राहें - 1 shiromani mathur द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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राहें - 1

एक कर्तव्य ऐसा भी

स्वामी हरि प्रपन्नाचार्य हरिद्वार में वैष्णव सम्प्रदाय के प्रसिद्ध व
तपस्वी आचार्य थे । उनके प्रसिद्ध राधा स्वामी आश्रम तीर्थयात्रियों
व भक्तों के ठहरने व खाने की निशुल्क व्यवस्था थी। परिचित भक्तों
व अनुयायियों के अतिरिक्त कोई भी अपरिचित तीर्थयात्री भी वहाँ
ठहर सकता था व भोजन ग्रहण कर सकता था। भगवान की ऐसी
कृपा थी कि उनका यह लंगर वर्षों से चल रहा था। भक्तों को भी
स्वादिष्ट व निशुल्क भोजन (प्रसादी) पाने के बाद दान देने की प्रेरणा
स्वतः होती थी। इसलिये स्वामी जी की ख्याति दूर दूर तक फैली
हुयी थी। परन्तु स्वामी जी किसी से कुछ नहीं मागते थे, स्व प्रेरणा
से लोग दान देते थे।
स्वामी हरि प्रपन्नाचार्य के महाप्रयाण के समय उनके भक्तों ने
उनके शव को बड़ी सुन्दर पालकी में सजाकर नगर भ्रमण करवाया,
भक्तों, आम नागरिकों व स्वामी जी के शिष्यों की बड़ी भारी संख्या
शव यात्रा के साथ थी। "जब तक सूरज चॉद रहेगा, स्वामी तेरा नाम
रहेगा" व अन्य रामनामी नारों, भजनों की गूँज व पुष्पवर्षा के बाद
स्वामी जी के आश्रम (मठ) में ही शव को अग्नि को समर्पित किया
गया - चारों ओर गुरूजी के पुण्य कार्य का बखान होता रहा।
आचार्य संस्कृत के बड़े विद्वान थे। कई पुराणों, रामायण व भागवत
कथाओं का वे अच्छा व्याख्यान करते थे। स्वामी हरि प्रपन्नाचार्य के
बचपन का क्या नाम था ? उनका जन्म स्थान कहाँ था ? उन्होनें
कहाँ शिक्षा ली ? कोई नही जानता था। उन्होनें कभी भी इन बातों
का विस्तार से वर्णन नहीं किया। कभी कोई पूछता था - स्वामी जी
आपका जन्म स्थान कहाँ है? तो स्वामी जी कहते थे - मैं स्वयं नहीं
जानता - ऋषिकेष के जंगली गाँवों में आवारा घूमता था। धीरे धीरे
संतों के सम्पर्क में आया। ऋषिकेष के राधा कृष्ण मंदिर में सेवा करते
करते ज्ञान मिला। साधुओं की संगत मिली, मेरा भाग्य चमक गया
और राधा स्वामी ने मेरे माध्यम से यह आश्रम बनवाया और भगवान
के भक्तों की सेवा कर रहा हूँ।
स्वामी जी के महाप्रयाण के बाद आचार्य जी की वरिष्ठ शिष्या
तपस्वनीं मंगला देवी आश्रम की मुखिया बनायी गई। आचार्य के
जीवन काल ही उन्हें उत्तराधिकारी घोषित किया जा चुका था।
अतः मंगला देवी को आश्रम के काम सम्हालने में परेशानी नहीं हुई।
आश्रम की व्यवस्था, भक्तों के ठहरने व भोजन की व्यवस्था पहले
जैसी या उससे भी अच्छी चल रही थी। स्वामी जी के शिष्य माता
मंगला देवी के आदेशानुसार व्यवस्था करते थे।
कुछ दिनों बाद छत्तीसगढ़ के जंगली क्षेत्रों से भक्तों की एक
टोली राधास्वामी आश्रम में आई उनकी भी ठहरने व भोजन की
व्यवस्था आश्रम की ओर से की गई। उस टोली में वंदना नाम की
एक सम्भ्रान्त महिला माता जी मंगलादेवी के आकर्षण का केन्द्र थी।
वृद्ध वंदना को माता जी निकट से देखती रहती। एक दिन
मंगला देवी ने वंदना से पूछा आपका नाम वंदना है ना ?
वंदना बोली - हॉँ माँ मेरा नाम वंदना है, आप ने कैसे जाना?
