संघर्ष और संकल्प - 5 shiromani mathur द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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संघर्ष और संकल्प - 5

नीता काकी

नगर निगम के चुनाव होने वाले हैं, जब से नगर निगम सहसपुर की सीट सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित हुई है तब से महिलाओं में सक्रियता बढ़ गई है। हर पार्टी अपनी अपनी महिला कार्यकर्ताओं की योग्यता व जीतने की संभावनाओं को तलाश रही थी। स्वतंत्र पार्टी से नीता गुप्ता नगर की सबसे पुरानी व शिक्षित ,सौम्य महिला कार्यकर्ता वर्षों से पार्टी व समाज सेवा का काम करती आ रही है । नीता काकी पार्टी की ही नहीं वे समाज सेवा और अध्यात्म के क्षेत्र में अपनी पहचान रखती है ।जब बहुत कम महिलाएं बाहर निकाल कर काम करती थी, तब से ही वे बच्चों के लिए बालवाड़ी चलाकर संस्कारित करती आ रही थी, और वे महिला अधिकारों की प्रबल पक्षघर रही है । सबकी नजर उन्ही की तरफ थी कि यदि नीता चुनाव लड़ी तो उसको हराना कठिन हो जाएगा । उनके प्रभावशाली वक्तव्य , तर्कों , कार्यशैली व ईमानदारी के सभी कायल थे । सबको उम्मीद है कि स्वतंत्र पार्टी से नीता गुप्ता की टिकट लगभग तय है ।
                        नीता भी मन ही मन सोच रही थी कि उसकी सेवाओं का प्रतिफल मिलने वाला है भगवान भी उसकी सामाजिक व सार्वजनिक सेवाओं से खुश हुआ है जो नगर निगम की सीट सामान्य महिला के लिये आरक्षित हुयी है । वो सोच रही थी उसके जैसी पुरानी महिला कार्यकर्ता नगर में कोई भी नहीं है ,यदि पार्टी उसे टिकट देगी तो वह जरूर जीत जाएगी। नीता को क्षेत्र में काम करना तो आता था ,परंतु रणनीति, दावपेच नहीं आते थे। नेताओं का व्यवहार उसके प्रति सम्मान पूर्ण था, सब उसे आदर से देखते थे। सार्वजनिक क्षेत्र में काम करते हुए उसे 35 वर्ष बीत चले थे। उमर भी साठ के आसपास हो चली थी इसलिए सभी उसका सम्मान करते थे , कुछ वरिष्ठ नेता उसकी निष्ठा व ईमानदारी से बहुत प्रभावित थे ।
                          स्थानीय विधायक सुरेश नेताम भी नीता का बहुत सम्मान करते थे । आयु मे भी वे नीता से काफी छोटे थे। सुरेश नेताम से पहले उनके पिता श्री मेघनाथ नेताम विधायक व मंत्री रह चुके थे । नीता उनके पिता के समय से पार्टी का काम करती आ रही है उनके पिता भी नीता का सम्मान करते थे, इसलिए सुरेश भी नीता को कभी नाम से नहीं बुलाते थे सदैव काकी जी कहकर बात करते व हर त्यौहार बार पर वे उनके घर जाते वह पांव पड़ते थे । इसलिए नीता का विधायक सुरेश से बहुत निकट का संबंध था व व्यवहार में बड़ी शालीनता रहती थी ।
            महिला सीट आरक्षित होने पर नीता ने विधायक से पूछा — नेताम जी कैसे क्या करना है निगम चुनाव में ?
सुरेश नेताम में कहा — करना क्या है काकी जी , चुनाव तो आपको ही लड़ना है हम सब आपके साथ है । बस आप तैयार रहिये ।" 
नीता बोली — टिकिट लेने भोपाल जाना होगा क्या?
