संन्यासिन मौसी (मां)
अम्मा अब बहुत बूढी हो गयी है, उनसे चला फिरा भी नहीं जाता है ,परंतु अम्मा बड़े हंसमुख स्वभाव की महिला रही है, सभी के खानपान का ध्यान रखना अम्मा की विशेषता रही । डॉ राकेश शर्मा अम्मा की सेवा में कोई कोर कसर नहीं रखते थे, उनके खाने का, दवाई का बहुत ध्यान रखते हैं । जब तब वे अम्मा से पूछते -"क्या खाओगी अम्मा —"?
कभी अम्मा कहती "पुआ खाना है ।" तो डॉक्टर साहब स्वयं ही आटा में गुड़ या शक्कर डालकर मिलाकर रख देते और गैस पर तेल गरम करके गरम - गरम पुआ बनाकर उन्हें खिला देते थे ।
वे अम्मा की हर फरमाइश स्वयं पूरी कर देते थे । फिर पुआ , भजिया या हलवा खाकर अम्मा का पेट खराब हो जाता, तो उनकी पत्नी कौशल्या को अम्मा की सेवा करनी पड़ती थी ,अम्मा कभी-कभी इतनी असमर्थ हो जाती थी कि कपड़े खराब कर लेती थी और कौशल्या को उनके कपड़े धोने की मेहनत करनी पड़ती थी ,पर डॉक्टर साहब अम्मा को खिलाए बिना नहीं मानते थे । कौशल्या को अम्मा की सेवा करके दोबारा नहाना पड़ता था । पर डॉक्टर साहब को इसकी तनिक भी चिंता नहीं थी, कि ज्यादा खाने से अम्मा का पेट खराब हो जाता है .
उनको मालूम रहता था, की 'अम्मा ज्यादा दिन की मेहमान नहीं है इसलिए उन्हें जो खाने की इच्छा है खाने दिया जाये । उनकी यही भावना रहती थी ।
अम्मा की तबीयत दिन प्रतिदिन गिरती गई और एक दिन वह दुनिया से विदा हो गई । डॉक्टर साहब अम्मा के जाने के बाद बहुत दुखी हो गए। बात बात पर वे अम्मा को याद करके रोते रहते थे । अम्मा के क्रियाकर्म के बाद डॉ. राकेश शर्मा उनकी अस्थियां इलाहाबाद त्रिवेणी संगम पर विसर्जन करने हेतु लेकर गये। अस्थि विसर्जन से पूर्व इलाहाबाद वे अपनी गेरुआ वस्त्र धारिणी ,सन्यासिनी, प्रतिभाशाली, तपस्वी मौसी से मिले, उन्हें भी वे संगम स्नान करने अपने साथ ले गए ।
मौसी जी भी बहुत बूढी हो गई थी उन्होंने मौसी से पूछा — मौसी आपकी तबीयत कैसी रहती है ?-
बोली — बच्चा अब, आयु बहुत हो गई है इसलिए कई बार तबियत बिगड़ जाती है , कमजोरी भी महसूस होती है ।
डॉक्टर साहब ने पूछा — मौसी खान की क्या व्यवस्था है -
मौसी बोली — तबीयत ठीक रहती है ,तो कुटिया में सामान रहने पर बनाकर खा लेती हूं ,पहले मैं भागवत व अन्य कथा सत्संग करती थी , तो खर्चा निकल जाता था बूढी हो गई हूं तो भागवत कथा आदि नहीं सुना पाती, तो घर बैठे कौन देने आएगा ?, इसलिए अब खाने की व्यवस्था ठीक नहीं रहती । कुछ तो बना नहीं पाती और कुछ मेरे पास सामान नहीं होता तो मैं लाचार हो जाती हूं । खाने की उचित व्यवस्था न होने के कारण पिछले दिनों पीलिया हो गया था ,लीवर गड़बड़ रहता है और अब तबीयत बिगड़ जाती है ।
डॉ शर्मा बोल —“ मौसी अब तुम मेरे साथ चलो ,आप मेरे साथ रहना ।“
सन्यासी मौसी बोली — "बच्चा ,जीवन भर सन्यासी रही, अब गृहस्थ में नहीं जाऊंगी ।"
