आजाद नारी - कितनी आजाद डॉ. ऋषि अग्रवाल द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

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आजाद नारी - कितनी आजाद

आजाद नारी - कितनी आजाद

भारत देश स्वतन्त्रता के पश्च्यात धीरे-धीरे स्थापित होता गया। हर तरफ विकास की नींव रखी जा रही थी। हर जगह आजादी का बिगुल बज रहा था पर उस आजादी के बिगुल में एक जगह आज भी गुलामी की दास्ताँ भली भाँती नजर आती हैं। जिस आजादी का हम दम भरते हैं उसी आजादी में हमारे देश की महिलायें खुद को जंजीरों में जकड़ी हुई पाती हैं। आज हमारा देश विकास और आधुनिकता की ओर अग्रसर हैं। हर तरफ बदलाव नजर मंजर बना हुआ हैं पर जहाँ नारी का नाम आता हैं वहां हम चुप से नजर आते हैं।

वह नारी जो परमपिता ब्रहमा जी के बाद इस संसार का निर्माण करती है। वह नारी जो हर घर को संवारती हैं। वह नारी जो जीवन के हर पथ में साथ निभाती हैं आज वही नारी खुद को अँधेरे में कोसती हुई नजर आती हैं। ऐसा क्यूँ ? क्या हम सभ्य नहीं या फिर हमारी सोच आज भी विकसित नहीं हुई ?

नर और नारी दोनों एक रथ के दो पहिये हैं फिर इतनी असमानता क्यूँ भला ? जैसे रथ दोनों पहियें के बिना आगे नहीं बढ़ सकता, वैसे ही नर बिना नारी के किसी भी दहलीज पर खुद को खड़ा नहीं कर सकता। नारी के बिना नर हमेशा अधूरा हैं। फिर क्यों आज नारी असुरक्षित है ? क्यों वो खुद का विकास नहीं कर पा रही हैं ?

जितना हक जिन्दगी जीने का नर को हैं उतना ही हक नारी को भी हैं। फिर भी उसके साथ भेदभाव हो रहा है। उसे हर कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ने से रोका जा रहा है। उससे उसके जिने का अधिकार छीना जा रहा है। अब हमें खुद को बदलना होगा और अंदर इंसानियत भरनी होगी। इस असमानता की खाई को हटाना होगा। नर और नारी दोनों को एक समान आंकना होगा। तभी हम आजादी का सही रूप से जश्न मना सकते हैं।

आज जिस तरह से बेटियां हर क्षेत्र में अपना नाम कमा रही हैं और बेटों से हर स्तर पे आगे बढ़ रही हैं। घर के काम से लेकर देश, राज्यों की बागडोर तक सम्भाल रही है। वही कुछ घटिया सोच वाले लोग और उनका बनाया हुआ समाज आज भी बेटियों को बोझ समझता हैं। उन्हें इस दुनिया में आने से रोकता है। उनके साथ अत्याचार करता है। उसे भोग्या समझकर उसका हनन कर रहा है।

प्रायः देखा जाए तो प्रकृति स्त्री और पुरुष के बीच कभी भेदभाव नहीं करती है। सामान्यतः रूप से जितने नर पैदा होते हैं लगभग उतनी ही नारी भी इस युग में पैदा होती है। फिर हम कौन होते हैं ? नर और नारी के बीच ये भेदभाव करने वाले। उनसे उनके जीने का अधिकार छिनने वाले। आज हमारी सोच इस तरह की विकसित क्यूँ हैं ? क्यूँ हम नारी को आगे बढ़ने के लिए रोकते हैं। क्या कारण हैं कि हमारी सोच का स्तर इतना निचे गिर गया हैं ?

एक तरफ नारी आसमान की उच्चाईयां छू रही हैं तो एक तरफ बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता हैं। अगर नारी वहां से खुद को महफूज भी कर ले तो उसे शिक्षा के क्षेत्र में पीछे रखने की कोशिश की जाती हैं। अगर लड़की का घर सभ्य हैं तो उसे शिक्षा तो मिल जाती हैं पर आज के असमाजिक तत्वों द्वारा नजरों की शिकार दिन-प्रतिदिन होती रहती हैं। उन्हें हर पल हवस की नजरों से देखा जाता हैं या फिर किसी अमानुष के द्वारा तेजाब का शिकार हो जाती हैं या फिर दहेज लोभी अंगारों में जलकर राख हो जाती हैं। मतलब हर तरफ नारी के दुश्मन अपने पंख फैलाएं बैठे हैं। हर पल नारी को कुछ डर, अपराध का हैं तो कुछ डर, भेदभाव का।

आज नारी को भय

अँधेरे में वहशी भेडि़यों से

उजाले में अपनों का डर

पैदा होने से पहले कोख में

पैदा होते ही बोझ बनने का डर

बाहर जायें तो वहशी नजरो से

या फिर तीखी बोली का डर

यहाँ भी बच गई अगर मैं

तो किसी की हवस का डर

बाबुल का घर छोड़ कर आई

तो दहेज के लोभियों का डर

कहा छुपाऊ खुद को मैं अब ‘ऋषि’

हर पल लगता हैं बेटी होने का डर

यह भय सच में बहुत गहरा हैं। आज भी नारी पर अत्याचारों की श्रृंखलाएँ लदी हुई है। नारी भले ही कितनी ही पढ़ लिख जाए या फिर थोड़े समय के लिए समाज का नजरिया उसके प्रति बदल भी जाएँ तब भी वह अत्याचारों के कैदखाने में बंद है। ऐसे कई उदाहरण हैं जो रोजाना हमारी आँखों के सामने घूमते दिखाई देते हैं। जो स्पष्ट रूप से हमें दिखाई तो देते हैं लेकिन फिर भी हम कुछ नहीं कर पातें।

ये कैसी रीत हैं ये कैसी दरिंदगी ? जन्म से पहले कन्या का गला घोटा जाता हैं

अगर जन्म ले भी लिया तो बोझ समझ कर मार दिया जाता हैं। यहाँ भी बच गई वो तो वहशियों की गन्दी नजरो से नहीं बचती और अस्मत लूटाकर वो अपनी, चैन सुख से जी नही सकती। अगर मांगने जाए मदद पूलीस से तो वो रावणराज समझ कर मारने दौड़ती हैं। रक्षक ही भक्षक बन बैठे हैं तो बलात्कार जैसी घटना क्यों ना हो। मुजरिम बेखौफ जुर्म करता हैं और पकडे जाने पे पुलिस वालो का दामाद बन जाता है। अँधा कानून और राजनीति की माया ने चारो तरफ वहशियों का साया फैला दिया है। आज हम सबकी खामोशी के कारण मासूम बहन बेटियां हैवानियत की शिकार हो रही हैं। क्यों ? कब तक ? यु ही बैठ तमाशा देखेंगे। जागोगे तो ही सवेरा पाओगे वरना यु ही अँधेरे में हम सब अपनी बहन बेटियों की अस्मत लूटते आज नही तो कल देखेंगे।

आज हर जगह बेटी बचाओं अभियान चलाया जा रहा हैं। जगह-जगह एन.जी.ओ. कन्या भूर्ण हत्या रोकने के लिए और समाज को जागरूक करने के लिए कार्य कर रहे हैं। अखबार, मिडिया, बहुत से धारावाहिको और लघु फिल्में, विज्ञापन, डॉक्यूमेंट्री और पब्लिक सर्विस एनाउंसमेंट के माध्यम से लोगों को जागृत करने के भरपूर प्रयास किए जा रहें हैं। हमें भी बदलाव की पहल करनी होगी और हमें हर हाल में विकसित इस घटिया सोच को बदलना होगा। नारी को सम्पूर्ण रूप से सम्मान दिलाने के लिए आवाज उठानी होगी। नारी के मन कुण्डली मारे बैठे भय को खत्म करना होगा।

सबसे पहली शुरूवात हमें अपने घर से करनी होगी फिर हमें अपने आस-पास के माहौल को बदलना होगा। हमें अपने स्तर पर हर जगह, हर इलाके में जाकर कन्या भूर्ण हत्या को रोकने के लिए लोगों को जागरुक बनाना होगा। विशेषकर महिलाओं को जिससे वे इस घिनौने कृत्य के खिलाफ आवाज उठा सकें। क्योंकि जब तक नारी खुद के मान-सम्मान के लिए आवाज नहीं उठायेंगी तब तक बदलाव आना सम्भव नहीं और तब तक समाज के लोग नहीं बदलेंगे। उन्हें समझना होगा कि अपने साथ होते अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना कोई जुर्म नहीं हैं। अपने साथ होते अन्याय के लिए चुप रहना सबसे बड़ा जुर्म हैं जो नारी सदियों से करती आ रही हैं।

अब इतिहास बदलना होगा। इसके लिए एक पहल की जरूरत हैं। कारवां तो अपने आप बन जाएगा। एक अच्छा अभियान बहुत कुछ बदल सकता हैं। एक अच्छा आन्दोलन इतिहास तक बदल देता है। नारी को खुद के मान-सम्मान के लिए लड़ना होगा। जब तक खुद के लिए वो नहीं लड़ेगी, तब तक बदलाव सम्भव नहीं होगा। तब तक अन्याय अपनी चरम सीमा पर जारी रहेगा और उनकी खामोशी से न जाने कितनी ही मासूमों का गर्भ में ही गला घोंट दिया जायेगा। अगर गलती से वे इस दुनिया में आ भी गई तो उनकी नन्ही आंखों को खुलने से पहले ही बंद कर दिया जायेगा।

आज हर कोई नारी हनन को लेकर चिंतित है। जिस तरह से उस पर अन्याय हो रहे है उसे देखकर मन बहुत पिडि़त हैं। नारी का रूप धरती माँ बेटियों के साथ होते अन्याय को देखकर विलाप कर रही है। उनकी दर्द भरी आवाज सभ्य समाज से करुण पुकार कर रही हैं और कह रही है कि बेटियों को कोख में मत मार।