सुरेश ने कहा— " वैसे तो आवश्यकता नहीं है परंतु जरूरत पड़ी तो मैं बताऊंगा कब कैसे तैयारी करनी है।" 
नीता आशवस्त हो गई कि उसकी पार्टी से उसे ही टिकट मिलेगी। नीता की योग्यता पर किसी को शंका ही नहीं थी। किसी और पार्टी के पास दमदार, सुशील , शिक्षित महिला थी भी नहीं ।
                        सुरेश सुखों में पला बड़ा था, उसके आजू-बाजू युवा व महिला कार्यकर्ताओं की भीड़ लगी रहती थी,जब से महिला सीट आरक्षित हुई थी महिलाएं भी सक्रिय होकर विधायक के आसपास टिकिट के लालच में मंडराती रहती थी । नीता आयु में बड़ी व अनुभवी होने के कारण विधायक की चमचागिरी नहीं कर पा रही थी , उसे अपने कामों पर विश्वास था और लगता था कि पार्टी व नगर का हित उसकी जीत में ही निहित है, परंतु आज के शीर्ष नेतृत्व को चमचागिरी से ही खुश किया जा सकता है, सत्ता पक्ष के विधायक के आसपास कुछ असामाजिक तत्व भी हावी होने लगते हैं ।
                सत्ता का गुण है या अवगुण, कुछ अवसर वादी लोग उसके आसपास छाये रहते हैं यदि नेतृत्व परिपक्व नहीं है तो सुरा -सुंदरी और कंचन - कामिनी के जाल में फंसते देर नहीं लगती । फिर मर्यादाएं विखंडित होने लगती है । कई अवसर ऐसे आते हैं ,जब बड़े-बड़े लोग भी डगमगाने लगते हैं फिर राजनीति तो इन सब के लिए बदनाम ही है । 
                      रोज रात को मित्र मंडली के साथ बैठने वह गपशप लगाने का सिलसिला सुरेश का चलता ही था । कई परिवार व महिला कार्यकर्ता विधायक व उसके निकटतम लोगों को प्रभावित करने लगी, सबको अपने निकटतम महिला को टिकट दिलाने की इच्छा तीव्र होती गई इसलिए विधायक को तरह तरह से प्रभावित किया जाने लगा । जिसमें आर्थिक लाभ भी सर्वोपरि हो जाता है । पैसा ऐसी चीज है जो सभी को खीचता है , सबको मालूम है नगर निगम का टिकट दिलाने में विधायक की राय प्रमुख रहती है ,उसकी बात हाईकमान भी नहीं काटता । उसकी सलाह पर ही उसके क्षेत्र की सीट पर टिकट फाइनल होगी ।
               सुरेश को लुभाने , पटाने का सिलसिला चलने लगा उसको भी तो कार्यकर्ताओं से जुड़े रहना है इसलिए सब की बातें सुननी है । धीरे-धीरे नीता में कमियां खोजी जाने लगी - अब बूढी हो गई है, बड़ी घमंडी है, छोटे नये लोगों से मिलती नहीं है । इस तरह की बातें कुछ लोग कहने लगे । 
                    जबकि नीता काकी ऐसी नहीं थी और ना ही यह बातें उसके सामने आई थी ,उसके पीछे ही झूठी बातें व किस्से गढ़े जाते थे व विधायक के कान भरे जाने लगे।
                                      नीता को पता हुआ की टिकिट की दावेदारी करने कुछ लोग भोपाल के चक्कर लगा रहे हैं, उसने भी भोपाल जाना चाहा तो उस ने सोचा, विधायक से बिना सलाह के भोपाल जाने का औचित्व नहीं है क्योंकि विधायक की सलाह तो ली ही जाती है ।उसने विधायक से पूछा — सब तो भोपाल जा रहे है मेरे को भी जाना है क्या ?
सुरेश ने कहा — क्या करोगी काकी , आप यही तैयारी करो , भोपाल का काम मैं सम्हाल लूंगा,आप परेशान न हो । आपको मेरे ऊपर विश्वास नहीं है क्या ? 
नीता बोली — दूसरी महिलाएं तो जा रही है इसलिए पूछ रही हूं ।
सुरेश बोले — उन लोगों को शौक है तो जा रही है किसी को रोक तो नहीं सकते , आप निश्चिंत रहो ।
               बार-बार पूछना नीता को अच्छा नहीं लगता था इसलिए वह निश्चिंत होकर रह गई । सुरेश की बातों पर उसे पूरा विश्वास था क्योंकि सुरेश को उसने बचपन से देखा परखा था परंतु समय और परिस्थितियों बदलती रहती है और मनुष्य का मन भी घूमता रहता है ।
            सुरेश के दिमाग में यह बात भरी गई कि यदि नीता को टिकिट मिली तो विधायक की कमाई नहीं हो पायगी । नीता उसूलों पर चलने वाली महिला है युवा कार्यकर्ताओं का मनोबल डाउन हो जाएगा जो आजादी अभी महसूस कर रहे हैं वह नीता के जीतने के बाद संभव नहीं होगी क्योंकि नीता को जिंदगी का अनुभव है, युवाओं की मनमानी नहीं चल पायगी । उनका विचार था की - अपनी मनमानी तभी हो सकती है जब किसी युवा सुंदरी को यह टिकिट दी जाय। टिकट तो विधायक की सहमति से ही मिलेगी, इसलिए कुछ अवसरवादी लोग विधायक को खुश करने में लग गये ।
               विधायक के भोपाल जाते ही वे ही अवसरवादी भोपाल पहुंच गये । वहां भी उन्होंने विधायक की घेरे बंदी चालू कर दी। राजनीति का भी नियम है, जब काम का समय होता है तो लोगों को अपने-अपने घर के काम याद आ जाते हैं, और जब चुनाव का समय होता है तो कहां-कहां के खोटे सिक्के जो चलन में नहीं होते, वह सामने आ जाते हैं ,और अच्छे सिक्कों को चलन से बाहर कर देते हैं ।
             धीरे-धीरे नामांकन पत्र दाखिल करने के दिन आ गए परंतु विधायक भोपाल में ही रुके थे विधायक का मन काकी की बजाय रेखा ठाकुर की ओर झुकता जा रहा था उसकी जीत में ही उन्हें अपना आर्थिक लाभ व स्वार्थ सिद्ध होता दिखने लगा । वे मन ही मन उसकी ओर झुकते जा रहे थे ।
          नीता ने अपना नामांकन पत्र दाखिल करने से पूर्व विधायक से फोन पर पूछा — कैसे करना है नामांकन पत्र जमा करने के दिन आ गये हैं ?   
