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Sabun

सबुन

विनोद विप्लव

इसमें कोई मुश्किल नहीं होती, अगर दुनिया में एक ही किस्म के साबुन होते।

आखिर बोली को करना ही क्या था? घर से निकलना था और मालकिन ने जो रुपये दिए थे, उनसे दुकान जाकर साबुन खरीदना था। घर आकर मालकिन को साबुन और बाकी के पैसे दे देने थे। इसमें दिक्कत क्या थी? यह तो कोई बच्चा भी कर सकता है।

बोली वैसे उम्र के हिसाब से बिल्कुल बच्ची तो नहीं थी लेकिन इस शहर के हिसाब से बच्ची ही थी। कोरे दिमाग वाली बच्ची, जिसे यह मालूम नहीं था कि साबुन भी कई तरह के होते हैं— जिस तरह से आदमी। बोली थी तो इसी धरती की प्राणी, लिहाजा उसे यह तो मालूम था कि आदमी कई तरह के होते हैं— जैसे वह और उसकी मालकिन। लेकिन इस धरती पर भी तो कई दुनिया हैं— आदमी और साबुन की तरह। अब चूंकि बोली किसी दूसरी दुनिया से इस नई दुनिया में आई इसलिए उसे यह पता नहीं था कि साबुन भी कई तरह के होते हैं।

बोली को इस नई दुनिया में कदम रखे हुए अभी एक माह भी नहीं हुआ था। वह करीब बीस दिन पहले अपने मामा के साथ यहां आई थी। उसे अपनी पुरानी दुनिया से इस नई दुनिया का सफर तय करने में कुछ ही पहर तो लगे थे।

कितने पहर, यह तो उसे पता नहीं। उसे तो सिर्फ इतना भर मालूम है कि वह अपने गांव से चलकर रेलवे ‘टिशन' पहुंची थी और गाड़ी में उस समय सवार हुई थी, जब सूर्य ढल गया था। पूरी एक रात गाड़ी पर बिताने के बाद दूसरे दिन उसने उस समय नई दुनिया में कदम रखा था, जब सूर्य बिल्कुल सिर पर चढ़ गया था।

बोली थी तो अनपढ़ देहाती। इसलिए उसका कालबोध घंटा, मिनट और सेकेंड के रूप में नहीं बल्कि पहर और सूर्य के उगने, ऊपर चढ़ने और डूबने के रूप में था। उसे तो यह भी पता नहीं था कि वह ठीक—ठीक पैदा किस समय हुई। उसकी दादी बताती है कि जब वह पैदा हुई थी तो उस समय सूरज उगने में कुछ पहर बाकी थे।

बोली के मां—बाप ने उसके मामा के कहने पर शहर के रहन—सहन और तौर—तरीके सीखने के लिए शहर भेजा था, जहां उसे अपने मालिक—मालकिन के साथ रहकर उनकी सेवा करनी थी और शहरी बनना था ताकि उसकी शादी में कोई दिक्कत न हो और ससुराल में उसे गंवार और देहाती न समझा जा सके।

उसके मां—बाप ने यही समझाकर उसे उसके मामा के साथ इस नई दुनिया में भेज दिया था।

नई दुनिया माने नई दिल्ली!.....उसने यहां आने के पहले इस चकाचौंध वाली दुनिया के बारे में जितने सपने देखे थे और जितनी कल्पनाएं की थीं, उनसे कहीं अधिक रंगीन और खूबसूरत थी यह दुनिया। यह दुनिया उसके लिए बिल्कुल अनजान और अपरिचित थी। यहां उसके मामा के अलावा कोई ऐसा नहीं था, जिसे वह अपना कह सकती।

मामा यहां उसी कारखाने में मजदूरी करते थे, जहां उसके मालिक बड़े अफसर हैं।

मालिक—मालकिन के बारे में उसके मामा ने इतना ही बताया था कि वे बड़े नेकदिल और भले इंसान हैं। गरीबों के लिए उनके दिल में बड़ी दया है। उन्होंने इसी कारण गांव की किसी लड़की को अपने साथ रखने और उसे पढ़ाने—लिखाने का फैसला किया था।