धरती कर रही करुण पुकार

बेटियों को कोख में मत मार

बिन बेटी के निर्विहीन संसार

मत करो बेटियों पे अत्याचार

बिन बेटी के रिश्ते दो-चार

मत करों बेटी का तिरस्कार

बेटी से ही होता पूर्ण परिवार

मत छीन जीने का अधिकार

बेटी होती ईश्वर का उपहार

बिन बेटी ना जग का आधार

बेटी तो वात्सल्य का भण्डार

बिन बेटी लगे काँटों का हार

दर्द पाकर देती खुशी हजार

मत कर गला घोंट कर वार

‘ऋषि’ दया की पात्र हैं नार

दे दे जीवन बन जा सुकुमार

कविता से साफ जाहिर हैं कि धरती माँ भी इस तरह के अत्याचारों से दुःखी हैं। आज नारी हनन को देखकर उनकी अन्तर्मन की पीड़ा सही भी है क्योंकि बेटी से परिवार पूर्ण होता हैं। बेटी खुशियों का उपहार हैं जिस घर में होती हैं वहां पर वात्सल्य का भण्डार लग जाता हैं। उन्हें कोख में मारकर आज हम खुद के जीवन को काँटों का हार पहना रहे है। बेटियां दर्द सहकर भी प्रेम देती हैं। जितनी दया और प्रेम की पात्र एक नारी होती हैं उतनी दया का पात्र शायद ही कोई हो।

भारत में ईश्वर को स्त्रीवाचक शब्दों जैसे - दुर्गा माता, काली माता, लक्ष्मी माता, सरस्वती माता से संबोधित किया है।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

अर्थात तुम ही हमारी माता हो और तुम ही हमारे पिता हो।

हम हमेशा यही कहते हैं राधे-कृष्णा, सिया-राम अर्थात् स्त्रीवाचक शब्द का प्रयोग प्रारम्भ में किया जाता हैं। ओम् जय जगदीश हरे, ओम् नमः शिवाय, जय श्री राम, जय श्री श्याम, जय हनुमान का जितना उद्घोष होता है उतना ही ‘जय माता दी’ का भी होता हैं। हमारी मातृभूमि हमारी भारतमाता है। पशुओं में भी गाय को गौ माता कहकर पुकारा जाता है परन्तु बैल को पिता कहकर हम सम्बोधित नहीं किया जाता। हमारी भारतीय संस्कृति में स्त्रीत्व का अत्यधिक आदर-सत्कार करना हमारे जीवन पद्धति के महत्त्वपूर्ण मूल्यों में से एक है । प्रायः कहा गया है कि

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।

अर्थात जहां पर नारियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। जहां उनकी पूजा नहीं होती और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये हर कार्य सफल नहीं होते हैं ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।

न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।

अर्थात जिस कुल में स्त्रियाँ दुःखी और पिडि़त रहती हैं, वह कुल जल्द ही विनाश की ओर अग्रसर हो जाता है। जहां वो खुश और सुखी रहतीं है उस कुल की वृद्धि निश्चित होती है।

यद् गृहे रमते नारी लक्ष्मीस्तद गृहवासिनी ।

देवता कोटिशो वत्स न त्यज्यंति गृहहितत ।

अर्थात जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुखपूर्वक निवास करती है उस घर में माता लक्ष्मी जी भी निवास (बसर ) करती हैं। हे! मनुष्य (वत्स) करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं त्यागते हैं।

बिन घरनी घर भूत समाना।

अर्थात जिस घर में नारी नहीं होती है वो घर भुतघर के समान हैं।

पर इस संसार में इसके विपरीत ही कार्य हो रहे हैं। भारत के लोग जहाँ धन की प्राप्ति और समृद्धि के लिए माँ लक्ष्मी जी की आराधना करते हैं, शक्ति पाने के लिए माँ दुर्गा जी के नाम का तप करते हैं, ज्ञान और विवेक के लिए माँ सरस्वती जी की उपासना करते हैं, अपने शत्रुओं पर विजय पाने के लिए माँ काली को प्रसन्न करते हैं। लेकिन जब यही देवियां नारी के रूप में उनके घर में आश्रय लेना चाहती हैं तब यह बात उनके गले नहीं उतरती है तब वे उन्हें गर्भ में ही मौत के घाट उतार देने का भरपुर प्रयत्न करते हैं।

आज हमारे सभ्य समाज के लोग रोज बेटियों को दुत्कारते हैं और नारी का अपमान करते हैं, हर राह पर उन्हें लज्जित करते हैं। जब माता रानी के नवरात्रे या फिर कोई तीज-त्यौहार आते है तो घर-घर जाकर बेटियां खोजते हैं और उन्हें घर लाकर पूजते हैं उस वक्त उन्हें वो पूजनीय लगती हैं। सही कहूँ तो उन्हें ये देवियां सिर्फ मूर्तियों और फोटो में ही अच्छी लगती हैं, भला असल जिंदगी में उनका क्या काम। देवी समान ये बच्चियां उनके लिए महज एक बोझ, एक पीड़ा बन कर रह जाती हैं।

प्राचीन भारत में नारी काफी उन्नत व सुदृढ़ थीं। समाज में जितना नर का महत्व था, वहीं पर नारी को समान अधिकार और सम्मान मिलता था। उपनिषद काल में पुरुषों के साथ स्त्रियों को भी शिक्षित किया जाता था। सहशिक्षा व्यापक रूप से दिखती है। भगवान श्री रामचन्द्र के पुत्र लव-कुश के साथ ऋषि अत्रि की पुत्री आत्रेयी पढ़ती थी। नारी भी सैनिक शिक्षा लेती थी। महाभारत काल से नारी का पतन होना शुरू हुआ तो मध्यकाल में आते-आते नारी पूरी तरह से पुरुषों की गुलाम, दासी और भोग्या बन गई।

भारतीय समाज शुरू से ही पुरुष प्रधान रहा है। यहां महिलाओं को हमेशा से दूसरे दर्जे का माना जाता है। यहां महिलाओं को अपने मन से कुछ करने की सख्त मनाही हैं। परिवार और समाज के लिए वे एक आश्रित से ज्यादा कुछ नहीं समझी जाती हैं। ऐसा माना जाता हैं कि उसे हर कदम पर पुरुष के सहारे की जरूरत पड़ेगी।

भारत में जहाँ एक तरफ नारी को दुत्कारा जा रहा हैं उन पर अत्याचार किये जा रहे हैं। वही दूसरी तरफ इस समय भारत में कई महत्वपूर्ण पदों पर कई नारियां आसीन है। जहां भारत के सर्वोच्च पद को एक महिला सुशोभित कर रही हैं। वहीं दूसरी तरफ भारत में कन्या भुर्ण हत्या, अत्याचार एवं बलात्कार के बढ़ते मामले इस छवि को दागदार बना रहा हैं। रूढि़वादी मानसिकता के कारण भारत कुरुतियों का शिकार होता जा रहा है। दुर्भाग्य से यह कुरुतियाँ इस देश की लक्ष्मी पर ग्रहण लगा रही हैं। अगर ये कुरुतियाँ यूँ ही अग्रसर रही तो आने वाले समय में नारी शब्द धीरे-धीरे मिट जायेगा।

वक्त रहते हमें समझना होगा की नारी का अस्त्वि हमारें लिए कितना महत्वपूर्ण है। अगर आज सुधार नहीं किया गया तो आने वाला समय हमारें लिए बहुत ही कष्टदायक होगा। हमें वक्त रहते नारी की किमत समझनी होगी। समझना होगा कि आज नारी किसी भी दिशा में नर से कम नहीं है।

आज लड़कियां लड़कों के समकक्ष ही नहीं उनसे आगे भी निकल चुकी हैं। रानी लक्ष्मी बाई, इंदिरा गांधी, मदर टेरेसा, महादेवी वर्मा, लता मंगेशकर, सरोजनी नायडू, किरण बेदी, किरण मजूमदार, कल्पना चावला, पीटी ऊषा, मैरी कॉम, सुनीता विलियम्स, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल ने सिर्फ भारत में नहीं बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति प्राप्त की है। हर जगह अपना परचम लहराया हैं। और नारी होने का गौरव प्राप्त किया हैं।

भारत देश में हजारों महिलाओं ने अपने कर्म, व्यवहार, त्याग और बलिदान से विश्व में आदर्श प्रस्तुत किया है। प्राचीनकाल से ही भारत में पुरुषों के साथ महिलाओं को भी समान अधिकार और सम्मान मिला है इसीलिए भारतीय संस्कृति और धर्म में नारियों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इन भारतीय महिलाओं ने संस्कृति, समाज और सभ्यता को नया मोड़ दिया हैं। भारतीय इतिहास में इन महिलाओं के योगदान को कभी भी भूला नहीं जा सकता।

आज नारी घर की चार दीवारी में बंद एक अबला नहीं बल्कि एक सशक्त व्यक्त्तिव की मालकिन बन चुकी है। खेल जगत, व्यापार जगत, फिल्म जगत, राजनीति, वकालत, चिकित्सा आदि सभी क्षेत्रों में नारी शक्ति का भी बोलबाला है। हर तरफ नारी अपनी शक्ति का परचम लहरा रही है। कुछ वर्षो से सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में भी महिलाओं के प्रतिशत में सुखद बढ़ोतरी देखने को मिली है। कई सरकारी महाविद्यालयों और संस्थानों में भी महिलाओं के लिए कुछ सीट्स रिजर्व रखी जाने लगी हैं ताकि महिलाएं उच्च शिक्षा और रोजगार प्राप्त कर सकें। नारी को मिलती बढ़ोतरी के बाद भी हमारे समाज की सोच फिर भी पिछड़ी हुई हैं। नारी को आगे बढ़ता हुआ देखकर भी नारी के साथ भेदभाव हो रहा हैं।

