वो मासूम सी लड़की - 4 Vandna Sharma द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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वो मासूम सी लड़की - 4



एक सपना -अपना आसमान, अपना घर

पीहू ने अब अपना छोटा सा कोचिंग सेंटर खोल लिया था। एक कमरे में दो टेबल, एक ब्लैकबोर्ड और वही पुरानी फोटोकॉपी मशीन। बेटा आरव भी उसके हर काम में उसकी सहायता करता। आरव अब बारहवीं क्लास में आ चुका था, काफी समझदार हो गया था।

पर पीहू के दिमाग में कुछ बड़ा चल रहा था। वह सिर्फ आज के बारे में नहीं सोच रही थी। उसे अपने बेटे के लिए सफर आसान करना था। वह सोच रही थी अपने बेटे के लिए एक बिजनेस का ऐसा मार्ग बना दूँ, जिससे उसके बेटे को कभी नौकरी के लिए दर-दर भटकना न पड़े। उसने जो दर्द सहा था, वह अपने बेटे को नहीं सहने देना चाहती थी।

एक रात वह छत पर खुले आसमान के नीचे चारपाई पर लेटी तारों को निहार रही थी। वही तारे जो उसके बचपन के साथी थे। तभी उसके दिमाग में एक विचार आया कि अब आरव बड़ा हो गया है, क्यों न साथ में कोई और काम भी शुरू किया जाए।

अभी तक पीहू के पति विदेश से नहीं लौटे थे।

अगले दिन पीहू ने सुबह नाश्ते के समय अपने बेटे से कहा - "बेटा मैं चाहती हूँ तुम अब कोचिंग सेंटर और प्रिंटिंग का काम पूरी तरह संभालो। आगे की पढ़ाई तुम पत्राचार से कर लेना और साथ ही अपना बिजनेस आगे बढ़ाओ। मैं सुबह योगा की क्लास देना शुरू करती हूँ।"

आरव ने खुश होकर कहा - "ठीक है माँ, आप योगा क्लास शुरू करो। योगा के साथ सिलाई भी सिखा सकती हो, आपको तो सब आता है।"

पीहू ने कहा - "हाँ, अच्छा विचार है।"

बस अगले ही दिन से पीहू ने एक नई शुरुआत की। उसने सुबह साठ साल से बड़ी औरतों के लिए निशुल्क योगा क्लास शुरू की। सबने पूछा, फ्री में क्यों? तो पीहू जानती थी, ये बुजुर्ग महिलाएं ही उसका सच्चा प्रचार करेंगी। ये महिलाएं पूरे मोहल्ले में उसकी अच्छाई की बात करेंगी और उसको उनके आशीर्वाद से नए लोग भी मिलेंगे।

उसकी योजना सफल हुई। धीरे-धीरे मोहल्ले की अम्माएं आने लगीं। कोई घुटनों के दर्द से, कोई अकेलेपन से परेशान थी। पीहू की योगा क्लास में उन्हें सिर्फ योग नहीं, एक साथ मिल बैठकर हँसने का बहाना भी मिला।

अब उसके पास पैसे देने वाली अन्य महिलाएं भी योगा क्लास के लिए आने लगीं। अब पीहू सुबह पाँच से दस बजे तक योगा क्लास सिखाती। उसने महिलाओं को क्राफ्ट व सिलाई भी सिखानी शुरू की, जिससे अन्य महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकें। वह अब सिर्फ एक माँ नहीं, पूरे मोहल्ले की दीदी बन गई थी।

इधर आरव ने भी कमाल कर दिया। उसने कोचिंग सेंटर के साथ एक छोटा सा कैफे भी खोल लिया। यह कोई आम कैफे नहीं था। इसमें छात्र-छात्राएं आकर शांति से किताब पढ़ सकते थे, साथ ही अपने दोस्तों के साथ कॉफी पी सकते थे। आरव ने उसका नाम रखा - "पीहू लर्निंग कैफे"। अपनी माँ के नाम पर। पीहू यह नाम देखकर रो पड़ी थी, ये आँसू गर्व के थे।

पीहू ने अपना योगा और क्राफ्ट का सेंटर भी बड़ा कर लिया था। जहाँ अब पाँच और औरतें उसके साथ काम करती थीं, जो कभी उसकी तरह ही मजबूर थीं। अब उसका बिजनेस बढ़िया चलने लगा था।

समय तेजी से बीत रहा था। लगभग पाँच साल बीत गए।

और फिर वह दिन आया। पीहू का पति विदेश से वापस आया। पाँच साल में वह बहुत बदल गया था। जब उसे अपने घरवालों के बुरे व्यवहार का पता चला कि उन्होंने पीहू और आरव को घर से निकाल दिया था, तो उसका सिर शर्म से झुक गया।

वह सीधा पीहू के छोटे से किराए के घर में आया। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने पीहू का हाथ पकड़कर कहा - "पीहू, मुझे माफ कर दो। मैं विदेश में पैसा कमाता रहा और यहाँ तुम अकेली सब सहती रही।"

पीहू ने कुछ देर उसे देखा। पाँच साल का दर्द, रातों की भूख, लोगों के ताने सब याद आ गए। पर फिर उसने अपने बेटे आरव को देखा। पीहू ने मुस्कुराकर कहा - "जो हुआ उसे भूल जाओ। मैं अब वो कमजोर पीहू नहीं रही।"

पीहू ने उसे माफ कर दिया। क्योंकि वह जानती थी, माफ करने में ही असली ताकत होती है।

अब पीहू के पति ने तीनों के लिए शहर से थोड़ा बाहर एक बड़ा सा फार्म हाउस खरीद लिया। चारों तरफ हरियाली, बीच में एक छोटा सा प्यारा सा घर। यह पीहू का सपना था - अपना घर, अपनी जमीन।

पीहू का बिजनेस अब तीनों मिलकर चलाते। आरव अपना लर्निंग कैफे और कोचिंग देखता, पीहू अपना क्राफ्ट सेंटर, और उसका पति अपने फार्म में फल और सब्जी उगाता और पीहू के काम में सहायता करता।

अब उनकी जिंदगी आराम से हँसते-गाते गुजर रही थी।

एक दिन पीहू अपने परिवार के साथ हरिद्वार गंगा नहाने गई। सालों बाद तीनों एक साथ कहीं घूमने निकले थे। तीनों एक घाट पर बैठकर पानी में पैर डुबोए डूबते सूरज को देख रहे थे। पानी सोने जैसा चमक रहा था।

आरव ने कहा - "माँ, देखो, हम कहाँ से कहाँ आ गए।"

पीहू ने आसमान में देखते हुए, जहाँ अब भी तारे निकलने लगे थे, कहा - "हाँ बेटा, पर अभी मंजिल बाकी है। मेरा एक और सपना है -"

"कौन सा सपना, माँ?" आरव ने पूछा।

पीहू मुस्कुराई और बोली - "शेष अगले अंक में..."