क्या आपने कभी सोचा है कि जब इंसान अपनी ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर खड़ा होता है, तो उसे सबसे ज़्यादा पछतावा किस बात का होता है? गँवाए हुए पैसों का... या छूटे हुए अपनों का?
शहर के सबसे बड़े अस्पताल के कमरे में एक अजीब सी खामोशी पसरी थी। 60 साल की मीना जी खिड़की के बाहर उड़ते हुए परिंदों को एकटक देख रही थीं। डॉक्टर ने अभी-अभी उनके बेटे और बेटी को बाहर बुलाकर साफ शब्दों में कह दिया था कि मीना जी के पास अब बहुत कम वक़्त बचा है।
मीना जी अपने ज़माने की एक बहुत ही सफल और व्यस्त महिला रही थीं। उन्होंने दिन-रात मेहनत करके एक बड़ा बिज़नेस खड़ा किया, आलीशान कोठी बनाई और अपने बच्चों को हर वो सुख-सुविधा दी जो पैसा खरीद सकता था। लेकिन आज इस चमचमाते प्राइवेट वार्ड के मखमली गद्दे पर लेटे हुए, वे खुद को दुनिया की सबसे अकेली औरत महसूस कर रही थीं।
तभी कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला। उनकी सात साल की पोती अनन्या दबे पाँव अंदर आई और मीना जी के बेजान से हाथ को अपने छोटे-छोटे हाथों में थाम लिया।
"दादी मां... आप जल्दी ठीक हो जाओ ना। मुझे वो मिट्टी के खिलौने फिर से बनाने हैं जो आपने एक बार बनाए थे," अनन्या ने मासूमियत से कहा।
अनन्या की वो भोली सी बात मीना जी के दिल में तीर की तरह चुभी। उनकी आँखों से आँसुओं की लड़ी बह निकली। उस एक पल में मीना जी की पूरी ज़िंदगी किसी फिल्म की तरह उनकी आँखों के सामने घूमने लगी।
उन्हें याद आया कि कैसे उन्होंने अपने बच्चों के बचपन के सुंदर और हसीन पल सिर्फ काम के चक्कर में गँवा दिए थे। जब बेटा अपनी पहली पेंटिंग दिखाकर तारीफ चाहता था, तब वे किसी क्लाइंट की कॉल पर व्यस्त थीं। जब बेटी अपनी छोटी-छोटी बातें साझा करना चाहती थी, तब वे 'टाइम नहीं है' कहकर उसे टाल दिया करती थीं। उन्होंने सोचा था कि ढेर सारा पैसा कमाकर वे अपने परिवार को खुशियाँ दे रही हैं, लेकिन असल में वे उनसे उनका वक़्त छीन रही थीं।
आज जब उनके पास सब कुछ था—दौलत, शोहरत, और आराम—तब उनके पास सिर्फ एक चीज़ नहीं थी, जिसे दुनिया का कोई भी अमीर इंसान पैसों से नहीं खरीद सकता... और वो था "बीता हुआ वक़्त"।
उन्होंने अनन्या को सीने से लगा लिया। आज उन्हें ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच समझ आ चुका था। ज़िंदगी का असली सच यह नहीं है कि आपने अपनी बैंक पासबुक में कितने अंक जोड़े या कितनी ज़मीन अपने नाम की। ज़िंदगी का सच्चा हिसाब तो इस बात से होता है कि आपने कितने दिलों में अपनी जगह बनाई, कितनी बार अपनों के चेहरे पर सच्ची मुस्कान लाई और कितनी खूबसूरत यादें पीछे छोड़ीं।
मकान ईंट और पत्थरों से बनता है, लेकिन उसे 'घर' सिर्फ अपनों का प्यार, हँसी और साथ बनाते हैं। जब हम इस दुनिया से जाएँगे, तो हमारी गाड़ियाँ और बँगले यहीं धरे रह जाएँगे। साथ जाएँगी तो सिर्फ वो भावनाएँ जो हमने दूसरों के दिलों में बोई हैं।
दोस्तों, ज़िंदगी बहुत छोटी और अनमोल है। इसे सिर्फ चीज़ें बटोरने और भागदौड़ करने में मत गँवाइए। आज ही अपने काम से थोड़ा वक़्त निकालिए, अपने माता-पिता के पास बैठिए, अपने बच्चों को सीने से लगाइए और अपनों से दिल खोलकर बातें कीजिए। क्योंकि ज़िंदगी जीने का नाम है, सिर्फ पन्नों की तरह गुज़ारने का नहीं।
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