इतना सब होने के बावजूद भी कई लोग इसी सोच से ग्रसित हैं कि लड़का ही बेहतर है। अगर इसी तरह की सोच मन में व्याप्त रही तो वो दिन दूर नहीं जहाँ पुरुष शादी से वंचित रह जाएंगे और मजबूरन उन्हें अपनी जिंदगी अकेले ही गुजारना पड़ेगी। बिन नारी के संसार की कल्पना करना मुश्किल हैं इसलिए समझना होगा कि नारी बिन ये संसार निर्विहीन हैं। सोच बदलनी होगी। विचार बदलने होंगे। नारी को भी नर के बराबर दर्जा देना होगा। और समझाना होगा कि बिन बेटी के घर की हर दरो-दीवारें फीकी ही रह जाती हैं चाहे उन्हें कितना ही रंग से रंग लिया जाएँ।

सरकार भी महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए नित नए प्रयास कर रही है। माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने बेटी बचाओ अभियान की रुपरेखा प्रस्तुत की है। जगह-जगह कन्या बचाओ की शपथ दिलाई जा रही हैं। फिलहाल ही राजस्थान के झुंझुनू जिले में एक साथ लाखों लोगो ने कन्या भूर्ण हत्या के खिलाफ बेटी बचाओं की शपथ व संकल्प लिया गया हैं। बदलाव की मुहीम तो शुरू हो चुकी हैं पर हमारी सोच नहीं बदल रही हैं। जहाँ एक तरफ शपथ ली जाती हैं तो दूसरी तरफ झाडि़यों में मासूम बेटी मिल जाती हैं। जहाँ बदलाव का बोलबाला हैं वही दूसरी तरफ कन्या भूर्ण हत्या, बलात्कार एवं अत्याचार जैसे संगीन अपराध बढ़ते जा रहे हैं।

जगह-जगह लिंगानुपात की यह असमानता हमें आखिर कहां ले जा रही है। हम किस ओर अग्रसर हैं। प्रायः सुनने को मिलता हैं कि यह सब उच्च शिक्षा के आभाव के कारण हो रहा हैं पर अगर देखा जाए तो आजकल के शिक्षित लोग के बिच यह विचारधारा ज्यादा बढ़ती जा रही हैं। शिक्षित लोग ज्यादा भेदभाव करते पाए जाते हैं।

आधुनिक समाज में मध्ययुगीन कुरुतियाँ सोचने को विवश करती हैं कि क्या आज भी भारत में बेटी का जन्म समाज में उतना ही स्वीकार्य तथा उत्सवी है जितना बेटों का। शिक्षा चाहे कितनी भी उच्च हो जाएँ जब तक मन मस्तिष्क में बैठे नारी के प्रति भेदभाव के शैतान को जब तक हटाया नहीं जायेगा तब तक इस तरह की घटाएं हमारे हृदय को चीरती रहेंगी और रोज घटित होती रहेंगी।

शिक्षा और संपन्नता भले ही समाज के विकास के आधार माने जाते हों लेकिन पढ़े लिखे समाज में भी लिंग भेद को महत्व दिया जा रहा है। बेटियां बचाने के लिए आज जन आंदोलन की जरूरत है। बड़े से बड़े अभियान की जरूरत हैं। लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या में गिरावट आने पर कई प्रकार की समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

जिस देश में नारी की पूजा करना परंपरा हो उसी देश में महिलाओं की संख्या में गिरावट आए तो ये सवाल सोच-विचार का बन जाता है कि हम किस ओर अग्रसर हैं ? हमारी सोच में इतना घिनौनापन क्यूँ हैं ? वक्त रहते हमें अब समझना चाहिए कि बेटियां बोझ नहीं होती हैं और जो लोग ऐसा सोचते हैं हमें मिलकर उसकी सोच बदलनी चाहिए और उसका मानसिक विकास कर नारी हनन पर रोक लगानी चाहिए।

फिलहाल 2015 में हुवे गणतन्त्र दिवस पर महिला शक्ति का परिचय दिखाया गया। महिला सशक्तीकरण की बानगी देखने को मिली। वैसे हमारे देश में महिला सशक्तीकरण कई बार देखने को मिला चुका हैं। प्रधानमन्त्री के रूप में इंदिरा गांधी, राष्ट्रपति के रूप में प्रतिभा पाटिल और जगह-जगह पर मुख्यमंत्री के पद आसीन महिलाएं, तीनों सेना में उच्च पद पर आसीन महिलाएं जिन्होंने महिला सशक्तिकरण का उदाहरण दिया हैं।

आज नारी न तो अबला है और न ही उसे पैरों की जूती कहा जा सकता है। आज की नारी अपने पैरों के ऊपर खड़ी हुई स्वावलम्बिनी है। वह किसी भी प्रकार से पुरुष पर आश्रित नहीं है और ना कभी होगी। बल्कि कभी परिचारिका बनकर तो कभी कार्यक्षेत्र की सहयोगिनी बनकर वह पुरुष वर्ग की मदद ही करती आई है। महिलाएं पुरुषों से किसी भी लिहाज से पीछे नहीं हैं। देश में करीब 2.70 करोड़ महिलाएं व्यापार और नौकरी कर धन अर्जित कर रही हैं और अपने दम पर परिवार चलाती हैं।

दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की ताकत भी उसकी बेटियां ही है। बेटियों के विकास से ही समाज का विकास है। हर क्षेत्र में बेटियां आगे बढ़ रही है। इसके बाद भी रुढि़वादी मानसिकता के वजह उनको दुनिया में आने से रोका जा रहा है। जगह-जगह जहाँ नारी आगे बढ़ रही हैं तो जगह-जगह उनका हनन हो रहा हैं। हम सबको मिलकर लोगों की मानसिकता को बदलना चाहिए।

आजकल पढ़े-लिखे वर्ग में केवल एक ही बच्चे को दुनिया में लाने का चलन सा हो गया है। इसे रिवाज कहें या विधाता की देन या फिर महंगाई की मजबूरी या फिर आजकल यह भी कहा जाने लगा है कि बेटा-बेटी में कोई अंतर नहीं है। पर अधिकतर के अंतर्मन में एक बच्चे के रूप में बेटे की चाहत ज्यादा होती हैं। उनकी सोच में यही होता हैं कि बेटा होगा तो वंश चलाएगा लेकिन वो ये क्यूँ भूल जाते हैं कि बिन बेटी के वंश चलायेंगे कैसे ? बेटी ही वंश चलाती हैं और बेटी ही परिवार की सरंचना करती हैं। बेटा एक वंश चलाता है तो बेटी दो वंश कि संचालिका होती है। अब समय के अनुसार चलना होगा और अपने अंतर्मन को बदलना होगा। इस लिंग भेद को मिटाना होगा।

कन्या भुर्ण हत्या करने से माँ, बहन, बेटी, पत्नी, दोस्त और अनेकों प्रकार के रिश्ते खत्म हो जाते हैं। सोचो अगर बेटी नहीं होगी तो आपके वंश को अपनी कोख में धारण करने वाला कौन होगा। अगर बेटी नहीं होगी तो माँ का आंचल कहाँ से लाओगे ? बेटी नहीं होगी तो हाथ पे स्नेह का धागा कौन बांधेगा ? बेटी नहीं होगी तो बहु कहा से लाओगे ? बेटी नहीं होगी तो घर में छन-छन की आवाज कहाँ से आएगी ? बेटी नहीं हुई तो जब पिता अपने काम से थक कर घर को आयेंगे तो उनके लिए पानी का गिलास कौन लायेगा ? माँ का रसोई में हाथ कौन बटाएगा ? भाई के जब बहन नहीं होगी तो रक्षाबंधन जैसा त्यौहार कैसे मनाओगे ? बेटियों के साथ होते अन्याय अगर इसी तरह गतिमान रहे तो ये संसार कैसे बच पायेगा ? बेटी से हर रिश्ते बनते हैं। बिन बेटी के किसी भी रिश्ते का निर्माण सम्भव नहीं हैं।

अब हमें नवनिर्माण हेतु इस जड़ को सही रूप से तैयार करना होगा। जिससे हमारी गलतियों की वजह से बेटियों के ऊपर सितम ना हो। क्यूंकि बेटियां तुलसी का पौध होती हैं, जिनमें खुद भगवान बसता हैं। बेटी ओंस की बूंद जैसी होती है। बेटियां हैं तो घर आंगन में खुशियाँ महकती हैं। बेटियां त्याग की मूर्त हैं। बेटी है तो कल है, बेटी से ही इस संसार में सुनहरा पल हैं। बेटियां नयनों की ज्योति हैं और सपनों की अंतरज्योति हैं। बेटियां पावन दुआ हैं। बेटी चेतना का स्वरूप है माँ आदिशक्ति का रूप हैं।

अगर सच कहुं तो पनाह हैं बेटियाँ क्योंकि

अपनी मुस्कान से महकाती घर आंगन बेटियाँ

थके बाप को गिलास पानी का पिलाती हैं बेटियाँ

ईट और चूने की दीवारों को घर बनाती हैं बेटियाँ

नजरों के इशारों से, समझती हैं माँ को बेटियाँ

तुम बागबाँ हो तो, बहार हैं बेटियाँ

प्यार के हाथो से तुझे गिरफ्त में बांधती हैं बेटियाँ

तेरे पसीने से थक जाती हैं बेटियाँ

तेरा हिस्सा, तेरी आरजू, तेरी मुस्कान हैं बेटियाँ

तेरे दरों-दीवारों की आब और रंग हैं बेटियाँ

आज किस अजाब की शिकार हैं बेटियाँ

तू कातिल है...तू कातिल है...तू कातिल है

पर ‘ऋषि’ पनाह हैं बेटियाँ..पनाह हैं बेटियाँ

मतलब साफ हैं बेटियां पनाह हैं। बेटियां हर रिश्तें का आधार हैं। बेटियां हैं तो परिवार हैं वरना रिश्ते सिर्फ दो-चार हैं। जब तक घर में बेटी ना हो घर की दरों-दीवारों को चाहे कितना भी रंग लिया जाएँ वो रंग हमेशा फीका ही रहता हैं।

