सरहद से इंतजार तक Nisha Choudhary द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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सरहद से इंतजार तक

पहाड़ की बर्फीली चोटियों पर जब तेज़ ठंडी हवाएँ चलतीं, तो ऐसा लगता मानो सुइयाँ जिस्म में चुभ रही हों। चारों तरफ सफ़ेद बर्फ की चादर बिछी थी और माइनस तापमान में साँस लेना भी एक चुनौती था। ऐसी कड़कड़ाती ठंड में भी विक्रम अपनी राइफल थामे, सरहद की चौकी पर पूरी सतर्कता से डटा हुआ था। जब भी ठंड बर्दाश्त से बाहर होने लगती या अपनों की याद दिल को घेरती, विक्रम अपनी फौजी वर्दी की ऊपरी जेब पर धीरे से हाथ फेरता। वहाँ रखी थी प्रिया की एक छोटी सी तस्वीर। उस तस्वीर में मुस्कुराता प्रिया का चेहरा देखते ही विक्रम के रगों में दौड़ता खून गर्म हो उठता और उसकी आँखें फिर से क्षितिज पर पहरा देने लगतीं।
दूसरी तरफ, सरहद से सैकड़ों मील दूर एक छोटे से गाँव में प्रिया अपने घर के आँगन में बैठी उसी शाम ढलने का इंतज़ार कर रही थी। शादी के महज़ दो महीने बाद ही विक्रम की ड्यूटी देश की सबसे कठिन सीमा पर लगा दी गई थी। जाते वक्त जब विक्रम ने अपना सामान बाँधा था, तब प्रिया की आँखों में आँसुओं का सैलाब था। विक्रम ने उसकी हथेलियों को अपने हाथों में लेकर कहा था, "प्रिया, देश की रक्षा मेरा फर्ज़ है। इंतज़ार थोड़ा लंबा और मुश्किल हो सकता है, लेकिन मेरा वादा है, मैं लौटकर ज़रूर आऊँगा।" प्रिया ने अपनी सिसकियों को रोकते हुए मुस्कुराकर कहा था, "आप बेफिक्र होकर वतन की हिफ़ाज़त कीजिए, आपकी इस प्रिया को अपने फौजी पर नाज़ है। मैं यहाँ आपके लौटने के हर एक पल की हिफ़ाज़त करूँगी।"
शुरुआत के दिन तो जैसे-तैसे बीत गए, लेकिन धीरे-धीरे दिन हफ़्तों में और हफ़्ते महीनों में बदलने लगे। सरहद के उस दुर्गम इलाके में नेटवर्क नाममात्र का था। कभी-कभार कई दिनों के बाद कुछ सेकंडों के लिए फोन की घंटी बजती। प्रिया झट से फोन उठाती, "विक्रम... आप कैसे हो?" बस इतना ही बोल पाती कि उधर से आवाज़ कट जाती। पर वही चंद सेकंड प्रिया के चेहरे पर हफ़्तों की मुस्कान लाने के लिए काफी होते थे।
फिर अचानक एक दिन सरहद पर हालात बिगड़ गए। टीवी पर खबरें चलने लगीं कि विक्रम की बटालियन वाले क्षेत्र में दुश्मन की तरफ से भारी गोलाबारी और घुसपैठ की कोशिश हुई है। यह खबर सुनते ही प्रिया के हाथ से पानी का गिलास छूटकर गिर पड़ा। उसका दिल किसी अनहोनी की आशंका से ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने तुरंत घर के मंदिर में दीया जलाया और हाथ जोड़कर ईश्वर से विक्रम की सलामती की भीख मांगने लगी।
एक दिन बीता, दो दिन बीते... देखते-देखते पूरा एक हफ़्ता गुज़र गया। सरहद से न कोई फोन आया और न ही कोई खबर। गाँव के लोग सांत्वना देने घर आने लगे, लेकिन प्रिया का हौसला अटूट था। वह हर रोज़ शाम को नए कपड़े पहनती, माथे पर सिंदूर सजाती और दरवाज़े पर जाकर खड़ी हो जाती। उसे पूरा यकीन था कि उसका विक्रम अपना वादा कभी नहीं तोड़ेगा। लेकिन अंदर ही अंदर इंतज़ार का हर एक पल उसके लिए किसी बड़े पहाड़ जैसा भारी साबित हो रहा था।
दसवें दिन की ढलती शाम को गाँव की कच्ची सड़क पर एक फौजी गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी की आवाज़ सुनते ही प्रिया का दिल सीने से बाहर आने को होने लगा। गाँव के लोग भी सन्नाटे में आ गए। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और उसमें से बैसाखी के सहारे, कंधे पर पट्टी बाँधे विक्रम बाहर निकला।
दुश्मन से लोहा लेते हुए विक्रम गंभीर रूप से घायल हो गया था, लेकिन उसने हार नहीं मानी थी। अस्पताल से होश आते ही उसने सबसे पहले घर लौटने की ज़िद की थी।
प्रिया ने जब अपने सामने विक्रम को सही-सलामत खड़ा देखा, तो उसकी आँखों से अश्रुओं की धारा बह निकली। विक्रम ने मुस्कुराकर अपनी बैसाखी एक तरफ टिकाई और अपनी बाज़ुओं को फैला दिया। प्रिया दौड़कर उसके सीने से जा लगी। महीनों का दर्द, डर, बेबसी और वो लंबा इंतज़ार एक ही पल में आँसुओं के साथ बह गया। सरहद पर वतन का फर्ज़ पूरा हो चुका था, और यहाँ इंतज़ार की वो लंबी रात हमेशा के लिए ख़त्म हो गई थी।
👉 क्या विक्रम और प्रिया के इस निस्वार्थ प्रेम और बलिदान ने आपके दिल को छुआ?
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