गंगा ठाकुर
केंद्रीय मंत्री श्री राम शरण यादव जी का आगमन हो रहा था,बहुत दिनों बाद वे अपने क्षेत्र में आ रहे थे, कार्यकर्ताओं में बड़ा जोश खरोश था, नगर को दुल्हन की तरह सजाया गया था, जगह-जगह होर्डिंग्स लगे थे मंत्री जी के नगर आगमन पर अभिनंदन व स्वागत लिखा होने के साथ-साथ स्थानीय नेताओं के फोटो भी लगाये गये थे । नगर में हर चौक पर गेट सजाए गए थे सैकड़ो फ्लेक्स व होर्डिंग्स से शहर सज गया था । मंत्री जी के आते ही युवाओं ने नगर के प्रवेश द्वार पर पहुंच कर जहां बड़ा सा गेट बनाया गया था, मंत्री जी को रोक कर जोरदार स्वागत किया तथा नारेबाजी की जिंदाबाद के नारों से नगर को गुंजायमान कर दिया तथा पटाखों की लड़ियां सड़क में बिछाकर अपनी प्रसन्नता व उत्साह का प्रदर्शन किया और वे लोग रैली के रूप में मंत्री जी को कार्यक्रम स्थल तक ले आये , स्वागत करने के लिए कार्यकर्ताओं व युवाओं में होड़ लगी थी ,सभी को लग रहा था स्वागत करने में “मैं पीछे ना रह जाऊं” तरह-तरह के गुलदस्ते बड़ी-बड़ी फूल मालाओं ,शॉल श्री फल से मंत्री का स्वागत होता रहा ,युवा नारे लगते रहे और मंत्री जी गदगद होते रहे ।
शाम को मंत्री जी कार्यकर्ताओं के साथ पार्टी कार्यालय में बैठे थे वे कार्यकर्ताओं से घिरे थे, तभी एक कार्यकर्ता ने कहा— "भैया अब आप मंत्री बन गए हो हमें आप पर बहुत गर्व है ,अब हमारे भी भाग्य खुल गए जो हमें आप जैसे नेता मिले है ,अब क्षेत्र का विकास व जनहित के काम सरलता से हो सकेंगे परंतु हमारी इच्छा है भैया किसी निगम या मंडल में हमारे क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को भी स्थान मिले आपके क्षेत्र में 50-50 वर्षों से पार्टी की सेवा करने वाले लोग हैं उन्हें भी अब अवसर मिलना चाहिए यदि किसी कार्यकर्ता को आगे आने का मौका मिलता है तो कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और पार्टी को भी उसका फायदा मिलेगा "
मंत्री जी ने कहा —" जरूर, आपकी बात सही है ,मैं ज्यादा तो नहीं एक कार्यकर्ता को किसी निगम या मंडल में अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बनवाने का प्रयास करूंगा ,आप लोग मिलकर एक नाम पर सहमति बना लो। सभी की इच्छा रहती है, कि वह आगे बढ़े इस कारण कोई भी नहीं बन पाता, आपस में ही सब एक दूसरे को काटने में लग जाते हैं फिर बात बिगड़ जाती है, पहले आप लोग आपस में तय कर लो, फिर मैं प्रयास करूंगा ।"
मंत्री जी मन ही मन सोच रहे थे राजनीति में सभी की बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएं रहती है, सभी खुद पद लेना चाहते हैं, सब लोग एक नाम पर सहमत हो नहीं पाएंगे । इस तरह मैं इन्हें बुद्धू बनाता रहूंगा, यह लोग आपस में ही लड़ते झगड़ते रहेंगे और मुझे बहाना मिल जाएगा कि आप लोग सहमत नहीं हो, तो मैं क्या कर सकता हूँ ? इनके लड़ने झगड़ते रहने में ही अपनी भलाई है ।