जब-जब धरती पे पाप अपनी चरम सीमा पर होता है तब तब इंसान अपनी इंसानियत भूल के अपने सभी नैतिक व मानवीय मूल्यों कों भूल जाता है तो कुदरत उसे अपने तरीके से समझाने का प्रयत्न करती है। जब से नारी के साथ अत्याचार बढ़ा हैं तब से प्रकृति ने क्रोध के स्वर में मानव जाती को समझाया हैं। प्रकृति ने कई बार कुदरत के इशारें पर अपना त्राहिमाम रूप उजागर किया है और इस कारण पापियों के साथ कुछ अच्छे लोग भी इस त्राहिमाम में बलि चढ़ जाते है।

आज हमारे नैतिक मूल्य और मानवीय मूल्य दोनो कफन ओढ़ चुके है जिस कारण आज हमारा भविष्य अंधकारमय हो गया है। प्रायः देखे तो इस युग में सभी मानव अपना सही मानवीय मूल्य को पहचानते हैं फिर भी मोह माया में मानवीय मूल्यों कों और इंसानियत कों परे रख देते है और स्वार्थी हो जाते है आज जरुरी है कि हम सभी फिर से इंसान बने और दया, समर्पण, मानवता की राह पर चले। तभी समाज में बदलाव सम्भव हैं। जैसे एक एक ईंट से घर कि दिवार खड़ी हो जाती है वैसे ही एक एक मनुष्य को शिक्षित करने से सुन्दर समाज का निर्माण हो सकता है।

आज हमारे समाज में लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं क्यूंकि हमारें समाज में मानव सभ्य नहीं हैं। मानव इसलिए सभ्य नहीं हैं क्यूंकि उनके अन्दर मानवता का स्तर खत्म हो रहा हैं। उनमें मानवता इसलिए नहीं हैं क्यूंकि शिक्षा का स्तर गिर चुका हैं। शिक्षा का स्तर इसलिए गिर चुका हैं क्यूंकि शिक्षा देंने वाले शिक्षिक अच्छे नहीं हैं। शिक्षिक इसलिए अच्छे नहीं हैं क्यूंकि सही लोगों का चयन नहीं किया जाता हैं। गलत लोगो का चयन इसलिए होता हैं क्यूंकि हमारे देश में आरक्षण रूपी राक्षस हावी रहता हैं और आरक्षण इसलिए हैं क्यूंकि बड़े-बड़े नेता लोग इसके पक्ष में खडे़ और अडे़ हैं नेता लोग इसलिए पक्ष में हैं क्यूंकि उन्हें वोट देकर हम ही विजयी बनाते हैं और विजयी भी हम योग्यता देखकर नहीं पार्टी, धर्म और जाती देखकर चुनते हैं और हमारा यही एक गलत फैसला किसी की जिंदगी तबाह कर रहा हैं।

प्रायः देखा जाए तो आज कन्या भूर्ण हत्या का मुख्यतः कारण और भी बहुत हैं पहला कारण था लिंग भेदभाव। जहाँ बेटी को बेटे के आगे कम मानते हैं। पहले कारण में बेटे से वंश चलता हैं यही सोच थी। पर बहुत से और भी उदाहरण हैं जिससे माता-पिता बेटियों को इस संसार में आने से रोकने के लिए मजबूर हो जाते हैं या फिर जान बुझकर मजबुरी का हवाला देकर नारी का हनन कर रहे है।

जब तक बेटी माँ की कोख में रहती हैं तब तक वो महफूज रहती हैं (अधिकतर जगह बेटियां तो माँ की कोख में भी सुरक्षित नहीं) जब वो संसार में आती हैं तो उसे अनेक प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं। पहले तो वो कोख में सुरक्षित नहीं। फिर भी वो जन्म लेती हैं तो बेटी होने का इल्जाम सहती हैं। जब यहाँ से भी वो खुद को सुरक्षित कर लेती हैं तो हमारे समाज में फैले असमाजिक तत्व उसे हवस की दृष्टि से देखने लगते हैं उसे हर राह पे, हर जगह पे उनकी गंदी नजरे खुरेचती हैं जिससे वो खुद को असहज महसूस करती हैं। उनकी नजरों से बच भी जाएँ तो किसी न किसी चैराहे पे या फिर किसी सुनसान गलियों में उसकी इज्जत तार-तार करने के लिए विकृत मानसिकता के तत्व ताक मैं बैठे रहते हैं। प्यार के नाम पर नारी को हवस का शिकार बनाने के लिए हर राह पर नरभक्षी खड़े हैं अगर प्यार में उसे पा नहीं सकते तो तेजाब से उसे यातना देने का प्रयत्न करते हैं। या फिर उसकी गन्दी तस्वीर, विडियों बनाकर उसे शोषित करता है। अगर वो उसके इशारों पे नहीं चलती है तो उसकी तस्वीरें, विडियों इन्टरनेट, मोबाइल के माध्यम से उसे बदनाम करने का प्रयत्न करता हैं। अगर यहाँ भी उसके भाग्य ने साथ दिया तो दहेज लोभी दानव उसे निगलने को तैयार बैठा हैं। मतलब साफ है कि नारी कहीं भी सुरक्षित नहीं है।

आज देखा जाये तो प्रायः माता-पिता को इसी का भय ज्यादा सताने लगा हैं। इस वजह से भी बेटियों को गर्भ में ही मारने लगे हैं अगर हम चाहें तो हम सब मिलकर इस भय को दूर कर सकते हैं। क्यूंकि जब तक ये भय रहेगा तब तक बेटियां ना कोख में सुरक्षित हैं ना कोख के बहार। इसलिए सबसे पहले हमें समाज को शिक्षित करना होगा। हर घर में अच्छे संस्कारों का निर्माण कर, एक सभ्य समाज का निर्माण करना होगा।

हमें बदलना होगा, हमें सम्भलना होगा, हर कदम पर नारी की रक्षा करनी होगी और नारी पे होते अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठानी होगी। पर हम तो बुजदिल हैं क्यूंकि हम अन्याय के विरुद्ध ना तो लड़ सकते हैं ना झगड़ सकते है ना ही अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकते है ना ही उसके विरुद्ध खड़े हो सकते हैं।

आज नारी भी इस बुजदिल जमाने को देखकर सोच में पड़ गई है और सोचने लग गई हैं कि

कहीं छुप जाऊ मैं, इस बुजदिल जमाने से

डरता हैं दिल मेरा, मेरे साथ होती अनहोनी से

रोज लजित होना पड़ता हैं, मरना पड़ता हैं

शिकार होती हुं वहिशियांे की हैवानियत से

कभी मुझें कोख में मार दिया जाता

तो कभी दहेज के लोभ में जला दिया जाता

फिर भी बाज नहीं आते ये लोग

तो बना कर कर हवास का शिकार

छोड़ देते हैं मुझे लड़ने को जमाने से

कब तक ये हैवानियत का दौर चलता रहेगा

कब तक तमाशा मेरा युही बनता रहेगा

जिसके आँचल की छाव में सोया करते थे

आज बाज नहीं आते, उसे सरेआम उतारने से

कब तक तुम चुप-चाप तमाशा देखोगें

कब तक अखबारों में ये सब खबरे पढ़ोगे

होता कितना दुःख हैं ये जब तुम जानोगे

जब तेरी अपनी छलनी होगी वहशी, हत्यारों से

रात होती सुनसान, गलियाँ हो जाती हैं वीरान

अब छा रहा चारो ओर खौफ, अंधियारों से

अब तो कुछ शपथ लो होती रोज की घटनाओ से

‘ऋषि’ कब तक बचायेगा, वहशी पापी हत्यारो से

ये आज का सच हैं कि हर जगह वहशी फैल चुके हैं। हर जगह नारी को नोचा जा रहा हैं। जिस आंचल की छाव में पले बढ़े वहीं आज सरेआम उसे ही उतार रहे हैं। जहाँ कभी नजरों की शर्म हुआ करती थी आज उन्हीं नजरों से बहन बेटियों को ताड़ रहे हैं। कहीं पैसो के दम पर तो कहीं रुतबे के दम पर तो कहीं प्यार के नाम पर नारी को हवस का शिकार बनाया जा रहा हैं।

यही एक भय हर माँ बाप को सताने लगा हैं इसी की वजह से बेटी का गला कोख में घोंटा जा रहा हैं। बेटी के साथ होने वाली अनहोनी के लिए भय रखना लाजमी हैं पर इस भय के लिए कन्या भूर्ण हत्या करना मतलब अन्याय के सामने घुटने टेक देना। हमें तो अन्याय के विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए। किसी के कारण हम बेटियों को इस संसार में आने से तो नहीं रोक सकते। अन्याय सहना सबसे बड़ा जुर्म हैं इसलिए इस गंदी सोच को हमें जड़ से उखाड़ना होगा और जो मन मस्तिष्क में भय बैठा हैं उसे खत्म करना होगा।

माता-पिता को अपनी बेटी के लिए चिंतिंत होना लाजमी हैं क्यूंकि जब बेटी पैदा होती हैं तब से लेकर जब तक वो सयानी होती है और जब बाहर अपना पहला कदम रखती है तो उसके लिए चिंता होने लगती है कि कहीं कोई अनहोनी ना हो जाएँ क्योंकि आज समाज की मानसिकता विकृत हो चुकी है। जिसके कई मुख्य कारण आप पढ़ चुके हैं।