शहर में बोली को गंवार और देहाती नहीं समझा जाए, इसलिए उसके मालिक — मालकिन ने सोच—विचारकर उसका नाम रखा था— बोली। मालिक—मालकिन शरीर को विदेशी ‘लुक' देने का यही तरीका जानते थे। उन्हें यह पता नहीं था कि दिमाग और विचार को कैसे विदेशी बनाया जाए, इसलिए बोली मानसिक तौर पर देहाती और गंवार ही बनी रही। ऐसी देहाती जिसे यह पता नहीं था कि साबुन भी कई तरह के होते हैं। बोली को साबुन के बारे में केवल इतना पता था कि कोई ऐसी मुलायम और चौकोर चीज, जिससे चाहो तो बदन साफ कर लो या कपड़े।

साबुन के बारे में उसके पास एक और महत्वपूर्ण जानकारी यह थी कि उसे रगड़ने पर झाग निकलता है— उसी तरह का झाग जैसा नदी में बाढ़ आ जाने पर किनारे—किनारे जमा हो जाता है। शादी के बाद शहर में अपने मर्द के साथ रहकर मजदूरी करने वाली उसकी सखी ने बताया था कि शहर में औरतें शरीर और बालों में उजली मिट्‌टी नहीं, बल्कि साबुन लगाती हैंं। साबुन लगाने से शरीर बिल्कुल साफ और मन तरोताजा हो जाता है। सभी मैल दूर हो जाते हैं। इसीलिए तो शहर की औरतें इतनी गोरी और सुंदर दिखती हैं।

बोली को अभी शहर आए बीस दिन हुए थे कि मालकिन ने उसे साबुन लाने का हुक्म दे दिया। उसे क्या मालूम था कि उसका साबुन से इतनी जल्दी वास्ता पड़ जाएगा। अगर उसे ऐसा मालूम होता तो वह अपनी सखी से या कम—से—कम अपने मामा से ही साबुन के बारे में विस्तार से जान लेती।

वैसे यह बात नहीं है कि उसने अब तक साबुन देखे ही नहीं हैं। वह देहाती है लेकिन इतनी देहाती नहीं। वह ‘टिशन' से उतरका अपने मामा के घर गई थी और वहीं एक रात रही थी। सुबह होने पर मामा ने उससे कहा था कि मालिक—मालकिन के घर जाना है इसलिए बढ़िया से नहा—धो लो।

मामा ने नहाने के लिए साबुन का एक छोटा टुकड़ा भी दिया था जिससे वह शरीर रगड़—रगड़कर नहाई थी। मालिक—मालकिन के यहां रहने के बाद से उसे नहाने के लिए साबुन दिया गया है। लेकिन इसके बावजूद वह साबुन के बारे में बहुत ज्यादा नहीं जानती।

उसकी मुश्किल थोड़ी कम हो गई होती अगर उसकी मालकिन न ही बता दिया होता कि उसे कौन—सा साबुन लाना है। असल में हुआ यह कि जब उसकी मालकिन नहाने के लिए कपड़े उतारकर टब में लेट गई, तब उन्हें याद आया कि उनका साबुन तो समाप्त हो गया है। उन्होंने टब में लेटे—लेटे ही बोली को दौड़कर दुकान से साबुन लाने का हुक्म दे दिया।

मालकिन ने उससे इतना ही कहा कि रैक में रखे पर्स में जो बीस रुपये रखे हैं, उससे नहाने का साबुन ले आओ, जल्दी। बोली की दिक्कत के लिए खुद बोली तो जिम्मेदार है ही, लेकिन उसकी मालकिन की भी गलती थी। बोली से इतनी गलती तो जरूर हुई थी कि घर से निकलने के पहले उसने मालकिन से यह नहीं पूछा कि कौन—सा साबुन लाना है।

अब बोली तो ठहरी देहाती और जाहिल, लेकिन उसकी मालकिन का तो यह फर्ज बनता ही था कि वह कम—से—कम उस साबुन का नाम बता देती जिसका वह इस्तेमाल करती हैं। बोली को तो यही मालूम नहीं था कि साबुन भी कई तरह के होते हैं। वह तो यही समझे बैठी थी कि साबुन तो साबुन होता है। उसे क्या मालूम था कि साबुन कई तरह के होते हैं और अलग—अलग आदमी का साबुन अलग—अलग होता है।

बोली की परेशानी के लिए उसकी मालकिन को भी पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। मालकिन ने, हो सकता है, बोली को ज्यादा समझदार समझ लिया होगा। मालकिन ने सोचा होगा कि इस घर में वह बीस दिन से रहती है, लिहाजा उसे इतना तो मालूम हो गया होगा कि मालकिन कौन—सा साबुन लगाती हैं।

