DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 3 Scene 3 Azoorey द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 3 Scene 3

ऐवान-ए-सद्र में अकेले अपने ख़्यालों के साथ अम्मा साहब ऐवान-ए-सद्र के झरोखे से इक़ामतगाह की तरफ़ की चहल पहल देख रहीं थी। उनके मन की उलझन उनके चेहरे से ज़ाहिर हो रही थी जिसकी वजह से वो ग़मग़ीन भी थीं।

"मैं अंदर आ जाऊं?" शेख़ बाबा की गूंजती आवाज़ ने अम्मा साहब का ध्यान तोड़ दिया

"आइए बाबा।" अम्मा साहब ने ख़ुद को समेटा 

"आज नाजाने क्यों ठीक से नींद ही नहीं आई।" दीवान पर बैठते हुए बाबा ने बताया

"कल रात की हवा ने सभी को शायद बहुत बेचैन कर रखा था।"... अम्मा साहब ने सुस्त लहजे में कहा फिर बात बदल दिया "क्या मुंशीजी नही आए अभी तक?"

"मालूम नही मुझे, अभी तक मुझे नज़र तो नही आए।"  बाबा ने बताया। कुछ पल शेख़ बाबा ने अम्मा साहब के चेहरे की तरफ़ नज़र की, फ़िर आख़िर कार उस सवाल को उठा ही लिया जिसने रात से इन्हें परेशान कर रखा था
"बहु बेगम आप कुछ परेशान मालूम हो। रहीं हैं।....मैं रात से देख रहा हूं किसी उलझन में लग रहीं हैं।" 

"बहुत सी बातें है जो उलझ गईं हैं। बहुत कुछ है पर मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं।" उन्होंने उसी उलझन में कहा

"हम्म्म, मतलब किसी उलझन में हैं। बताइए क्या बात है?" बाबा ने पूछा

"अम्हेल मुझे मन्नत दरगाह में मिली थी।" 

"हां बताया था आपने, और बिलाल ने इसीलिए आपको ख़त भी लिखा था शायद।" 

"उसने अपनी हवेली से बंसीपूर तक का सफ़र अपनी तालीम के लिए तय किया था... वो सफ़र जो कभी मैने आपकी सरपरस्ती में किया था।... और बेशक आप ही हैं बाबा जिसने मेरे अबाजान, बाबजान बाद उनकी जगह लिया। मीर के जाने के बाद आपने मुझे क़ाबिले एहतराम बनाया।"

"ऐसी क्या बात है बहु बेगम की आप इतनी परेशान हैं?" 

"पीर बाबा ने बताया कि वो उन्हें ग़ैर हालत में मिली और उसके अंदर कई घाव है जो ज़ाहीर नहीं होते।"

"ऐसा क्या है?" शेख़ बाबा भी अब कुछ उलझ से गए

"उन्होंने कहा वो अपने कस्बे में बक़ायदा रूपोष थी, इसलिए उन्हें लगा उसकी इस हालत की वजह शायद वही लोग थे। हालांकि ये सिर्फ़ उनका अंदाज़ा था, इसलिए वो उसे अपने साथ मन्नत दरगाह लाए।"

"क्या मतलब?"

"उन्हें शक है, क्योंकि उसने अबतक अपने कस्बे और अपने आप से जुड़ी कोई बात नही किया है किसी से, न ही लौट जाने की बात करती है, और उसके बारे में कोई कुछ ख़ास नहीं जानता,मगर बाबा..." अम्मा साहब ने एक सांस भरी "मैं बस इतना जानती हूं कि वो बे लोस हवेली का ख़ून है, उसकी इज्ज़त है।"

"क्या....! अम्हेल बेलोस हवेली की बेटी है?" शेख़ बाबा इस बात को सुनकर बिल्कुल हक्का बक्का हो गए, इतना ज़्यादा जैसे उन्हें किसी ने उनकी ख़ुद की बेटी की मरने की ख़बर दे दी हो 

"ये आप कैसे कह सकतीं हैं?"

"उसने ख़ुद बताया मुझे।" 

"अगर ये हक़ीक़त है तो फ़िर ये आपने क्या किया? अगर अनाबी को इस बात की भिनक भी हुई तो महल में तूफ़ान खड़ा हो सकता है। क्या आपको मालूम नही था उसका यहां आना न उसके लिए बेहतर है न आपके लिए, फिर ऐसा क्यों किया?" 