हमारा ये कैसा सभ्य समाज हैं जहाँ एक तरफ हम बेटी बचाओं का अभियान चलाते हैं तो एक तरफ बेटियों को सरेआम नोंचा जा रहा हैं। समझ में नहीं आता कि इन वहशियों को खत्म करने का अभियान कब चलेगा। कब ये घिनोने कृत्य रुकेंगे। कब नारी खुद को सुरक्षित महसूस करेगी। हर तरफ नारी के लिए खौफ पसरा हुआ हैं। जहाँ भी जाए उसे ये ही भय रहता हैं।

नारी हर समय, हर जगह दर्द से कराह रही हैं। उसका दर्द, उसके अन्तर्मन कि पिड़ा समझने के लिए कौन आगे आयेगा ? द्रोपदी को चीर हरण से बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया था पर आज के युग में द्रोपदी असंख्य है और उन्हें बचाने के लिए भगवान अवतार नहीें लेंगे। आज अगर द्रोपदी को कोई बचा सकता है तो वो है खुद नारी। उसे माँ काली का रूप धरना होगा और विनाश करना होगा हर बुराई का। तभी वो खुद को सुरक्षित कर सकती है।

क्योंकि आज

खुदा नहीं रहा, इस जहान में

वरना यूँ कत्लेआम नहीं होता

नहीं लुटती, नारी की आबरू

घर का चिराग, वीरान न होता

लहु-लुहान ना होती, राहें यहाँ

अगर खुदा तेरा, विचरण होता

तेरा जन्मा, भूख से न तड़फता

ऐ खुदा गर तू दरियादिल होता

तूने बनाया होता, गर इंसान को

धर्म नाम पर आडम्बर न होता

गर तूने बनाएं होते, धर्म अलग

सबके खून का रंग एक न होता

गर होती सच्चाई की जीत यहाँ

झूठ ने कोहराम मचाया न होता

अगर होती तेरी मूर्त-सीरत एक

यूँ तेरे नाम का बंटवारा न होता

मिलता जीवन तेरी छत्र छाया में

तो आतंकवाद का साया न होता

न उजड़ती किसी माँ की कोख

बेटा -बेटी में, गर फर्क न होता

अगर होती खुदा तेरे पास जन्नत

ये कलयुग नहीं, ये सतयुग होता

न होता इंसान इंसान का दुश्मन

गर ‘ऋषि’ इस युग में खुदा होता

हां आज के युग को देखकर अब आभास होने लगा है कि इस धरती पे अब खुदा नहीं रहता वरना जब जब धरती पे अन्याय हुआ है उसने अन्याय का पतन किया है। पर आज तो अन्याय ही सच्चाई और अच्छाई का पतन कर रहा हैं। हर तरफ इंसान और राहें लहुलुहान है। इसलिए नारी को खुदा के भरोसे नहीं खुद के भरोसे अन्याय से लड़ना होगा वरना अन्याय एक दिन इंसानियत का जड़ से पतन कर देगा। इसलिए अब नारी कोे माँ काली का रूप धरना ही होगा।

आज नारी के साथ होने वाले अन्याय का एक मुख्य और बड़ा कारण कुछ महिलायें भी हैं जो महिला होकर भी नारी को मोह माया के लालच में आकर अपनी ही जाती को भोग्या के रूप में चित्रित कर रही हैं। जो नारी होकर भी नारी का दर्द नहीं समझती हैं।

आज महिला ही महिला कि दुश्मन बन बैठी हैं। घर के पुरुष तो फिर भी बेटी होने पर भी संतुष्ट हो जाते हैं पर घर की और बाहर की कुछ महिलायें ही ताने मार-मार कर उस औरत का जीना मुश्किल कर देती हैं। मतलब हर तरफ नारी की हार नजर आती हैं। यहाँ तक अगर किसी नारी के बार-बार बेटियां ही हुई तो वो अपने बेटे की दूसरी शादी करवाने के लिए योजनाएं बनाने लग जाती हैं। अगर नारी माँ नहीं बन पाती है तो उसे बांझ होने का अहसास भी खुद नारी ही करवाती हैं।

नारी को देह व्यापार में धकेलने के लिए पुरुष वर्ग के साथ महिला वर्ग भी शामिल हैं। नारी का दर्द खुद नारी भी महसूस नहीं करती। एक बेटी को कोख में मारने के लिए भी माँ ही हामी भरती हैं। वो खुद भूल जाती हैं कि मैं भी नारी हूँ और अगर उस समय मेरे माता-पिता मुझे कोख में मार देते तो मैं ये युग कहाँ से देखती।

किसी भी पुरूष या महिला को आपने आशीर्वाद में कभी यह कहते नहीं सुना

पुत्री वती भव, दूधों नहाओ-पुत्रियों फलो

हर जगह बेटे की आकांक्षा मन में धरना दिए हुवे बैठी हैं। पर जब किसी गाय या भैंस के बछडी या कटड़ी का जन्म होता हैं तो कितने खुश होते हैं तब क्यों खुशी मनाई जाती हैं और वहीं जब घर की बहु कन्या को जन्म देती है तो कितनी मायूसी छा जाती हैं। कितना फर्क हैं ना हमारी सोच-विचार में।

आज नारी खुद को कहीं भी सहज महसूस नहीं करती हैं। चुपचाप सितम सहती रहती हैं और उफ तक नहीं करती। नारी इतनी सहनशील हैं कि दर्द पाकर भी बदलें में प्यार देना पसंद करती हैं। पर कहीं ना कहीं उनके मन-मस्तिष्क में एक भय प्रायः उसके इर्द गिर्द घूमता रहता हैं। हर तरफ वो असुरक्षित हैं। कानून भी मजाक बन कर रह गया हैं। एक तरफ सभ्य समाज का नाम लेकर नारी पे अत्याचार करने वाले पुरुष वर्ग तो दूसरी तरफ स्त्री वर्ग भी नारी की दुश्मन बन कर बैठी हैं। मतलब हर तरफ भय ने अपना शिकंजा कसा हुआ हैं।

महिलाओं के साथ हो रहे इन हादसों को देखकर व सुनकर मन बहुत चिंतित हो जाता हैं। ये कैसी विडंबना है कि हमारे देश में नारी सशक्तिकरण और नारी मुक्ति के जितने दावे किये जाते हैं उतना ही नारी शोषण और अत्याचारों की घटनाएँ बढती जा रही हैं। नारी के सशक्तिकरण की जब भी बात आती हैं, तब तब कहाँ जाता हैं की नारी को अगर इन अत्याचारों और शोषण से मुक्त करवाना हैं तो सबसे पहले नारी को शिक्षित करना होगा। पर अगर देखा जाएँ तो पिछड़ी और अशिक्षित महिलाओं की बात तो दूर जो आज शिक्षित महिलाएं भी असुरक्षित हैं क्यांेंकि निजी से लेकर सार्वजनिक जीवन में, घर से लेकर बाहर, विधालय से लेकर कार्यालय तक, खेल से लेकर फिल्मी जगत तक और राजनीति जैसे क्षेत्रों में भी महिलाएं उत्पीड़न और शोषण का शिकार हो रही हैं।

हमारे देश में राष्ट्रीय महिला आयोग और राज्य महिला आयोग जैसी बड़ी संस्थाओं को पर्याप्त अधिकार और संसाधन मुहैया कराये गए हैं। लेकिन फिर भी आज भी हमारें देश कि नारियाँ इन्साफ के लिए खुद से और समाज से लड़ती रहती हैं और ताकती रहती हैं मुंह न्याय के लिए।

नारी पे हो रहे हर अत्याचार और शोषण के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के कानून भी बनाएं गये हैं फिर भी उनके साथ अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। हर तरफ एक भय नारी के जीवन में व्याप्त होता जा रहा हैं। जहाँ एक तरफ नारी आसमान की उच्चाईयां छू रही हैं तो दूसरी तरफ उनके साथ भेदभाव, शोषण और अत्याचार किया जा रहा हैं।

जिस तरह से नारी के साथ अत्याचार हो रहे हैं तो इन सबके लिए अगर कोई दोषी हैं तो वो हैं हमारी मानसिकता, समाज और सरकार में उच्चं पद पर आसीन अधिकारीयों का गैर जिम्मेदार व्यवहार। जो सब होते देखकर भी चुप रहते हैं। हमारे राजनेता जो आये दिन बेढंगे ब्यान देते रहते हैं और अपराध करने वालों के हौंसलें को बढ़ावा देते हैं। कानून कितना भी सख्त हो जाएँ पर जब तक हमारी मानसिकता नहीं बदलेगी तब तक अत्याचार कम नहीं होंगे।

प्रायः देखा जाता हैं कि जब भी नारी पर अत्याचार होता हैं तो अपराधी को सजा देने की जगह पीडि़त नारी को ही दोषी ठहरा दिया जाता हैं और उसे ही ताने और गंदी नजरों का शिकार होना पड़ता हैं। अगर नारी अपने साथ हुवे अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाना भी चाहे तो घर वाले अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा का हवाला देकर उसे आवाज उठाने के लिए रोकते हैं और उसके साथ हुवे अत्याचारों को दबाने का प्रयत्न करते हैं और फिर भी वो आवाज उठाती हैं तो उसे डरा धमाका कर चुप करा दिया जाता हैं।

नारी कितनी भी दुःखी हो उसका दर्द कोई नहीं समझना चाहता। उसके साथ हुवे अत्याचारों के लिए कोई आवाज नहीं उठाना चाहता। यहाँ तक माता-पिता भी उसे चुप करवा कर देते हैं। हमारे समाज के लोग नारी को सुरक्षा देने की जगह उसे भयभीत ज्यादा करते हैं। पीडि़ता को न्याय दिलाने कि जगह उसके चरित्र पे ही उँगलियाँ उठा दी जाती हैं। हमारे कानून में इतना लचीलापन हैं कि यहाँ दोषी को सजा देने के रास्ते कम, उसे जुर्म से बाहर निकलने के रास्ते ज्यादा उपलब्ध हैं। बाहुबली, रसूखदार और पैसेवालें पैसों के दम पर कानून को ही खरीद लेते हैं। जिससे अत्याचार के विरुद्ध उठाई गई आवाज वही दब कर रह जाती हैं।

