छाया Manish Kumar Singh द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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छाया

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शहर काफी बड़ा था। हर बड़े शहर की तरह यहॉ भी हर ओर लोग ही लोग थे। सब एक दूसरे को अनदेखा करके अपने गंतव्‍य की ओर बढ़े जा रहे थे। किसी की नजर किसी से जुड़ती नहीं थी। हालॉकि चलते वक्‍त कभी-कभार जरुर टकरा जाते थे। ऐसा होने पर वे एक दूसरे से माफी मॉगने के लिए रुकते नहीं थे।

लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए बसें,ऑटो,टैक्‍सी,प्राइवेट गाडि़यॉ बड़ी तादाद में थीं। सड़कें अजगर की तरह दूर तक पसरी रहतीं। कितना भी ट्रैफिक ऊपर से गुजर जाए ऊफ तक नहीं करतीं।

हर वर्ग के लोग यहॉ रहते थे। शहर सभी को उनकी आमदनी और कार्य के हिसाब से जीने की सहूलियत देता था। इसलिए तो आलीशान कोठियों-बॅगलों व आरामदायक फ्लैट,पेंट हाउस के साथ अवैध कॉलोनियों की दुर्गंधयुक्‍त नालियों के किनारे मकान खड़े थे। झुग्गियों में मानवता का एक भाग पॉव सिकोड़कर पनाह लेता। सड़क व बाजार में ये सभी नजर आते। इसका यह मतलब नहीं कि शहर समावेशी था। दरअसल प्रत्‍येक व्‍यक्ति अलग-अलग जी रहा था। सबसे अलग होकर।

मैं खुशकिस्‍मत था जो एक ठीक-ठाक नौकरी पा गया। शहर के केन्‍द्र से कोई दस-बारह किलोमीटर दूर रिहाइश भी सही थी। किराया वाजिब एवं जेब के अनुकूल था। बड़े शहरों के लिए दस-बारह किलोमीटर क्‍या चीज है। लोग दूसरे शहरों से रोज काम पर आते हैं। सड़क के दोनों ओर सजी-धजी दूकानें व शोरुम मन को ललचा रहे थे। वैसे बाहर फुटपाथ पर भी सामान बिछाकर लोग बेचने के लिए मौजूद थे। जिसे जो चाहिए खरीद लो। मैं दूर से ही अपनी हैसियत और जरुरत की चीजें भॉपने की कोशिश कर रहा था। एक शोरुम के सामने खड़ा होकर शीशे के पीछे सजायी शर्ट और टाई निहारने लगा। देखने में कोई बुराई थोड़े न है। मन बहलाव हो जाएगा। हिम्‍मत करके कुछ समय बाद अन्‍दर चला गया। उस दिन अच्‍छे कपड़े धारण कर रखे थे। दूसरे ग्राहकों में व्‍यस्‍त होने के बावजूद सेल्‍समैन ने मेरी ओर देखा। एक मुस्‍कान भी फेंकी। मैं उपेक्षा से जितना आहत होता हू उतना ही स्‍वागत से भी घबराता था। पहले से तैयारी करके नहीं आया था कि क्‍या कहना है। फिर भी कुछेक शर्ट उलटे-पुलटे। अपरिचय का अपना लाभ है। यहॉ सेल्‍समैन की व्‍यंग्‍य भरी मुस्‍कान मन पर क्षणिक घाव लगाती है पर एअर कंडीशण्‍ड शोरुम से बाहर आकर हम पूर्ववत हो जाते हैं।

आज खाली होने के कारण मैं भरे बाजार से निकल कर अपेक्षाकृत खाली सड़क पर टहलने लगा। निरुद्देश्‍य नहीं अपितु तफरीह करने हेतु। सहसा लगा कि एक आदमी मेरे पास चल रहा है। मैंने ध्‍यान नहीं दिया। आखिर मेरी ओर भी कौन ध्‍यान देता है। लेकिन जब यह लगा कि वह व्‍यक्ति अपनी निगाहें देर से मुझ पर गड़ाए भी हुए है तो जाहिर था कि मैं आशंकित हो उठा। पलट कर उसकी तरफ देखा तो पाया कि वह मुझे ताक रहा था। पूछने का मन हुआ कि कहिए क्‍या बात है। पर जाने दिया। वह व्‍यक्ति खुद बोला। ''लगता है कि आपको पहले देखा है।'' मैं चौंक कर अत्‍यन्‍त सावधान हो गया। यह कौन सी बला है? जेबकतरे वगैरह भीड़ में हाथ की सफाई दिखाकर अन्‍तर्ध्‍यान हो जाते हैं। राहजनी करने वाले इतनी देर में अपना काम करके निकल जाते। यह शख्‍स तो पीछे पड़ा हुआ है। जरुर कोई ठग होगा। खैर मैं कौन सा मूर्ख परदेशी हू जो उल्‍लू बना देगा। फिर वह भी अकेला और मैं भी। उसका कोई दूसरा साथी नहीं दिख रहा था।‍

