क्या पुरुष सचमुच अपना ख्याल रखना भूल गए हैं? r k lal द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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क्या पुरुष सचमुच अपना ख्याल रखना भूल गए हैं?

“क्या पुरुष सचमुच अपना ख्याल रखना भूल गए हैं?

लेखक: आर. के. लाल

अक्सर देखा जाता है कि पुरुष अपनी पत्नियों से पहले इस दुनिया से विदा हो जाते हैं क्योंकि उनकी  सही परवाह नहीं हो पाती है । पुरुषों का अपनी पत्नियों से पहले गुज़र जाना कोई प्राकृतिक बात नहीं है,  यह किस्मत भी नहीं है और जेनेटिक्स (आनुवंशिकी) का नतीजा भी नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ज़्यादातर पुरुष धीरे-धीरे खुद को मार रहे हैं । मजे की बात है कि इस विषय में कोई बात ही नहीं करता कि यह उनके लंबे समय तक  तनाव और जीवनशैली की वजह से होता है।

दुनिया के अधिकांश देशों में महिलाओं की औसत जीवन प्रत्याशा पुरुषों से अधिक है। यह तथ्य हमें सोचने पर विवश करता है कि क्या पुरुष अपनी उतनी परवाह करते हैं, जितनी उन्हें करनी चाहिए?  क्या कभी सोचा ग्या है कि परिवार के लिए दिन-रात मेहनत करने वाला पुरुष , सबकी जरूरतों का ध्यान रखने वाला पुरुष आखिर अपना ख्याल कब रखता है? वह जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाता भी है  लेकिन इस भागदौड़ में एक सवाल पीछे छूट जाता है—उसके अपने स्वास्थ्य का क्या? उसकी अपनी भावनाओं का क्या? उसकी अपनी खुशियों का क्या? आज इसी विषय में कुछ पल सोचने की जरूरत है।

हमारे समाज में पुरुष को परिवार का भरण-पोषण करने वाला, रक्षक और हर समस्या का समाधान करने वाला व्यक्ति माना जाता है। लेकिन इस भूमिका को निभाते-निभाते वह अक्सर अपनी जरूरतों, भावनाओं और स्वास्थ्य को पीछे छोड़ देता है। वह दूसरों की चिंता करता है,  सबकी समस्याएँ सुलझाता है, लेकिन अपनी परेशानी किसी से कहने में हिचकिचाता है।

भूमिका का जाल - एक पुरुष से अपेक्षा की जाती है कि वह परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी करे, संकट में सबके साथ खड़ा रहे और हर परिस्थिति में मजबूत बना रहे। इसी जाल में उलझ कर धीरे-धीरे वह अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं, भावनाओं और जरूरतों को दबाना सीख जाता है। समाज की एक पुरानी धारणा भी है— “एक असली मर्द कभी शिकायत नहीं करता।”

यही सोच उसे अपनी परेशानियाँ छिपाने और चुपचाप तनाव सहने के लिए मजबूर कर सकती है। वह भूल जाता है कि वह केवल पति, पिता, बेटा या कमाने वाला व्यक्ति ही नहीं, बल्कि भावनाओं और सीमाओं वाला एक इंसान भी है।

अपनी बात किससे कहें -- पुरुष अक्सर बिना रुके काम करता रहता है। बाहर से कहता है, “मैं ठीक हूँ”, जबकि भीतर ही भीतर वह थकान, चिंता और निराशा से जूझ रहा हो सकता है।

कुछ लोग तनाव से राहत पाने के लिए शराब, धूम्रपान, अत्यधिक भोजन या अस्वास्थ्यकर खान-पान का सहारा लेने लगते हैं। लेकिन ये आदतें राहत देने के बजाय लंबे समय में स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा सकती हैं। असंतुलित आहार, शारीरिक निष्क्रियता और नशीले पदार्थों का सेवन हृदय रोग, मधुमेह तथा दूसरी गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकते हैं।

तनाव से निपटने का बेहतर तरीका है—अपनी बात किसी विश्वसनीय व्यक्ति से साझा करना, नियमित व्यायाम करना, संतुलित भोजन लेना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना।

