पश्चाताप
मनीषा मंदिर जाते समय अपने पुत्र देवेश को बोली- "मैं मंदिर
जा रही हूँ तुम अपने ऑपरेशन के लिये हॉस्पीटल जाते समय मुझे
मंदिर से साथ ले लेना'- और वह मंदिर चली गई।
देवेश के कमर में बड़ा फोड़ा हो गया था जिसके ऑपरेशन के
लिये डाक्टर ने देवेश को सुबह 8 बजे खाली पेट हॉस्पीटल बुलाया
था। देवेश पत्नी श्रद्धा के साथ मंदिर से मॉ को लेकर हॉस्पीटल पहुँच
गये, साथ में उनका मित्र वरूण भी था। ऑपरेशन होने से पहले
देवेश का ब्लड टेस्ट व शुगर टेस्ट किया गया।
देवेश हँसमुख स्वभाव का था, उसने सिस्टर से ब्लड व शुगर की
टेस्ट रिपोर्ट मॉगी, जब सिस्टर ने कहा -कि आप ऊपर चलिये, मैं रिपोर्ट
लेकर वहीं आती हूँ।
तो देवेश हँसकर बोला - मैं ऊपर जाने नहीं आया हूँ, आप मुझे
अभी से ऊपर भेज रही हो और वह ठहाका लगाकर हँसा। उसकी इस बात पर सभी ठहाका लगाकर हंस पड़े , ऑपरेशन से पूर्व उसकी हंसी मज़ाक की बातें उसके ऊँचे मनोबल को स्पष्ट कर रहीं थीं, हॉस्पीटल
का ऑपरेशन रूम ऊपर छत पर था। इसी बीच अन्य परिजन भी
हॉस्पीटल पहुँचने लगे।
10 बजे डाक्टर देवेश को ऑपरेशन रूम में ले गये, 10.30 पर
डाक्टरों ने देवेश को ऑपरेशन रूम से बाहर निकाला और सिस्टर से
कहा कि 1 घंटे में मरीज को होश आ जायेगा। इस बीच मनीषा को
देवेश की अधखुली ऑखे देखकर अच्छा नहीं लगा, देवेश की ऑखे
खुली थी, पुतली फैली हुयी थी- वह बोली इसकी ऑँखे क्यों खुली
हुई है?
सिस्टर ने कहा- कुछ नही थोड़ी देर में होश आ जायेगा- तो
ठीक हो जायेगा।
मनीषा देवेश के पास बैठी देवेश के होश में आने का इन्तजार
कर रही थी और हॉस्पीटल के डाक्टरों, नर्सो व सभी स्टाफ को
दुआयें भी दे रही थी। स्वभाव से धार्मिक मनीषा सभी के कल्याण के
लिये ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी।
एक घंटे पश्चात भी जब देवेश के शरीर में कोई हरकत नहीं
आई तो मनीषा घबराई और उसने वरूण से कहा- "देखो देवेश को
अभी तक होश नहीं आया- छोटा सा ऑपरेशन था इतनी देर हो गई
होश में आने के लिये।" वरूण व अन्य परिजनों ने गौर से देखा तो
पाया कि देवेश की सांसे नही चल रही है। डॉक्टर को खबर की गई
डॉक्टर देवेश को पूनः ऑपरेशन रूम में ले गये, डाक्टर ने छाती
दबाकर देखा और थोड़ी देर में देवेश को मृत घोषित कर दिया जब
