"बेटा, जब तक यह साइकिल चल रही है, तब तक तेरा बाप खड़ा है।" पिता के इन शब्दों की असली कीमत मुझे उस दिन समझ आई, जब उस पुरानी साइकिल का पेडल हमेशा के लिए रुक गया और सिर से वो बरगद की ठंडी छाँव अचानक उठ गई...
गाँव के छोटे से मकान में आज एक गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। घर के कोने में जंग लगी वो पुरानी साइकिल चुपचाप खड़ी थी, जिससे कभी मेरे सपनों की उड़ान शुरू हुई थी।
बचपन के वो दिन याद आते हैं तो आँखें नम हो जाती हैं। जब भी मैं स्कूल के लिए लेट होता, तो पापा अपनी वही पुरानी साइकिल लेकर तैयार खड़े मिलते। न उन्हें कड़कड़ाती धूप की परवाह होती थी, न ही ढलान पर हांफती हुई साँसों की चिंता। वह मुझे साइकिल की डंडे पर बिठाकर बस एक ही बात कहते, "बेटा, तू बस अपनी मंज़िल की तरफ देख, पीछे से तुझे गिरने से बचाने के लिए तेरा बाप खड़ा है।"
मुझे याद है, जब मुझे शहर के बड़े कॉलेज में दाखिला मिला था, तो फीस भरने के लिए पैसे कम पड़ गए थे। पापा कई रातों तक चैन की नींद नहीं सोए थे। उन्होंने बिना मुझे बताए अपनी आख़िरी जमापूँजी भी मेरे हाथ में रख दी। मैंने जब उनके फटे हुए जूते और हाथों के छाले देखे, तो मेरी आँखें भर आई थीं। पर उन्होंने अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ कहा, "जूते फटे हैं तो क्या हुआ बेटा, तेरे पंख तो सलामत हैं ना! तू बस उड़ना सीख।"
वक्त बदलता गया। मेरी पढ़ाई पूरी हुई और शहर की एक नामी कंपनी में मुझे अच्छी नौकरी मिल गई। अपनी पहली सैलरी से मैंने पापा के लिए एक ब्रांडेड घड़ी और महँगे जूते खरीदे। पर जब मैं गाँव पहुँचा, तो पापा ने उन चीज़ों को अलमारी में संभालकर रख दिया और वही अपनी पुरानी साइकिल लेकर मुझे बस स्टैंड छोड़ने आए।
मैंने चिढ़कर कहा, "पापा, अब तो मैं कमाने लगा हूँ। इस खटारा साइकिल को छोड़ क्यों नहीं देते? लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे!"
पापा मुस्कुराए और बड़े प्यार से बोले, "यह खटारा नहीं है बेटा। इसी के पेडल मार-मारकर मैंने तुझे इस काबिल बनाया है। यह मुझे याद दिलाती है कि मैं एक बाप हूँ और जब तक ज़िंदगी है, मुझे थकना नहीं है।"
उस दिन मुझे पापा की बात समझ नहीं आई। पर वक्त की लाठी जब पड़ती है, तो इंसान को सब समझ आ जाता है।
पिछले महीने, अचानक एक रात गाँव से फोन आया कि पापा की तबीयत बिगड़ गई है। जब तक मैं शहर की गाड़ियों को लांघकर गाँव पहुँचा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पापा की साँसें थम चुकी थीं। घर के आँगन में कदम रखते ही मेरी नज़र उसी पुरानी साइकिल पर पड़ी। वह आज भी वहीं खड़ी थी, पर उस पर बैठने वाला और मुझे सँभालने वाला इंसान हमेशा के लिए चला गया था।
आज जब शहर की भागदौड़ और तनाव में कोई मुसीबत आती है, तो दिल घबरा जाता है। पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो अब ढाल बनकर खड़ा रहने वाला कोई नहीं दिखता। पिता का साया क्या होता है, यह उनके चले जाने के बाद ही समझ आता है। वह एक ऐसे बरगद के पेड़ होते हैं, जो खुद ज़िंदगी की हर धूप और बारिश सहकर बच्चों को ठंडी छाँव देते हैं। आज पापा तो नहीं हैं, पर उनकी वो पुरानी साइकिल मुझे हर दिन मुश्किलों से लड़ना सिखाती है।
क्या आपने कभी अपने पिता के इस निस्वार्थ संघर्ष को महसूस किया है?
पिता के असीम प्यार और त्याग को बयां करती यह कहानी अगर आपके दिल को छू गई हो, तो कमेंट (Comment) में अपने पापा के लिए एक प्यारा सा संदेश ज़रूर लिखें।
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