शहादत Pradeep Mishra द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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शहादत

कहानीः

शहादत

बस की गति मंद पड़ चुकी थी। वह ज्यों—ज्यो उस मुकाम को छू रही थी, जिससे ठीक सामने से मेरे गॉव का कच्चा रास्ता शुरू होता है। मन पर छायी विरक्ति की धुन्ध गहराने लगी थी।.... बस धूल उड़ाती आगे बढ़ गयी थी। अब स्टाप पर मैं था तो अकेला खड़ा, पर एक मौन विलाप अर्न्तमन के सन्नाटे को बीधता कब से मेरा पीछा कर रहा था, जिसे सुनने से मैं चाह कर भी बच नही सकता। आखिर मेरे पड़ोस में ही घटित हुआ है सब—कुछ.... लोग तंत्र में आस्था रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को थर्रा देने वाला शर्मनाक वाक्या। एक जघन्य अपराध।

पिछली बार जब मैं घर आया था, तो यही बस स्टाप पर फौजी काका मिल गये थे। कुशल—क्षेम के उपरान्त गॉव की तीन मील की दूरी हमने बतियाते हुए पूरी की थी। काका कह रहे थे, ‘‘ जानते हो बेटवा, तुम्हारी काकी ने इधर एक नई जिद पकड़ ली है। कहती है सुन्दर के जाने के बाद इस गॉव से मन उचट गया हेै। चलो खेती बारी बेच कर पास के शहर में बस जाय... पर मैं तो शहर में रहने के नाम पर कॉप जाता हूॅ। इसी शहर में बुखार से तपते अचेत सूरज को लिए आधी रात को हर नामी—गिरामी डाक्टर की चौखट पर गुहार करता रहा पर किसी ने उसके माथे पर हाथ तक न रखा। कितना आसरा लेकर डाक्टर चन्द्रा के पास गया था। उन्होने भी झटक दिया था, ‘चलो.... चलो अस्पताल ले जाओ इसे, ही इज सो सीरियस....‘ अस्पताल वहॉ के दोनो सीनियर डाक्टर सेमीनार अटेन्ड करने लखनऊ गये थे। आखिर काल की व्यूह रचना के आगे मैं कुछ न कर सका। जो होनी थी वह हुआ। पर मन में अब तक मलाल है एक कोशिश तो करनी चाहिए थी उपलब्ध डाक्टरो को .... मानवता के नाते ही सही, पर रात में कौन नींद खराब करे अपनी। कोई मरता है तो मर जाय....‘‘ काका रोै में बोले जा रहे थे।

‘‘.... बेटवा! वो जमाना कुछ और था, जब लोग डाक्टर को ईश्वर का दूसरा रूप कहते थे। मुझे डाक्टर राम नारायण तिवारी का चेहरा आज भी याद है.... एन चैत में राम नवमी को मेरी तवीयत बहुत बिगड़ गयी। बाबू जी भाग कर अस्पताल पहुॅचे। छुट्‌टी का दिन था। डाक्टर साहब घर पत्नी के साथ श्रीमद्‌ भागवत की कथा सुनने बैठे ही थे कि कम्पाउन्डर ने जाकर कान में इत्तिला दी.... पल भर में उंगली से कुश—पैती निकाल कर पत्नी को दे दी और पंडित जी से क्षमा मॉग कर अस्पताल आ पहुॅचे। क्या सेवा भाव था उनमें। परचित अपरचित मरीज के प्रति एक सा व्यवहार। सबके कष्ट हर लेने को तत्पर। पहले लोग डाक्टर को भगवान कहते थे, पर आज का डाक्टर खुद को भगवान समझता है....‘‘ बोलते बोलते काका रूके थे। नजरे घुमा कर मेरी राय जाननी चाही थी ,‘‘ काका, आप ठीक कहते हो पर जब सारा समाज दूषित हो गया हो तो डाक्टर भी तो उसी का हिस्सा है.... अभी कल की घटना है। सिविल लाइन की व्यस्त सड़क एक रिक्शे वाले को मिरगी का दौरा पड़ गया। उसका शरीर जोर—जोर से कॉप रहा था। मुॅह से सफेद झाग निकल रही थी। आस—पास अच्छी भींड़ जमा हो गयी। कुछ टाई—सूट मार्का लोग सहानिभूत दर्शा रहे थे पर दूर से। अचानक भीड़ का परे ढकेलता एक गवार व्यक्ति,‘ रामू—रामू, कहता उसके पास आया और उसने रामू को सुघांने के वास्ते चमड़े के जूते की मॉग कर डाली....‘

