Jal ki Bhit Subhash Neerav द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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Jal ki Bhit

पंजाबी कहानी

जल की भीत

किरपाल कज़ाक

अनुवाद : सुभाष नीरव

गहरी रात का चितकबरा अँधेरा फिरनी वाले घरों के ज़र्द उजाले के संग बाहरी पोखर की गंदली छाती पर बड़ी ही संकोची साजिश के साथ थिरक रहा था।

ठिठुरन भरे जाड़े के दिन थे। पूरब की हल्की हवा में गांव की फिरनी पर से उतरते हुए उसने महसूस किया जैसे चारों ओर फैली रहस्यमयी चुप टोने—टोटके का रूप धारण कर लिया हो। गेहूं की बालियों से लेकर सितारों के ऊँघते झुरमुट तक। पर ऐसे गुस्ताख पलों में हमेशा ही उसकी अपनी रूह अन्तर्मन में किसी शोरभरी खामोशी के साथ पसरे हुए आलम में भटक जाती। वह जीते—जी रेंगते हुए अहसास के कारण अपनी ही दहलीज के बीच किसी भय के साथ ठिठक जाता और दिहाड़ी के देहतोड़ श्रम के कारण चूर चूर हुई देह को...पत्नी के सामने निढ़ाल सा फेंकते हुए बेहूदगी और कमीनगी से भरी इच्छाओं की चाबुक से इस टोने—टोटके वाली खामोशी को तार—तार कर देना चाहता।

उसकी आहट से कहीं करीब से ही एक पक्षी फड़फड़ाकर उड़ा और दूर खेतों तक उसकी आवाज़ गूंजती रही।

उसने साथ वाले गांव के स्पीकर से रुक रुक कर आती पाठ की आवाज़ और नहर की ऊँची झाल से नीचे गिरते पानी की आवाज़ को साफ़ साफ़ सुना। चादर की तरह तने अँधेरे में उसने गौर से देखा, टुंडों की दुहाजू बहू जंगल—पानी होकर लौटते हुए बढ़इयों का ऊपरी मोड़ काट रही थी। हमेशा की भाँति गुरुद्वारे के सूने अहाते पर सरसरी नज़र डाल वह घर की दहलीज़ में आ खड़ा हुआ।

वैसे उसे अपनी ही दहलीज़ पर वापस लौटा लाने का सेहरा उसके माँ—बाप के सिर पर ही बंधता था। कभी वह सोचता, मानो वह पुरखों का श्राप ही भोग रहा हो। जिसमें कहीं उसकी नाजुक—सी पत्नी भी शामिल थी। जिसने अपनी सुहागरात भी माँ—बाप की गरीबी को याद करते हुए आँसुओं के संग बिताई थी।

तब... मासूम सी पत्नी के अल्हड़ चेहरे की ओर देखते हुए उसको लगा था, मानो यह विवाह का वर (जिसमें पत्नी की सांवली—सी सूरत के सिवा कुछ भी नहीं था) पड़ोसन लड़की से इश्क करने के शाप के तौर पर उसको नसीब हुा था। मगर महबूब लड़की जब भी मिलती, यही कहती, “नहीं... यह तो उसका जिस्म भोगने और गांव में बदनाम होने का शाप था।” कभी उसको अपने आपको ही लगता जैसे यह उसके अंदर की हवसभरी आग की राख थी जो उसको अंधा करती चली गई थी।

शायद इसलिए उसकी पत्नी को हमेशा ‘दिन' चढ़े रहते, वह लम्बी हा...य... के साथ उठती—बैठती तो उसके अंतर तक कुछ चुभता—सा चला जाता। आख़िर, वह कहाँ से कहाँ पहुँच गया था — तितलियों जैसी लड़कियाँ... और उनका छलकता यौवन, उसके सपनों में कहाँ दफ़न हो गया था ?

छकड़ा—सी सायकिल पर देह का भार फेंकता वह आँगन में आ खड़ा हुआ। बिल्कुल उन दहलीज़ों में जहाँ ज़रूरतें तांडव नृत्य किया करती हैं...और प्रश्न—चिह्न हवा में लटके रहते हैं। आख़िर, वे सपने कहाँ छू—मंतर हो गए थे जो उसने जवानी से पहले देखे थे। वह स्वर्ग कहाँ रह गया था जो पड़ोसन लड़की से इश्क करते हुए उसके सख्त आलिंगन में दिखा था।

