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शरारती दोस्त

शरारती दोस्त

डा. सुनीता

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चंदन और युथुंग दोनों युवक बहुत अच्छे दोस्त थे। वे जो भी काम करते, साथ-साथ ही करते थे। दोनों बड़े जिंदादिल थे और छोटी-मोटी बदमाशियाँ करते रहते थे। लोग भले ही उनसे थोड़े परेशान भी रहते थे, पर उनकी जिंदादिली और मस्तमौलापन के वे मुरीद थे। यानी गाँव में उनके रहने से बड़ी रौनक रहती थी। माहौल खुशनुमा रहता था।

ऐसा नहीं कि वे हमेशा किसी को सताने के लिए ही चालाकियाँ चलते रहते थे, बल्कि कभी-कभी वे लोगों की मुसीबत के समय मदद भी करते थे।

गाँव में एक बुढ़िया थी, जो कि अकेली रहती थी। वह सूअर पालकर अपना गुजारा करती थी। उसने उन दोनों को अपने घर बुलाया और कहा, “देखो बेटा, मैं बहुत बूढ़ी हो गई हूँ। तुम दोनों जवान हो, तगड़े हो। मेरे सूअर इधर-उधर भागते रहते हैं। तुम दोनों अगर मेरे सुअरों के लिए एक बाड़ा बना दो तो बड़ी मेहरबानी होगी।”

दोनों युवकों ने बड़े उत्साह से कहा, “अरे अम्माँ, यह कौन-सी बड़ी बात है? हम कल ही बाड़ा बना देंगे। फिर तुम्हारे सूअर बाड़े में ही रहेंगे। पर एक बात कहनी है अम्माँ। हमें बड़े जोरों की भूख लगी है, कुछ खिला-पिला दो।”

बुढ़िया उनकी बात से बड़ी खुश हुई और उसने उन दोनों को भरपेट भोजन कराया। भोजन के बाद वे दोनों नदी किनारे वाले जंगल से लकड़ियाँ लेने चल दिए, ताकि सूअरों का बाड़ा बनाया जा सके।

वे दोनों नदी किनारे पहुँचकर थोड़ी देर विश्राम करने लगे।

युथुंग ने ऐसे ही एक पत्थर हटाया तो उसे केकड़ा दिखाई दिया। उसने झटपट उस केकड़े को निकाल लिया। चंदन ने भी जैसे ही एक पत्थर हटाया, तो उसे तीन-चार केकड़े दिखाई पड़े। केकड़े उन्होंने झटपट खाए और उनके खोल एक जगह इकट्ठे कर लिए। करीब घंटे भर तक वे दोनों इस खेल में लगे रहे। इस खेल में लगे रहने के कारण वे बुढ़िया के बाड़े की बात बिल्कुल भूल गए।

शाम को चंदन और युथुंग गाँव लौटे, तो एक अँगोछे में वे खोल बाँधकर लाए थे। वे खोल उन्होंने बुढ़िया के बरामदे में चुपके से रख दिए और दबे पाँव वहाँ से निकल लिए।

कुछ दिन बाद की बात है, चंदन और युथुंग घूमने निकले। वे यों ही यहाँ से वहाँ घूमते हुए मटरगश्ती कर रहे थे। एक जगह उन्होंने देखा कि नदी किनारे मंदिर के पास एक पुजारी कुछ गाँव वालों के लिए पूजा-अर्चना और बलि की तैयारी कर रहा है। बस, चंदन और युथुंग का दिमाग तुरंत चालू हो गया कोई नई शरारत करने के लिए।

दोनों दोस्तों ने योजना बनाई कि पहले वे दोनों गन्ने के रस में अपने शरीर को सराबोर कर लेंगे, फिर रुई में लोटपोट हो जाएँगे, ताकि पूरे शरीर पर रुई चिपक जाए और वे इनसान न दिखकर उस क्षेत्र के देवता दिखने लगें।

ऐसा करने के बाद चंदन ने युथुंग से कहा, “तुम नदी के उत्तर की ओर थोड़ी दूर जाकर बैठ जाओ और मैं नदी के दक्षिणी किनारे की ओर जाकर बैठता हूँ। जब तुम मुझे बुलाओगे तो मैं जवाब दूँगा और मैं जब तुम्हें बुलाऊँ, तो तुम जवाब देना।”

थोड़ी देर बाद ही पुजारी ने अपनी पूजा समाप्त की और मंत्र पढ़ते हुए उस इलाके के देवताओं को भोग लगाने के लिए नेवैद्य स्वीकार करने के लिए पुकारा। तभी अलग-अलग दिशाओं से देवता का वेश धारण किए हुए चंदन और युथुंग वहाँ पहुँच गए। पुजारी ने जो भी पकवान चढ़ाए थे और जो बलि के पशु थे, उन सभी को इन दोनों ने खाना शुरू कर दिया।

पुजारी और गाँव वालों ने ऐसा नजारा पहले कभी नहीं देखा थे। उनकी आँखें खुली की खुली रह गईं। उनके सामने ऐसा दृश्य कभी उपस्थित नहीं हुआ था। उनके मन में भय व्याप्त हो गया कि ये जो नेवैद्य ग्रहण कर रहे हैं, ये सचमुच के देवता हैं या दानव?