‘‘ फिर क्या हुआ‘ काका ने उत्सुक हो पूछा था।

‘‘ भीड़ को छटते देर नही लगी। लोग अपने जूते बचाकर खिसकने लगे और तो और काका, रिक्शे पर बैठाकर जिन दो सवारियो को बेचारा खींचकर ले जा रहा था। वे भी किसी झंझट में न पउ़ने और किराया बचा लेने की दोहरी गणित पे चलते सबसे पहले नौ दो ग्यारह हो चुकी थी।‘‘

‘‘ इसी को कहते है किसी कटी उंगली पर पेशाब न करना।‘‘ काका किटकिटा उठे थे।

उस दिन वार्तालाप का सिलसिला घर पर पहुॅच कर ही रूका था।

आस पास कोई परिचित न दिखा तो अनमने भाव से मैंने गॉव की राह पकड़ ली। गोैधूलि की बेला। मन्द बयार। दोनों ओर दूर तक फैले हरे—भरे खेत। लेकिन धान की लहलहाती हरियाली भी ऑखो में सुकून की एक चमक पैदा करने में नकाम थी आज। सिर पर उदासी की चीले मॅडरा रही थी और स्मृतियो की दलदल में भी तब्दील थी मेरे गॉव की उबड़—खाबड़ पगडण्डिया....छुटि्‌टयो में जब वह गॉव आते तो राह चलते बच्चे उन्हे अकसर घेर लेते और पूछते,‘‘ फौजी काका आप को तोपो से डर नही लगता?‘‘

‘‘नही बच्चो! तोपे हमारे लिए वैसी ही है जैसे तुम्हारे लिए खिलौने। हम दिन—रात उसी के साथ खेलते है तो फिर डर कैसा?‘‘ वे बड़े प्यार से बच्चो को समझाते।

‘‘काका.... काका, आपके पास तो इतनी सारी तोपे है फिर उसे गॉव क्यो नही लाते....हमको दिखाने।‘‘ मासूम सोनू पूछ बैठता।

‘‘ सोनू बेटा तोपे तो दुश्मन को डराने के लिए होती है। भला हमारे इस छोटे से गॉव में उनका क्या काम। तोपे बस देश की सीमाओ पर ही अच्छी लगती है। जब तुम बड़े हो जाओगे तब मै अपने साथ ले चलूगॉ तुम्हे तोपे दिखाने।‘‘ वे बच्चो के छोटे से छोटे सवाल को भी नजर अंदाज नही करते। उन्हे बच्चो से घुलना—मिलना बोते करना बेहद भाता था।

देर रात तक गॉव की चौपाल पर उनका बैठका चलता। वह लोगो को अपने फौजी जीवन के रोचक संस्मरण सुनाते और खूब ठहाके लगाते.... पल भर में इनकी गॅूज पूरे गॉव भर में फैल जाती। यह काका के ठहाको का सहज आकर्षण था कि गाय भैंस की चारा—सानी में फसे उनके हित—मित्र अपने को रोक नही पाते और चौपाल की ओर बढ़ आते। यही ग्राम पंचायत से लेकर अमेरिका रूस तक में घट रही राजनैतिक उथल—पुथल की चर्चा होती। हुक्के गुड़ड़ाये जाते। डाकिया बाबू व चौकीदार में तो लम्बी चौड़ी गप्पे हाकने की होड़ लग जाती। ये बात और थी कि उनकी बातो को कोई बच्चा भी गम्भीरता से नही लेता था। रोना रोने की बीमारी से ग्रस्त सेवानिवृत बैंक बाबू त्रिपाठी जी आदतन काका पर व्यंग्य—बाण छोड़ देते,‘‘ हमका देखो, जिनगी भर बैंक की फाइलो में ऑख फोड़ते रहे। आज पेन्शन भी नही मिलती उधर दस साल की नौकरी और फिर मजे ही मजे। भई, असली मलाई तो यही काटते है फोैज वाले....‘‘ सैनिको को पेन्शन ओर कुछ रियायते सरकार देती है तो कोई एहसान नही करती। यही जवान अट्‌ठाइस सौ फीट की ऊॅचाई पर सर्दी गर्मी बरसात भी झेलते है। जब नेताओ के कोरे भाषण पेलने, सिलान्यास करने और शरीर में चर्बी की बढ़ोत्तरी के करने के बदले इतनी सुविधायें, ताम—झाम मिलती है तो फिर सैनिक तो देश के लिए जान की बाजी लगाते है....‘‘ काका बिफर पड़ते। अन्त में मुखिया जी के हस्तक्षेप से मामला ठन्डा पड़ता।