बड़े ही आश्चर्य के साथ उसने देखा, आँगन में गहरी चुप जाल की तरह तनी पड़ी थी।

“है कोई...” दीवार के साथ साइकिल खड़ी करते हुए वह लगभग चीख ही पड़ा।

यूँ वह जानता था, अँधेरे में उसकी बीवी उसकी प्रतीक्षा कर रही होगी। शिद्‌दत से नहीं...डर के साथ...। डर ! जिसमें वह धँसती ही चली जाती है। उसके हर हुक्म के आगे सूखे पत्ते की तरह उड़ने से लेकर, बराबर के हो आए बच्चों को सोता—जागता छोड़कर, आख़िर तक का नाटक खेलने की सीमा तक...।

परंतु बिल्कुल अचरज की तरह उसकी पत्नी कच्चे कोठे की बजाय, पक्के कोठे से बाहर निकली तो वह देखता ही रह गया। पक्का कोठा जो सिर्फ़ नाम को ही पक्का है और जिसमें वह सिर्फ़ कहने को ही अकेला सोता है।

दीये की काँपती लौ में उसने पत्नी का नाजुक यौवन, उदास नज़रों से देखा।

“मैंने सोचा, शायद आज तुमने न आना हो।” वह कह रही थी।

उसको लगा मानो वह मचलकर कह रही हो। चकित—सा हुए को एक पल उसे कोई बात ही न सूझी।

“बच्चे ?” वह धीमे स्वर में पूछा। घर में पसरी चुप उसे हैरान किए जा रही थी।

“बड़े सुबह से ननिहाल गए हैं, छोटी गहरी नींद में सो रही है।” लोफर—सी अदा में उसने हवा को उंगली से काटते हुए कहा और कुछ अधिक ही अजीब—सी नज़रों से उसकी तरफ देखने लगी।

उसने चोर निगाहों से देखा, दीये की काँपती रौशनी में उसके साँवले होंठों पर रंगीन दातुन कुछ ज्यादा ही गाढ़ा था।

उसके जी में आया वह कलपकर कहे, “चैन नहीं पड़ता ननिहाल बना।” पर वह उसक बालों में आढ़ी—तिरछी गहरी मांग में ही उलझ गया और उसने अपनी फटी आँखों से उसके कहीं आने—जाने के समय पहने जाने वाले सूट में उसकी सूखी छातियों का कसा हुआ उभार देखा। बड़ा अजीब आलम था। उसे खड़े खड़े को भस्म कर देने वाला। एकाएक वह चौके में जाने की बजाय अंदर कमरे में चला गया। अगले ही पल वह आँखों में हँसी को रोकते हुए, माथे पर दिखावटी बल डाले और हल्क—से झटके के साथ बीवी को गोद में गिरा लिया।

“ठहरो, रोटी तो ले आऊँ।” लाड़ में वह बोली।

लेकिन वह उतावलेपन में उसके तंग गले में हाथ डाल रहा था। सस्ती अंगी में कतरनों की गेंद थी। एक पल उसके जेहन में कुछ बुझता चला गया, पर तसव्वुर के तेजी से फिसलते पल उसने जल्दी से लपक लिए। यह अलग बात है कि ऐसे गुस्ताख पल उसको हमेशा मंहगे पड़ते थे। फिर भी वह पता नहीं क्यों इन पलों के लिए तड़पता और तरसता था।

कभी वह सोचता, ये नाजुक पल ही तो उसकी ज़िन्दगी की पूंजी हैं। जिनमें उसका पड़ोसन लड़की से किया इश्क, मरकर भी खत्म नहीं हुआ और पत्नी के साथ सोते हुए आज भी वह हर भोगी, अनभोगी लड़की का तसव्वुर हाथों में दबाये सारी रात तड़पता और करवटें बदलता है।

रोटी के लिए मना करते हुए जब वह जल्दी से रजाई में घुस गया तो उसकी पत्नी की आँखों में खुशी नाच उठी।

“लाओ, दबा दूँ।” छूने के बहाने उसने कहा।

“नहीं...” वह जैसे तड़प उठा, ”तू सारे दरवाजे बन्द कर दे।”

कहीं दुबककर बैठी भूख मानो उठकर उसकी आँखों में बैठ गई और कितना ही कुछ था जो उसकी नज़र से हटता ही चला गया। हमेशा की तरह...।

बिना किसी विरोध के खड़े—खड़े ही वह कपड़े उतारने लगी तो पत्नी की सूखी सी देह उसको चुभती चली गई। एक दर्द उसके अंदर नसों में पसरता चला गया। पाँचवे बच्चे और दो गर्भपातों के बाद वह बस मरते मरते ही बची थी। ऐसे ही किसी समय में जब उसकी आँखों में बीवी का ढल गया सूरज, उसकी वासना के साथ छलकती आँखों में किसी मरूस्थल सा पसर जाता तो पता नहीं क्यों गांव की सारी सुंदर लड़कियों के साथ साथ वह पड़ोसन लड़की उसके जेहन में आ बैठती।

“आज तो हदें ही तोड़ दीं...” पता नहीं वह कहाँ खोया हुआ था।

“बस, यूँ ही... मैंने कहा, रोज़ उलाहने देता रहता है कि...”