चंदन और युथुंग ने सारा प्रसाद खत्म किया और धीरे-धीरे जंगल की ओर बढ़ते हुए, गाँव वालों की आँखों से ओझल हो गए।

लोग यह माजरा नहीं समझ पाए और उस क्षेत्र के देवताओं के बारे में तरह-तरह की बातें और किस्से-कहानियाँ चल पड़ीं। कुछ लोग दबी जबान से कह रहे थे, हो न हो, यह कारनामा चंदन और युथुंग का ही है। पर भला इसका प्रमाण क्या था? लिहाजा उन्हें चुप हो जाना पड़ा।

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एक रोज बाद चंदन और युथुंग को फिर एक नई शरारत सूझी। वे एक बगीचे में घुस गए, जहाँ काली मिर्च की बेलें लगी थीं। चंदन ने अपने दोनों पैर और हाथ नीचे जमीन पर रख लिए और वह घोड़ा बन गया। युथुंग उसकी पीठ पर बैठ गया। युथुंग ने बेल पर लगी सारी काली मिर्चें तोड़कर अपनी जेबें भर लीं और फिर वे दोनों मजे में अपने घर आ गए।

अगले दिन जब बगीचे के मालिक ने देखा कि उसकी सारी काली मिर्चें गायब हैं तो उसे बड़ा गुस्सा आया।

बगीचे का मालिक गाँव के सरपंच के पास गया और शिकायत की, “मेरी काली मिर्चें कोई चुराकर ले गया है। उसे दंड दिया जाए।”

उसे पूरा विश्वास था कि यह काम चंदन और युथुंग का ही हो सकता है। इसलिए उन्हें दंड मिलना चाहिए।

गाँव के सरपंच ने दोनों को बुलाया और सख्ती से पूछा, “ सच-सच बताओ, क्या तुमने काली मिर्चें चुराई हैं? बगीचे के मालिक को शक है कि तुम दोनों ने ही यह करतूत की है। इसलिए तुम दोनों को हर्जाना देना होगा।” सरपंच ने गुस्से में आकर कहा।

इस पर चंदन गिड़गिड़ाते हुए बोला, “नहीं श्रीमान जी, मैंने तो मिर्चों को हाथ भी नहीं लगाया।”

फिर वह आसमान की ओर मुँह करके बोला, “हे ईश्वर, तुम साक्षी हो। अगर मेरे इन हाथों ने मिर्चें चुराई हों तो मेरी दसों उँगलियाँ अभी कटकर गिर जाएँ।”

उसके इन शब्दों को सुनकर सभा में सन्नाटा छा गया।

अब सरपंच ने युथुंग से कहा, “चंदन ने नहीं तो तुमने तो जरूर ही काली मिर्चें चुराई हैं। तुम्हें इसका दंड भुगतना पड़ेगा।”

युथुंग भी गिड़गिड़ाते हुए बोला, “श्रीमान जी, मैंने इसकी काली मिर्चें नहीं चुराई हैं, मैं निर्दोष हूँ।”

फिर चंदन की तरह वह भी आसमान की ओर देखते हुए बोला, “हे ईश्वर अगर मैंने काली मिर्च के बगीचे में पैर भी रखा हो तो मेरे दोनों पैरों की दसों उँगलियाँ कटकर अभी जमीन पर गिर जाएँ।”

चंदन और युथुंग दोनों ने अपनी निर्दोषता सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। गाँव वालों को भी उन पर तरस आ गया और उन्हें चोरी के आरोप से बरी कर दिया गया।

अब तो दोनों की खुशी का ठिकाना न था। मिर्चें तो उन्होंने चुराई थीं। पर जो कुछ उन्होंने ईश्वर का नाम लेकर कहा, वह भी अपनी जगह ठीक था। न तो चंदन ने मिर्चों को हाथ लगाया था और न युथुंग ने बगीचे में पैर रखा था। युथुंग चंदन की पीठ पर सवार था, इसलिए दोनों की बात सही थी।

फिर कुछ दिन बाद चंदन और युथुंग में फिर कुछ नया करने की हुड़क उठी। उन्होंने एक घर से एक कद्दू चुराया और एक घर से चिकन। फिर उन्हें एक मिट्टी की हाँड़ी मिल गई। हाँड़ी में उन्होंने कद्दू और चिकन को मिलकर पकाया। बेसबरे तो वे थे ही। अभी हाँड़ी चूल्हे पर ही थी कि चंदन ने कलछी से थोड़ा शोरबा निकाला और चखने लगा।

“वाह, क्या मजेदार बना है!” उसने जैसे ही यह कहा, तो झट से युथुंग ने भी उसके हाथ से कलछी ली और जल्दी से हाँड़ी से शोरबा निकाला और चखने लगा।

वह तो ‘वाह!’ भी कर नहीं पाया कि हाँड़ी में कलछी जोर से लगने के कारण हाँड़ी की तली में थोड़ी तरेड़ आ गई और शोरबा रिसने लगा। थोड़ी देर में ही सारा शोरबा भी बह गया और चूल्हे की आग भी बुझ गई। वहाँ काफी धुआँ-सा फैलने लगा।

चंदन को युथुंग पर बहुत गुस्सा आया कि उसे कलछी इतनी लापरवाही से मारने की क्या जरूरत थी? उसने कुछ कहा, तो युथुंग को भी गुस्सा आ गया। पहले तू-तू, मैं-मैं हुई और फिर हाथापाई होने लगी। फिर मुक्के चलने लगे।

उस दिन के बाद फिर वे कभी इकट्ठे दिखाई नहीं दिए। गाँव वालों ने भी चैन की साँस ली। वे भी रोज-रोज के बखेड़ों से तंग आ चुके थे।

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