मंगला देवी - यों ही मेरी बचपन की सहेली का नाम भी वंदना
है।
वंदना ने जब मंगला देवी को गौर से देखा तो उसे सन्यासिनी
वेश में अपनी सहेली शोभा शर्मा को पहचानने में तनिक भी देर नहीं
लगी। लगभग पचास वर्षो के बाद दोनों सखियाँ गले मिल रही थी।
दोनो भावुक हो गई उनके गले रूंध गये, आँखों से मोती बरसने लगे।
वंदना को उम्मीद नही थी कि तीर्थयात्रा के बीच उसे वर्षों पूर्व गायब
हुयी उसकी सखी शोभा सन्यासिन के वेश में मिलेगी।
शोभा से मिलने के बाद वंदना के मन में कई प्रश्न उठने लगे,
कई सवालों ने उसके मन को झकझोरा, कई प्रश्नों को मन में दबाये
वह शोभा से उसका हालचाल पूछती रही व अपना हालचाल बताती
रही - वंदना ने बड़े शांत स्वर में कहा - सब यहीं खड़े खड़े पूछती
रहेगी कहीं बैठायेगी नही
वंदना की इस बात पर मंगला देवी उसे अपने शयन कक्ष में
ले गई वहाँ दोनों सखियों ने दिल खोलकर बातें की।
वदना ने पूछा - शोभा से मंगला नाम कब से रख ली?
मंगला देवी जब से स्वामी जी के साथ रह रही थी तब से
ही अपना बदल कर मंगला रख लिया। आचार्य मुझे मंगला के नाम
से पुकारते थे।
वंदना - मैने तो सुना था कि तू किसी साधू के साथ भाग गई
थी।
मंगला बोली - ठीक सुनी थी, मैं तुझे सब बताती हूँ। एक दिन
माँ, पिताजी और मैं शादी के कार्यक्रम में बाहर गये थे। बड़ी बहन
शीला विधवा थी। उसे व आचार्य (मेरे पति) को घर में छोड़ गये थे।
पिताजी ने सोचा वैवाहिक कार्यक्रम में विधवा बेटी को ले जाना उचित
नही लगता इसलिये शीला दीदी को घर में छोड़ दिये थे। पीछे में
शीला दीदी को अकेले पाकर प्रदीप (पति) अपनी वासना पर नियन्त्रण
नहीं रख पाये और उसके साथ जबरदस्ती कर बैठे । दीदी रोती रही
प्रदीप अपनी करनी पर मन में पछताते रहे अपनी गलती को
छिपाने का कोई मार्ग समझ नहीं आया तो रोती हुई दीदी की हत्या
कर जंगलों में भाग गये।
माता पिता को गहन दूख हुआ। बड़ी बेटी विधवा थी छोटी बेटी
की शादी कर प्रदीप जैसे पढ़े लिखे युवक को घर जमाई बनाया था।
परन्तु उसने भी धोखा दे दिया सबकी समझ आ गया कि शीला
की हत्या प्रदीप ने ही की है। इसलिये घर से फरार है, मैं भी बहुत
शर्मिन्दा थी।
वंदना बोली फिर तू साधू के साथ क्यों भाग गई?
