शाम के सात बजे थे। अक्टूबर की ठंडी हवा चल रही थी और आसमान एकदम साफ था। चाँद तारों के संग अठखेलियाँ कर रहा था।
छत पर पड़ी चारपाई पर लेटी पीहू तारों को निहार रही थी। उसे तारों में अलग-अलग आकृतियाँ खोजने का बहुत शौक था। कभी उसे लगता यह शेर है, कभी हिरन। खुद से ही कहानी बनाती, कुछ गुनगुनाती, और फूलों से बातें करते हुए खुद में ही मस्त रहती।
पीहू इतनी मासूम थी कि अठारह साल की होने पर भी सब उसे बच्चा ही समझते थे। सजना-सँवरना उसे बिल्कुल पसंद नहीं था। हमेशा साधारण से ढीले सूट, लंबे बालों की एक मोटी सी गुँथी हुई चोटी, और हिरनी जैसी फुर्ती। घर में सबके काम वह भाग-भाग कर निपटा देती। बच्चे हों या बड़े, सबसे प्यार से बात करती।
क्लास में उसकी कोई पक्की सहेली नहीं थी। उसे अकेले रहना ही अच्छा लगता था। जब खाली समय मिलता तो वह अपनी अध्यापिका सुधा मैडम के पास चली जाती और उनका काम करवा देती। मैडम भी उसे बहुत प्यार करती थीं और कहती थीं - "पीहू, तुम इस दुनिया की सबसे मासूम लड़की हो।"
एक बार उसके पापा ने उसे बिजली का बिल जमा करने भेजा। वह लाइन में चुपचाप खड़ी अपनी बारी का इंतजार करने लगी। उसकी मासूम सी शक्ल देखकर लाइन में खड़े एक अंकल को दया आ गई। उन्होंने बिजली विभाग के कर्मी से कहा - "भैया, पहले इस बच्ची का बिल जमा कर लो, बेचारी कब से खड़ी है।" पीहू का बिल सबसे पहले जमा हो गया। वह खुशी-खुशी घर लौट आई।
फिर एक दिन वह अपने स्कूल से वापस आ रही थी। सड़क पर चलते हुए अचानक उसकी ठोकर लगी। उसने नीचे देखा तो एक छोटी सी पोटली जैसी गिरी हुई थी। उसने उठाकर देखा तो उसमें दस-दस के नोटों की गड्डी थी। करीब दो हजार रुपए होंगे।
पीहू ने इधर-उधर देखा, कोई नहीं था। उसने घबराकर वह गड्डी अपने बैग में रख ली। उसका दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था। उसने आज तक इतने पैसे एक साथ नहीं देखे थे।
घर आकर उसने सारी बात अपनी माँ को बताई और सारे पैसे माँ के हाथ में रख दिए। माँ ने पैसे देखे और गंभीर हो गईं। उन्होंने कहा - "पीहू, ये पैसे हमारे नहीं हैं। जिसे खोया है, वह कितना परेशान हो रहा होगा। हम कल तुम्हारी मैडम के साथ उसी जगह जाएँगे।"
अगले दिन पीहू और उसकी माँ सुधा मैडम के साथ उसी जगह गईं। वहाँ पास की सब्जी मंडी में एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति रोता हुआ सबसे पूछ रहा था - "किसी ने मेरी पोटली देखी क्या? मेरी बेटी की फीस के पैसे थे।"
पीहू ने पहचान लिया, वही जगह थी। वह डरते-डरते उसके पास गई और बोली - "अंकल, क्या आपके पैसे ऐसे थे?"
उस व्यक्ति ने गड्डी देखी तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। बोला - "हाँ बेटी, यही हैं। मैं अपनी बेटी की फीस के लिए पूरे महीने की कमाई जोड़कर ला रहा था। मंडी में गिर गए। मैं तो सोच रहा था अब मेरी बेटी का साल बर्बाद हो जाएगा।"
पीहू ने बिना कुछ सोचे वह पूरी गड्डी उसे लौटा दी। उस आदमी ने हाथ जोड़ लिए - "बेटी, तुमने मेरी बेटी का साल बचा लिया। भगवान तुम्हें हमेशा मासूम बनाए रखे।"
उस दिन पीहू को एक नई खुशी मिली। रात में जब वह फिर से चारपाई पर लेटकर तारों को देख रही थी, तो उसे लगा जैसे तारे आज पहले से भी ज्यादा चमक रहे हैं और उसकी ईमानदारी पर टिमटिमा रहे हैं।
उसे समझ आ गया था कि तारों में कहानी खोजने से भी बड़ी कहानी, ईमानदारी और सच्चाई में होती है। मासूमियत सिर्फ दिखने में नहीं, मन में होनी चाहिए।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली