मासूम सी वो लड़की - 2 Vandna Sharma द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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मासूम सी वो लड़की - 2



कहानी - पीहू की नई उड़ान

समय बहुत तेजी से बदलता है। समय के गर्भ में क्या छुपा है, कौन जानता है।

वही मासूम सी पीहू, जो कभी तारों में कहानियाँ खोजा करती थी, आज एक रूढ़िवादी परिवार की बहू थी। गाँव के उस घर में उसकी शादी हुई थी, जहाँ औरत का काम सिर्फ सहना माना जाता था।

उसका पति स्वभाव से कठोर था। अपने परिवार को खुश रखने के लिए वह अक्सर सबके सामने पीहू का अपमान कर देता। कभी उसे नीचा दिखाता, कभी खरी-खोटी सुनाता। उसकी माँ के सामने तो वह ऐसा व्यवहार करता जैसे पीहू का कोई अस्तित्व ही न हो। ससुराल में कोई उसका सम्मान नहीं करता था, क्योंकि जिस घर में पति ही पत्नी का सम्मान न करे, वहाँ दूसरों से क्या उम्मीद की जाए। ससुराल में एक बहू को सम्मान दिलाना पति का पहला फर्ज होता है, पर जब वही सबके सामने अपशब्द कहे, तो वह बहू सबकी नजर में सिर्फ एक नौकरानी बनकर रह जाती है।

पीहू की सुनने वाला कोई नहीं था। वह चुपचाप सुबह से शाम तक घर का सारा काम करती - चूल्हा, चौका, बच्चे। और रात में जब सब सो जाते, तो अकेले में चुपचाप रो लेती। जब भी वह अपने पति से मन की बात कहना चाहती, वह उसे डाँट कर चुप करा देता। सबके सामने वह उसे दुत्कारता, और कभी-कभी अकेले में जब उसका मन होता तो दो मीठे बोल बोल देता। पीहू बहुत धार्मिक और सहनशील थी। वह सब अपनी किस्मत समझकर सहती रही। उसे ईश्वर पर पूरा विश्वास था कि एक दिन ईश्वर के घर जरूर न्याय होगा।

समय बीता। पीहू का बेटा अब बारह साल का हो गया था। वह अपनी माँ को रोते हुए देखता तो उसका नन्हा सा दिल भी रो पड़ता। एक दिन बेटे ने पूछा - "माँ, तुम हमेशा रोती क्यों हो?" उसी दिन पीहू ने पहली बार आईने में खुद को देखा। उसने देखा, उसकी आँखों की वो मासूम चमक कहीं खो गई है।

और उसी क्षण उसने निर्णय लिया। अब और नहीं।

उसने घर में सबके सामने हाथ जोड़कर कहा - "मैं इस घर को छोड़कर नहीं जाऊँगी, न ही मैं तलाक लूँगी। क्योंकि तलाक का बुरा असर मेरे बच्चे पर पड़ेगा और मैं अपने बेटे को पिता के बिना बड़ा नहीं करना चाहती। पर अब मैं एक अलग कमरे में रहूँगी। मैं अपना खर्चा खुद कमाऊँगी।"

सब हक्के-बक्के रह गए। रूढ़िवादी ससुर ने कहा - "औरत होकर कमाएगी?" पीहू ने शांत स्वर में कहा - "हाँ, अपनी अध्यापिका सुधा मैडम से मैंने सिलाई सीखी है। मैं सिलाई करूँगी।"

पति कुछ न कह सका।

अगले दिन से पीहू ने अपने छोटे से कमरे में एक पुरानी सिलाई मशीन लगा ली। गाँव की औरतों के ब्लाउज, बच्चों के कपड़े सीने लगी। धीरे-धीरे उसकी ईमानदारी और मीठे बोल की वजह से उसके पास काम आने लगा। जो पीहू कभी दूसरों की मदद के लिए पैसे लौटा देती थी, आज वही अपने दम पर अपने बेटे की फीस भर रही थी, अपना खर्चा उठा रही थी।

अब वह सबके सामने नीचा नहीं देखती। वह सिर उठाकर जीती है। उसने अपने पति से लड़ाई नहीं की, उसने खुद से दोस्ती कर ली। वह आज भी ईश्वर को मानती है, पर अब वह जानती है कि ईश्वर भी उन्हीं की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करते हैं।

रात में जब वह अपनी चारपाई पर लेटकर तारों को देखती है, तो उसे वही बचपन वाली पीहू याद आती है। पर अब उसे तारों में सिर्फ आकृतियाँ नहीं, अपना भविष्य दिखता है - एक ऐसा भविष्य जहाँ वह मासूम तो है, पर कमजोर नहीं।

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली