स्वाभिमान - लघुकथा - 31 Pradeep Mishra द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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स्वाभिमान - लघुकथा - 31

1) लघुकथा :

काले-अंग्रेज

‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की तपिश को किशोरावस्था में उन्होंने बड़े करीब से महसूस किया था | संगी – साथियों के साथ ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो”… ‘वन्देमातरम” के नारे लगाये थे | निर्भीकता का पहला पाठ गोरे सिपाहियों से आँख मिचौली खेल कर ही सीखा था उन्होंने | देश आजाद हुआ, तो उन्होंने एक इंटरकॉलेज में अध्यापक की नौकरी पकड ली | धीरे – धीरे तरक्की पाकर वह कॉलेज के प्राचार्य तो बन गये, पर उनकी वेशभूषा, उनका पहनावा नहीं बदला… वही खादी का कुर्ता-धोती, गाँधीटोपी, गले में अगुचा, जिसे गर्मियों में तपती धूप से बचाव के लिए वह पगड़ी की तरह सिर पर बांध लेते थे |

जेठ की भीषण गर्मी थी | उस दिन कॉलेज में सरकारी छात्र वृत्ति की परीक्षा आयोजित थी | कॉलेज गेट पर पुलिस बल तैनात था | सायकिल की चेन बार –बार उतर जाने के कारण वह नियत समय से कुछ देर से पहुंचे |जब तक की चपरासी उन्हें देख दौड़ कर आता, गेट पर तैनात दरोगा ने उन्हें रोक लिया ...

‘’...कहाँ एकदम से दबाये चले जा रहो हो ...”

‘’...सर...सर ...ये हमारे कॉलेज के प्रिसिपल साहब है ...’’ चपरासी उनकी सायकिल अपने हाथ में लेते हुए बोला |

‘’...कपडे से तो नहीं लगते ...’’दरोगा ने पास खड़े सिपाहियों की ओर देख बड़ी बेतकुल्फी से कहा और फिर हंस पड़ा |

उन्होंने घूम कर देखा, तो एकबारगी लगा कि जिन अंग्रेज सिपाहियों को वह कब का खदेड़ चुके है, एकबार फिर वही खड़े उनका उपहास कर रहे है ...आम भारतीय के प्रति वही जलालत का भाव ! वही कुटिल अट्टहास !! तिरस्कार की आंच से उनका तन-बदन जल उठा | अपनी बड़ी – बड़ी भावपूर्ण आँखे उन्होंने दरोगा के चेहरे पर गड़ा दी और गंभीर स्वर में बोले,

‘’...ए...मिस्टर ...पुलिस विभाग में नौकरी करते हो और आदमी को उसके कपड़े से आंकते हो ...सफेदपोश अपराधियों को तो मिलकर तुम्हे पुरस्कृत करना चाहिए …खैर, मैं आज ही पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखूंगा और उन्हें बताऊंगा कि उनके विभाग में अभी सुधार की बहुत जरूरत है ...’’ इतना कहकर वह गेट के भीतर प्रवेश तो कर गए, पर एक सवाल अनवरत उनके दिमाग में उमड़ –घुमड़ रहा था की आखिर देश इन काले अंग्रेजो से कब मुक्त होगा ...???

***

2) लघुकथा:

ईमान

डाक्टर वर्मा की क्लीनिक में बैठा वह उनसे हिसाब-किताब में व्यस्त था कि तेरह-चैदह साल का एक लड़का झिझकते हुए अन्दर आया और उनकी ओर मुखातिब होकर बोला, ‘‘ डाक्टर साहब... बाहर मोटर साइकिल के पास ई रूपया पड़ा मिला है... लीजिए...‘‘

सौ-सौ रूपये के पाॅच नोट! एकदम कड़क। अचम्भित हो डाक्टर वर्मा ने पूछा, ‘‘ शर्मा जी, देखिए कहीं आपका रूपया तो नही गिर गया...‘‘

