चूहों का राजा कौन Sonu Kasana द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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चूहों का राजा कौन

नाम सोनू कसाना

मो0 न0 09759501137

पाठकों से,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

मातृभारती पर ये मेरी तीसरी किताब है। मुझे बताते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है कि पाठकवर्ग का बड़ा स्नेह प्राप्त हो रहा है और आशा है कि आगे भी होता रहेगा।

धन्यवाद!

1 चुहों का राजा!

एक जंगल मे बहुत से चुहें रहते थे। कुछ ने पेड़ों की जड़ों में तो कुछ ने जमीन में बिल बना रक्खे थे। उस समूह का कोई राजा नही था। सब मिल जुल कर रहते थे। एक दिन एक चुहे के मन मे आया कि जंगल के राजा शेर की तरह उनका भी एक राजा हो। जो उनकी समस्याओं का समाधान कर सके। उसने अपने समूह के सामने ये प्रस्ताव रखा, प्रस्ताव सबको बडा पसंद आया। एक दिन बरगद के पेड़ के नीचे एक सभा बुलाई गई। पूरा समूह एकत्र हो गया। चीनू चूहे ने अपनी बात सबके सामने रखी। सबने चीनू की हां में हां मिलायी। अब गाड़ी इस बात पर आकर अटक गई कि चूहों का राजा बनेगा कौन? कोई कहने लगा कि राजा किसी बुजुर्ग चुहे को बनाया जाना चाहिए क्योंकि उसे जीवन का अनूभव होगा। कोई कहता राजा तो किसी युवा करे ही बनाया जाना चाहिए ताकि वह जोश के साथ हर मुसीबत का सामना कर सके। अब सब अपनी अपनी बात रखने लगे तो माहोल पूरा गरमा गया। खूब चीं चपाट होने लगी। चीनू ने सबको चुप कराया और फिर एक बार अपनी बात रखी कि इस बात का फैसला हम चुनाव से करेंगे। चुनाव मे खडे़ होने के लिए कल आप में से इच्छुक चुहा अपना नाम मुझे लिखवा दे। एक महीने बाद चुनाव होगा। सबने चीनू की बात का समर्थन किया। कुछ अधेड़ चूहो ने जोर जबरदस्ती करके मुस्का चाचा का नाम लिखवा दिया। कुछ ने अपनी पसंद युवा टीनू को बनाया। चारों और बस यही बात चल रही थी कि चुहो का राजा आखिर बनेगा कौन? धीरे धीरे समय बीता चुनाव नजदीक आ गया। सबको मुस्का चाचा का पलड़ा भारी लग रहा था। अब चुनाव मे केवल दो दिन ही रह गये थे तो टीनू ने सारे समूह मे घोषणा करवा दी कि यदि चुंहों ने उसे चुना तो वह बिल्ली के गले में घंटी बांधने के लिए तैयार है। बस फिर क्या था ! रातों रात माहौल टीनू के पक्ष में बनने लगा। चुनाव का दिन आ पहुंचा। मतदान हुआ और टीनू विजयी हुआ। टीनू को चूंहों का राजा बनाया गया। टीनू राजा बन कर आंनदमय जीवनयापन करने लगा। देखते ही देखते समय बीत गया और एक बार फिर चुनाव का समय आ गया। चूंहों ने बिल्ली के गले में घंटी बांधने के बारे में टीनू से पूछा। टीनू ने बड़ी गम्भीरता पूर्वक उत्तर दिया कि घंटी तैयार है बस इस बार राजा बनते ही बिल्ली के गले में बांध दी जायेगी। इस वादे के सहारे टीनू एक बार फिर राजा बन गया और अगली बार के लिए नया वादा सोचने लगा।

2 बदलाव !