शोभा बोली - प्रदीप कुछ दिनों तक तो छिपे-छिपे जंगलों में
घूमते रहे। उन्होनें अपने आपको छिपाने के लिये साधू का वेश बना
लिया। दाड़ी मुंछे व सिर के बाल बढ़ा लिये, माथे पर बड़ा सा तिलक
लगाते ताकि कोई पहचाने मत, परन्तु उनका मन उस दुनियाँ में नहीं
लगता था अपराधी को छिपने के लिये छदम् वेश जरूरी था।
इसलिये प्रदीप सन्यासी वेश में रहने लगे।
सन्यासी वेश में वे बार बार मेरे कमरे की खिड़की के पास
आकर मुझसे भी साथ चलने के लिये कहते थे। माता पिता वैसे भी
दुखी थे उनको छोड़कर जाना उचित नहीं लगता था परन्तु प्रदीप का
(उनका) बार-बार साथ चलने का अनुरोध मुझे द्रवित कर देता था
- मैं मन ही मन बहुत घुटती थी, रात-रात भर मैं सो नही पाती थी।
किसी से कुछ कह भी नहीं सकती थी, प्रदीप के प्रति अपने प्रेम व
कर्तव्य को भी भुला नहीं पाती थी। हिम्मत करके एक दिन मैं प्रदीप
के साथ रात में घर छोड़कर जंगलों में चली गई।
वंदना बोली - उन दिनों तुम्हारी व प्रदीप की बहुत बातें
निकलती थी - एक साधू को तुमसे बातें करते व मिलते हुये कुछ
लोगों ने देखा था - इसलिये लोग बोलने लगे - कि शोभा साधू के
साथ भाग गई।
जागेश्वर महाराज का भाग्य ही खराब है - एक बेटी की हत्या
हो गई। छोटा दामाद ही हत्यारा निकला। छोटी बेटी साधू के साथ
भाग गई आदि तरह तरह की बातें लोग किया करते थे।
मैं जानती हूँ वंदना .. पापा को मेरे जाने के बाद बहुत दुख हुआ
होगा, उनकी और मेरी बदनामी भी बहुत हुयी होगी, परन्तु मैं क्या
करती? प्रदीप हत्या करने के बाद अकेले पड़ गये थे। किसी से कुछ
कह नही सकते थे जरा भी किसी को आभास हो जाता तो प्रदीप
पकड़ लिये जाते और जिन्दगी भर जेल की हवा खाते। पत्नी धर्म
निभाते हुये मैने उनका साथ दिया मैं भी जानती थी कि प्रदीप दीदी
के हत्यारे हैं।
वंदना बोली - फिर तुम लोग कहाँ कहाँ रहे?
छत्तीसगढ़ के जंगलों में हम ज्यादा दिन छिप नही सकते थे।
इसलिये सन्यासी वेश में हम लोग ऋषिकेष के जंगलों में रहने लगे।
बहुत कष्ट उठाये। बाद में ऋषिकेष के राधे कृष्ण मंदिर में सेवा करने
लगे। धीरे से स्वामी जी ने यह राधा- स्वामी आश्रम व राधे कृष्णा का
भव्य मंदिर भक्तों के सहयोग से बनाया।
जीवन भर मैं उनकी शिष्या बनकर रही। पत्नी होते हुये भी मैं
शिष्या थी और हम लोग अलग-अलग कमरों में सोते थे। इस आदर्श
को हमने जीवन भर निभाया। स्वामी जी को भी उस हत्या का बहुत
दुख था। कामुकता के कारण उनसे हत्या हुयी, जगंल जगंल भटके,
अनेकों कष्ट सहे, बदनामी उठायी, मान सम्मान,धन सम्पति सब कुछ
गया, उसका उन्हें बहुत पछतावा था। इसलिये प्रायश्चित स्वरूप वह
सदैव पवित्रता का ध्यान रखते थे। शिष्यों व संतों के बीच उन्होनें जो
सम्मान बनाया वह उनकी तपस्या का फल था मैं भी उनके हर
धार्मिक कार्य में बराबर सहयोगी रही। इसी का परिणाम है कि यह
आश्रम सफलतापूर्वक अभी तक चल रहा है और भगवान चलवा रहे
हैं। अब सब मुझे मंगला देवी या माताजी के नाम से जानते हैं ।
मंगला ने पूछा - मेरे माता पिता का क्या हुआ हमारे तो कोई
भाई नहीं था?
वंदना ने बताया - तुम्हारी माता जी की मृत्यु के बाद पिताजी
अकेले हो गये थे बीमार भी रहते थे तो तुम्हारी बुआ के बेटे उनको
अपने गाँव ले गये। वहीं वे स्वर्ग सिधार गये। उनकी मृत्यु के बाद
बुआ के बेटों ने गॉँव वाला घर बेच दिया और खेत बटाई पर दे दिये।
मंगला बोली - मुझे अफसोस है कि मैं माता पिता के लिये कुछ
नहीं कर पायी। बदनामी व कलंक झेलकर भी मैने पत्नी धर्म निभाया,
बस यही कह सकती हूँ । जीवन भर यह राज मैं अपने सीने में दबा
कर रखे रही। प्रदीप से हरि प्रपन्नाचार्य बनने की लम्बी कहानी में
मैने उनका साथ दिया और अनेकों लॉछन व तकलीफें झेली। जीवन
भर मैं उन्हें अपना पति नहीं कह पायी इस बात का मन में मलाल
रहता है, और एक संतोष भी उनके प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर
सकी।
                                   डॉ. शिरोमणि माथुर 
                                    दल्ली राजहरा

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