डॉक्टर साहब समझ रहे थे — जिस तरह बूढी मौसी रह रही है और जैसा उनका खान-पान है - मौसी जल्दी ही बीमार हो जायेगी और बुढ़ापे में बहुत कष्ट उठायेगी, कभी भी कुछ भी हो सकता है । 75 वर्ष की आयु में इनका अकेले रहना ठीक नहीं है । यही सब सोचकर वे बोले — अब आपका अकेले रहना ठीक नहीं है मौसी ,कभी रात विरात आपका तबीयत बिगड़ी तो कौन सेवा करेगा ? आप गृहस्थी में थोड़ी जा रही हो , मैं आपको ले जा रहा हूं। मैने भी घर के सामने भाग में दुर्गा मां का एक मंदिर बनाया है , आप मंदिर में मैया की सेवा करना । आप वहाँ भी ऐसे ही रहना जैसे यहाँ रहती हो, मैं व बच्चे आपकी सेवा करेंगे ।
मौसी बोली — बच्चे , मैं जीवन भर समाज सेवा करती रही,अब बहू बच्चों को तकलीफ दूं तो मेरा मन स्वीकार नहीं कर पा रहा है ।
वैसे मौसी भी यथार्थ और वर्तमान अपनी परिस्थितियों को समझ रही थी । उनका शरीर दिन प्रतिदिन ढलता जा रहा था, उनसे खाना भी नहीं बनता था, एक भक्त कभी - कभी आकर सेवा कर जाता था , वह भी अपने काम धंधे में व्यस्त रहता था , अन्य साधु संत भ्रमण में निकल जाते है तो वे अकेली कुटिया में पड़ी रहती हैं, उनका जीवन भी अब बोझ सा होता जा रहा था ।कई बार तो राशन भी नहीं रहता था, खाना बनाये तो क्या बनाये और क्या खाये ?---वे सोचती ------------ रही ।
किसी रिश्तेदार ने कभी भी नहीं पूछा ,ना ही किसी ने कहा कि वे मुझे अपने घर ले जाय। ---एक राकेश ही कह रहा है - मौसी को अपना हित डॉ राकेश शर्मा के साथ जाने में समझ आया तो वे चुप रही और बोली — जैसी आपकी सलाह है फिर वैसे ही करती हूं ।
डॉ राकेश शर्मा ने कहा — "संगम में अस्थि विसर्जन करके आप कुटिया में चलो, अपना सामान साइटों और मेरे साथ चलो"।
सन्यासी मौसी संगम तट पर बने मंदिर की एक कुटिया में रहती थी ,मौसी सोचने लगी -----
उनके निकट की एक कुटिया में कुछ समय पहले एक वृद्ध सन्यासी माता जी रहती थी, ---बड़ा कष्ट भोगकर --वे स्वर्ग सिधार गई ।
अंत समय में खाने व दवाई आदि के लिए वे दूसरों पर आश्रित हो गई थी , सेवा करने वाले करते थे , परंतु जिम्मेदारी कोई नहीं समझते थे,---- इतना बड़ा संत समाज है न तो समाज हम लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हैं--- ना ही सरकार कुछ करती है , सब दानदाताओं के रहम करम पर निर्भर करता है।--- दानदाताओं में भी अब वह भावना नहीं रह गई है । सरकारें तो अपने स्वार्थों से लोगों को पूछती है - हमारी कोई यूनियन तो होती नहीं जो वह हमारा ध्यान दे ,---और हम साधु संत कोई सुविधाओं के लिए तो अपना घर वार छोड़कर नहीं आते है ---
मौसी इन्हीं विचारों में खोयी रही ।
सन्यासी जीवन से गृहस्थ परिवार में जाना उसके मन को स्वीकार नहीं हो रहा था , परंतु शरीर की अवस्था उन्हें डॉक्टर राकेश शर्मा की सलाह मानने के लिए विवश कर रही थी । अंत में बहुत सोच समझ कर मौसी डॉक्टर साहब के साथ---उन के घर जाने को तैयार हो गई ,डॉक्टर के घर जाने से उन्हें स्वास्थ्य के मामले में दवाई आदि की सुविधा भी रहेगी और बुढ़ापे में खाने की भी सहूलियत रहेगी । यही सोचकर वे तैयार हो गई ।
सन्यासी मौसी, कुटिया में आई कुछ ज्यादा सामान तो था नहीं । दो - चार केसरिया साड़ी, ब्लाउज, एक बिस्तर , दो - चार खाना बनाने और खाने वाले बर्तन और एक खटिया - बस इतनी ही सन्यासी की संपत्ति थी ,वैरागी मन, और साथ ही ढेर सारी दुआएं ।