‘‘ नही, साहब... ये रूपये मेरे नही है...‘‘ जेब चेक कर वह एक झटके में सच बोल गया। पर डाक्टर साहब को बड़े इत्मीनान से नोट जेब के हवाले करते देख वह अन्दर ही अन्दर झुंझला उठा... लगा जेैसे सच बोलकर उसने बेहद बेवकूफाना हरकत कर दी है। एक सच के एवज में हुआ पांच सौ रूपये का त्वरित नुकसान उसे कचोट गया।

‘‘... देख रहे हैं, शर्मा जी! हम पैसे वालों की दुनिया से ‘ ईमान ‘ नाम की जो चीज कब की लुप्त हो चुकी है, वह आज भी कहीं न कही जिन्दा है, लेकिन सिर्फ उन्ही लोगो के पास, जिनकी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नही है...‘‘

एकबारगी महसूस हुआ जैसे कुशल मनोचिकित्सक की भांति डाक्टर साहब ने उसकी मनःस्थिति पढ़ ली है। वह कुछ झेप सा गया। इससे उबरने के उपक्रम में वह इधर-उधर देखन लगा, तो निगाह क्लीनिक से निकल रहे उस लड़के पर टिक गयी...फटी-पुरानी बनियान व नेकर पहने उस मैले कुचैले लड़के की आंखो में समायी ईमानदारी की दुलर्भ चमक ने उसे शर्मशार कर दिया था।

***

3) लघुकथा :

समोसे

ट्रेन की जनरल बोगी में एक युवक समोसे से भरी थाल लेकर घुसा। जून की उमस भरी चिपचिपी गर्मी में यात्रियों की रेलमपेल थी। उसे लगा कि अच्छी आमदनी हो जायगी।

‘‘...ताजे गरम समोसे.... बोलिए भाय...… बहन जी.....‘‘ उसने सम्भावित ग्राहको का ध्यान खीचने का प्रथम प्रयास किया ही था कि सिर मुडाते ही ओले पडे़....

‘‘हुँह....… समोसे...… इन समोसे को तो वही खायेगा, जिसे मरना होगा.....डायरिया से....‘‘ खिड़की के बगल मे बैठी संभ्रात सी दिखने वाली महिला ने कुछ इस तरह से समोसे के साथ विक्रेता पर भी हेय दृष्टि डालते हुए कहा, जैसे कि पहले से ही ये प्रतिक्रिया देने को बिल्कुल तैयार बैठी हो।

प्रत्युत्तर मे वह कुछ कहते-कहते रूक गया। लेकिन तब तक उस महिला का व्यंग्य-वाण लक्ष्य को भेद गया था। विधिवत्। अधिकांश यात्रियों के चेहरे बिगड गये मानो उसकी थाल में समोसे न होकर काकरोच भरे पडे हो। महिला की स्पष्ट चेतावनी के चलते कुछ भूखे यात्रियों को तो इस संकोच में मन मारना पडा कि कही उनकी गिनती दुस्साहसी पेटुओं में न होने न लगे।

बेहद निराश हो वह डिब्बे से उतर कर प्लेटफार्म पर आ गया। कुछ सोचकर वह महिला के पास वाली खिडकी पर पहुंच गया.....

‘‘बहिनजी, भीख नहीं दे सकती, तो कम से कम तुम्बी (भीख मांगने का पात्र) तो न फोड़िये.... उम्मीद थी कि आप जैसे पढ़े-लिखे लोग एक गरीब के संघर्ष का सम्मान करेंगे, पर आपने तो उसके पेट में लात मारकर अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता सिद्वकर दी....... ये मेरा ही नही, इस देश का भी दुर्भाग्य है कि एम.ए.पास होकर भी समोसे बेच रहा हूँ.... हा, रही बात समोसे खाकर मर जाने की, तो पिछले कई वर्षो से हर दिन जो समोसे नहीं बिक पाते, उस मेरे बच्चे खाते है.... पर उनमें से तो कोई भी आजतक नहीं मरा.... बहिन जी ! इस देश मे लोग भूख से मरते है, कुछ खाने से नहीं....‘‘ बड़ी विनम्रता से अपनी बात कहकर वह दूसरे डिब्बे की ओर बढ़ गया था।

***

नाम : प्रदीप मिश्र