राज एक बहुत अच्छा लड़का था। उसके चाहने वालों को उससे केवल एक षिकायत थी वो ये कि वो गुस्सा बहुत करता था। एक दिन राज स्कूल जाने के लिए तैयार था लेकिन उसे उसकी एक कॉपी नही मिल रही थी। राज चिल्लाया—मम्मी मेरी नॉट बुक नही मिल रही है। मम्मी रसोईघर में राज के पापा के लिए नाष्ता तैयार कर रहीं थी। मम्मी ने कहा— ध्यान से देखो राज वहीं कहीं होगी तुम्ही ने तो रखी थी। राज के लिए बस इतना ही काफी था। उसने अपने बस्ते से सब कॉपी किताब निकाल कर फर्ष पर फैला दी। मम्मी जब तक बाहर आयी राज बस्ता खाली कर चुका था। मम्मी ने जल्दी जल्दी सब कॉपी किताब एकत्र करके फिर से बस्ता तैयार किया और खोई हुई कॉपी वहीं बिलकुल सामने ही पड़ी थी लेकिन राज जल्दबाजी और गुस्से के कारण उसे देख ही नही पाया। लेकिन जब तक राज बस पकड़ने के लिए घर से बाहर निकला तब तक बस जा चुकी थी। उस दिन राज को पूरादिन घर पर ही रहना पड़ा। उस दिन स्कूल मे बहुत महत्वपूर्ण अध्याय पढ़ाया गया। राज ने उस अध्याय को स्वाध्याय से सीखने का बड़ा प्रयत्न किया परन्तु सफल न हो सका। राज स्वयं भी अपने गुस्से से बड़ा परेषान था। परन्तु उसका अपने गुस्से पर कोई नियंत्रण न था। इसी तरहा दो तीन घटनाऐं घटी जिनका असर राज के परीक्षाफल पर पड़ा। कक्षा मे प्रथम या ज्यादा से ज्यादा द्वितीय आने वाला राज इस बार तृतीय आया था। राज अपने परीक्षाफल से बड़ा निराष था। इस बार गर्मीयों की छुट्टियों में राज के मम्मी—पापा ने उसके के गाँव जाने का निर्णय लिया था। तीनों गाँव पंहुच गये। दो चार दिन तो अच्छे गुजरे लेकिन फिर एक दिन किसी बात को लेकर राज का गुस्सा सबके सामने आ गया। राज के मम्मी—पापा ने उसके नाना—नानी को उसके छोटी—छोटी बातों पर गुस्सा करने के बारे मे बताया। राज के नाना—नानी ने उन्हें बताया कि गाँव के पास जंगल मे एक साधु महाराज रहतें हैं। शायद वे राज के गुस्से को शांत करने का कोई मार्ग सुझा सकें। अगले दिन वे सब सुबह—सुबह साधु जी के आश्रम पंहुच गये और सारी बात स्वामी जी को बताई। साधु जी ने कहा राज जरा मेरे पास आओ पुत्र! राज उनके पास जा कर खड़ा हो गया। साधु महाराज ने प्यार से राज के सर पर हाथ फिराया और पुछा तुमने आज तक गुस्से मे जो श्ी अपना लाभ किया हो वो मुझे बताओ। राज चुप चाप खड़ा रहा। राज की चुप्पी का अर्थ था कुछ नही। साधु महाराज ने फिर से पुछा तुमने आज तक गुस्से मे जो श्ी अपनी हानि की हो वो बताओ। अब राज ने हिचकते हुए बताना शुरू किया— जी मैंने वो॰॰॰॰॰ एक बार अपनी एक टी—र्शट फाड़ दी थी ! अपने कई खिलोने तोड़ दिए ! अपने कई मित्रों से मित्रता समाप्त कर ली ! और हां सबसे बुरा अपना रिजल्ट खराब कर लिया!

साधु महाराज ने कहा— देखा गुस्से ने तुम्हारी कितनी हानि की है फिर श्ी तुम गुस्सा करते हो। राज ने उत्तर दिया— गुरू जी मैं गुस्सा जान बूझ कर नही करता। बस अपने आप आ जाता है।

साधु जी ने समझाया— जैसा मैं कहुं वैसा करोगे? राज ने हां में सर हिलाया। साधु ने आगे कहा— जब श्ी कभी तुम्हे गुस्सा आये तो एक बार कुछ छण गुस्से से होने वाले लाभ—हानियों के बारे मे सोचना फिर जो मन में आये वो करना। राज ने उस दिन से ही ये सूत्र अपना लिया। धीरे—धीरे उसका गुस्सा कम और फिर बिलकुल समाप्त हो गया। बड़ा होकर राज एक सफल इंसान और एक सफल नागरिक बना।