आज यही सब दर्द देखकर बेटियों को कोख में मारने का प्रयत्न हो रहा हैं पर ये सब सोचकर कोई कन्या भूर्ण हत्या करता हैं तो वो गलत हैं और वो गलत मानसिकता के शिकार हैं। बेटी को कोख में मारने की जगह बेटी को इतना मजबूत बनाओ की उसके साथ शोषण और अत्याचार करने के लिए कोई भी असमाजिक तत्व नजर ना उठा सके।

जब माता-पिता एक बेटी को कोख में मरवाते है तो वो अनेक रिश्तो का पतन कर देते है। कन्या भुर्ण हत्या के पिछे ना जाने कितने रहस्य, दर्द छिपे होते है। जब कोख में एक बेटी पलती है तो आज के युग को देखकर माता-पिता का चिंतित होना लाजमी बन जाता है। तब वो भय इस कदर हावी हो जाता है कि जुर्म दस्तक देने लगता है। वो भय तभी खत्म हो सकता है जब उन्हें कोई जागरूक करें।

एक छोटी सी दास्तान है जिसमें पिता अपनी बेटी को कोख में ही मरवाना चाहता है उसे उसकी पत्नी रोकने का प्रयास भी करती है लेकिन जब पति अपने अन्तर्मन की पिड़ा अपनी पत्नी को बताता है तो पत्नी निःशब्द हो जाती है कि तभी बेटी अपनी माँ की कोख में पुकार करती हैं और अपने मात-पिता से जीवन जीने की गुहार करती हैं।

कोख में पलती बेटी, माँ और पिता का दर्द

एक औरत गर्भ से थी पति को जब पता लगा कि

कोख में बेटी हैं तो वो उसका गर्भपात करवाना चाहता

हैं और दुःखी होकर पत्नी अपने पति से क्या कहती हैं -

सुनो, ना मारो इस नन्ही कली को

वो खूब सारा प्यार, हम पर लुटायेगी

जितने भी टूटे हैं सपने, फिर से वो सब सजाएगी

सुनो, ना मारो इस नन्ही कली को

जब तुम थक कर घर आओगे, तुम्हे खूब हंसाएगी

तुम प्यार ना करना बेशक उसको, वो अपना प्यार लुटाएगी

सुंनो, ना मारो इस नन्ही कली को

तुम्हारें हर काम की चिंता, वो एक पल में भगाएगी

किस्मत को दोष ना दो, वो अपना घर आंगन महकाएगी

ये सब सुन पति अपनी पत्नी को कहता हैं -

सुनो मैं भी नहीं चाहता मारना इस नन्ही कली को

तुम क्या जानो, प्यार नहीं क्या मुझकों अपनी परी से

पर डरता हूँ समाज में हो रही रोज-रोज की दरिंदगी से

क्या फिर खुद वो इन सबसे, अपनी लाज बचा पाएगी

क्यूँ ना मारू में इस कली को, वो बहार नोची जाएगी

मैं प्यार इसे खूब दूंगा, पर बहार किस-किस से बचाऊंगा

जब उठेगी हर तरफ से नजरें, तो रोक खुद को ना पाउँगा

क्या तू अपनी नन्ही परी को, इस दौर में लाना चाहोगी

जब तड़फेगी वो नजरो के आगे, क्या वो सब सह पाओगी

क्यों ना मारू में अपनी नन्ही परी को

क्या बीती होगी उनपे, जिन्हें मिला हैं ऐसा नजराना

क्या तू भी अपनी परी को, ऐसी मौत दिलाना चाहोगी

ये सुनकर गर्भ से आवाज आती हैं सुनो माँ पापा

मैं आपकी बेटी मेरी भी सुनो -

पापा सुनो ना, साथ देना आप मेरा

मजबूत बनाना मेरे हौसले को

घर लक्ष्मी हैं आपकी बेटी, वक्त पड़ने पे मैं काली भी बन जाउंगी

पापा सुनो, ना मारो अपनी नन्ही कली को

उड़ान देना मेरे हर हौंसलों को

मैं भी कल्पना चावला की तरह, ऊँची उड़ान भर जाउंगी

पापा सुनो, ना मारो अपनी नन्ही कली को

आप बन जाना मेरी छत्र छाया

मैं झाँसी की रानी की तरह, खुद की गैरो से लाज बचाउंगी

पिता ये सुनकर मौन हो गया और वो अपने फैसले पे

शर्मिंदगी महसूस करने लगा और कहता हैं अपनी बेटी से -

मैं अब कैसे तुझसे नजरे मिलाऊंगा

चल पड़ा था तुम्हारा गला दबाने

अब कैसे खुद को तुम्हारे सामने लाऊंगा

मुझे माफ करना ऐ मेरी बेटी

तुझे इस दुनियां में सम्मान से लाऊंगा

वहशी हैं ये दुनिया तो क्या हुआ

तुझे बहादुर बिटियाँ बनाऊंगा

मेरी इस गलती की मुझे हैं शर्म

घर - घर जाके सबका भ्रम मिटाऊंगा

बेटियां बोझ नहीं होती

अब सारे समाज में अलख जगाऊंगा

मेरी इस कविता का शीर्षक बस यही हैं कि कुछ लोग बेटी को बोझ समझते हैं तो कुछ इस खौफ से बेटी को जन्म नहीं देते कि दहेज के लोभी, वहशियों से कैसे बचायेंगे। पर उनको एक ही जवाब - बेटी को कायरता की जिन्दगी मत जीने दो, उसे भी बेटो जितना सम्मान दो, उसके हौसलों को ऊँची उड़ान दो। हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा और जब समाज बदलेगा तो एक सुंदर संसार का निर्माण होगा।

इस संसार में जीने का हक सबको हैं और ये हक छीनने का अधिकार ना तो इंसानों को है और ना ही इंसानों द्वारा बनाएं गए किसी समाज को हैं। बेटियां भी उड़ान भरना जानती हैं। आप बस उसका सहयोग करो और उसके हौंसलों को मजबूत बनाएं। राह वो खुद ब खुद बनालेगी।

आज हमें बदलाव के लिए बहुत प्रयत्न करने होंगे और हर उस चीज का बहिष्कार करना होगा जिसके कारण नारी के साथ शोषण और अत्याचार बढ़ रहे हैं। हैवानियत का जो ये गंदा दौर चला हैं उसकी जड़ों को काटना होगा तभी नारी को खुले आसमान में पंख फैला कर जी सकेगी और उसे खुशियों से भरी जीने की राह मिलेगी।

दुनियाभर में नारी को समानता का अधिकार दिया गया है, लेकिन हकीकत तो यही है कि उसे बचपन से लेकर बुढ़ापे तक जुल्मों का शिकार बनाया जाता है। भारत में तो भुर्ण हत्या, बाल-विवाह, बलात्कार , दहेज, सती, देवदासी और विधवाओं के प्रति हेय-दृष्टि जैसी पुरातन परम्पराओं के नाम पर नारी दासता के पन्नों पर हर रोज प्रताड़ना की नई कहानी लिखी जा रही है।

आज जिस तरह से बेटी बचाओं अभियान, नारी पर अत्याचार बंद करों, हमें आजादी चाहिए जैसे अभियान होने के बावजूद भी अत्याचारों और शोषण में वृद्धि ही हुई हैं इसका मुख्य कारण हैं इन्टरनेट, मोबाइल और मिडिया (फिल्म और विज्ञापन) जिसमें नारी को सिर्फ भोग्या के रूप में परोसा जा रहा हैं। किसी भी वस्तु का प्रचार प्रसार करने के लिए नारी के देह का प्रदर्शन किया जा रहा हैं। जिसके कारण हमारे समाज में नारी के प्रति विकर्ष्ण और गंदी मानसिकता पैदा हो रही हैं जिसके कारण बलात्कार, अत्याचार और यौन उत्पीड़न जैसी गम्भीर समस्याओं में बढ़ोतरी हो रही हैं। फिल्मों का जिस तरह स्तर गिरा हैं उससे साफ जाहिर होता हैं कि हमारी मानसिकता कितनी गिर चुकी हैं। और इस तरह के कार्य में नारी ही उनका साथ दे रही है चन्द दौलत और शोहरत के खातिर। पर उन नारियों को ऐसा करने के लिए बढ़ावा भी कुछ असमाजिक पुरूष वर्ग ही तो देता है। जिस वजह से खुद औरत दुसरी औरत के लिए खाई तैयार कर रही है।

आजकल एक विज्ञापन आता हैं कि बेटे रोते नहीं। उसे बचपन से लेकर जवानी तक यही कहाँ जाता हैं और वो लड़का बड़ा होकर नारी पे हाथ उठाता हैं और अंत में कहाँ जाता हैं काश बेटे को बचपन में ये भी सिखाया जाता कि बेटे बेटियों को नहीं रुलाते हैं और ना ही उनपे हाथ उठाते हैं। अगर ऐसा बचपन में हो जाता तो शायद नारी पे अत्याचार नहीं होते। ये हकीकत हैं अगर हमे अच्छे संसार का निर्माण करना हैं तो सबसे पहले एक अच्छी नींव तैयार करनी होगी। बचपन से लेकर जवानी तक लड़कों के सामने बेटी को दोयम दर्जे का समझा जाता हैं। अगर बचपन में लड़कों को अच्छे संस्कार दिए जाएं और उन्हें लड़की का मान सम्मान करना सिखाया जाएँ तो इस तरह के गंभीर घटनाएँ उत्पन्न नहीं होगी। इसलिए बच्चों को अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा देनी बहुत जरूरी हैं।