इसके आगे कोई बात ही न सूझी, पर वह सब कुछ याद आया जो उसकी ज़िन्दगी में फांस की तरह चुभा पड़ा था और कभी भी होंठों पर नहीं आया था। जिसकी पीड़ा में वह और अधिक होश गवां लेती और वह एक लम्बा नाटक... पति के एक इशारे पर दोहराती जाती, जिसमें वह पता नहीं दिन चढ़ने तक क्या क्या नकल किए जाती।

शायद इसीलिए वह उसकी असुंदरता को पहले गालियों की छाजन में छांटता, और फिर किसी सुंदर सी दीखती लड़की का तसव्वुर कर, किसी उस देश में पहुँच जाता जहाँ सारी की सारी अपूर्ण इच्छाएँ बित्ताभर दूर खड़ी होकर उससे मसखरियाँ करती रहतीं।

...वह अलफ़ नंगी पड़ी थी और कतरनों की बनावटी गेंदें उसकी सख्त छाती में चुभती चली गई थीं। बाहर रात और गहरी हो गई थी। आँखों में दुबककर बैठी भूख जैसे मच उठी थी।

“मैं कहूँ, आज तो कमाल कर दिया तूने...।”

उसने एक सुरूर में कहा।

“मैंने सोचा, खुश कर दूँ आदमी को... रोज़ लड़ता है कि कपड़े नहीं पहनती, बाल नहीं संवारती।”

“सुन...” दीये की मद्धम रौशनी और मिली—जुली सांसों के बीच उन्होंने एक दूजे के धुँधले नक्श पहचानने की कोशिश की, और उसकी पत्नी को पति का वह एक एक नाटक स्मरण हो आया जिसमें नायक बनते ही उसकी हर तल्ख़्ाी रेशम की तरह नरम हो जाती और वह कुछ और ही लगने लगता।

“सुन...” अकारण ही वह बोला।

“कहो...”

“क्या बनना है आज फिर ? मिट्‌टरों की दीशी ?”

“ऊँ... हूँ...।”

“गडरियों की पासो ?”

“बिल्कुल नहीं।”

“और क्या ?”

“बस, मलकीत कौर...।”

“ले, वो तो तू है ही।”

“आज तो वही मिलेगी फिर...।”

“ले, तेरे में अब है ही क्या ?” न चाहते हुए भी उससे कहा गया।

“तुमने ही यह हाल कर दिया, नहीं तो...।” उसने ताना कसा।

“यूँ ही मूड न खराब कर देना कहीं। कोई मज़ेदार बात कर।”

”क्यों तंग है बहुत ?”

“हूँ।”

“तो हल्का हो जा।”

“तभी तो कहा है, कोई बढ़िया सी औरत बनकर दिखा आज।”

“आज नहीं, आज तो मलकीत कौर ही मिलेगी।”

“क्यों ? किसलिए ?”

“मेरी मर्ज़ी।”

और कोई दिन होता तो वह उसकी इतनी सी हुक्म—अदूली की बड़ी सी सज़ा सुनाता, मगर उस समय उसने बहुत ही कोमल स्वर में कहा, ”एकदम पगली है तू भी।”

“देख, एक ही बात कहूँ ?” वह झिझकती—सी बोली।

“बोल...।”

“दूसरियों के बारे में सोचता रहता है, कौन सा पास आ जाती है कोई। बस, सपने ही हैं...भला, अगर आज यूँ ही सोच ले कि मैं ही आई हुई हूँ गौना करवा के।”

एक पल चुप पसर गई।

रजाई में और गहरे घुसते हुए उसने दीये की बाती और तेज़ कर दी। परंतु फिर भी कोठरी में पड़ी गिनी—चुनी चीजे़ उनकी नज़रों से ओझल हो रही थीं।

“चल, फिर छोटी साली ही सही।” उसने छूटती हुई बात को लपका।

“बिल्कुंल नहीं।”

“क्यों ?”

“मेरी मर्ज़ी...।”

“...”

“तुझे दस साल हो गए एक से एक टटोलते हुए। कभी मेरी भी मर्ज़ी पूछी है ?”

“अच्छा, ठीक है। एक बात कर फिर...।”

“...”

“बोल।”

“पहले कसम खा।”

वह निश्चेष्ट पड़ी थी और एकटक छत के आर—पार देख झांक रही थी।

“...”

“बोलती क्यों नहीं ?”

“हूँ...।”

“पहले कसम खा, मानेगी।”

“तेरी कसम।”

“चल बता, आज किसके साथ सोना चाहती है तू।”

“...”

