मंगलसूत्र
शंशाक की शादी का कार्ड मिलते ही सोनम खुशी से नाच
उठी। उसकी सखी कुसूम के बेटे शंशाक के लिये वह भी एक अच्छी
लड़की की तलाश में थी, मन में संतोष की सांस लेते हुए उसने सोचा
कुसुम ने अच्छी ही लड़की देखी होगी। अब कुसुम अपने दायित्व से
मुक्त होकर आराम से रहेगी, उसकी जिम्मेदारियाँ अब पूरी हो
जायेगी। असमय पति दिलीप की मृत्यु के बाद से कुसुम बहुत
परेशान थी। तीन-तीन बच्चों को पालना, पढ़ाना-लिखाना फिर
उनकी शादी करना और लड़कों को व्यापार में संलग्न कर आगे
बढ़ाना, कोई सरल काम नहीं था परन्तु कुसुम मेहनत का पर्याय बन
गई थी, कड़ी मेहनत कर उसने अपनी जिम्मेदारियों पूरी निष्ठा से
निभाई।
दिलीप की मृत्यु कैंसर से हो गई थी। कैंसर की बीमारी के
इलाज में ही बहुत पैसा खर्च हो गया था, तब बच्चे छोटे थे। दिलीप
की मृत्यु के
के पश्चात उसने भिलाई वाला घर बेच दिया था और बाजार
की देनदारियाँ निपटाने के बाद बचे पैसे से उसने देहली में एक छोटा
सा घर खरीद लिया। देहली वह रिश्तेदारों के सहारे गई थी, परन्तु
दुर्दिन में कोई भी साथ नहीं देता है। देहली में वह स्वयं एक शोरूम
में काम करती। पैसे के लालच में वह अतिरिक्त काम करती जिससे
वह कुछ और कमाई कर सके। धीरे से उसने बड़े बेटे अनिल को भी
उसी शोरूम में काम में लगा दिया था। अनिल को काम में लगाते
समय उसके मन में यह भावना थी कि अनिल कुछ काम सीख लेगा
जो भविष्य में उसके काम आयेगा। मालिक अनिल को बहुत कम पैसे
देता था, फिर भी वह संतोष कर चूप रहती थी। धीरे-धीरे अनिल
काम सीखता रहा।
धीरे से कुसुम ने बड़े बेटे को दुकान खुलवा दी जो अब ठीक
से चल रही है। उसकी शादी भी पढ़ी-लिखी लड़की से कर दी जो
अच्छी जगह कार्यरत है। मझली बच्ची रेखा को पढ़ा--लिखा कर
तैयार कर उसकी भी शादी कर दी। दामाद शासकीय सेवा में है।
वे दोनो अच्छी तरह से अपना परिवार सम्हाल रहें है। कुसुम भी
उनकी खुशी में खुश थी।
कुसुम भिलाई को भूल नहीं पाती थी क्योंकि यहाँ उसकी दुकान
जो थी। नोएडा में अनिल की दुकान जम जाने के बाद वह छोटे बेटे
को साथ लेकर भिलाई आ गई और भिलाई में शशांक को एक दुकान
में काम पर लगा दी जिससे वह भी काम सीख सके और स्वयं घर
में साड़ियाँ व लेडिज कपड़े रखकर बेचने का काम करने लगी।
धीरे-धीरे मॉँ बेटे ने स्वयं की दुकान खोल ली।
शशांक भी अपनी दुकान अच्छी तरह से चला रहा है, उसकी
शादी को लेकर कुसुम बहुत चिंतित रहती थी, इसीलिये वह कई बार
सोनम को भी अच्छी लडकी खोजने के लिये कहती थी। सोनम ने
भी अपने प्रयास किये परन्तु कहीं भी रिश्ता जम नहीं पाया। इन्हीं
विचारों में सोनम खोयी थी इसी बीच फोन की घंटी बजी -कुसुम का
फोन था। सोनम ने खुशी खुशी फोन उठाया- हलो कुसुम कैसी हो?