"ये सही है या ग़लत इसका फैसला मैं नहीं कर सकती। मुझे कल तक उसकी कोई ख़बर नहीं थी, मगर जब बिलाल ने मुझे उससे मिलवाया तब मालूम हुआ मुझे। उस वक़्त, उस एक पल में मेरे ज़हन ने मेरा साथ छोड़ दिया था और मुझे पूरी तरह से लालपुर में धकेल दिया। मुझे उससे लिए सारे वादे याद आ गए, वो जो मैने उससे आख़िरी दफ़ा किए थे, और अब मैं उसे नज़रअंदाज़ कैसे करती?" अम्मा साहब के ऊपर ऐसे जज़्बात तारी हुए जिसे वो चाहकर भी छुपा नहीं पाईं "और ख़ासकर तब जब वो इस दुनिया में नही है।" उन्होंने बताया

"क्या...!" ये उनके लिए एक और ज़बरदस्त झटका बना।उन्होंने अफसोस में सर पड़कर थोड़ी देर ठहर कर कुछ सोचा उसके बाद कहा "बात ऐसी है तो ठीक है, आप परेशान मत होइए, जो भी होगा बेहतर होगा मैं कोशिश करूंगा सब दुरुस्त रहे।"

"क्या ऐसा मुमकिन है के......।" 

"खट्ट खट्ट... बात पूरी होने से पहले दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई 

क्या मुझे अंदर आने की इजाज़त है?" मुंशीजी ने बाहर से पूछा

"आ जाइए मुंशीजी आपका ही इंतज़ार था।" अम्मा साहब ने अपना रूदादी लहजा बदलकर उन्हें अंदर बुला लिया

"माफ़ी चाहता हूं मैं आने में देर हो गई।"

"नही आप वक़्त पर आएं है।" शेख़ बाबा ने उन्हें तसल्ली दिलाया "अब आप तशरीफ़ फरमा हो जाइए कुछ ज़रूरी बातें करनी है" शेख़ बाबा ने ऐवान-ए-सद्र में खुफिया बैठक का आग़ाज़ कर दिया। 

"हां, मुझे याद है।" मुंशीजी भी उसमें शामिल हो गए "उस बारे में आपने कुछ सोचा है वज़ीर साहब?" 

"राएद के सिलसिले में हमलोग कभी और बात करेंगे। अभी अहम बात ये है कि जितना ज़्यादा हो सके हमें अम्हेल का ख़्याल रखना है महल के अंदर भी और बाहर भी.....आप समझ गए ना?" हालात के तहत शेख़ बाबा ने सबसे पहले इस बात को ही तर्जी दिया

"बाहर भी...।" उन्होंने कुछ सोचकर कहा "जी मैं बिल्कुल समझ रहा हूं....मैं सब समझ गया।" 

मुंशीजी ने भी अम्हेल को लेकर अपनी अलग ही दुनिया बना ली थी जिसकी वजह से बिना किसी तफ़्तीश वो मुस्कुराते हुए हर बात के लिए राज़ी हों गए। इनकी मुस्कुराहट में अजीब सा जवाब था जिससे शेख़ बाबा हैरत में पड़ गए की इतने सवाल करने वाले शक्स ने बिना किसी सवाल हामी कैसे भर दिया, इससे पहले की वो कुछ कहते कुसुम आ गई

"अम्मा साहब अम्हेल आपी आ गई।" उसने बाहर से आवाज़ लगाया

"अंदर आ जाओ।" हुक्म की तामीर करके कुसुम अम्हेल को लेकर कमरे में पहुंच गई। 

सभी लोगों की नज़र अम्हेल पर पहुंची, वो इस वक़्त कल रात वाली मैली कुचैली अम्हेल से बिल्कुल अलग अरास्ता थी। वो बहुत मासूम और प्यारी लग रही थी। महल से मिले हुए कपड़े और ज़ेवर में वो किसी शहज़ादी से कम नहीं लग रही थी।

"अम्हेल इधर आओ, इधर आकर बैठो।" अम्मा साहब ने उसे अपने क़रीब बुलाया, वो नज़रे झुकाए उनके पास जाकर बैठ गई। उसकी नजरें किसी भी नज़रों से मिलना नही चाह रही थीं। वो बस अपने आप को पिंजरे में क़ैद कर लेना चाहती थी। 

"अम्मा साहब मैथिली दी मंदिर गईं हुईं हैं, आज शनिवार हैना।" कुसुम ने अम्हेल के बैठने से पहले बताया

"हम्म्म।"

"महल में कैसा लग रहा है?" अम्मा साहब ने अम्हेल से पूछा

"यहां की हवा ताज़ी है।" उसने बनावटी मुस्कुराहट बना कर कहा

"ख़ुशी है मुझे तुम्हे यहां की हवा पसंद आई।"  अम्मा साहब ने कहा "मैं चाहती हूं कुछ ख़ास और ज़रूरी लोगों से तुम्हारी मुलाक़ात हो जाए।" 

अपनी तरफ़ से, अम्मा साहब उसके अंदर चल रहे तकल्लुफ को दूर करने की कोशिश करने लगी। एक ख़लिश जो उसकी आंखो में साफ़ दिखाई दे रही, जिसे उसके बढ़ते क़दम अयां कर रहे थे। जिसको छुपाने की वो पूरी कोशिश कर रही थी। 

"ये शेख़ बाबा है, मीरास महल के सबसे आला और अहम हस्ती जिन्होंने वज़ीर की मसनद संभाल रखा है, और ये मुंशीजी है इनका खानदान पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे महल का परिवार रहा है और ये उनमे छठी पीढ़ी है। ये लोग मेरे बहुत ख़ास है और बहुत भरोसेमंद भी।... तुम भी हमेशा इनपर यकीन कर सकती हो किसी भी मामले में।" उन्होंने अम्हेल को बेतकल्लुफी से समझाया
"क्योंकि मेरे पीछे हमेशा ये लोग ही खड़े रहे है इसलिए ये तुम्हारी भी मदद करेंगे।" 