बेटियां अपने माता-पिता की आँखों में आंसू आने से पहले उनका दर्द पहचान लेती हैं। और वहीं दुसरी तरफ बेटे माता-पिता का दर्द समझने कि बात तो दूर वो उनकी आँखों में आंसू देने की वजह खुद बनते हैं। रोटी और बेटी दोनों का एक दुसरे के साथ बहुत गहरा सम्बन्ध हैं। जिस घर में बेटी होती हैं उस घर में रोटी मिलना तो निश्चित रहता हैं। अन्यथा बेटे चाहे चार-पांच ही हों, पर लड़ेंगें इस बात पर की माता-पिता को अपने पास कौन रखे।

आजकल ऐसे दिन भी आ गये हैं कि हर शहर में वृद्धाश्रम खुलने लगे हैं क्यूंकि आजकल के आधुनिक युवाओं के लिए माता-पिता बोझ बन जाते हैं। ये सत्य हैं कि बेटियों के लिए माता-पिता कभी बोझ नहीं बनते हैं। आज आपके पास माँ, दादी, नानी, बहन, भुआ, काकी, भाभी, चाची, ताई, मौसी, पत्नी अनंत रिश्ते हैं। ये रिश्ते आज आपके पास क्यूँ हैं क्यूंकि बुजुर्गों ने कन्या भुर्ण हत्या को फैशन नहीं बनाया था।

पुरुष चाहें किसी भी तरह स्त्री को सता लें, पीड़ा दें, या मानमर्दन करें। फिर भी चाहें अहोई अष्टमी में माँ हो या रक्षाबंधन में बहन हो या करवा चैथ में पत्नी हो नारी हर रूप में पुरुष की सुरक्षा, सुख एवं समृद्धि के लिए ही निरंतर तप और वृत करती रहती है। नारी दया और त्याग की प्रतिमूर्ति हैं जिसें आज के सभ्य पुरुष समझ नहीं पा रहे हैं। पुरुष वर्ग को नारी का क्षमा, दया, अहिंसा, त्याग जैसा रूप ही पसंद आता हैं उन्हें नारी का अधिकार, संघर्ष, संग्राम, प्रतिशोध, हिंसा, दौड़-धुप, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाला रूप उन्हें पसंद नहीं आता हैं।

मतलब साफ हैं पुरुष वर्ग (हमारा सभ्य समाज की हुंकार भरने वाले) को नारी का तितली जैसा रूप बिल्कुल पसंद नहीं आता हैं उन्हें नारी चुप और शांत रहने वाली पसंद हैं जो उनके किये हुवे अत्याचारों के सामने मौन रहें और सब अत्याचार सहती रहें। पर युग बदल रहा हैं हर तरफ बदलाव हो रहा हैं फिर नारी क्यूँ अशांत हैं उसे भी अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ा होना हैं और उसे तितली का रूप के साथ मधुमक्खी का रूप भी धारण करना होगा जो अन्याय करने वालों को डस सके।

नारी अपने साथ होते जुल्मों से परेशान हो चुकी है। कुछ मर्द जिनकी गिरी हुई मानसिकता के कारण उसके अन्तर्मन को बार बार अधात पहुंचता है। वो अपने मन की पीड़ा किसी से कह भी नहीं पाती हैं। मन ही मन में खुद कोसती हुई खुद से ही सवाल करती है। और जब जब वो खुद से सवाल करती है तो उसके मन में क्रोध उत्पन्न होता है।

और तब वह उन सभी मर्दो को क्रोध स्वर में कहती है कि

हे! अत्याचारी, अंहकारी

शर्म नही आती तुझे

घिनौनी हरकते करते हुवे

हमारी भावनाओं का

मखौल उड़ाते हुवे

क्या तुम्हे

इसीलिए जन्म दिया हैं

हमारे ही आँचल में

पला बढ़ा तू

शर्म नही आती तुझे

वक्त आने पे

उसी आँचल को हटाते हुवे

धिकार हैं मुझे तुझ पर

जिस कोख से तू पैदा हुआ

शर्म नही आती तुझे

उसी को छलनी करते हुवे

इससे अच्छा

मैं बाँझ रह जाती

आने लगी मुझे शर्म

तुम्हे मर्द कहते हुवे

अभी वक्त हैं सुधर जा तू

वरना हमे शर्म नही आयेगी

तुम जैसे मर्दो को

कोख में मारते हुवे

नारी का यु क्रोधित होना भी सही है और सच में आज के युग को देखते हुवे उसे एकदिन ये कदम उठाना पड़ेगा। क्योंकि आज नारी पे होने वालें अत्याचारों की संख्या अनगिनत हैं। रोज कोई ना कोई अपराध नारी के जीवन की डोर काट रहा हैं। हमें अब बदलाव के लिए नारी के जीवन की डोर को मजबूत करना होगा और नारी के साथ होने वालें अत्याचारों की जड़ काटनी होगी। जब तक नारी समाज में सुरक्षित नहीं तब तक हमें खुद को आजाद कहना गलत होगा। हम जिस समाज में रहते हैं अगर उस समाज में हमारी माँ, बहन, बेटियां सुरक्षित नहीं तो फिर हमें उस समाज में रहने का भी कोई अधिकार नहीं हैं। इसलिए बदलना होगा ये सब कुछ और करनी होगी नई शुरुवात। एक अच्छी दिशा का निर्माण करना होगा। जहाँ बेटियां कोख से लेकर हर राह पर सुरक्षित रहे।

नारी का त्याग, बलिदान, प्रेम, स्नेह हमें कभी नहीं भूलना चाहिए। आज जहाँ नारी अपने घर की दहलीज से बाहर निकल अपने माता-पिता का और खुद का नाम रोशन कर रही हैं। वहीं हमें उनके इस हौंसले को सलाम करते हुवें उनका हर डगर पे साथ निभाना होगा। उनकी हिम्मत बन उनकों मजबूत बनाना होगा।

हम चाहे तो इस समाज में बहुत कुछ बदल सकते हैं। सबसे पहले अगर कुछ बदलना हैं तो वो हमारी सोच। अगर हम अपनी सोच बदले तो बेटियों के साथ दुर्व्यवहार नहीं होगा। कन्या भूर्ण हत्या और हैवानियत को रोकने के लिए हमें समाज को जागरूक करना होगा। हर घर को शिक्षित करना होगा। नारी के शौर्य, त्याग, बलिदान एवं उनके अभिमान की गाथाएँ सुनानी होंगी। हर घर में नारी के प्रति अपना व्यवहार बदलना होगा। हर घर को जागृत करना होगा और उन्हें सरकार द्वारा चलाई जा रही बेटियों के लिए योजनाओं के बारें में बताना होगा। और उन्हें बताना होगा कि कन्या भूर्ण हत्या, दहेज मांगना, नारी से छेड़छाड़, उसका मानमर्दन करना, उसे प्रताडि़त और शोषित करना कितना बड़ा अपराध हैं।

नारियों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध देश के प्रत्येक नागरिक को आगे आने की जरूरत है। नारियों के सशक्तिकरण में हर प्रकार का सहयोग देने की जरूरत है। इस काम की शुरूआत सबसे पहले अपने घर से होनी चाहिए क्योंकि जब तक हम खुद नहीं सुधरेंगे तब तक हमें सभ्य समाज कि परिकल्पना करनी नहीं चाहिए।

नारी सृजन की शक्ति। यह शक्ति जिस रूप में प्रकट होती है, वह उसी रूप में परिलक्षित भी होती है। नारी हमारे बिच अनेकों में विघमान हैं उसके हर रूप को समझना होगा। जब नारी अपने बच्चें को दूध पिलाती है तो वह वात्सल्य व ममता का साकार रूप होती है। जब नारी अपने साथ हुवे अत्याचारों के खिलाफ खड़ी होकर हुंकार भरती है, तो वह माँ दुर्गा व माँ काली रूप विकराल रूप होती है और फिर उसके साहस व दृढ़ता के सामने ना तो कोई टिका है और ना ही कोई टिक सकता हैं। जब नारी अपनी सुकोमल संवेदनाओं के संग विचरती है तो सृष्टि में सौंदर्य की एक नई आशा, दिव्य प्रकाश के रूप में बिखर जाता है, परन्तु जब नारी अपने प्राकृतिक एवं पवित्र भाव को भूल जाती है तब वह भोग्या, अबला के रूप में शोषित, प्रताडि़त व दंडित की जाती है।

आज नारी को खुद का उत्थान स्वयं ही करना होगा। तभी बदलाव सम्भव हैं। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था - नारी का उत्थान स्वयं नारी ही करेगी, कोई और उसे उठा नहीं सकता। वह स्वयं उठेगी। बस, उसमें उसे सहयोग की आवश्यकता है और जब वह उठ खड़ी होगी तो दुनियां की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती। वह उठेगी और समस्त विश्व को अपनी जादुई कुशलता से चमत्कृत करेगी।

आज नारी खुद को सम्भालें और अपना सही रूप पहचानें। अपने अंदर की आंतरिक शक्तियों को उभारें और उसे रचनात्मक कार्यों में लगा दें, जिससे नारी खुद को मजबूत बना सकेगी और फिर नारी शक्ति के रूप में आगे बढ़ सकेगी। उसे फिर शोषित बेडि़यों में नहीं बाँधा जा सकेगा। उसे स्वयं में साहस, शौर्य, पवित्रता को फिर से बढ़ाना होगा। जिससे कोई भी उसे अबला और भोग्या के रूप में ना देख सके। नारी खुद के रूप की पहचान जिस दिन कर लेगी उस दिन से उसका बाजारीकरण नहीं होगा और वह अश्लीलता की दहलीज पर बिकने से बच सकेगी।