कोई बहुत भयानक चुप जो कहीं खेतों में कराह रही थी, कमरे में आकर लटक गई।

“बता जल्दी।”

वह बहुत तेज कहीं भागा जा रहा था।

पत्नी कब्र की तरह खामोश थी।

“बोलती नहीं।” उसने उतावला होकर कहा।

“छोड़ो भी...।” एक लम्बी आह और बस...

अचानक कमरे में लटकी चुप, एक पल को दोनों के जिस्मों से चिपक गई।

एक पल दुनिया का सारे मर्द उसकी आँखों के आगे आ खड़े हुए, बेशक वह दौड़ और हाँफ रहा था, मगर अचानक उसे सब की सब धुँधली वस्तुएँ साफ़ दिखने लग पड़ी थीं। फिर उसने दुलारते हुए पत्नी का चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर उसकी मस्त आँखों में पराये मर्दों की भीड़ देखने की कोशिश की। मगर उसको अपनी और सिर्फ़ अपनी सूरत का भ्रम, साँप की तरह डस गया और उसने निश्चिंता के साथ कहा —

“चल, जिसका मर्ज़ी नाम ले ले...आज खुली छूट है तुझे।”

“...”

परंतु वह उसी तरह छत के पार झांक रही थी। चुप और स्थिर...।

अचानक उसको लगा मानो दस बरसों से वह सचमुच तवे पर एक बासी रोटी की तरह पड़ी रही हो, एकदम कोयला हुई... और इस चंचल अहसास के कारण उसका दिल घबराने लग पड़ा।

“जल्दी बता फिर...।” अपनी किसी अपूर्ण इच्छा की परिक्रमा करता वह फिर से दौड़ने लगा।

बड़ी ही गुस्ताख निगाह से उसने देह पर फैले पति को देखा, उसकी मुंदी आँखों में झांका। उसको लगा मानो पति के खुले बाल उसका मुँह सहला रहे हों... भारी दे हके नीचे पड़ी जैसे वह पिसती जा रही थी... और अचानक, पता नहीं कैसे, उसके द्वारा कमरे के ऐन बीच में लटकी चुप एक झटके से चीरी गई।

“अच्छा, आत्मा तृप्त कर दे फिर...” पता नहीं वह कहाँ से बोली।

“मुँह से तो कुछ कह...।”

“पटवारियों का गिंदर बन जा फिर...।”

भूकम्प—सा जलजला और बस... दुनिया का ज़र्रा—ज़र्रा मानो पथरा गया। उसकी नाजुक सी देह पर भारी देह मानो शिला—पत्थर हो गई और आँख के फेर में ही सब कुछ सुन्न हो गया।

अगले ही क्षण, क़हरों का एक तूफान... और उसके खुले बालों की अग्नि जीह्वायें, और के माथें में एक पल के लिए चमकी चंद्रमा की छोटी सी किरन को पूरा का पूरा निगल गईं।

उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। उसको पता भी न चला, वह कैसे और कब आँगन में आ गिरी थी और उसके नंगे बदन को ठिठुरती रात की तीखी किरचें चीरती चली जा रही थीं।

“कुतिया ! ये कब से चल रहा है तेरा कंजरखाना...।”

वह बेतहाशा चीख रहा था और खेतों तक पसरी चुप, टुकड़े—टुकड़े हो गई थी।

दर्द में उसने आँखें मूंद लीं। फिर वह पैरों पर उठ खड़ी हुई।

भयभीत अँधेरे में खड़ा, एकदम नंगा, वह क्रोध से काँपने लगा। उसके जी में आया कि वह उसकी बोटी बोटी कर दे... या जान से ही मार दे... पर वह जैसे ही क्रोध में आगे बढ़ा, ठिठक गया।

“ख़बरदार अगर हाथ लगाया...” वह बेतहाशा चीखकर बोली और उसकी नग्न देह में से एक ज्वाला उठी।

ठिठुरती रात में वह सुन्न हो गया। उसने देखा, वह नाजुक—सी औरत जलती चिता की तरह धधक रही थी।

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किरपाल कज़ाक ( जन्म : 15 जनवरी, 1943)

पंजाबी के प्रख्यात कथाकार। छह कहानी संग्रह —‘काला इल्म', ‘सूरजमुखी पुछदे ने', ‘अद्धा पुल', हुमस', ‘गुमशुदा' और ‘अंतहीण' । एक उपन्यास ‘काला पत्तण'। एक नाटक ‘कंधां तो बिना'। चार शोधपरक पुस्तकें, एक —‘किता शब्द कोश' प्रकाशित। ‘पंजाबी सभ्याचार कोश' प्रकाशाधीन।

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