विधायक ने फोन पर कहा —आप नामांकन पत्र भर दो मैं प्रयास कर रहा हूं । 
नीता ने पूछा — भैया ठीक से बताओ, बाद में हंसी नहीं बननी चाहिए ,फॉर्म जमा करना है या नहीं ? 
सुरेश ने कहा — काकी आप फार्म जमा कर दो । 
                     अभी तक किसी भी प्रत्याशी का नाम फाइनल नहीं हो पाया था विधायक की मौखिक सहमति पर नीता ने अपना फार्म जमा कर दिया । इस बीच कई अन्य महिलाओं ने भी अपने-अपने फार्म जमा कर दिये । नीता काकी के नाम के सामने तो नई महिला कार्यकर्ता चुप थी जैसे ही प्रभा का नाम सामने आया तो आशा, कौशल्या भारती, शबाना बेगम, गायत्री चंद्राकर ,शशि पांडे आदि कई महिला कार्यकर्ताओं ने नामांकन पत्र भर दिये । दूसरी पार्टियों से भी महिला उम्मीदवारों ने नामांकन फॉर्म भर दिये । इस बीच नीता काकी ने विधायक को कई बार फोन लगाया परंतु विधायक ने उसका फोन ही नहीं उठाया ।
                         नीता को किसी ने कुछ भी नहीं बताया परंतु रेखा ठाकुर के नाम का बी फॉर्म चुनाव अधिकारी कार्यालय में विधायक द्वारा जमा कर दिया गया । 
              जैसे ही लोगों को पता हुआ की पार्टी की ओर से रेखा को अधिकृत प्रत्याशी बनाया गया है । सभी को बहुत आश्चर्य हुआ और सब महिला उम्मीदवार आक्रोशित हो गई । तत्काल वरिष्ठ कार्यकर्ताओं व महिला उम्मीदवारों की मीटिंग बुलाई गई । उसमें नीता काकी भी गई । 
                सभी ने सबसे पहले नीता से पूछा — "अब आप क्या चाहती हो - यदि आप निर्दलीय चुनाव लड़ोगी तो हम सभी महिला प्रत्याशी अपना नाम वापस ले लेंगी ।"
        नीता बोली — "मैंने जिंदगी भर पार्टी का काम किया हर बार पार्टी को जितवाने का काम किया है ,अब उसी पार्टी के खिलाफ खड़े होकर चुनाव नहीं लडूंगी उसी पार्टी की हार की भागीदार नहीं बनूंगी।"
         कुछ लोग बोले —"आप चुनाव लड़ो हम साथ देंगे ।"
दृढ़ता पूर्वक नीता बोली — "पार्टी मुझे टिकिट देती तो मैं चुनाव जरूर लड़ती, पार्टी ने मुझे टिकिट नहीं दी तो मैं चुनाव नहीं लडूंगी ।"      
पार्टी की अन्य महिला उम्मीदवारों ने कहा — " यदि आप चुनाव नहीं लड़ोगी तो फिर हम चुनाव लड़ेंगे ।"
नीता बोली — "अब आप देख लो, इस तरह अपनी पार्टी को चुनाव जीतना मुश्किल होगा ।"
                  सभी कार्यकर्ता एकमत हो गए कि अब विधायक को सबक सिखाना है अब हार - जीत भगवान भरोसे है। 
                   दूसरे दिन जाकर नीता काकी अपना नामांकन फॉर्म वापस ले आई । परंतु विधायक व उसके निकटतम किसी व्यक्ति ने उसे कोई भी संपर्क नहीं किया । 
                         इस तरह स्वतंत्र पार्टी की ओर से अधिकृत प्रत्याशी रेखा ठाकुर के अतिरिक्त चार महिलाएं चुनाव मैदान में और थी । विरोधी पार्टी की अधिकृत प्रत्याशी एक ही महिला थी इसलिये रेखा सहित सभी महिलाये चुनाव हार गई । विरोधी पार्टी की शिखा शर्मा चुनाव जीत गई ।
                  लोगों के मन में विधायक सुरेश नेताम के खिलाफ आक्रोश घर कर गया । कुछ दिनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में सुरेश नेताम भी अपना चुनाव हार गये । महिलाओं के साथ हुए धोखे का फल पार्टी को विधायक की हार के रूप में भोगना पड़ा. 

                                         
छतीसगढ़ रत्न 
डॉ. शिरोमणि माथुर
9893742299 
shiromanimathur@gmail.com