रात में ही कार्यकर्ताओं ने आपस में तय किया कि आपस में लड़ते झगड़ते रहने से किसे को मौका नहीं मिल पाता और नेताओं की नजर में भी हमारा मान सम्मान नहीं रहता इसलिए एक नाम पर सहमति बना लेनी चाहिए । अब यह चिंतन चला कि कोई एक ऐसा नाम हो जिस पर सभी की सहमति बने कुछ देर चुप रहने के बाद एक बुजुर्ग कार्यकर्ता बाबूलाल शर्मा ने कहा कि —मेरी राय में किसी महिला का नाम बढ़ाया जाए तो विरोध नहीं होगा, महिला का नाम सुनते ही सबका ध्यान श्रीमती गंगा ठाकुर की तरफ गया, वह नगर की सबसे सीनियर महिला कार्यकर्ता है। वर्षों से वह पार्टी की सेवा करती आ रही है, पढ़ी-लिखी ,सुशील, संपन्न, प्रखर वक्ता व मिलनसार भी हैं। पिछले 30 से 35 वर्षों से वह अनवरत पार्टी की सेवा ही नहीं कर रही है बल्कि लोगों के दिलों में विश्वास ,संतोष ,अपनापन बांट रही है, लोगों के प्रति उनके व्यवहार व अपनेपन के कारण वह सम्मान वह प्रतिष्ठा की अधिकारी भी है, कितने ही कार्यकर्ता इस बीच आए और गए, कुछ घर में बैठ गए, परंतु गंगा ठाकुर बिना किसी महत्वाकांक्षा के पार्टी के प्रति निरंतर समर्पित है, लगभग सभी नए पुराने कार्यकर्ता उन्हें पहचानते व अपना समझते हैं। अब गंगा ठाकुर के नाम पर सहमति बन गई। मन में सभी के इच्छाएं तो रहती ही है परंतु गंगा ठाकुर के नाम पर सभी चुप रहे । वाकई वे बहुत पुरानी महिला कार्यकर्ता है ।
गंगा ठाकुर में पार्टी के प्रति गजब का समर्पण भाव था और सभी कार्यकर्ताओं के प्रति सम्मान व आत्मीयता भी थी। आसपास के क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता थी वह जी जान लगाकर निस्वार्थ भाव से जनता की सेवा करती थी, पार्टी के हर काम को बिना किसी अहम् के करते जाना उनकी आदत बन गई थी ।
सुबह खास खास कार्यकर्ता मंत्री के घर पहुंचे और बोले — " हमने आपस में मिलकर गंगा ठाकुर के नाम पर सहमति बनाए हैं, आप इनको किसी अच्छे पद पर बैठाइये ।"
गंगा ठाकुर के नाम पर एक मत से सहमत होना मंत्री जी की चिंता का कारण बन गया, वे मन ही मन सोचने लगे कि यदि गंगा ठाकुर को आगे बढ़ाता हूं तो यह तो मेरे लिए ही खतरा बन जाएगी। बड़ी सौम्य सुशील महिला है, पार्टी के प्रति समर्पित। इसके कारण तो कभी मेरी ही टिकट कट सकती है, अब मन ही मन मंत्री जी पछताने लगे कि कहां मैने एक मत होकर नाम बताने के लिए बोल दिया परंतु वे बोले ठीक है, मैं प्रयास करता हूं , तुम लोग उन्हें लेकर दिल्ली पहुंचो ,वहीं प्रधानमंत्री जी से मिलकर बात करेंगे , और गंगा को उनसे मिलवा भी दूंगा ।
मंत्री जी ने शिवदास को अलग बुलाकर पूछा— आप क्या चाहते हो ?