चौड़े माथे और रोबीली मूॅछो वाले फौेजी काका देखने में भले ही सख्त लगते पर थे वह बड़े ही भावुक इन्सान....गॉव की सुखिया आजी पर जब नाम के विपरीत दुखो का पहाड़ टूटा तो उनके वे सभी सगे सम्बन्धी कन्नी काट गये, जिनकी क्रूर दृष्टि आजी की पॉच बीघा जमीन पर थी। उस वक्त एक फोैजी काका थे जिनसे छटपटाती आजी का कष्ट देखा नही गया। वह आजी को सरकारी अस्पाताल ले गये और अपने पैसो से ट्‌यूमर का आपरेशन करवाया। फोैज से बड़े मुश्किल से मिली छुटि्‌टयो में से आधी उन्होने आजी की सेवा में लगा दी थी।

रामदीन के जीवन में भी फोैजी काका किसी फरिश्ते की तरह आये थे.... उसके छप्पर के घर में उस घड़ी आग लगी, जब गॉव के अधिकांश मर्द धान की कटाई करने खेतो में जा चुके थे। घर धूूॅ—धूॅ कर जल रहा था। पानी डाल कर आग बुझाना बहुत मुश्किल था। रामदीन खड़ा रो चिल्ला रहा था और मदद की गुहार लगा रहा था। गरीब की जीविका के एक मात्र साधन दोनो बैल लपटो में फॅस चुके थे। हल्ला—गुल्ला सुनकर काका वहॉ पहुॅचे। मौके की नजाकत भॉपने में उन्हे देर न लगी। मोटे कम्बल से पूरे शरीर को ढका और पल भर में जलते घर में घुस गये बैलो की रस्सी खोलने। अब बाहर रोने वालो में काकी भी शुमार हो गयी थी। उनकी जान में जान तब आयी, जब बैलो के साथ—साथ काका भी हसॅते हुए बाहर आ गये। घर आकर काकी उनसे खूब झगड़ी। पर काका टस से मस न हुए। ‘परहित सरस धरम नहीं भाई‘ की भावना तो उनके स्वभाव में रच—बस चुकी थी। आखिर वह ठहरे मातृभूमि के सच्चे सिपाही।

काकी हार मानकर चुप हो गयी पर काका देर तक मुझसे हामी भरवाकर बोलते रहे,‘‘....मैं कैसे समझाऊॅ इस कम बुद्धि औरत को, यह चाहती है कि मैं रामदीन के बैलो को जल कर मर जाने देता। बेटवा! तुम तो बहुत पढ़े लिखे हो समझा पाओ तो समझाओ इसे....‘‘ यह जिम्मेदार मुझ पर छोड़कर बोलते—बोलते काका भावुक हो चले, ‘‘ अभी कल के अखबार में पढ़ा है कि अक्षरधाम मन्दिर में घुसे आतंकवादियो की लोकेशन परखने के लिए एन. एस. जी. के हमारे कमाडो मन्दिर प्रांगण में बेखौफ चहलकदमी कर उनको गोली चलाने के लिए उकसा रहे थे। आतंकवादियो के सधे निशाने से एक जवान शहीद हो गया और एक गम्भीर रूप से घायल। पर कुछ घण्टो में मन्दिर पर फिर हमारा नियन्त्रण हो गया था। मै तो यह पढ़कर और कर्तव्य पालन से उस पावन दृश्य की कल्पना करके ही रोमांचित हो उठा। कबिवर माखन लाल चतुर्वेदी की‘ पुष्प की अभिलाषा‘ स्मरण हो आयी ‘.....मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ पर तुम देना फेक। मातृभूमि को शीश चढ़ाने जाये बीर अनेक।‘ बेटवा! देश की रक्षा में तनमन से लगे सैनिक अनाथ नही होते, उनके पीछे भी बूढ़े मॉ—बाप, बीबी—बच्चे का भरा पूरा परिवार होता है। जिम्मेदारिया होती है। अनेक सपने होते है पर.... बात जब देश के आन की आती है तो फिर शहीद होना सबसे सुनहरा स्वप्न बन जाता है एक भारतीय सैनिक का....‘‘ मैं तल्लीन हो काका को सुन रहा था कि इसी बीच काकी ने व्यवधान डाल दिया। वह दो प्याली चाय बनाकर रख गयी और ठण्डी होने से पहले पी लेने की हिदायत भी दे गयी थी।