अम्हेल समझने लगी की शायद वो बाबाजान को जानती थी इसलिए ये सब कर रहीं, और यही सही भी था मगर उसकी समझ से बहुत अलग। उसने उनकी बात का जवाब बनावटी मुस्कान के साथ दिया

"जी।"

मुंशीजी भी ये सारा मामला बहुत ग़ौर से देख रहे थे। फ़िर अम्हेल की तरफ़ से अम्मा साहब ने अपना ध्यान मुंशीजी पर कर लिया

"मुंशीजी, मैंने आपसे जल्दी आने का मुतालेबा किया ताकि आप अम्हेल को मीरास महल से बख़ूबी वाक़िफ करवां दें।"

मुंशीजी के कुछ भी बोलने से पहले वो दुबारा अम्हेल से मुख़ातिब हो गई। 

"मैं चाहती हूं कि अबसे तुम अपना ध्यान खुदपर लगाओ। मैने बाबा से बात कर लिया है अबसे तुम्हे जितनी भी तालीम हासिल करना चाहती हो, तुम कर सकती हो और उसमें बाबा तुम्हारी मदद करेंगे।" 

इस वक़्त यहां क्या हो रहा था न ये अम्हेल के समझ में था न ही मुंशीजी के समझ में, लेकिन दोनों ही कुछ न कुछ समझने की कोशिश कर रहे थे हालांकि उन्हें समझ आए या न आए, अम्मा साहब की बात मानना तो उनपर लाज़िम था।

अम्मा साहब ने शेख़ बाबा से पूछा "बाबा आप इसकी ज़िम्मेदारी ले रहे हैना?" उनके पूछने में हुक्म भी था और सवाल भी 

"आपकी मर्ज़ी है तो मैं पीछे कैसे हट सकता हूं बहु बेगम।" 

"मुंशीजी अब आप इसके साथ जाइए और अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कीजिए सदाए जरस के गुल से पहले।" अम्मा साहब ने हुक्म जारी किया

"बेगम साहब......." मुंशीजी ने कुछ कहना चाहा

"कुछ मत कहिए पेशकार साहब ये काम आपको इसलिए दिया गया है क्योंकि आप पर भरोसा है मुझे।" शेख़ बाबा ने उनकी बात सुने बिना उन्हें टोक दिया

"ठीक है तब तो मुझे जाना ही पड़ेगा। चलो बेटी महल की सैर करते है।" अपने मसखरे अंदाज में अपनी धोती थामे वो अम्हेल के साथ बाहर जाने लगे मगर शेख़ बाबा ने उन्हें रोक लिया

"ये महल है जिसे अंदर और बाहर का कुछ मालूम नही होता और जब उसमें नए सदस्य शामिल हो जाए तो वो लोगो के लिए कई सवालों का बाइस बन जाता है। उन्हें जुस्तुजू होगी मगर याद रहे उन्हें इसके बारे में सिर्फ उतनी ही बातें बताना है जितनी सबको मालूम है, यही बेहतरीन रास्ता है।" 

मुंशीजी शेख बाबा का इशारा समझ गए। अम्हेल उसी बात से घबराने लगी जिसका उसे डर था हालांकि ये बात सबसे ज़्यादा उसकी बेहतरी के लिए उठाई गई मगर वो जानती थी हवेली की तरह ही महलों की जिंदगीयां भी आसान नहीं होती मगर जो उसके बस में नहीं वो उसे कैसे रोक सकेगी। 

मीरास महल में नए मेहमान के साथ कई सारी उलझनों और परेशानियों कि भी आमद हो गई है। मौसमों ने भी अपना रुख़ बदल लिया। रात के तूफ़ान के बाद जहां बादल सुबह सुबह थमने लगा था वो दुबारा से घिरने लगा। नहीं मालूम आने वाला तूफ़ान कितना कम या बलंद होगा मगर शायद चलने वाली हवाएं पेड़ो पर लगे पत्तो को नोंच कर अपने साथ बहा ले जाना चाहती हैं, प्यार से संजोए हुए बग़ीचे में खिले फूलो को भी मुरझा देना चाहती हैं। 

अम्मा साहब के चेहरे पर इन सभी बातों का डर साफ़ नज़र आ रहा था, वो आने वाले वक़्त से आगाह हो रही थी। महल में गूंज रही चहल पहल उन्हें सुनाई नही दे रही थी। जिस महल के वो सारे मसले वो ख़ुद हल करती थीं आज उन्हीं के दरमियान वो ख़ुद को फंसा हुआ महसूस करने लगी। ऐसे हालात में शेख़ बाबा का दिया हुआ दिलासा और हिम्मत ही उनका हौसला बना। उन्हें इस बात का यक़ीन था कि मिलकर इन सारे मसलों का हल निकाल ही लेंगे।