मैंने बेहद गंभीरतापूर्वक रुखाई से कहा,''जी नहीं आपको गलतफहमी हुई है। मैं आपको नहीं जानता।'' मुसीबत सर पर पड़ने पर इंसान काफी साहसी हो जाता है। सहसा मैंने पाया कि शहर बिल्‍कुल सुनसान हो गया है। वक्‍त पर यहॉ कौन किसकी मदद करता है।

वह फिर भी साथ चलता रहा। मैंने गौर किया कि वह लगभग मेरी कद-काठी यानि मध्‍यम कद का था। शायद उन्‍नीस ही होगी। कपड़े थोड़े गन्‍दे से थे। अगर इतना ही रसूख वाला होता तो क्‍या ऐसे किसी के पीछे पड़ता। देखा जाए तो वह कोई इतना बड़ा दादा टाइप नहीं दिखता था। लेकिन चार सौ बीस होने की आशंका से

इंकार नहीं किया जा सकता था। इसलिए मैं सतर्क था। शाम ढलकर रात का रुप ले रही थी। ''इंसान इंसान पर भरोसा नहीं करता है।'' उसी ने पुन: शुरुआत की। यह नहीं कहा कि क्‍या जमाना आ गया है। यानि बात समय-काल से बॅधी नहीं थी। पहले भी ऐसा ही रहा होगा।

''सो तो है।'' मेरे मुह से भी निकल गया। ''लेकिन इसमें किसी का क्‍या दोष वक्‍त ही ऐसा है। किसी का जान-माल सुरक्षित नहीं है।''

वह सहमति में सर हिलाने लगा। दोनों ही बातें करता है। अंधेरे में मुझे वह ज्‍यादा जरुरतमंद लग रहा था। शक्‍ल ध्‍यान से देखने पर उसकी दाढ़ी दो दिन की बढ़ी हुई दिखी। आदमी खासा उम्रदराज था। कनपटियों के बाल खिचड़ी हो चुके थे।

एक गली में घुसकर मैं चाय की दूकान पर खड़ा हो गया। वह भी रुक गया। बेंच पर बैठकर मैंने दूकान वाले से चाय को कहा। पेशोपेश में था कि उसे चाय के लिए पूछू या नहीं। आखिर कौन सा उसे जानता हू। वह खुद ही बेंच पर बैठ गया। दूकानदार ने हमें साथ देखकर बिना कहे एक नहीं दो कप थमा दी। ''भाईसाहब!'' वह शिष्‍ट लहजे में बोला। ''मेरा एक दोस्‍त बिलकुल आपके जैसा है। माफ कीजिएगा। शुर में इसलिए पहचानने में गलती हुई। मुलाकात इुएकाफी समय गुजर गया। हम लोग इकठ्ठे काफी वक्‍त गुजारा करते थे।'' 'वह क्‍या आपके साथ काम करता था?'' मैंने यू ही पूछ लिया। ''अरे नहीं।'' उसने चाय की चुस्‍की लेनी प्रारम्‍भ कर दी थी। ''बस हम यू ही मिलते थे। कोई कारोबारी बातें नहीं होती। अपने-अपने मन की बातें करते। घंटों। जी हॉ...। जो बातें इंसान पत्‍नी-बच्‍चों,मॉ-बाप से नहीं कर पाता वे सब हम एक-दूसरे से करते थे।'' वह दूर कहीं नजर गड़ाकर मुस्‍करा रहा था।

''मन का मीत कहिए।'' मैं यह सब सुनकर हठात् बोल उठा। उसने चाय का कप नीचे रखकर तर्जनी हिलाते हुए कहा। ''हॉ बिल्‍कुल सही कहा। ऐसा ही दोस्‍त था मेरा।'' वह मानो उदास हो गया। ''ऐसी न जाने कितने कप मैंने उसके साथ पी थी। समझिए कि चाय पीना एक बहाना था। साथ में कभी एकाध मठरी खा ली। बात साथ वक्‍त गुजारने की थी।'' वह विगत को वर्तमान में जीने का प्रयास कर रहा था।

दुनिया में एक भी अगर इस लायक मिल जाए जिससे मन की बात कह सके तो जिंदगी खाली-खाली नहीं लगती। मैंने चाय का कप लगभग खाली कर दिया था। ''वह भी आपकी तरह बिल्‍कुल फिलॉसफर था।'' वह जोर देकर बोला। ''मैं और फिलॉसफर...?'' मुझे ताज्‍जुब हुआ। ''मतलब आप भी गहरी बात करते हैं।''

