राहें - 28 shiromani mathur द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

राहें - 28

गवाही
मैं सुबह से ही व्यस्त थी । घर के सारे काम मुझे ही निपटाने थे। क्योंकि पुत्रवधु कुछ दिनों से
मायके गई हुई थी। ऊपर से पति का बार - बार कोर्ट में गवाहो देने जाने का आग्रह , अच्छा नहीं
लग रहा था परन्तु कोर्ट का आदेश है तो मानना ही है , सोचकर मै जल्दी जल्दी काम में लग
गई। रही -सही कसर श्रवण ने पूरी कर दी थी। उसे भी आज ही छुट्टी मनाना था। इस पकी आयु
में काम भी तो जल्दी-जल्दी नहीं हो पाता है। आखिरकार काम निपटाया और मैं तैयार होकर कोर्ट
में गवाही देने चल दी। कोर्ट के माहौल वहाँ के पेशेवर वकीलो की जिरह , पेशेवर अपराधियों,
पेशेवर गवाहों व पुलिस की आवाजाही से अनअभ्यस्त मैं जब गवाही देने जा रही थी तो मेरे वकील ने
मुझे बताया भी नहीं कि अपराधी पक्ष का वकील मुझसे किस तरह के प्रश्न पूछ सकता है। सहज रीति
से गवाही के लिये जाते समय मैं सोच रही थी , कि जो कुछ मालूम है मैं बता दूंगी , जो नही मालूम
है , मैं कह दूंगी कि 'मुझे नही मालूम'।
थोडी देर इधर उधर घूमने के बाद मैंने देखा जज साहब अपने कुस्सी पर बैठ गये हैं। उनके
बैठने के थोडो देर बाद ही मेरे नाम की पुकार हुई और मैं गवाही देने जज के सामने पहूँची। मेरे
अभिवादन का जज साहब ने कोई उत्तर नही दिया। लगा वे किसी भी अभिवादन का उत्तर नही दे
रहे थे , शायद अपनी निष्पक्षता प्रतिपादित करने का उनका अपना तरीका हो। अपराधी पक्ष के वकील
ने मुझसे तरह -तरह के प्रश्नों की झड़ी लगा दी। बहुत से प्रश्नों के उत्तर मुझे मालूम नही थे तो
देती भी कैसे, सो कह दिया 'मालूम नही' कहने पर वकील झल्ला कर बोले " आपको मालूम क्या है
मैडम "? उनके कहने से लगा जैसे मेरी सच्चाई पर उन्हे विश्वास नही है , जैसे मैं बन रही हूँ मैं
उन्हे अपनी सच्चाई का विश्वास नही करा पाई , या वे नही कर पाये। मुझे क्या मालूम था कि वे लोग
गड़े मुर्द उखाड़ेंगे , सो सब जानकारी लेकर जाती। वैसे भी मैं जरा दुनियादार कम हूं। अपने काम से
काम रखती हूँ कोई क्या करता है क्या नही ? मुझे कतई इसकी चिंता नही रहती। परिवार के सदस्यों
के व्यक्तिगत् मामलों में भी हस्तक्षेष नही करती। संख्याओं, आंकड़ो मे मैं शुरू से ही कमजोर हूं ।
जैसे गाड़ियों के नम्बर , टेलीफोन नम्बर तारीखें, मेरे पर्स या घर मे कितने पैसे है आदि मै निश्चत
रूप से कभी भी याद नही रख पाती हूँ। अब वकील वर्षों पुरानी घटनाओं की तारीख पर तारीख और
पैसे-पैसे का हिसाब मुझसे पूछ रहे थे , मै कैसे बता पाती ? मेरी इस असमर्थता को वह ऐसे समझ
रहा था जैसे मैं मक्कारी कर रही हूँ या अपराधी हूँ। उनका बराबर प्रयास मुझसे कुछ अनर्गल
कहलवा लेने का ही रहा था । उनका बार बार बेबात चिल्लाना बड़ा अजीब सा लग रहा था। पूरी
जिंदगी में शायद ही कभी किसी ने मुझसे इस तरह बातचीत की हो , मुझे याद नहीं। मेरी गंभीर
प्रकृति के कारण कभी किसी से झगड़े की नौबत ही नही आई। मैने उस वकील से कहा कि 'आप
चिल्लाते क्यों हैं ? ठीक से बात क्यों नही करते ? " वह और जोर से चिल्लाने लगा। मैने जज साहब
का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया , तो जज साहब भी निस्पृह 

भाव से मेरी बात सुनकर चुप रहे।

मेरे लिये यह पूरा माहौल असहनीय सा था। मैं खडे - खड़े थक गई थी , वह वकील मुझ पर
प्रश्न दागे जा रहा था। न चाहते हुए भी मैने कहा कि अब मैं थक गई हूँ , क्योंकि अधिक बोलने की
मेरी शुरू से ही आदत नहीं है। मैंने खड़े-खड़े ही सोचा कहाँ मैं गवाही के चक्कर में पड़ गई। सही
को गलत और गलत को सही सिद्ध करने की पूरी कोशिश वह वकील बार बार कर रहा था। शब्दों का
एक जाल सा बिछा दिया था , उसने मेरे चारों ओर। मेरे कहने पर वह मुझे झिड़क देता था , मेरी
सहजता उसकी कुटिलता में छिप गई , जो बात मैं कहना चाह रही थी , वह बात मुझे कहने ही नही
देता था। वह , मेरे बोलने पर जितना पूछा जाता है , उतना बोलो" कहकर वह मुझे चुप करा देता
था और झट वह मुझसे दूसरा प्रश्न पूछने लगता था। उसके उलजुलूल प्रश्नों पर मेरे मौन का अर्थ भी
वह मेरी स्वीकृति ही मान लेता था। मै उसके वाक्जाल में ऐसी उलझ गई कि अपनी बात अंत तक
नहीं कह पाई। मुझे पहली बार महसूस हुआ कि सच्चाई कितनी अहसाय होती है। मेरा तन व मन
दोनों थक गये थे, मैं जल्द से जल्द घर जाकर आराम करना चाह रही थी। ले - देकर गवाही पूरीहुई, लगा किसी नर्क से मुक्ति मिली। मेरे पति मेरी मनोदशा समझ रहे थे। सो उन्होने मुझे चाय
पिलाई, परन्तु मन बडी उलझन महसूस कर रहा था।

घर आकर मै निढ़ाल सी बिस्तर पर पड़ गई। अपराध और न्याय व्यवस्था से जुड़े अनेकों प्रश्न
मेरे मन मैं कौंधते रहे। थोड़ा शांत होने पर मै उठी , अपने पूजा कक्ष मे अपने आराध्य देव के सामने
बैठ गई। हे भगवान! क्या तेरे दरबार में भी आत्माओं को न्याय ऐसे ही मिलता है?

डॉ शिरोमणि माथुर दल्ली राजहरा
Email-shiromanimathur@gmail.com 
Contact- 9893742299 
Dalli Rajhara