Girgit Vinod Viplav द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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विनोद विप्लव

— कहिए गुप्ता जी, आपको यह नया मोहल्ला कैसा लगा?

— अजी मत कहिए। यह मोहल्ला भी कोई रहने लायक है।

— क्यों क्या हुआ? क्या खराबी है इस मोहल्ले में?

— यह पूछिए कि क्या इस मोहल्ले में कौन सी खराबी नहीं है?

— मतलब?

— मतलब यह कि यहां की सड़कें बिल्कुल टूटी—फूटी हैं, सड़कों के बीचों—बीच कई बड़े—बड़े गड्‌ढे हैं जिनमें गिरने पर अस्पताल या स्वर्ग ही पहुंचेगे। नाली का पानी सड़क पर आ जाता है। जगह—जगह कचरे के बड़े—बड़े ढेर पड़े हैं। बारिश हुई नही कि सड़क पर घुटनों तक गंदा पानी इकट्‌ठा हो जाता है। गंदगी के मारे आप मोहल्ले में घुसने की हिम्मत नहीं कर सकते। ऊपर से मच्छरों का प्रकोप। बिजली की चौबीसों घंटे आंख मिचौली.......।

— लेकिन इसके लिए आपके मोहल्ले के लोग कुछ करते क्यों नहीं।

— मोहल्ले के लोग। मत पूछिए। निकम्मे हैं सब। किसी को इससे मतलब ही क्या।

— एक उपाय है। आप अखबारों को अपने मोहल्ले की इन समस्याओं को लेकर पत्र लिखिए।

— लेकिन इससे होगा क्या।

— इससे बहुत कुछ हो सकता है। पहले तो आपका पत्र संबंधित अधिकारियों की नजरों में आएगा। हो सकता है कि आपके पत्र के आधार पर अफसरानों की आंखें खुले और आपके मोहल्ले की ओर ध्यान दिया जाए। दूसरा इस पत्र को पढ़कर आपके मोहल्ले के दूसरे लागों की भी नींद खुलेगी। फिर वे भी ऐसा करेंगे। यह भी संभव है कि सभी लोग मिलजुल कर इन समस्याओं को दूर करने के लिए पहल करें।

— देखिए मुझे तो यह सब वाहियात लगता है। इससे कुछ होना—जाना नहीं है। अधिकारी और मोहल्ले के लोग अंधे नहीं हैं। सब को इस मोहल्ले की समस्याएं मालूम है। अगर किसी को कुछ करना होता तो पहले ही कर चुकते।

— लेकिन यह कोशिश करके देखने में हर्ज की क्या है। हो सकता है कि आपकी यह कोशिश सफल हो जाए।

— लेकिन जब किसी को कोई मतलब ही नहीं तो मुझे क्य ा गरज पड़ी है।

— आप इस मोहल्ले के जागरूक निवासी हैं। इस नाते आपका यह फर्ज बनता है।

— देखिए, मैं बाल—बच्चेदार आदमी हूं। मुझे आप राजनीति में क्यों फंसा रहे हैं।

— लेकिन इसमें राजनीति कहां से आ गई। आप तो अपने मोहल्ले की समस्याओं के बारे में लिखेंगे। जो असलियत है, जिनसे आप, आपके परिवार और मोहल्ले के लोग त्रस्त हैं।

— नहीं मैं नहीं लिखूंगा। आजकल किसका संबंध राजनीति से जुड़ जाए कहना मुश्किल है। क्या पता इसके आधार पर पुलिस मेरे पीछे पड़ जाए। तब। तब क्या होगा?

— लेकिन पुलिस आपके पीछे भला क्यों पड़ेगी। आप कोई गलत काम थोेड़े ही कर रहे हैं। आप तो अपने मोहल्ले की भलाई चाह रहे हैं। आप अपने मोहल्ले की समस्याओं को उठा रहे हैंं। अपना देश लोकतांत्रिक है। आपको अपनी बातें कहने का अधिकार है।

— मैं खूब जानता हूं। मैं इतना मूर्ख नहीं हूं कि आपकी बातों से गुमराह हो जाऊं और अपने पैरों में खुद कुल्हाड़ी मार लूं। क्या पता इस पत्र के आधार पर सरकार मुझे गिरफ्तार कर ले। सरकार मुझ पर यह शक कर सकती है कि मैं लोगों में असंतोष फैला रहा हूं। लोगों को सरकार के खिलाफ भड़का रहा हूं। अगर ऐसा आरोप लगाकर ‘रासूका अथवा आतंकवाद विरोधी कानून' के तहत मुझे कैद कर जेल में डाल दिया गया तब। तब तो मेरे बच्चे भूखों मरेंगे।

़़— लेकिन आप ऐसा क्यों सोचते हैं? इसे आशावादी और सकारात्मक ढंग से सोचिए।

— वही तो मैं कह रहा हूं। हमारे मोहल्ले में केवल छोटी—मोटी दिक्कते ही तो हैं। ये तो सभी मोहल्ले में हैं। हमारा मोहल्ला तो दूसरे सभी मोहल्लों से बेहतर है। इस मोहल्ले से अच्छा तो कोई मोहल्ला नहीं होगा। मुझे अपने मोहल्ले से कोई शिकायत नहीं है।