मौसी मंदिर में गई मंदिर में राधे कृष्ण की मूर्ति को आखिरी बार प्रणाम किया, वहां के पुजारी जी से मिली , सब बातें बताई । कुटिया खाली करने व खटिया छोड़ने की बात कह कर मौसी वहां से विदा लेकर, डॉक्टर साहब के साथ आगामी गंतव्य की दिशा में भगवान भरोसे चल दी ।
डॉक्टर शर्मा अपनी गाड़ी से मां की अस्थियां विसर्जन करने गए थे ,मौसी का थोड़ा सा सामान उनकी गाड़ी में ही आ गया और मौसी डॉक्टर साहब के साथ चल दी ।
रास्ते भर मौसी अपने अतीत के बारे में सोचती रही — कितनी शानो - शौकत से उनके पिताजी ने उनका शादी रतनपुर के प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में की थी । --पति बालमुकुंद कितने खूबसूरत , बुद्धिमान , कुशल व्यापारी थे ---परंतु शादी के साल भर बाद ही हैजा हो जाने से उनका देहांत हो गया । जवान बेटे की असमय मौत के बाद ससुर --पंडित रामाधीन तिवारी भी बीमार रहने लगे ,छः माह बाद वे भी स्वर्ग सिधार गए । पति के मरने के बाद ससुर के जीवित रहते तक उसका जीवन ससुराल में ठीक से चला, परंतु ससुर के मरते ही ,--- जेठानी ने घर पर अपना कब्जा कर लिया और पूरे व्यापार पर जेठ ने कब्जा कर लिया । अब पूरे घर व व्यापार पर जेठ -जेठानी का अधिकार था । दिनभर काम करने के बाद खाना भी ठीक से नहीं मिलता था ---,तबीयत ठीक ना होने पर भी वो काम करती और दवाई की व्यवस्था भी नहीं होती थी । जेठानी जली कटी सुनती थी ।--- जेठानी के अत्याचारों से वह बहुत परेशान हो गई थी । मौसी को अपनी कोई संतान नहीं थी, जेठ के बच्चों को वह अपना बच्चा समझ कर प्यार करती थी व उनकी सेवा करती थी, पर --- जेठानी को उनके प्रति शंका रहती थी, --उनको लगता था – विधवा मैं उनके बच्चों को कुछ टोटका - टोना करके मार न दूं । इसलिए वे अपने बच्चों को मेरे पास नहीं आने देती थी ----------- । जेठानी के ऐसे vyvhar
पति की मृत्यु के बाद दो साल किसी तरह – मैंने - जेठानी के साथ रो-रो कर बिताये परंतु मायके से भाई - भाभी ने कभी नहीं पूछा — मैं ,कैसे जी रही हूं । फिर मेरा मन नहीं माना तो दो वर्ष बाद मैं ही मायके गई ----। तो दूसरे ही दिन से भाभी का व्यवहार बदल गया -----। उनको लगा कि मैं वहां रुकना जाऊं । वहां सब कुछ साधन संपन्नता तो थी परंतु भाभी हरदम खर्चे के लिए रोती रहती । किसी तरह छः माह भाई - भाभी के लांछन व बाते सुनने के बाद मैं बहुत दुखी रहने लगी । वे सोचते रहीं ------।
मैने सुना था - मथुरा वृंदावन में मंदिरों में विधवा महिलाएं रहती है और वहाँ सेवा करती तथा भजन कीर्तन करके अपना जीवन बिताती है । और किसी तरह भगवान भरोसे एक दिन मायके का घर छोड़कर मैं मथुरा वृंदावन के मंदिरों में आ गई, वहां पर मंदिरों में विधवा माता बहनों के साथ भजन कीर्तन करती व रहती रही फिर मैं तीर्थ यात्रिओं के साथ हरिद्वार व ऋषिकेश चली गई । 30 वर्षों तक मैंने ऋषिकेश के पावन सप्त - ऋषि आश्रम में अपनी सेवाये थी ---- यहां मुझे अपने तपस्वी जीवन का भरपूर आनंद मिला ---- मैने ज्ञान , योग , सत्संगों में बहुत कुछ सीखा, वे खुद भी अच्छा प्रवचन व भागवत कथा करती थी -----। जो लोग बड़े भक्ति भाव से सुनते थे । मैं सेवा भाव से ही सब करती रहती थी । मैंने कभी भी पैसे का लालच नहीं किया । कथा का पूरा चढ़ावा आश्रम व मंदिर के आचार्य के पास जमा हो जाता था । वहां से हम सभी की व्यवस्था हो जाती थी - वहीं से मैंने सभी तीर्थो की भी यात्रा की । मथुरा वृंदावन की बजाय ऋषिकेश मुझे ज्यादा अनुकूल रखता था ऋषिकेश में रहने से मेरा आध्यात्मिक ज्ञान वह भक्ति भाव बढ़ता गया ।