निरंतर संघर्ष - बिजली-पानी के बिल, मकान का किराया या किस्त, बच्चों की पढ़ाई, परिवार की अपेक्षाएँ, नौकरी का दबाव और कर्ज़—इन सबके बीच पुरुष कई बार लगातार संघर्ष की स्थिति में रहता है।

जब वह तनाव में होता है, तो उससे अक्सर यही पूछा जाता है, “समस्या हल हुई या नहीं?” लेकिन कितने लोग रुककर यह पूछते हैं, “तुम कैसे हो? क्या तुम बहुत थक गए हो? क्या तुम्हें किसी मदद की जरूरत है?”

किसी समस्या का समाधान पूछना जरूरी है, लेकिन समस्या से जूझ रहे व्यक्ति की मनःस्थिति समझना भी उतना ही जरूरी है।

पुरुषों की भावनात्मक जरूरतों को समझना, उनकी बात ध्यान से सुनना और उन्हें बिना किसी आलोचना के अपनी परेशानी बताने का अवसर देना परिवार तथा समाज की साझा जिम्मेदारी है।

शरीर की सीमायें- कुछ पुरुष अपनी क्षमता से अधिक काम करते रहते हैं। वे थकान, नींद की कमी और लगातार बने रहने वाले तनाव को सामान्य मानकर अनदेखा कर देते हैं। समय के साथ यह आदत स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, स्ट्रोक और गुर्दों से जुड़ी समस्याओं के अनेक कारण होते हैं। लंबे समय तक तनाव, अस्वास्थ्यकर जीवनशैली और समय पर जाँच न कराना भी जोखिम बढ़ाने वाले कारक हो सकते हैं।

जब किसी व्यक्ति की इन स्थितियों में मृत्यु होती है, तो हम अक्सर कह देते हैं, “भगवान की यही इच्छा थी।” लेकिन साथ ही हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या समय पर स्वास्थ्य-जाँच, बेहतर जीवनशैली, पर्याप्त आराम और उचित चिकित्सा से कुछ जोखिम कम किए जा सकते थे। शरीर की चेतावनियों को अनदेखा करना बहादुरी नहीं है। समय पर डॉक्टर से सलाह लेना समझदारी है।

प्यार, सम्मान और सराहना ---- एक विचारणीय प्रश्न यह भी है कि क्या पुरुष को उसके व्यक्तित्व, संवेदनशीलता और मानवीय गुणों के लिए उतना सम्मान मिलता है, जितना उसकी कमाने की क्षमता और जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए?

आप मानें या न मानें पुरुषों को इसलिए प्यार नहीं किया जाता कि वे कौन हैं, बल्कि इसलिए प्यार किया जाता है कि वे क्या सुविधाएँ लोगों को मुहैया करा सकते हैं। उनका महत्त्व केवल उसकी आय या सुविधाएँ उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए। पुरुष को भी यह महसूस होना चाहिए कि परिवार में उसका अस्तित्व महत्त्वपूर्ण है।

एक सुखी परिवार वह है जहाँ सभी सदस्य एक-दूसरे की मेहनत को पहचानें, भावनाओं का सम्मान करें और कठिन समय में एक-दूसरे का सहारा बनें।

तनाव और भावनात्मक थकान -  ज्यादातर पुरुष अपनी पत्नी के साथ रहते हैं। कई पुरुष दिनभर काम करने के बाद घर लौटते हैं, तो जब काम से लौटता है तो उसे उम्मीद  होती है प्यार की, थकान दूर होने की जिसके न मिलने पर उसमें तनाव होना स्वाभाविक है । दूसरी ओर, यदि घर में लगातार विवाद, कटुता या संवाद की कमी हो, तो उनकी मानसिक थकान और बढ़ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि तनाव "गोलियों से भी ज़्यादा तेज़ी से जान ले सकता है।"

भारत में पुरुषों की आत्महत्या से जुड़ी स्थिति भी गंभीर चिंता का विषय है। इसके पीछे अनेक सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं। इसलिए जरूरत है कि पुरुषों को अपनी समस्याएँ साझा करने, भावनात्मक सहारा पाने और समय पर मदद लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

