अध्याय-२९
अमृता तीनों बेटियों के चेहरों की खुशी देखकर अतीत में खो गई थी। जब उसकी अपनी सगाई हुई थी, तब वह भी इतनी ही खुश थी। एक बेटी जब ससुराल विदा की जाती है, तो वह अपना संपूर्ण अस्तित्व अपने मायके में ही छोड़कर आती है। ससुराल में अपने जीवनसाथी और उसके परिवार के लिए स्नेह के अलावा वह भला किस महत्वाकांक्षा से आती है? परंतु ससुराल वालों की नज़र में वह स्नेह की पक्षी ही नहीं, बल्कि पूरे घर की केवल ज़िम्मेदारियों का ठिकाना बनकर रह जाती है। कभी किसी ससुराल वाले को ऐसा क्यों नहीं महसूस होता कि उसके आने से पहले भी तो इतने सालों से घर का संचालन हो ही रहा था न? तो फिर सारी ज़िम्मेदारियाँ या उम्मीदें उसी के सिर क्यों? फिर भी हर नववधू इस दौर से गुज़रती है और खुद को साबित भी करती है! समय के साथ सब कुछ बदल जाता है, लेकिन बस यह मानसिकता नहीं बदलती कि जो अच्छा है वह ससुराल वालों का काम है और हर भूल नववधू की। यदि एक नवविवाहिता अपनी पूरी ज़िंदगी जीवनसाथी के परिवार को समर्पित कर देती है, तो क्या बदले में वह परिवार थोड़ा-सा प्रेम या सम्मान, जिसकी वह हक़दार है, नहीं दे सकता? काश! अगर ऐसा होता तो मेरी ज़िंदगी भी शुरुआत में उतनी पीड़ादायक न रहती जितनी रही! खैर, जो भी हो, लेकिन हनी के जीवन में मैं अपने जैसे कड़वे अनुभव तो बिल्कुल नहीं होने दूंगी...'
हनी स्टेज से नीचे आई और उसने अमृता का हाथ पकड़कर फोटो खिंचवाने के लिए उसे खड़ा किया, तब अमृता हकीकत की दुनिया में लौटी।
हर्ष और उमंग के साथ खड़ी होकर उसने पूरे परिवार का फोटो खिंचवाया। फोटो खिंचवाते समय वह भावुक हो गई थी। उसने माइक हाथ में लिया और बोली, "आज मैं अपनी बेटियों के हर उस परिवार का, जिन्होंने हमारे आँगन के फूल को स्वीकार किया है, बहुत-बहुत आभार मानती हूँ और ऐसी ही आशा रखती हूँ कि आप इसे प्रेम रूपी जल से सींचते रहेंगे। हमारा यह फूल अब आपके आँगन की शोभा बनेगा। इस परिवार ने इन्हें सब कुछ दिया है, यह तो केवल जीवनसाथी का प्रेम पाने आई है।" ऐसा कहते हुए अमृता तीनों दामादों की तरफ देखती है और इशारे से ही उम्मीद की एक मूक माँग पेश करती है। तीनों दामाद भी उसकी बात समझ गए हों, इस तरह हल्का-सा सिर झुकाकर मूक सहमति देते हैं।
अमृता अब जो बोलेगी, वह हनी की ज़िंदगी में एक हल्का-सा झटका ले आएगा।
अमृता बोली, "भले ही मैंने हनी को अपनी कोख से जन्म न दिया हो, लेकिन मैंने उसे कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि उसकी परवरिश में कोई कमी रही। रॉकी बेटा, तुम हमेशा उसके चेहरे पर इसी तरह मुस्कान बिखरी रहने देना।" अभी अमृता बोल ही रही थी कि रॉकी की दादी स्टेज पर आ गईं। उन्होंने हाथ में लेकर माइक को बंद कर दिया और अमृता से एक तीखा सवाल किया, "अब यह सब कहने का क्या मतलब है? इस सगाई तक आपने यह बात छिपाकर रखी और अब सबके सामने खुलेआम बोल रही हैं, यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। हनी हमें मंज़ूर नहीं है। इस सगाई को मैं मानती ही नहीं।"