हॅसमुख व जिंदादिल काका को पहली और आखिरी बार रोते हुए मैंने तब देखा था, जब उनका इकलोैता बेटा क्षेत्र में फैली महामारी की भेंट चढ़ गया था। उस हादसे को दशको गुजर जाने के बाद भी जब मैं सामने पड़ जाता तो पुकार लेते,‘‘बेटवा पढ़ाई कैसी चल रही है? खूब मन लगाकर पढ़ रहे हो न.... तुम्हे बड़ा अफसर बनके दिखाना है....‘‘ फिर एकाएक उनकी आवाज सर्द पड़ने लगती। ‘‘....मेरा सूरज जिंदा होता तो आज तुम्हारे इतना बड़ा होता जब तुम्हे देखता हूॅ बेटवा मुझे उसकी बहुत याद आती है। दिन—दिन भर तुम्हारे साथ रहता। साथ पढ़ने व खेलने जाता। तुममे तो उसकी जान बसती थी। आज तक याद है घर में खीर या सेवई बनती तो झट तुम्हे बुलाने भाग जाता....‘‘ धीरे—धीरे उनका स्वर विषाद की गहरी खाई में खो सा जाता। काका के चेहरे पर बिखरे तमाम दर्द को सहेज लेने की कोशिश मे मैं कह उठता,‘‘ काका क्या मैं आपका बेटा नही हूॅ....‘‘ और वह लपक कर मुझे ऐसे छाती से लगा लेते जैसे सच में उन्हे उनका सूरज मिल गया हो। बड़ी स्नेहिल दृष्टि से मुझे निहारने लगते। पलक झपकते मुख पर हॅसी की धूप खिल उठती और वह घर ले जाकर मट्‌ठा खिलाये बिना मुझको नही छोड़ते।

इकहत्तर के भारत—पाक युद्ध के समय काका राजस्थान की सीमा पर तैनात थे उन दिनो अनपढ़ काकी नियमित रूप से रेडियो पर समाचार सुनने मुखिया जी के बरामदे में पहुॅच जाती। जब भी काकी भारतीय सैनिको के शहीद होने का समाचार सुनती, उनकी ऑखे डबडबा आती। धैर्य चुकने लगता। मुखिया जी उन्हे समझाते और दिलासा देते। युद्ध खत्म होने पर फौजी काका गॉव तो लौटे पर अपना बायां हाथ गवांकर। लड़ाई में उनका बायां हाथ गोलियो से बुरी तरह जख्मी हुआ था। जान बचाने के लिए डाक्टरो ने यह हाथ कलाई के पास से काट देना पड़ा था। इस युद्ध के संस्मरण सुनाते वह बताते,‘‘ उस दिन हम तीन साथी गड्‌ढे में बैठकर गोलियॉ चला रहे थे। दुश्मनो को हमारे ठिकाने का अंदाजा हो गया और उन्होने हम पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। दोनो ओर से गोलियां चलने लगी.... मेरे दोनो साथी दुश्मनो की गोलियो से शहीद हो गये। बायें हाथ में मेरे भी गोली लगी थी लेकिन मैने तब तक फायरिंग बन्द नही की, जब तक मारे दर्द के मैं बेहाश नही हो गया.... बस समझ लो कि उस दिन मौत मुझे छू कर निकल गयी....‘‘ वीरता के लिए जब काका को सरकार ने ‘शौर्य पदक‘ से सम्मानित किया, तो उनका ही नही सारे गॉव का सिर गर्व से ऊॅचा उठ गया था। अखबार में छपी काका की फोटो देख काकी फूले नही समा रही थी।