इसी तरह, महिलाओं को भी घर, परिवार, नौकरी और सामाजिक अपेक्षाओं के कारण भारी तनाव का सामना करना पड़ता है। इसलिए इस समस्या को पुरुषों और महिलाओं के बीच प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक-दूसरे की परिस्थितियों को समझने के अवसर के रूप में देखना चाहिए।

घर ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ व्यक्ति को शांति, सुरक्षा और अपनापन मिले। परिवार में खुला संवाद, परस्पर सम्मान और जिम्मेदारियों का उचित बँटवारा तनाव कम करने में मदद कर सकता है।

अपना ख्याल रखना --- बहुत से पुरुष अपनी छोटी-मोटी तकलीफों को उम्र या काम का सामान्य परिणाम मानकर टाल देते हैं। कई बार वे डॉक्टर के पास तभी जाते हैं, जब परेशानी गंभीर हो जाती है। यह आदत बदलने की जरूरत है।

नियमित स्वास्थ्य-जाँच, रक्तचाप और रक्त-शर्करा की निगरानी, पर्याप्त नींद, संतुलित भोजन और नियमित शारीरिक गतिविधि अच्छे स्वास्थ्य के महत्त्वपूर्ण आधार हैं। मानसिक स्वास्थ्य को भी शारीरिक स्वास्थ्य जितनी ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यह मत सोचिए कि डॉक्टर के पास जाना कमजोरी का संकेत है। यदि लगातार उदासी, चिंता, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा या निराशा बनी रहे, तो किसी योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। अपनी परेशानी स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि स्वयं के प्रति जिम्मेदारी का संकेत है।

सीखना --- पुरुषों को बचपन से मजबूत बनना, कमाना और जिम्मेदारियाँ उठाना सिखाया जाता है। लेकिन उन्हें अपनी थकान पहचानना, भावनाओं को व्यक्त करना और जरूरत पड़ने पर मदद माँगना उतनी सहजता से नहीं सिखाया जाता। उन्हें दूसरों का रक्षक बनाया जाता है, लेकिन यह कम सिखाया जाता है कि अपनी रक्षा और देखभाल कैसे करें।

अब समय है कि इस सोच में बदलाव आए। पुरुषों को यह समझना चाहिए कि हर जिम्मेदारी अकेले निभाना जरूरी नहीं है। परिवार को भी यह समझना चाहिए कि पुरुष की चुप्पी का अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि वह ठीक है।

एक स्वस्थ समाज वही है, जहाँ पुरुष और महिलाएँ दोनों अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य, भावनाओं और सम्मान की रक्षा कर सकें।

संकल्प - आइए, पुरुष अपने जीवन में कुछ छोटे लेकिन महत्त्वपूर्ण बदलाव लाने का संकल्प लें और अपना खान-पान सुधारें, शारीरिक रूप से सक्रिय रहें,  अपनी जरूरत के अनुसार 7–9 घंटे नींद लें, ध्यान, योग, माइंडफुलनेस और अपने प्रिय कार्यों के लिए समय निकालें। नियमित स्वास्थ्य-जाँच कराएँ, परिवार, मित्रों या किसी विश्वसनीय व्यक्ति से मन की बात कहने में संकोच न करें।  काम और जिम्मेदारियों के साथ विश्राम, मनोरंजन तथा व्यक्तिगत खुशियों के लिए भी समय निकालें।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात—अपने आपको अजेय समझने का दिखावा बंद करें। शरीर कोई ऐसी मशीन नहीं है, जो बिना रुके काम करती रहे। उम्र बढ़ने के साथ अपनी क्षमताओं और सीमाओं को समझना तथा उनके अनुरूप जीवनशैली अपनाना जरूरी है इसलिए दूसरों के लिए जीने के साथ-साथ अपने लिए भी जिएँ। ऐसा जीवन बनाइए जिसमें जिम्मेदारियों के साथ संतोष हो, परिश्रम के साथ विश्राम हो और रिश्तों के साथ मन की शांति भी हो। पुरुषों को आज चाहिये कि वे अपना ख्याल खुद रखें। कोई दूसरा उनके लिए ऐसा नहीं करेगा ।