''स्‍कूल में भी आपका कोई साथी होगा?'' मैंने पूछा।

''जी ढ़ेर सारे थे। बात यह है कि बचपन में पूरा स्‍कूल का कैम्‍पस,घर का अहाता,आसपास की सड़कें ओर गलियॉ-पूरा माहौल मेरा साथी था। सच पूछिए तो बचपन में हम सबका आसपास के माहौल से अपनापन होता है। बाद में सब बदल जाता है।'' चाय की दूकान की मंद रोशनी में वह अब किसी भी द्दष्टि से संदेहास्‍पद नहीं प्रतीत हो रहा था। उलटे मुझे उसमें अपना अख्‍स दिख रहा था।

''मेरा बचपन तकलीफ में बीता।'' वह बिना पूछे अधिकारपूर्वक कहने लगा। ''घर में गरीबी थी। आमदनी का जरिया बढ़ाने के लिए पढ़ाई के साथ मुझे काम पर भी लगना पड़ा। एक रोज की बात है पार्क में दोपहर को थक कर सो गया था। वहॉ ताश खेलने वालों की मॅडली बैठती थी। उन्‍होंने टॉग खींचकर मुझे दूर कूड़े के ढ़ेर के पास कर दिया। मैं बेखबर सोया रहा। बाद में शाम को पुलिस वाला आया और दो डंड़े जमाए। बड़ी मुश्किल से ईमान की दुहाई देकर मैं हवालात जाने से बचा। नहीं तो मॉ-बाप को जमानत कराने में एकाध बचे गहने बेचने पड़ जाते। जेब में पड़ी चने की पुडि़या तक वे ले गए।'' सहसा वह मुझे अभी भी बेहद गरीब लगने लगा।

उसने आगे सुनाना शुरु किया। ''अपने उस दोस्‍त की संगत में मुझे पुरानी उदासी वाली यादों से छुटकारा मिलने में काफी मदद मिली।'' मैंने चाय के पैसे अदा करने के लिए जेब में हाथ डाला। ''नहीं।'' उसने चाय वाले को हाथ से इशारा किया। ''बाबूजी से पैसे मत लेना।'' सचमुच में मेरे दिए पैसे उसने नहीं लिए। उस आदमी के पकड़ाए नोट को रख लिया। ऐसा लगा कि दूकानदार उसका पूर्व-परिचित था।

हम दोनों साथ उठे। वह अभी भी चल रहा था। पर अंदाज जुदा था। अब वह अपने रास्‍ते जाना चाहता था। सड़क के किनारे गलियॉ मिलनी शुरु हो गयी थीं। ''आपका दोस्‍त अभी कहॉ है?'' मेरे इस प्रश्‍न के उत्‍तर में वह हॅसा। ''पता नहीं बाबूजी कहॉ पर है...आज मुझे वह आप में दिखा।'' वह उन्‍हीं किसी एक गली में घुस रहा था। मैं उसे जाते देखता रहा।

उसने मुझमें अपने अतीत के दोस्‍त को देखा था। पर मैं उसे जाते वक्‍त उसमें स्‍वयं को देख रहा था। उसके चले जाने के बाद सड़क का सूनापन मन के रीतेपन का ही स्‍वाभाविक विस्‍तार लगा। नीरवता कह रही थी कि मानो वह कभी था ही नहीं। पर मन के किसी कोने में यह लग रहा था कि वह हमेशा ही था। शहर में उसके और मेरे जैसे बहुत से होंगे जो ऐसे ही किसी दोस्‍त को ढॅूढ़ रहे होगे या जिन्‍हे दोस्‍त की जरुरत है।

(मनीष कुमार सिंह)

लेखक परिचय

मनीष कुमार सिंह। जन्‍म-16 अगस्‍त,1968 को खगौल, जिला पटना, बिहार में हुआ।भारत सरकार,सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय में प्रथम श्रेणी अधिकारी। विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं यथा-हंस,कथादेश,कथाक्रम,समकालीन भारतीय साहित्‍य,साक्षात्‍कार,पाखी,दैनिक भास्‍कर,नयी दुनिया,नवनीत,शुभ तारिका,लमही, अनभै सॉंचा इत्‍यादि में कहानियॉ प्रकाशित। पॉच कहानी-संग्रह-'आखिरकार','धर्मसंकट','अतीतजीवी',’वामन अवतार’ और ‘आत्‍मविश्‍वास’ प्रकाशित। ‘ऑगन वाला घर’ शीर्षक से एक उपन्‍यास प्रकाशनाधीन।

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