यह भी हो सकता है कि जल्दबाजी के कारण वह बोली को साबुन का नाम बताना भूल गई हों। अब जल्दबाजी में आदमी यह थोड़े ही देखता है कि उसे बिल्कुल वही चीज चाहिए जो बिल्कुल उसकी पसंद की हो। थोड़ा उन्नीस—बीस भी चलता है।

मालकिन के हुक्म से बोली को इतना तो मालूम हो गया कि साबुन शायद दो किस्म को होता है— एक नहाने का और दूसरा कपड़ा धोने का। मालिक—मालकिन ने उसे जो साबुन दिया था, उससे वह नहाती तो थी ही, जरूरत पड़ने पर कपड़े भी उसी से धो लेती थी। उसे आज से पता चला है कि दोनों कामों के लिए अलग—अलग साबुन होते हैं।

दुकान पहुंचकर उसने दुकानदार से साबुन मांगा तो दुकानदार ने उसकी ओर घूरकर पहला सवाल यही किया— ‘कौन—सा साबुन दूं? लक्स, हमाम, रेक्सोना, लिरिल, पर्ल, एविटा....या कोई और।'

एकबारगी इतने साबुनों का नाम सुनकर यह एकदम घबरा गई। उसे इस बात पर आश्चर्य भी हो रहा था। बाप रे! इतनी तरह के साबुन! उसे कौन—सा साबुन लेना है, यह तो पता ही नहीं! पता नहीं, मालकिन को कौन—सा साबुन चाहिए। अगर उसने कोई दूसरा साबुन ले लिया तो भी, और अगर खाली हाथ घर लौट गई तो भी, मालकिन के हाथों उसकी पिटाई होनी ही है।

उसे कुछ समझ नहीं आया कि वह करे तो क्या करे और कहे तो क्या कहे कि वह दुकानदार से सिर्फ इतना कह पाई— ‘पता नहीं, मालकिन ने मंगाया है नहाने के लिए।'

दुकानदार लड़की के पहनावे को देखकर समझ गया कि लड़की को ‘विदेशी लुक' देने वाली मालकिन का पसंदीदा साबुन कौन—सा हो सकता है। दुकानदार ने अत्यंत चमकीले और आकर्षक पैक में लिपटे साबुन को निकालकर बोली को दिया— ‘यह साबुन ले जाओ। तुम्हारी मालकिन को जरूर पसंद आएगा। विदेशी साबुन है। इस मोहल्ले की सारी मालकिन यही साबुन मंगाती हैं।'

बोली ने उसे साबुन को बड़ी सावधानी से उलटते—पुलटते हुए दुकानदार से पूछा— ‘यह कित्ते का है?'

दुकानदार ने कहा— ‘अरे ज्यादा का कहां है? केवल बीस रुपये को ही है।'

उस देहाती मानसिकता वाली लड़की के तो साबुन के दाम सुनकर होश ही उड़ गए। इत्ता महंगा होता है साबुन! आखिर इसमें होता क्या है! बीस रुपये में सिर्फ एक साबुन! देखने में यह जितना छोटा है उस हिसाब से यह चलता कितने दिन होगा। महीने में तो कई साबुन जरूरी होते होंगे। जब एक साबुन में इतना खर्च करना होता है तो और सामान में कितने खर्च होते होंगे! उसके अपने घर में कभी भी पूरे महीने में बीस रुपये से अधिक का सामान नहीं आया होगा।

उसके पूरे परिवार के लिए बाजार से सामान का मतलब माचिस की दो—चार डिब्बियां, एक—आध किलो गुड़, नमक और एक—आध लीटर किरासन तेल, बस! अनाज आदि बाबू को मजदूरी में मिल जाता है और इस तरह पूरा महीना किसी तरह गुजारा हो जाता है। वह जब तक गांव में थी, उसने केवल साबुन का नाम ही सुना था, देखा तक नहीं था। ‘सपर' कर वह नदी में नहाने जाती थी। पानी लाने जाती तो उसी समय नहा लेती थी। नदी के किनारे उजली मिट्‌टी पड़ी रहती थी। उसी को बालों में लगा लेती थी।

साबुन उसने पहली बार अपने मामा के घर में ही देखा था। अगर साबुन इतना महंगा होता तो उसके मामा साबुन कैसे खरीदते! वह मालिक—मालकिन जैसे धनी तो हैं नहीं। किसी तरह से मजदूरी करके अपना और परिवार का पेट पाल रहे हैं।