नारी के विषय में ऋग्वेद में ऋषि मुनि उद्धोष करते हैं कि-

शुचिभ्राजा, उपसो नवेदा यशस्वतीर पस्युतो न सत्याः।

अर्थात श्रध्दा, प्रेम, भक्ति, सेवा, समानता की प्रतीक नारी पवित्र, निष्कलंक, आचार के प्रकाश से सुशोभित, प्रातःकाल के समान ह्रदय को पवित्र करने वाली, लौकिक, कुटिलता से अनभिज्ञ, निष्पाप, उत्तम, यशमुक्त, नित्य, उत्तम कार्य की इच्छा करने वाली, संकर्मण्य और सत्य व्यवहार करने वाली देवी है।

सही मायने में देखा जाएँ तो आप किसी भी ग्रन्थ को या किसी भी धार्मिक पुस्तक को शांत चित से पढेंगे तो उसमें आप नारी के अनेकों रूप के साथ उसकी ममता, त्याग, बलिदान, उनका निश्छल प्रेम, वात्सल्य इत्यादि के वर्णन से जरुर रूबरू होंगे।

नारी ममता, वात्सल्य, दया, करुणा, सेवा, सहयोग, प्रेम और संवेदना की जीती जागती तस्वीर है। उसमें श्रद्धा, दया, भक्ति और त्याग का जीवित चित्रण है। कला चेतना उसमें विद्यमान है। पुरुष में बल, शौर्य, साहस, पराक्रम आदि गुण प्रधान होते है परन्तु नारी संवेदना की प्रधान होती है। वह ईश्वर की अनुपम कृति (रचना) है जो संसार में ममता, करुणा, प्रेम, संवेदना का संचार करती है। वह मातृत्व व वात्सल्य की विलक्षण विभूति है जो ईश्वर का प्रतिनिधित्व करती है।

नारी के द्वारा ही संस्कृति जीवन्त रहती है उसी के द्वारा अगली पीढ़ी संचारित होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि दस उपाध्यायों से एक आचार्य श्रेष्ठ है और 100 आचार्यों से एक पिता श्रेष्ठ है लेकिन 1000 पिताओं से एक माता उत्तम है।

नारी श्रद्धेय का रूप हैं जो एक धुप-अगरबत्ती की तरह होती है जो अपना सर्वस्व हवन कर सम्पूर्ण जगत को सुगन्धित करती है और अन्त में स्वयं भस्मीभूत होकर राख में प्रवर्तित हो जाती है। नारी प्राचीन काल से ही अपनी अदभुत शक्ति की प्रतिभा, चातुर्य, स्नेहशीलता, धैर्य, समझ, सौन्दर्य के कारण हर मोर्चे पर पुरुष से आगे रही है। जहां वह पति को पूज्य व देव तुल्य मानती है।

नारी बेटी हैं, बहन हैं, पत्नी हैं, माता हैं, भाभी हैं, सहयोगी हैं, साथी हैं, प्रेमिका हैं। नारी एक ऐसा वृक्ष है जो छाया देकर भी सुगन्ध फैलाता है। नारी अपनी सन्तान के लिए ममता का भाव, पति के लिए त्याग व समपर्ण, मानवता के लिए दया के भाव और जीव-जन्तु के लिए करुणा के भाव रखने वाली नारी ही तो है। नारी संसार का हिस्सा ही नहीं अपितु नारी से ही संसार हैं।

भारतीय समाज में नारी को एक देवी रूप माना हैं वह आदि-शक्ति का रूप हैं। नारी का सौन्दर्य, उसकी कोमलता और उसकी मोहकता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति हैं। बिना अपने आप को विज्ञापित किए, वह एक साथ कई तरह के मोर्चो की कमान संभाल लेती है। सन्तान उत्पत्ति से लेकर उसके पालन तक, प्रेम से लेकर विवाहित जीवन तक वह निरन्तर प्रेरणा की मिशाल बनी रहती है। आज बड़ा से बड़ा विद्वान, कलाकार, वीर योद्धा, उसी की कोख से उत्पन्न होते हैं। नारी केवल नर का मादा रूप मात्र नहीं है। नारी तो एक शाश्वत, चिरन्तन दिव्य रूप है।

नारी के इतने सारे रूप होकर भी उसे अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, संगठित होना पड़ रहा है और उसे खुद के रूप को उजागर करने के लिए खुद से और इस समाज से लड़ना पड़ रहा है। पुरुष वर्ग नारियों पर अत्याचार करते हैं तो कहीं-कहीं नारी ही नारियों पर अत्याचार कर रही हैं। आखिर क्यों हो रहा हैं ये सब ? क्यूँ नारी शोषित हो रही हैं ? नारी को देवी का रूप जानकर भी उसे क्यों प्रताडि़त किया जा रहा हैं ?

नारी को शोषित और प्रताडि़त होने का एक मुख्य कारण ये भी हैं कि उसे बचपन से ही माता-पिता प्रेम, स्नेह और दुलार के साथ-साथ उसके अन्तर्मन में पराया धन की भावना भर देते हैं। बंदिशों की बेडि़यों में जकड़ी नारी आजादी चाहती है। माँ-बाप के घर में जो हजारों बंदिशें उन पर होती है, वे सोचती है कि शादी के बाद उन बंदिशों से मुक्ति मिल जाएगी। पर ससुराल जाकर वो और ज्यादा बंदिशों और बेडि़यों में जकड़ दी जाती हैं। हिन्दुस्तान में एक समय ऐसा भी था, जब नारियों को अपना जीवन साथी चुनने की पूर्ण आजादी हुआ करती थी, लेकिन आधुनिक युग में इस आजादी को छीन लिया हैं।

नारी हर तरह के कष्ट सह लेती हैं क्यूंकि उसे बचपन में शिक्षा के रूप में यही सिखाया जाता हैं। जिसके परिणाम स्वरूप वह हर तरह से शोषित होकर भी चुप रहती हैं। यही रुढि़वादी सोच की वजह से नारी को अबला और भोग्या के रूप में उसकी पहचान बनती रही।

अब हमें पुरानी विचारधाराओं की जड़ को काटना होगा और उसमें अब नए पौध विकसित करने होंगे। समाज में एक अच्छी पहल कर नारी के प्रति सम्मान व स्नेह के भाव उजागर करने होंगे। नारी के साथ हो रही घरेलू हिंसा, अत्याचार, बलात्कार, कन्या भूर्ण हत्या, दहेज प्रथा, पर्दा प्रथा जैसे घोर अपराधों को खत्म करना होगा। नारी को शिक्षित कर उसके अंदर आत्मविश्वास भरना होगा और उसे इतना मजबूत बनाना होगा कि कोई भी उसे शोषित करने से पहले हजार बार सोचे। हम सबको यह संकल्प लेना होगा कि अब और नहीं, अब किसी भी इंद्र के पाप का दंड अब किसी भी आहिल्या को नहीं भरना होगा।

नारी के रूप का जितना वर्णन किया जाये उतना ही कम होगा। नारी ने इस सम्पूर्ण संसार की रचना की है। मैं ई्रश्वर कि इस महान कृति को किस-किस रूप में परिभाषित करू। किस तरह से हे! नारी तेरा में वर्णन करू।

क्योंकि

माँ, बहन बेटी का सार हो तुम

त्याग, स्नेह का आगार हो तुम

बना हैं तुझसे ये सम्पूर्ण संसार

करुणा, प्रेम का संचार हो तुम

घर -आंगन को जो रोशन करे

सूरज के जैसी दमकार हो तुम

करें जब कोई तुझपे अत्याचार

माँ काली का अवतार हो तुम

दो परिवारों की लाज समेटती

श्रद्धा, विश्वास की नार हो तुम

मानवता में प्रेम का संचार करे

दया, ममता का भंडार हो तुम

ना हो अबला, ना हो कमजोर

प्रतिशोध में तपती धार हो तुम

‘ऋषि’ कितना करें तेरा वर्णन

सब कश्ती की पतवार हो तुम

यें सत्य हैं कि नारी हमारी हर कश्ती की पतवार हैं और आज वो ही पतवार भंवर में फंसी हुई हैं। आओ मिलकर तुच्छ मानसिकता, लिंग भेदभाव, हवस, दौलत कि लालसा का वेग मन मष्तिस्क से हटाएं और संसार का निर्माण करने वाली नारी को भंवर में डुबने से बचायें। उसका सहयोग कर एक सुन्दर राष्ट्र का निर्माण करें और ये संकल्प लें कि ना बुरा करोंगे, ना बुरा देखोगे। जितना सम्मान धर की नारी का करतें हो उससे कहीं गुणा पराई स्त्री का भी करोगें।

और नारी को भी अब अबला का रूप त्यागना होगा और लड़ना होगा अपने अधिकारों के लिए। समझना होगा उसे अपने दिव्य रूप को। अब समय आ गया है कि नारी तुम अपना प्रचंड रुप दिखाओं। अब याचना छोड़कर, अन्याय के विरूद्ध रण के लिए हुंकार भरो। जिस तरह तु घर सम्भाल सकती है वैसे ही तु देश भी सम्भाल सकती है। अब तुझे अपने कोमल हृदय को फुल के साथ कठोर पत्थर का भी बनाना होगा। आज तुम्हें संकल्प लेना होगा कि तुम ना नारी पे अत्याचार करोगी और ना ही अत्याचार सहोगी।

अगर हम अब भी वक्त रहते नहीं सम्भले तो समय की रेत नारी के दिव्य रूप को तहस नहस कर देगा। क्योंकि आज समय प्रचण्ड रूप से गतिमान हैं। समय रहते ही अब हमें सम्भलना होगा। वरना तैयार हो जाओ समय की रेत के साथ धुमिल होने को।

पहचान ‘समय कि रेत’ को वरना बरबादियाँ होंगी

अब ना सम्भलें तो बिन नारी दुनिया रचानी होंगी

आंखों पे लगी पट्टी और बन्द मुट्ठी को लो खोल

वरना दरिन्दों की गुफा में वतन की बेटियाँ होंगी

ऋषि अग्रवाल