शशांक की शादी की बहुत बहुत बधाइयाँ हो।
कुसुम ने कहा- हॉ दीदी आपको भी बधाई है- ऐसे काम नहीं
चलेगा वर -वधु को आर्शीवाद देने आपको शादी में आना ही होगा।
आऊंगी ना, यह भी कोई कहने की बात है, जरूर आऊंगी -
सोनम बोली।
हॉँ दीदी अपके आये बिना काम नहीं चलेगा, आप रहती हो तो
मुझे भी बहुत हिम्मत रहती है - कुसुम बोली।
सोनम ने पूछा-लड़की कैसी है?
अच्छी है ना गोरी है ना काली है गेंहुऑ रंग है। बिना
माता-पिता की है, माता- पिता का एक्सीडेंट में स्वर्गवास हो गया।
लड़की अपने मामा के घर रहती है। पढ़ी-लिखी है, कम्पयूटर का
काम भी उसे आता है। शशांक को भी दुकान में सहारा हो जायेगा,
दोनो मिलकर काम सम्हालेंगें तो व्यापार को और भी बढ़ा सकते हैं,
यही सोचकर रिश्ता तय कर ली हूँ कि लड़की पढ़ी-लिखी है।
उसके मामा ने कह दिया है कि हम शादी में कुछ नही दे सकेंगें
क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है- हमने भी कहा कि
कोई बात नही, हमें लड़की अच्छी चाहिये, शशांक को भी लड़की
पसंद आ गई तो रिश्ता तय कर दिया।
सोनम बोली- ठीक है बच्चें खुश रहें बस और क्या चाहिये? मैं
शादी के समय आऊंगी जरूर। तुम उसे किसी चीज की कमी मत
होने देना, बिना माता- पिता की बच्ची है तुमही उसकी मा और सास
भी हो।
कुसुम ने कहा- हो दीदी मैं भी समझती हूँ मेरे लिये भी और
कौन है। शादी की तैयारी चल रही है, कंगन खरीद लिये है,
मंगलसूत्र खरीदने की सोच रहीं हूँ । वैसे तो मेरे पास भी बहुत अच्छा
मगंलसूत्र है, परन्तु वही मगंलसूत्र निधि को देने का मन नही होता,
सोचती हूँ मेरा मगंलसूत्र तो खंडित सुहाग का प्रतीक है, उसे कैसे
दे दूँ? आपकी क्या राय है?
सोनम बोली - यदि अपके मन में उस मगंलसूत्र को लेकर
शंका कुशंकायें आ रही है तो आप उस मगंलसूत्र को रहने दो, नया
मगलसूत्र ले लो।
कुसुम बोली - हॉँ दीदी दो दिन से मन में तरह-तरह के ख्याल
आ रहें हैं। मै नया मगंलसूत्र खरीद ही लेती हूँ । मुझे अन्य सामान
लेने बाजार जाना ही है, मैं मगंलसूत्र भी ले आऊरंगी। कहकर कुसुम
ने फोन रखती हूँ, कहकर फोन रख दिया।
कुसुम बाजार गई और बहू के लिये कई अच्छी-अचछी साडियाँ.