जरूर यह दुकानदार उसे देहाती समझकर ठगना चाहता है। उसने वह साबुन दुकानदार का लौटा दिया— ‘नहीं, यह नहीं चाहिए। कोई और साबुन दिखाओ। यह बहुत महंगा है। मालकिन डाटेंगी।'

दुकानदार बोली को भोली—भाली और गंवारू बात पर मन ही मन हंसा। उसने बोली के सामने रंग—बिरंगे पैक में लिपटे कई तरह के साबुन रख दिए— ‘देखो, यह दस रुपये का है, यह पंद्रह रुपये का है, यह आठ रुपये का है.....।'

लेकिन बोली की नजर नीचे वाले रैक पर रखे साबुन की ओर लगी हुई थी। उसने सोचा— ‘दुकानदार उस साबुन को नहीं निकाल रहा है। जरूर वह सस्ता और बढ़िया वाला साबुन होगा। मुझ मूर्ख समझता है। देहात की हूं तो क्या हुआ, मेरे पास भी दिमाग है! बोली ने उस साबुन की तरफ इशारा करते हुए पूछा— ‘वह साबुन कित्ते का है?'

दुकानदार बोली पर तरस खाता हुआ समझाने के लहजे में बोला— ‘अरे, यह तुम्हारी मालकिन का साबुन नहीं है। यह तो यहीं बनता है। यह विदेशी थोड़े ही है! इसे यहां की कोई मालकिन नहीं मंगाती। अगर ले गई तो जरूर मालकिन के हाथों पिटोगी।'

लेकिन देहाती सोच वाली उस लड़की को दुकानदार की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। जरूर यह मुझे मूर्ख बना रहा है। अब यह मुझे ही चराने चला है कि यह विदेशी नहीं है। अब साबुन भी देशी और विदेशी होने लगा! अगर पिटूंगी तो मैं पिटूंगी और अपनी बात से पिटूंगी। इसका क्या? बड़ा हमदर्द बनने चला है।

बोली ने कहा— ‘उसे वही साबुन चाहिए। कित्ते का है।'

दुकानदार बिना किसी पैक में लिपटे उस साबुन को निकाल लाया। उसने बोली को समझाने का आखिरी प्रयास करते हुए कहा— ‘यह बहुत सस्ता है। केवल दो रुपये को है। लेकिन तुम्हारी मालकिन के लिए नहीं है। ले जाना है तो ले जाओ। लेकिन देख लेना, आज तुम पिटकर रहोगी।

बोली ने वह साबुन ले लिया। ऐसा ही तो साबुन उसके मामा ने उसे लगाने को दिया था। देखो तो कितना बड़ा और कितना कड़ा है! यह ता बहुत दिनों तक चलता होगा। मालकिन क्यों पिटेंगी! सस्ती चीज किसे पसंद नहीं आएगी? मालकिन के पास ज्यादा पैसे हैं क्या? पैसा तो सबको प्यारा होता है। कौन नहीं चाहता कि दो पैसे बचे और उसका कोई और सामान आ जाए!

बोली वह साबुन और बाकी पैसे लेकर तेजी से अपने घर की ओर चल पड़ी। रास्ते में वह सोचती जा रही थी कि आज मालकिन उससे जरूर खुश हाेंगी। कितने सस्ते में साबुन आ गया!

हालांकि उसके घर वालों की औकात में इतना सस्ता साबुन भी नहीं था। लेकिन कहां बीस रुपये और कहां दो रुपये! मालकिन के लिए यह साबुन कितना सस्ता पड़ेगा। मालकिन को शायद इस साबुन के बारे में पता नहीं होगा। अगर वह इसके बारे में जानती होतीं तो वह भी यही साबुन खरीदतीं।

आखिर कौन आदमी ऐसा नहीं होगा जो सस्ती चीज नहीं खरीदना चाहेगा और वैसे भी इसका करना क्या है, देह में ही तो लगाना है!

बोली जैसे ही दरवाजा धकेलकर घर में घुसी वैसे ही उसके कानों में मालकिन की आवाज पड़ी। मालकिन शायद पहले भी पुकार चुकी हैं।

मालकिन ने टब में लेटे—लेटे ही चिल्लाकर कहा— ‘बोली, साबुन ले आई। जल्दी दो। एक साबुन लाने में कितना समय लगाती है यह लड़की!'

