राहें - 24 shiromani mathur द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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राहें - 24

नींव के पत्थर

हमारे आसपास कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो अपने अच्छे
स्वभाव, संस्कारों से निरन्तर समाज सेवा करते रहते है, परन्तु उनकी
अच्छाइयों की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता, जैसे धार्मिक लोग,
साहित्यकार, कथावाचक या समाजसेवी, देशभक्त, सहयोगी स्वभाव
वाले, प्रकृते प्रेमी - वह लोग चुपचाप बिना किसी तामझाम के अपने
अच्छे कमो से समाज व प्रकृति को सहयोग देते हैं वह किसी से कुछ
अपेक्षायें भी नहीं रखते, ऐसे ही सहयोगी स्वभाव वाले हमारे दादू भी
थे।
समाज के प्रति जागरूक देश प्रेमी दादू- सीधे, सरल, व्यक्तित्व
के स्वामी थे, कांगेस के कार्यक्रमों में वो अपनी सहभागिता अवश्य
निभाते थे- कोई बुलाये या ना बुलाय, उन्हें मालूम भी हो जाये कि
कांग्रेस का कार्यक्रम हो रहा है, वे पहुंच जाते थे। उन्हें इस बात की
कभी शिकायत नहीं रही कि दूसरे उन्हें कार्यक्रमों की सूचना देते हैं।
या नही। देखा जाता है कि जिन लोगों को कार्यक्रम में जाना नही
होता वे बहुधा कहते रहते है कि हमें कार्यक्रम की सूचना नहीं मिली
भले ही सूचना मिल चुकी होती है, परन्तु दादू को सूचना मिलने ना
मिलने की कभी शिकायत नही रही। वे पार्टी के प्रति सदैव समर्पित
रहे। दादू का सभी सम्मान करते थे। दादू बुजुर्ग थे, सरल भी थे और
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रहे थे। अपनी जवानी में दादू वर्षों जेल
में रहे।
कभी-कभी दादू मेरे घर भी आते रहते थे। एक दिन दादू ने
एकांत देखकर मुझसे कहा "कि मेरी इज्जत तो सब करते हैं परन्तु


कभी कभी मेरी जेब में दो रूपये भी नही होते, बच्चे छोटे हैं, उनसे
भी कुछ बोल नही सकता' । मैने बड़ी सहजता से पूछा - 'दादू आप
तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हो, आपको तो पेंशन मिलती होगी?" मैने
प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा- "वे बोले मैं जेल से भाग
आया था देश भक्ति का जज्बा उन दिनों ज्यादा था। बाहर जाकर
आंदोलन को उग्र बनाने के लिये लोगों को प्रेरित कर पाऊंगा, यह
सोचकर जेल से भाग आया था इसलिये मेरे पास कोई सर्टिफिकेट
नही है अतः पेशन नही मिलती'।
मैन सहजता से फिर पूछा- "दादू आप कह रहे हो कि बच्चे
छोटे छोटे है, आपकी आयु तो अधिक है बच्चे क्यों छोटे है'।
दादू ने फिर कहा- कि "मैं वर्षों जेल में रहा इसलिये शादी देर
से हुयी' बात समझते देर नहीं लगी कि देश भक्ति के दिवाने मेरे
सामने खड़े है। मेरा मन उनके प्रति श्रद्धा से भर गया। जेल से आने
पर भी उस समय देश भक्तों को देशद्रोही की संज्ञा दी जाती थी।
दादू ने भी वह सब झेला होगा। ऐसे में कोई अपनी बेटी कैदी को देना
भी क्यों चाहेगा?
मैं चुप, दादू बोले- "देश आजाद हुआ तब मैं सामने आया और
विद्याचरण शुक्ला जो भारत सरकार में मंत्री थे- ने मेरी नौकरी
भिलाई-स्टील-प्लांट में लगवा दी। रिटायर होने के बाद से मै खाली
हूँ और आयु भी अब अधिक है" ।
मैने पूछा "दादू मैं आपकी क्या सेवा कर सकती हूँ ? मेरे लायक
कोई सेवा हो तो बतलाइ्ये'। दादू संकोची स्वभाव के थे। पार्टी
मीटिंग में भी दादू बहुत ही साधारण ड्रेस में आते थे । हम सब उनका
बहुत सम्मान करते थे। इसलिये उनकी मैली सी, पुरानी धोती शोभा
नही देती थी । मैं सोचती थी बुजुर्ग लोग अपनी ड्रेस के प्रति लापरवाह
रहते हैं, दादू भी इस ओर ध्यान नही देते होंगे- परन्तु आज स्थिति
समझ में आई, यथार्थ में दादू आर्थिक संकट से गुजर रहे थे। परन्तु
उन्होने हम सब को कभी भी यह आभासित नही होने दिया उनके