शिवदास — बनने दो गंगा ठीक है उसे ही आगे बढ़ाते हैं
मंत्री जी — तुम खुद अपने लिए प्रयास क्यों नही करते ? मैं चाहता हूँ की तुम प्रयास करो”
शिवदास — मैं यह काम करूंगा तो मेरी दुकान कौन सम्हालेगा "
मंत्री जी — बच्चे सम्हाल लेंगे ।
शिवदास — " बच्चे अभी छोटे है, नहीं सम्हाल पायेंगे ।“
अब गंगा के नाम पर सहमति बनी है ,उसे ही बना दीजिये ।
इस तरह मंत्री ने अपने प्रिय खास- खास कार्यकर्ताओं से अलग-अलग बुलाकर बातचीत की और प्रयास किया कि कोई अन्य कार्यकर्ता गंगा का विरोध दे तो उन्हें बहाना मिल जाएगा परंतु मंत्री जी के गणित को कार्यकर्ता या तो समझ नहीं पाए या समझने का प्रयास ही नहीं किया । गंगा व कुछ लोगों को लेकर दिल्ली आने के लिए कह कर ,मंत्री जी दिल्ली चले गये ।
कुछ लोगों को दिल्ली लेकर जाना, रास्ते का खर्चा उठाना ,उन्हें खिलाना -पिलाना ,ठहरने की व्यवस्था करना यह तो गंगा को ही करना था परंतु उसने सोचा यह अवसर फिर नहीं आयेगा अभी सब उनके नाम पर सहमत है ,कब किसका मूड बदल जाए इसलिए गंगा ने कहीं से पैसे की व्यवस्था की और सोचा एक-दो दिन में प्रधानमंत्री जी से मिलकर आ जाएगी। गंगा आर्थिक रूप से साधारण परिवार की महिला है ज्यादा खर्चा उठा पाना उसके लिए कठिन बात थी । यही सोच कर खास खास चार सीनियर कार्यकर्ताओं वह अपने पति को लेकर देहली पहुंची। देहली में होटल में सबके रुकने की व्यवस्था गंगा के पति मनोज ठाकुर ने की ।
फिर दिल्ली में मंत्री जी के बंगले में सभी पहुंच गए मंत्री जी दौरे पर गए हुए थे , रात्रि में जब वे दौरे से आये तो सबकी भेंट हुई, मंत्री जी ने हंसते हुए सबका स्वागत किया और सुबह प्रधानमंत्री से मिलवाने का आश्वासन देकर सबको आराम करने की सलाह देकर मंत्री जी भी आराम करने चले गये ।
गंगा व सभी कार्यकर्ता बड़े उत्साहित थे कि कल हमारी भेंट प्रधानमंत्री जी से हो जाएगी और गंगा को नियुक्ति पत्र भी मिल जाएगा हम खुशी-खुशी वापस जायेगे ।
सुबह-सुबह सभी चाय नाश्ता करके मंत्री जी के बंगले पहुंचे ,मंत्री जी ने फोन लगाकर बताया कि प्रधानमंत्री जी दो दिन के दौरे पर बाहर गए हैं, वापस आते ही आपको मिलवा दूंगा । "
सब के सब होटल में पड़े पड़े क्या करेंगे अतः तय हुआ कि दिल्ली के दर्शनीय स्थलों को घूम लिया जाए अब गंगा और उसके पति ने सभी को दिल्ली के दर्शनीय स्थल घुमाने के लिए एक टैक्सी तय कर ली, अब दो दिन तक दिल्ली घूमने के बाद गंगा व कार्यकर्ता दूसरे दिन शाम को फिर मंत्री जी के बंगले पहुंच गये । मंत्री ने कहा —पता करता हूं प्रधानमंत्री जी आए या नहीं और रात में मिलेंगे या नहीं?
फोन लगाकर मंत्री ने बताया प्रधानमंत्री जी का वापसी देर रात में है , उनको ग्यारह बारह भी बज सकता है, अगले दिन रविवार है, प्रधानमंत्री जी किसी से भी मिलते नहीं है, उस दिन वे अपने पेंडिंग काम निपटाते हैं, इसलिए अब आप सबको सोमवार को मिलवा दूंगा।
सब फिर रुक गये सोचा इतने दिन तो हो गए , अब एक दिन और रुक जाते हैं फिर दुबारा आना नहीं होगा । अब गंगा सहित सभी ऊबने लगे थे, सबके घर के काम भी नुकसान हो रहे थे परंतु गंगा की दशा देखकर सब सोमवार को प्रधानमंत्री जी से मिलने के लिए रुक गये ।
मंत्री रामशरण यादव सोचने लगे ---इन सबको कैसे टरकाया जाय,--- यह तो मेरे लिए ही समस्या हो गई। मंत्री जी ने अपने खेमे से गंगा को काटने के लिये एक हरिजन महिला सरिता भारती को दिल्ली बुला लिया और इतवार की शाम को सरिता भारती अपने पति सहित दिल्ली आ गई।