डाक्टरों से पूछा- ऐसा क्या हुआ तो उनका कहना था कि देवेश को
हार्ट अटैक आया है उसी में उनकी मृत्यु हो गई ।
मनीषा तो एकदम घबरा गई। थरथर कॉपने लगी। उसने सोचा
भी नही था कि जवान 50 वर्षीय बेटा ऐसे चल देगा, वो भी छोटे से
ऑपरेशन से, इसी तरह बहु श्रद्धा का भी वही हाल था सिर
पटक-पटक कर वह रो रही थी, बार-बार रोते-रोते गिर जाती थी,
सभी परिजन व मित्रजन जो वहाँ उपस्थित थे, आश्चर्यजनित दुख
व विषाद में भर गये। सब कुछ अप्रत्याशित था, पूरे घर पर मातम छा
| दो छोटे-छोटे बच्चों व पत्नी को बिलखता छोड़कर देवेश का
इस तरह ख़त्म हो जाना सभी को अखर रहा था।
देवेश के शव को घर लाकर रखा तो बेटी दिशा बार-बार पिता
को याद कर रोती और बार-बार बेहोश हो जाती थी उसकी स्थिति
बहुत ही दयनीय थी क्योंकि पिता देवेश की वह लाडली बिटिया थी।
वह बाहर रहकर पढ़ती थी। अभी घर आई हुई थी। प्रतिदिन कालेज
जाते समय तैयार होकर वह अपना फोटो देवेश को व्हाटसप पर
भेजती थी। जिस दिन वह अपना फोटो नही भेजती तो देवेश उसको
फोन पर डॉटते हुये कहते थे- लगता हैं आज तू कालेज नही गई।
घर का माहौल तो विषादमय था ही नगर में भी देवेश की छवि
लोकप्रिय व्यक्ति की थी, वे सभी के सुख दुख में साथ देने वाले व्यक्ति
थे। ऐसे व्यक्ति का असमय चले जाना नगरवासियों के लिये
पीड़ादायक था। बड़ी संख्या में नगरवासी देवेश की अन्त्येष्ठी में
शामिल हुये। लोगों को अनुभव हो रहा था कि हॉस्पीटल में कुछ तो
गड़बड़ी हुयी है, जो देवेश बिना बीमारी के ऐसे ही चल बसे। जवान स्वस्थ व्यक्ति का जाना सभी के मन में शंकायें पैदा कर रहा था
जबकि स्वयं गाड़ी चलाकर देवेश हॉस्पीटल गये थे।
अन्त्येष्ठी के समय अन्य रिश्तेदार भी आ गये थे। अन्त्येष्ठी के
बाद देवेश की अचानक मृत्यु पर चर्चा चली तो हॉस्पीटल के समस्त
दस्तावेज देखे व समझे गये तो समझ में आया कि देवेश की मौत
डाक्टरों की लापरवाही व गलत उपचार के कारण हुयी व उनका
शुगर व क्रेटनिन बढ़ा हुआ था। शुगर व क्रेटनिन की कोई दवा उन्हें
नहीं दी गई। छोटे से फोड़े के लिये पूरा बेहोश करने की भी जरूरत
नही थी। मनीषा ने कहा कि इसकी शिकायत की जानी चाहिये तो
परिचितों का कहना था- अन्त्येष्ठी से पहले शिकायत करते तो
पोस्टमार्टम से कुछ पता चलता-एक डाक्टर दूसरे डाक्टर का साथ
देते हैं, तुम्हारी कौन सुनेगा?