ऋषिकेश में ठंडी अधिक पड़ने से उनकी तबीयत खराब रहने लगी इसी कारण पिछले 3 वर्षों से वह इलाहाबाद में मंदिर की कुटिया में रह रही है । यहां आकर भी उनका स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा है । यहां खाने व दवाई की भी समुचित व्यवस्था नहीं है --- फिर हम संतो को सुविधा क्या देखनी है, हम चल रहे है । ---- जीवन प्रभु को दिया है तो वही सम्हालेगा । आगे ही वही जिम्मेदार है , सोचकर मौसी निश्चिंत भाव से यात्रा करती रही । रात्रि 8 बजे तक मौसी डॉक्टर शर्मा के साथ राजहरा आ गयी ।
डॉक्टर साहब ने मौसी के लिए एक कमरे की व्यवस्था कर दी । खाना मौसी घर में खाती थी, सुबह शाम मंदिर में भगवान की सेवा करती , धार्मिक पुस्तकें पढ़ती , दोपहर में आराम करती, इस तरह 3 साल तक डॉक्टर व उनके परिवार की सेवा से मौसी का जीवन सामान्य से अच्छा ही बीता , सुख में तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि बुढ़ापा स्वयं दुख देता तब शरीर साथ नहीं देता । डॉक्टर साहब और उनकी पत्नी ,मौसी को खाना देते समय अपने को बड़ा भाग्यशाली समझते थे। उनकी भावना रहती ----- एक संन्यासी उनके घर भोजन कर रहा है । इसी भावना से वे सेवा करते थे । मौसी के देहान्त के बाद डॉक्टर साहब उनकी अस्थियां लेकर फिर इलाहाबाद गए क्योंकि मौसी की इच्छा थी कि उनकी अस्थियां संगम में विसर्जित की जाय ।
सन्यासी मौसी के अस्थि विसर्जन का दायित्व पूर्ण कर डॉक्टर साहब ने एक सामाजिक व धार्मिक, पारिवारिक व सांस्कृतिक चेतना व कर्तव्य बोध का आदर्श प्रस्तुत किया । इलाहाबाद के संत समाज ने अस्थि विसर्जन कार्यक्रम में शामिल होकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की । जिस मंदिर में मौसी मां तीन वर्षों तक रही थी ,मौसी की शालीनता व पवित्रता की छाया से मंदिर के पुजारी व भक्तगण बहुत प्रभावित थे ,वे सभी भी वहाँ साथ थे।उन्होंने डॉक्टर साहब की सेवा भावना की भूरि - भूरि प्रशंसा की । संत समाज ने डॉक्टर को अनेकों आशीर्वचनों से और अपनी शुभकामनाओं से मंडित किया । डॉक्टर साहब ने अपना भाग्य तो बनाया है , समाज में भी एक आदर्श प्रस्तुत किया । इस सारी व्यवस्था में डॉक्टर राकेश शर्मा के साथ-साथ उनकी पत्नी कौशल्या की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रशंसनीय रही ,उनके सहयोग से ही डॉक्टर साहब अपनी हर जिम्मेदारी में निरंतर सफल हो चले गये । सन्तो के प्रति लोगो में सम्मान तो होता है , परन्तु दायित्व बोध नहीं होता । डॉ शर्मा ने आदर्श प्रस्तुत किया.
छतीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर
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