प्रति मेरी शुभकामना को ही दादू कुछ अनुभव किये होंगे तभी वे अपने
मन की बात मुझसे कह रहे है।
दादू चुप रहे, मैने फिर पूछा दादू क्या करना है? कुछ तो
बतलाइयें ।
दाद बोले "आप मेरे लिये निराश्रित पैंशन बनवा दो" । मैने कहा
"दादू आपका यह काम अवश्य पूरा होगा, आप चिंता ना- करें"। दादू
बड़े स्वभिमानी व्यक्ति थे- इसलिये उनके सम्मान का ध्यान भी
रखना जरूरी था। जिन अमर शहीदों व स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों
के त्याग और बलिदान के कारण हम आजादी की सांसे ले रहें हैं।
और निरन्तर विकास करते हुये शान से सिर उठाकर चलते हैं।
उनके त्याग और बलिदानों की यादों से मन भावुक हो गया। 15
अगस्त और 26 जनवरी को मैं दादू को कोई भेंट देती थी तो वे बड़े
संकोच से स्वीकार करते थे।
दादू चले गये। मैने नगरपालिका के मूख्य कार्यपालन अधिकारी
(C.M.o) को फोन लगाकर कहा की दादू की निराश्रित पैंशन बनवा
दिजिये साथ ही दादू की पत्नी की भी पेंशन बनवा देना जिससे दादू
को 300 रू. प्रतिमाह तो मिल जाये (उस समय निराश्रित पेंशन 150
रू. प्रतिमाह प्रति व्यक्ति थी) पति पत्नी दोनों को मिलाकर कुछ पैसे
तो उनके हाथ में आयेंगे। मैने सी. एम.ओ. को यह भी कहा कि दादू
को आफिस में मत बुलाना। अपने स्टाफ के किसी व्यक्ति को उनके
घर भेजकर फार्म भरवा लेना। फार्म, फोटो व उनके स्वास्थ्य परीक्षण
का खर्च मैं दे दूंगी उनसे आप कुछ मत बोलना।
लगभग-एक डेढ़ माह बीत गये। दादू से भेंट नही हो पायी
और C.M.0से भी इस विषय में चर्चा नहीं हो पाई। एक दिन दादू
याद आये मैने C.M.O. को फिर फोन लगाकर पूछा "दादू का प्रकरण
कहां तक पहुंचा"?
तब C.M.O. साहब ने बताया कि दादू ने अपनी पेंशन लेना तो
स्वीकार किया, पत्नी की आयु पेंशन सीमा में ना आने के कारण पत्नी

की पेंशन लेने से मना कर दिया। दादू के प्रति मन असीम श्रद्धा से
भर गया। यह है हमारी भारत माता के बलिदानी बेटों का त्याग।
दादू इस संसार से विदा ले चुके हैं, परन्तु दादू के शब्द व
उनका त्याग मन में उनके प्रति श्रद्धा जगा देता है । दादू त्याग की
मूर्ति थे। किसी के प्रति कोई शिकायत नही, किसी से कोई अपेक्षा भी
नही।

छतीसगढ़ रत्न 
डॉ.शिरोमणि माथुर 
दल्ली राजहरा
Email- shiromanimathur@gmail.com 
Contact-9893742299