सुहाग का जोड़ा, श्रृंगार का सामान व नया अच्छा सा तीन तोले का
मगंलसूत्र खरीद कर ले आयी। छोटे बेटे की शादी है बड़े शौक से
शादी की तैयारी कर रही थी। उसके जीवन का आखिरी जिम्मेदारी
वाला काम है, सभी रिश्तेदारों को व सहेलियों को बुलायेगी, शादी में
कोई कमी नहीं होनी चाहिये । यही सोचकर कुसुम शादी की तैयारी
में लग गई।
शादी में सम्मिलित होने सोनम भी आई। शादी अच्छे से हो
गई। देखने में वर-वधू की जोड़ी अच्छी लग रही थी। शादी के बाद
सभी रिश्तेदार चले गये। आजकल कोई रिश्तेदार रूकते भी नहीं।
घर में नव जोड़े को छोड़कर शादी की मिठाई बॉटने कुसुम बड़े बेटे
अनिल के साथ आसपास के मोहल्ले में निकली। सबके घरों में दिन
भर मिठाई बॉटती रही, शाम को घर में आयी और थककर सो गई । सुबह बड़े
बेटे अनिल व बहु को देहली जाना था। वे भी चले गये।
दिन भर घर काम करते-करते व फैला सामान समेटते उसे
थकान हो गई। शाम को जब सामान और व्यौहार में आये उपहारों
को सम्हाली, तब नया भारी मंगलसूत्र डब्बे में भरकर सम्हालकर
अपनी अलमारी में रख दिया और बहु निधि को हल्का छोटा
मगंलसूत्र रोजाना पहनने के लिये दे दिया था। कुसुम दिन भर व्यस्त
रहती। शादी के बाद भी घर में बहुत काम रहता है, मेहमानों के जाने
के बाद बिखरे घर को सम्हालना, शामियाना वाले, किराया भंडार,
राशन वालों इन सभी का हिसाब करना, बधाईयाँ देने वालों से मिलना
और उन्हें विदा करना, फिेर घर का काम, खाना बनाना सब वह करती
और जब थकान अनुभव करती, तो आराम करने बैठ जाती। परन्तु
निधि अपने कमरे में घुसी रहती उसे सासू माँ से कोई मतलब नहीं था।
ससूराल में आते ही उसने रंग दिखाने शुरू कर दिये, घर में
खाना भी नही बनाती थी। कुसुम के साथ उसका व्यवहार सासू माँ
जैसा ना होकर नौकरानी जैसा रहता। कुसुम सोचती धीरे -धीरे सब
समझने लगेगी। पढ़ी लिखी लड़की है, अपनी जिम्मेदारी समझेगी।
कुसूम के कारमों में कमियाँ निकालना, घर में अपने हिसाब से सामान
लाना। घर की व्यवस्था में निधि कुसुम की उपेक्षा ही करती थी।
शशांक के मन में अपना प्रभाव जमाने के लिये वह कुसुम की सलाह
व उसके कामों को पुरातन पंथी या गंवार कहकर उपेक्षित करती
शशांक भी सोचता निधि नये फैशन के अनुसार घर सजा कर रखती
है। धीरे-धीरे वह भी निधि के प्रभाव में आता गया और माँ की बातें
उसे दकियानूसी लगने लगी। उसके मन में भी मॉँ के प्रति उपेक्षा का
भाव पनपने लगा। कई बार वे दोनो बाजार या कहीं घूमने चले जाते,
देर रात बाहर खाना खाकर आ जाते थे। उन्हें माँ की चिंता नही
रहती थी, कि उसने खाना खाया है या नहीं, जबकि शशांक शादी
से पहले रात का खाना माँ के साथ ही खाता था।एक
दिन अपनी अलमारी सम्हालते हुये कुसूम ने मगंलसूत्र
वाला डब्बा खोला तो देखा डब्बे से मगंलसूत्र गायब है।
कुसुम ने घर में बताया कि मगंलसूत्र डब्बे से गायब है, यह बात
शशांक की जानकारी में भी आई। घर में मगंलसूत्र की बहुत खोज
की गई, परन्तु मगंलसूत्र नही मिला। रात में निधि और शशांक
बीच में पता नहीं क्या- क्या बातें हुयी कि दोनों ने सुबह मगंलसूत्र
की चोरी के लिये कुसूम को ही जिम्मेदार ठहरा दिया।
कुसुम का कहना था कि मगंलसूत्र उसकी ही अलमारी में रखा
था फिर उसे चोरी करने की क्या आवश्यकता थी। वह बेटे को डॉटते
हुए बोली - जबान सम्हाल कर बोल , क्या बोल रहा है? क्या मैं चोर
हूँ ?