मनीषा बहुत दुःखी थी। उसका मन नही माना तो उसने कलेक्टर व
जिला स्वास्थ्य अधिकारी को देवेश के इलाज सम्बन्धित सभी दस्तावेजों
सहित शिकायत लिख भेजी। परन्तु उस पर क्या कार्यवाही की गई
यह मनीषा को भी नही बताया गया। सिर्फ इतना पता चलाकि
कलेक्टर ने मेडिकल टीम बनाकर जॉच करने का आदेश जिले के
स्वास्थ्य अधिकारी को दिया है। इस पर क्या कार्यवाही हुयी कुछ भी
ज्ञात नही हो सका।
लगभग डेढ़ वर्ष बाद स्टेट मेडिकल कौंसिल का पत्र मनीषा को
प्राप्त हुआ कि वह देवेश की बीमारी और उससे सम्बन्धित सभी
दस्तावेज लेकर कौंसिल के सामने उपस्थित हों।
निधार्रित तिथि पर मनीषा ने कौंसिल के समक्ष उपस्थित होकर
अपनी व्यथा कही तो कौंसिल के सदस्यों को वहाँ कई गलतियाँ
मिली। हॉस्पीटल के डाक्टर ऑपरेशन के लिये प्रशिक्षित नहीं हैं।
एनस्थीसिया वाला डाक्टर समिति में रजिस्टर्ड नहीं है पर्याप्त
प्रशिक्षित स्टाफ भी हॉस्पीटल में नहीं पाया गया। मरीजों को मिलने
वाली अन्य सुविधायें भी पर्याप्त नहीं पायी गई ।
ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल प्रबंधन की दादागीरी पर चलते हैं।
यूनियन का अस्पताल होने के कारण कोई शिकायत भी नही करता।
ग्रामीण लोग शिकायतें भी नहीं करते और प्रबंधन अपनी मनमानी
करते रहते हैं , प्रायः आये दिन डाक्टरों की लापरवाही से मौतें होती
रहती है। आयुष्मान कार्ड के अनुचित लाभ लेने के कारण अस्पताल
की आय प्रतिदिन बढती जा रही है।
इस प्रकरण में जैसे ही अस्पताल प्रबंधन को अपनी कमियों का
अनुभव हुआ वैसे ही उन्होने ऊपर बैठे अपने नेताओं से बात कर
वातावरण को अपने अनुकूल बनाना प्रारम्भ कर दिया और स्वास्थ्य
मंत्री से मिलकर दबाव बनाया कि इस वनवासी व ग्रामीण अंचल में
डाक्टरों और अस्पताल पर कार्यवाही हुयी तो अस्पताल बंद हो
जायेगा और जनता को बहुत तकलीफ होगी अपनी संख्या बल के
कारण प्रबंधन द्वारा विभागीय मंत्री पर भी दबाव बनाकर मेडीकल
कौंसिल की रिपोर्ट को सार्वजनिक ना होने देने में सफल हो गये और
अपराधी डाक्टर बच गये ।
मनीषा को जब यह बात पता हुयी तो उसने सोचा कि वह भी
पिछले पचास वर्षो से पार्टी की सेवा करती आ रही है। मंत्री जी उसे
स्वयं जानते पहचानते हैं, उसके बेटे की मृत्यु का मामला है मंत्री जी
भले आदमी हैं, उसकी जरूर सुनेगें। आखिर एक दिन वह मंत्री जी
से मिलने गई और अपनी सब व्यथा सुनायी। वह सोच रही थी मंत्री
जी उसके बेटे की मृत्यु पर संवेदना के दो शब्द कहेंगें परन्तु मंत्री जी
ने उससे कहा- वे भी यूनियन के लोग हैं यदि कार्यवाही की तो वे
नाराज हो जायेंगें और अस्पताल बंद हो जायेगा, आखिर चुनाव भी तो
देखना है।
मनीषा मंत्री जी का उत्तर सुनकर अवाक रह गई। उसे अपने
पैरों के नीचें से जमीन खिसकती नजर आई। उसे लगा पचास वर्षों
तक पार्टी की सेवा करना व्यर्थ हो गया। राजनीति अपने स्वार्थो पर
चलती है। जनता व कार्यकर्ताओं की कौन सुनता है? पार्टी सेवा में
बिताये अपने पचास वर्षों पर उसे पश्चाताप हो रहा था। घर के
जरूरी काम छोड़कर वह दिन-दिन भर पार्टी के हित में अपना तन-
मन- धन लगाती रही।चुनाव में नेताओं को जिताने के लिए मेहनत करती रही, उसका उत्तर मंत्री जी ऐसे देंगे, उसने कभी सोचा भी नहीं था. पचास वरषो की अपनी निस्वार्थ सेवाओं का
प्रतिफल यह मिला।नेताओं की अवसरवादिता उसे गहरे तक हिला गई. फिर उसने पार्टी के लिए काम ना करने का निर्णय लिया.
छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा
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