मालकिन गुस्से में थीं। शायद काफी देर से उसका इंतजार कर रही थीं। आखिर कोई आदमी कितनी देर तक टब में नंगा लेटा रहेगा! कोई मिलने के लिए आ जाए, तो!

बोली जोर से बोली— ‘हां, मालकिन!'

वह दौड़कर बाथरूम का दरवाजा के पास गई और दरवाजा खुलने का इंतजार करने लगी ताकि मालकिन को साबुन पकड़ा सके।

मालकिन ने बाथरूम को दरवाजा थोड़ा खोला— ‘लाओ, दो।'

बोली ने साबुन मालकिन के हाथ में पकड़ा दिया। बोली को दरवाजे के सामने वाली दीवार में जड़े शीशे में मालकिन की नंगी छवि दिख गई।

मालकिन कितनी गोरी और सुंदर हैं! एकदम उजली! उजली मिट्‌टी से भी उजली! यह सोचकर बोली अपराध भाव से शरमा गई। बोली वहां से हटने ही वाली थी कि कठोर और जोरदार आवाज सुनकर कांप गई।

‘....बोली....तुम यह क्या पत्थर उठा लाई हो? किसने तुम्हें यह लाने को कहा था।'

बोली जहां की तहां खड़ी रह गई। उसने तो सोचा था कि मालकिन यह साबुन देखकर ज्यादा से ज्यादा उसका दाम पूछेंगी और दाम सुनकर खुश हो जाएंगी। लेकिन लगता है कि आज उसकी खैर नहीं।

अगले ही क्षण दरवाजा खुला और मालकिन कांख में तौलिया दबाए प्रकट हुईं। मालकिन का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था।

मालकिन ने दरवाजा खोलते ही बोली के बाल पकड़कर दूसरे हाथ से अनगिनत तमाचे जड़ दिए— यह पत्थर तुम्हें किसने लाने को कहा था! बाजार में तुम्हें केवल यही साबुन मिला!'

‘और साबुन बहुत महंगे थे। मैंने सोचा, यह सस्ता होगा। दो रुपये को ही तो है!'

बोली केवल इतना ही बोल पाई। डर के मारे उसका कलेजा बैठा जा रहा था।

मालकिन का गुस्सा उसने आज पहली बार देखा था। पहले भी उससे छोटी—बड़ी गलतियां हुई हैं लेकिन मालकिन ने उस पर हाथ नहीं उठाया। आज पता नहीं, मालकिन इतना गुस्सा क्यों कर रही हैं!

लगता है, उससे भारी भूल हो गई। पता नहीं, वह घर से निकाल लेंगी या मारते—मारते जान ले लेंगी।

‘जंगली—गंवार! तुम्हें सस्ता साबुन लाने को किसने कहा था! बीस रुपये ले गई थी, उसका क्या किया? यह गंवार लड़की हमारी इज्जत डुबाकर रहेगी। किसी को पता चल गया कि मेरे घर में यह साबुन मंगाया गया है तो सोसाइटी में नाक बचानी मुश्किल हो जाएगी। यह गंवार लड़की क्या समझेगी।' मालकिन इतना कहकर दो—चार तमाचे और जड़ने के बाद थोड़ी शांत हुईं।

‘गलती हो गई, मालकिन! मैंने सोचा कि ....।' बोली आगे कुछ न बोल सकी।

‘गलती की बच्ची! तुमने दुकानदार को यह तो नहीं बताया कि यह साबुन किसने मंगाया है? पता नहीं, दुकानदार भी क्या सोचता होगा!'

‘नहीं मालकिन, मैंने कुछ नहीं बताया।' बोली ने सफाई दी।

‘अब जाओ। इस साबुन को बदलकर दूसरा साबुन ले आओ। बोलना— यह नहीं, अमेरिका से जो साबुन आता है वह चाहिए।....समझी! टेबल क्लाथ के नीचे दस रुपये का नोट रखा है, उसे भी लेती जा। पच्चीस रुपये में देगा।'

बोली की जान में जान आई। चलो, मालकिन से इतने सस्ते में मेरी जान तो छूटी। मालकिन कितनी नरम दिल हैं।

बोली और पैसे लेकर फिर से दुकान की ओर जाने लगी। रास्ते में पता नहीं क्या सोचकर उसकी रुलाई छूट गई। शायद उसे आदमी की तरह साबुन की भी फर्क सूझ में आ गया था।

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