सेवानिवृति के पश्चात काका पूरी तरह गॉव के होकर रह गये थे। शहर में बसने की काकी की मॉग को वह पहले ही खारिज कर चुके थे। ऐसे में गॉव की जन समस्याओ से उनका जुड़ाव स्वाभाविक था। सरकारी प्राइमरी स्कूल दूसरे पुरवे पर था। बरसात के दिनो में बच्चो का स्कूल पहॅुच पाना असम्भव हो जाता, क्योकि दोनो गॉवो के बीच से होकर निकले पहाड़ी नाले में जल भराव हो जाता था। एक दिन काका ने मुखिया जी से बच्चो के वास्ते गॉव में एक स्कूल खुलवाने की बात चलायी। मुखिया जी ने सहर्ष हामी भर ली। फिर दोनो ने तहसील की खूब दौड़—धूप की। जिलाधिकारी से संस्तुति कराकर कागज ऊपर भेज दिया। बस आर्डर आना बाकी था कि अचानक ग्राम पंचायत चुनाव की घोषणा हो गयी। चुनाव अचार संहिता लागू हो गयी। स्कूल का मामला अधर में लटक गया। यह सुन काका का चेहरा फक पड़ गया, तो मुखिया जी ने पीठ थपथपाकर हौसला अफजाई की,‘‘फिकर न करो.... फौजी! स्कूल तो बन कर रहेगा, चार माह बाद सही....‘‘।

अब तक निर्विरोध चुने जाने वाले मुखिया जी को पहली बार चुनाव का सामना करना पड़ा। उनका मुकाबला था सुमिरन सिंह से जो हाल ही मे चार माह की जेल काट कर निकला था। प्रारम्भ में दोनो प्रत्याशियो में कही कोई मुकाबला न दिख रहा था। मुखिया जी की सामाजिक प्रतिष्ठा व सम्मान था। जन सेवा का व्रत था। कराये गये तमाम विकास कार्य थे। वही सुमिरन के पास सिर्फ जाति वाद का ब्रहास्त्र था, जिसका वह बाखूबी इस्तेमाल कर रहा था। जैसे—जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे थे....लड़ाई एक तरफा नही रह गई थी। ‘सिंह वाहिनी‘ अंकित नेम प्लेट वाली बुलेट पर लखदख कुर्ता—पायजामा झाड़े सुमिरन घड़घड़ाता हुआ निकलता, तो उसे देख ठाकुर टोले के युवा—बुजुर्ग सभी के सीने अनायास ही चौड़े होने लगते।

चुनाव परिणाम आये, तो इस बार लोकतंत्र हारा। जाति विशेष की जीत हुई। क्षत्रिय बाहुल्य इस ग्राम पंचायत ने शायर अदम गोण्डवी की इन लाइनो को प्रासंगिक बनाकर दम लिया—जितने हरामखोर थे पुरवे—जवार में, प्रधान बनके आ गये पहली कतार में। सुमिरन समर्थको ने चुटकी ली ‘कल के लौड़े ने मुखिया को पटखनी दे दी... बेचारे का बुढ़ापा बिगाड़ दिया...‘ इस अनपेक्षित सत्ता परिर्वतन ने गॉव की आबोहवा ही बदल दी... मुखिया जी के साथ जहॉ ऊॅच—नीच हर तबके के लोग समान भाव से निकल पड़ते थे। वही सुमिरन के पीछे चलते उसके कुछ सेलेक्टेड चमचे व भाड़े के दो बंदूकची। उसकी —‘ भय बिन होय न प्रीत‘ की सोच को चरितार्थ करते। वह स्थानीय सांसद—विधायक से अपने सम्बन्धो की डींग हांकता। थाने की दलाली करने व रूपये लेकर सरकारी जमीन का पट्‌टा बनाने के खेल में बड़े ही मनोभोग से लगा रहता।

हित—मित्रो की सलाह मान वर्षो से टल रहे हार्निया के आपरेशन को कराने मुखिया जी बड़े बेटे के पास लखनऊ क्या गये? सुमिरन की कथित विस्तारवादी दृष्टि ग्राम सभा की उसी जमीन पर गड़ गयी जिस पर स्कूल प्रस्तावित था। नुक्कड़ की उस जमीन का वह व्यवसायिक उपयोग करने की ताड़ में था। गॉव में तनातनी के आसार बढ़ रहे थे... पर यह अन्दरूनी तनाव खुलकर सतह पर उस वक्त आया, जब सुमिरन कुछ लोगो को ले जमीन की नाप—जोख कराने आ पहुॅचा। काका से देखा न गया और वे सामने आ गये....