अमृता तो कुछ भी समझने में असमर्थ थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि दादी ऐसा क्यों बोल रही हैं। वह बहुत दुखी होकर बोलने ही वाली थी कि बात को सँभालते हुए रॉकी ने कहा, "दादी, आप ऐसा क्यों कह रही हैं? सच में क्या हुआ था, यह मैं आपको घर चलकर बताऊंगा। प्लीज दादी, इसमें अगर किसी का भी दोष है तो वह सिर्फ और सिर्फ मेरा है। प्लीज मान जाइए न!" दादी रॉकी की प्रेम भरी बातें सुनकर थोड़ी शांत हुईं, फिर उन्होंने आसपास के लोगों को देखा तो उन्हें अहसास हुआ कि मुझसे इस तरह गलत बोला गया। उन्हें बहुत अफ़सोस भी हुआ। इसलिए तुरंत अपनी भूल सुधारते हुए बोलीं, "रॉकी! बेटा! तू खुश तो मैं भी खुश।" ऐसा कहकर उन्होंने रॉकी का माथा चूमा और हनी का भी, और दोनों को अपने गले से लगा लिया। आज हनी और रॉकी दोनों अनजाने में ही दादी की वजह से एक-दूसरे के करीब आ गए। दोनों इस पहले अहसास को सभी की मौजूदगी से बेखबर होकर महसूस कर रहे थे। सब फिर से खुश हो गए कि चलो, अब सब शांति से निपट गया।
भोजन के बाद कुछ देर तक म्यूज़िक पर सभी जोड़े डांस कर रहे थे। ये नई जोड़ियाँ भी मानो एक होकर डांस कर रही थीं। धीमा संगीत, उसमें हमसफ़र का हाथों में हाथ और यह पहला अहसास! वातावरण में मानो प्रेम की हल्की महक बिखर रही थी। सभी को इस तरह एक-दूसरे में खोया देखकर रमेशभाई फिर से शोभा को याद करने लगे और बोले, "शोभा! तू जैसी भी थी, मैंने तुझे दिल से प्यार किया था। मिस यू शोभा।" इतना उन्होंने मन ही मन कहा, पर आँखों के आँसुओं के ज़रिए दर्द बाहर छलक आया था। आज खुशी के इस मौके पर कोई उन्हें देख न ले, यह सोचकर वे खुद ही खुद को सँभाल रहे थे।
परिवार के खुशी के दिन बहुत तेज़ी से बीत रहे थे। तीनों बेटियों के विवाह की सारी खरीदारी हो चुकी थी। सोने की खरीदारी के लिए डिज़ाइन पसंद करने के वास्ते आज परिवार फिर से रमेशभाई के घर इकट्ठा हुआ था। एक से बढ़कर एक सेट, पेंडेंट-इयररिंग्स, कंगन, कमरबंद, तथा दामादों के लिए चेन, अंगूठी और घड़ी—हर किसी के लिए सोने की ऐसी शानदार डिज़ाइन्स पसंद की गईं जो एक ही नज़र में भा जाएँ। इस पूरी चर्चा के बीच भार्गवी भावुक हो गई और बोली, "आप लोगों के बिना यह घर सूना हो जाएगा। इस घर में एकदम सन्नाटा छा जाएगा। आपके बिना मन ही नहीं लगेगा।" भार्गवी के शब्द बाकी सभी के आँसू बनकर ढलकने लगे थे। राजेश ने तुरंत माहौल को सामान्य करने के लिए कहा, "बेटियाँ शहर में ही तो हैं, जब मन करे उनसे मिल आना। सही है न पापा? चलिए, अब सबका मूड ठीक करने के लिए अमृता सबके लिए काजू-अंजीर शेक बनाएगी।"
अमृता हँसते हुए बोली, "जी नहीं! मैं तो मैंगो शेक ही बनाऊँगी।" और यह सुनकर सब हँस पड़े।