शशांक गुस्से में भरकर बोला- तुम्हीं सब गड़बड़ करती हो और
अच्छा दिखने के लिये बातें बनाती हो ,तुम्हीं चोर, हो और ना जाने
क्या-क्या अनर्गल लॉछन माँ पर लगाता रहा।
उत्तर प्रतिउत्तर में बातें बढ़ती गई अंत में शशांक ने मॉ को घर
से निकल जाने के लिये कह दिया-अपना सामान उठाओं और घर
से चली जाओ , मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं।
अपने समस्त अरमानों को दबाकर कुसूम ने बच्चे पाले थे।
शशांक की शादी के बड़े-बड़े सपने देखे थे। शादी हुये छह माह ही
हुआ था बहू के सामने ही वह मॉँ को चोर और ना जाने क्या-क्या
लॉछन लगा रहा था। कुसुम भी सह ना सकी, वो भी शशांक को भला
बुरा कहती हुई पड़ोसी के घर चली गई। दिन भर वह पड़ोसी के घर
ही रही। रात होने पर भी उसे बुलाने बेटा बहू कोई नही आये तो दो
दिन बाद वह देहली चली गई पड़ोसी ही उसे ट्रेन में बैठाने आये बेटा,
बहू कोई नही आये ।
देहली वह अपने पुराने घर में आई। बड़े बेटा अनिल और बहु
रमा नोएडा में रहते हैं। वह वहाँ भी नहीं गई। उससे खाना नहीं
खाया जा रहा था ना किसी काम में उसका मन लग रहा था , बेटे के
व्यवहार व लॉछनों से उसका मन बहुत दुखी था। अपनी जवानी में
वह बच्चों को बड़ा करने, पढ़ाने व उनके व्यवसाय के लिये संघर्ष
करती रही। अपना एक-एक पैसा बचाकर वह बच्चों की जरूरतें पूरी
करती रही। आज बुढ़ापे में बहू के आते बेटे की नजर बदल गई।
उसका मन इतना दुखी था कि उसने भगवान की पूजा करना भी
छोड दिया ।
देहली में बड़े बेटे अनिल ने खानें पीने का कुछ सामान उसके
पास पहुचाया तो वह उस सामान का फोटो खींच कर ले गया।
कुसुम सब देखती रही। कुसूम ने अपने दुख-सुख बताये तो अनिल
ने भी शशांक का पक्ष लिया। कुसुम ने वृध्दाश्रम में जाने और वहाँ
रहने की बात की तो उसने शशांक बुलाकर बातचीत करने की
बात कही। कुछ दिनों बाद शशांक व अनिल फिर घर आये, बातें
निकली और माँ बेटे में फिर झगड़ा हो गया। बच्चों ने माँ को फिर
जली- कटी सुनायी और गालियाँ दी। कुसुम जब वृध्दाश्रम जाने व
अपना सब कुछ वहाँ देने का बोलती तो बच्चे भड़क जाते, उन्हें बस
यही डर था कि मॉ देहली वाला घर जो कुसुम के नाम था वृध्दाश्रम
को दान कर देगी तो उन दोनों को घाटा हो जायेगा इसीलिये बच्चे
उसे वृध्दाश्रम भेजना नहीं चाहते थे।
अनिल कभी-कभी माँ से मिलने आता और मां से कहता - तुम
मेरे साथ नोएडा में रहो, यहाँ अकेली रहती हो मुझे अच्छा नहीं
लगता।
कुसूम कहती- मैं यहाँ हूँ तो घर की देखभाल भी कर रही हूँ।
अनिल कहता - कहाँ लफड़ो में पड़ती हो, घर मेरे नाम कर दो,
और मेरे साथ रहो घर की देखभाल में करता रहूंगा।
ठीक है बेटा जब भगवान के दरबार में अक्ल बांटी जा रही थी
तो तू ही सबसे आगे था, मैं तो कहीं थी ही नही - कह कर कुसुम
हँस देती थी।
कुसुम दिल्ली में रह तो रही थी, परन्तु उसका मन वहाँ नही
लगता था। भिलाई में ही उसे अच्छा लगता था, परन्तु बहू के सामने
इतनी बेइज्जती व लॉछन झेलकर वह भिलाई आना नहीं चाहती थी।