सोमवार को सभी मंत्री जी के ऑफिस में बैठे। वहां पर सरिता को आया हुवा देखकर सभी हक्के बक्के रह गए ।
पहले मंत्री जी ही बोले¬- “सरिता भी अपनी दावेदारी करने यहाँ तक आ गई है पहले आप दोनों आपस में बैठकर तय कर लो फिर आगे बात हो ।“
दोनों महिलाये अपनी -अपनी दावेदारी करने लगी। मंत्री जी के अंदरूनी समर्थन के कारण सरिता बड़ी-बड़ी बातें करने लगी। गंगा ठाकुर अपनी शालीनता के कारण ज्यादा बहस में नहीं पढ़ना चाहती थी क्योंकि वह झगड़ालू स्वभाव की महिला नहीं है ।सरिता काम कम करती थी परंतु प्रदर्शन ज्यादा करती थी इस कारण बातचीत में जो चतुरता व चालाकी सरिता की बातों में थी, वो गंगा में नहीं थी। दोनों अपनी अपनी दावेदारी कर रही थी, अपने किये कामों का बखान कर रही थी, सरिता गंगा से अनुभव में कम ही थी- परंतु बहुत बढ़ चढ़कर बोल रही थी ।
सरिता बोली —" पिछली बरसात में जब निचली बस्तियों में पानी भर गया था और लोगों की झोपड़ियां पानी में बह गई थी तो मैंने लोगों को अपने घर में रखकर खाना खिलाया था, सैकड़ो लोग मेरे घर खाना खाये थे, तब तो आप दिखाई नहीं दी थी "।
गंगा बोली — "मैं तो शांतिनगर की पूरी बस्ती को सामुदायिक भवन में ठहराने की व्यवस्था में लगी थी , आपके घर में तो वही लोग थे जो आपके रिश्तेदार थे , सैकड़ो लोग तो आपके या किसी और के घर में आ भी नहीं सकते "।
सरिता भड़क गई -" वे मेरे रिश्तेदार नहीं थे ,आमजन थे ,जिनको मैने अपने घर रखकर शरण दी थी "।
गंगा बोली —" मैं तो 30 वर्षों से पार्टी की सेवा कर रही हूं । आप नये हो "।
सरिता बोली — "आप पुराने हो पर जितना काम अभी थोड़े दिनों में मैंने किया है, उतना तो आपने अपने पूरे जीवन में भी नहीं किया है। मैने , मजदूर बस्तियों में लाइट लगाने व सड़क बनवाने के लिए कई आवेदन पत्र अधिकारियों को दिए थे" ।
गंगा बोली — "मैं तो मजदूर बस्ती में लाइट लगाने सुलभ ,शौचालय व सड़क बनाने के लिए कई बार आंदोलन व रैली भी निकाल चुकी हूं पार्टी के हर कार्यक्रम में बराबर भाग लेती हूं" ।
दोनों अपने कामों को बढ़ा चढ़ा कर बताने में लगी थी परंतु गंगा सौम्य महिला थी , वह बात करते समय उत्तेजित नहीं हुयी, सरिता उत्तेजित होकर कहने लगी —"आजकल यह मैडम कुछ नहीं करती है बस पुरानी डींगे मारती रहती है"।
गंगा मंत्री जी के खेल को समझ गई इसलिए ज्यादा बहस में नहीं पड़ी और शांत हो गई बोली —"निर्णय मंत्री जी को लेना है आप जैसा चाहो वैसा करिये"।
दोनों की बहस पर मंत्री जी बहुत आनंद ले रहे थे अंत में मंत्री जी बोले— आप लोग निश्चिंत रहो, मैं प्रयास करूंगा, परंतु जाति के आधार पर सामान्य की बजाय प्रधानमंत्री हरिजन होने के कारण सरिता को ज्यादा महत्व दे सकते हैं, हमें सोच समझकर निर्णय लेना है , अब स्थानीय विधायक से भी राय लेनी पड़ेगी। आप लोग चिंता मत करो, हम अपनी तरफ से जो सबके हित में होगा वही निर्णय लेंगे ।
इस तरह समझा बुझा कर नाश्ता करवा कर मंत्री जी ने सबको विदा कर दिया । गंगा पार्टी के प्रति अपने कामों को मन ही मन गिनती रहीं और मंत्री जी की चालाकी पर सोच सोच कर भाँति भांति से चिन्तन करती रही.
छतीसगढ़ रत्न
डॉ .शिरोमणि माथुर
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