‘‘... का हो सुमिरन! सारे जवार में यही बारह बिस्वा जमीन रह गयी है नाप जोख के वास्ते... और वो भी लेखपाल को लिये बिना, इसे मुखिया जी स्कूल के नाम बहुत पहले कर चुके है... अब इस पर हाथ न डालो तो ही ठीक है...‘‘

काका के तेवर देख सुमिरन चुप रहा। उसके बंदूकधारियो ने कुछ हलचल दिखायी तो काका ने जोर से डपट दिया।

‘‘पन्द्रह साल की नौकरी में बारह साल तो बस तोप पर सवारी की है...यह गोली—बारूद बहुत देख चुका हूॅ...तुम सबकी भलाई इसी में है कि मुखिया जी के लौटने तक इधर दिखायी न देना..‘‘

‘‘ ठीक है काका... एस.डी.एम. खड़े होगे तब तो नापने दोगे...‘‘ इतना कह सुमिरन उस दिन तो वहॉ से चला आया। पर उसके शातिर दिमाग ने क्षण भर में भविष्य का बेहद भयावह व रक्त रंजित तानाबाना बुन लिया था....।

बरसात आने वाली थी। अच्छे मानसून के आसार बन रहे थे। गॉव में सबसे पहले धान की रोपाई करवाकर काका भी फुर्सत में थे। सो उन्होने ऑगन की टूटी—फूटी मिट्‌टी की दीवारो को पक्का करवाने का निश्चय किया। शहर जाकर वह सहकारी बैंक में जमा तीस हजार रूपये निकाल कर लाये। दौड़ धूप कर ईट, सीमेंट और बालू का इंतजाम किया। शुभ दिन तिथि देखकर अपने हाथो से काका ने दीवार की नींव में पहली ईट रखी। पण्डित जी ने पूजा पाठ किया और काकी ने बड़े उत्साह से गॉव घर में भगवान का प्रसाद बॉटा।

दीवार का निर्माण कार्य धीरे—धीरे गति पकड़ रहा था कि एक सुबह सारे गॉव में सनसनी फैल गयी। समय जैसे सांसे थामें ठहर गया था। जिसे देखो वही काको के घर की ओर भागा जा रहा था। मौत रात के स्याह ॲधेरे के बीच चुपके से उनके घर की चौखट लांघ गयी थी। उनपर धारदार हथियारो से हमला हुआ था। सिर पर काफी गंभीर चोटे आयी थी। कमरे में रखे बक्से का ताला टूटा था और कुछ नोट व कागज आस पास विखरे पड़े थे...सुनियोजित हत्या काण्ड का बड़ी चालाकी से चोरी की वारदात में तब्दील कर दिया गया था। दुश्मन से लड़ते हुए देश के लिए शहीद होना जिस सिपाही का स्वप्न हो, उसे मिली भी तो ऐसी निरर्थक मौेत! जो कुछ सरहद पार के दुश्मन न कर सक,े उसे देश के भीतर पल रहे गद्‌दारो ने कर दिखाया...दशको तक देश की सीमा पर मौत से ऑख मिचौली खेल चुके फौजी काका के ऐसे अकल्पनीय अन्त ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया।

गॉव पहॅुचकर सीधे घर जाने का मन न हुआ। पोखरे के मुहाने पर भतीजा चिन्टू खेलते दिख गया। उसे बैग पकड़ा मैं फौजी काका के घर की ओर बढ़ गया। घर पर ताला पड़ा था। पड़ोस से पता चला कि कुछ दिन पहले काकी के भाई आये थे और उन्हे साथ ले गये। अनायास मेंरी दृष्टि समीप स्थित उस जमीन पर टिक गयी, जिस पर काका नन्हें—मुन्नोें के लिये स्कूल बनवाना चाह रहे थे। मैं अवाक खड़ा देखता रह गया...वहॉ टीन—शेड की छत डाल एक अस्थाई दुकान का निर्माण हो चुका था। चहल—पहल थी। बाहर पड़ी बेन्च पर कुछ लोग बैठे थे। दुकान के सामने लगे बोर्ड पर ग्राहको को आकर्षित करने हेतु बड़े—बड़े अक्षरो में लिखा था—‘‘ आपका ध्यान किधर है, मधुशाला इधर है‘... देशी शराब की दुकान !

प्रदीप मिश्र

संपर्क :— द्वारा कृष्णा पुस्तक केन्द्र, तहसील गेट के सामने, जनपद बलरामपुर

(उत्तर प्रदेश) पिन— 271201

मेबाइल— 9839844781