इसलिये उसने भिलाई जाने से मना कर दिया। उसने बच्चों का मुँह
तक ना देखने की कसम खा ली थी।
कुछ दिनों बाद भिलाई के घर में शशांक को छतरी खोजते
समय निधि की अलमारी में कपड़ों के बीच वह मगंलसूत्र मिल गया।
मगंलसूत्र देखते ही शशांक अचंभित रह गया उसने निधि से पूछा-
यह मगंलसूत्र तो यहाँ हैं और हम लोग मॉ से लड़ बैठे।
निधि बोली- मॉँ ने ही यहा रखा होगा, मुझे तो कुछ भी नहीं
मालूम। जाते-जाते लॉछन से बचने के लिये माँ मगंलसूत्र को यहाँ
छिपा दी होगी।
शशांक चूप रहा उसे कुछ कहते नही बना।
सालभर भी नहीं बीता भिलाई में शशांक की तबियत बिगड़ी, बह
ने फोन कर बताया कि शशांक को हार्ट अटैक आया है, बार-बार
मम्मी-मम्मी कह कर याद करते है और रोते हैं तो कुसूम से रहा नहीं
गया। फौरन ही वह हवाई यात्रा कर भिलाई शशांक के पास पहुँच
गई।
प्लेन में आते आते वह तरह-तरह के विचारों में खोयी हुयीं।
भिलाई आकर कुसुम सीधे अस्पताल गई। शशांक से मिली,
उसकी हालात देखकर वह रो पड़ी। बहुत देर शशांक के सिर पर
हाथ फेरती रही। शशांक का बीमार चेहरा व निधि का उतरा चेहरा
देख कर वह बोली - तुम लोगों ने क्या शक्ल बना रखी है? दोनों
उदास हो? शशांक व निधि को समझाती रही - भगवान सब ठीक
करेगा। घर आकर रात में नि्धि व कुसुम साथ साथ खाना खाने
बैठी। निधि से खाना नहीं खाया जा रहा था, वह खाते खाते उल्टी
करने चली गई तो कुसुम को समझ में आ गया निधि गर्भवती है,
इसलिये खा नहीं पा रही है - एक माँ ही दूसरी माँ की अवस्था को
ठीक से समझ सकती है - निधि का चेहरा इसी कारण सूखा सूखा
सा है। कुसुम को सब समझ में आ गया। अब उसे अपने कर्तव्य का
बोध भी हुआ और खुशी भी हुयी। शशांक व निधि दोनों को मॉ की
इस समय अधिक आवश्यकता है। अपनी वंश वेलि के आगे बढ़ने की
खुशी निधि से ज्यादा कुसुम को थी। वह मन ही मन गदगद् हो उठी
और निधि के खाने,पहनने व आराम का ध्यान रखने लगी।
कुछ दिनो बाद घर में एक बालक का जन्म हुआ। उस समय
घर, अस्पताल व बच्चे की जिम्मेदारी कुसुम बड़े उत्साह से पूरी करने
लगी। बच्चे को घुट्टी पिलाना, मालिश करना, निधि को समय पर
गरम खाना देना, सारा काम कुसुम बड़े ही जोश खरोश से बिना थके
करती रही। निधि को भी महसूस हुआ- और वह कुसुम से बोली-
माँ बच्चे को जन्म देने में मैने तो प्रसव वेदना झेली वह तो सब जानते
हैं, परन्तु इतने दिनों से आप शशांक, मेरी व बच्चे की सेवा कर
जो तकलीफ़ झेल रहीं हैं उसे कोई नहीं जानता।
आप के हमारे ऊपर बहुत एहसान हैं.. मॉँ बनने के पर भावनायें
बदल जाती हैं व सहनशक्ति बहुत बढ़ जाती है.. मैं आपसे अपनी
गलतियों के लिये क्षमा चाहती हूँ। कहते कहते निधि भाव वि्हल हो
गई - आगे कुछ नहीं बोल पायी।
कुसुम भी भाव विभोर हो गई उसकी ऑखें भर आई बहू को पेट
से लगाते हुये बोली - तुम बच्चे सुखी रहों, और क्या चाहिये मुझे.
इसके आगे वह भी नहीं बोल पार्यी।
छतीसगढ़ रत्न
डॉ.शिरोमणि माथुर
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