अभी-परीक्षा शेष है
मैं बरामदें में बैठी मोबाइल देख रही थी। दरवाजे पर आहट ने
मेरा ध्यान खींचा ,गेट तक दुष्टि घुमाई तो श्रीमती लता तिवारी अपनी
बेटी वर्षा के साथ आ रही थी। चेहरे पर चिरपरिचित सौम्य आकर्षक
मुस्कान व जीवन के खट्टे -मीठे अनुभवों की छाप लिये वह मेरे
निकट और मैं उनके निकट पहुंच गयी और हम दोनो एक दूसरे को
गले लगाकर गहन आत्मीयता का अनुभव करती हुयी, कमरे में बैठ
गई। श्रीमती लता तिवारी कहने लगी "अब गोंदिया जा रही हूँ तो
सोची ,आप से मिल लूँ फिर ना जाने कब आपसे मिलना हो" ।
मैने आश्चर्य से उनकी ओर देखते हुये पूछा - गोंदिया?
जा रही हैं आप? और कितने दिनों के लिये जाना है? वें बोलीं "दीदी
कल सुबह हम लोग गोदिया के लिये निकल जायेंगे, सामान आज
ट्रक से भेज दिया है ,अब वहीं रहने का विचार है"। वह मुझे बड़ी
बहन जैसा सम्मान शुरू से देती आई है इसलिये दीदी कहकर
संबोधित करती है।
बात को ठीक से समझने के लिये मैने फिर से पूछा "यहाँ का
घर व पोल्ट्री फार्म का क्या किया ?" वो बतला रही थीं घर और
पोल्ट्री फार्म दोनो एक ही बड़े मकान के दो हिस्से थे मकान के
साथ-साथ उसे भी बेच दिया। आयु अधिक होने व कर्मचारियों की
समस्याओं के कारण पोल्ट्री फार्म व डेयरी बंद कर दी थी, डेयरी की
जमीन कई वर्ष पहले ही बेच दी थी। अब घर व पोल्ट्री फार्म बिक्री
कर दिया हैं और गोंदिया में एक फलैट ले लिया वहीं हम दोनो (पति
श्री तिवारी जी) रहेंगे'।
मैने फिर पूछा --"इस आयु में नये परिवेश में नये सिरे से
गृहस्थी जमाना बड़ा कष्ट दायक होगा' ,अब बेटी वर्षा बीच में बोली--
"आन्टी, फ्लैट काफ़ी पहले बुक कर दिया था और अब पूरी व्यवस्था हो गई है"। वर्षा
व उसके वकील पति के सहयोग से हुयी व्यवस्था की जानकारी
सुखद अनुभूति दे गई। मिसेज तिवारी ने बतलाया, तिवारी जी का
पूरा परिवार गोंदिया में निवासरत है, वहाँ अन्य भाईयों के परिवार व
उनके बेटे, पोते, पोतियाँ व वर्षा बेटी का परिवार होने से पारिवारिक
वातावरण मिलता रहेगा, अब जीवन वहीं व्यतीत करना है ,यही
सोचकर यहाँ की पॉपर्टी बेच कर गोंदिया में रहने का निर्णय लिया
है।
मैने लता से पूछा - "बेटे मूकेश का क्या हालचाल है, कैसी है उसकी दुकान
अन्य व्यवस्था?" लता ने बताया--मुकेश की
दुकान अच्छी चल रही हैं, अभी वह किराये के पलैट में अपने परिवार
सहित- पिंकी पुत्रवधु व रवि बेटे के साथ रहते है, रवि सी.ए. की
पढ़ाई कर रहा है तो ज्यादातर रायपुर में रहता है। मुकेश के लिये
प्लाट छोड़ दिया है, जैसा चाहे वैसा मकान मुकेश बनवा सकते है।
पुत्रवधू पिंकी स्कूल में टीचर है, वह सब खुश हैं। हमारा यह मकान
तो पूराने टाइप का बना था। आजकल एक से एक अच्छे शानदार
मकान बन रहे हैं मुकेश जैसा चाहेंगे, मकान बनवा लेंगे और हम भी
मकान बनाने में आर्थिक सहयोग दे देंगें । पिंकी को यह मकान पहले
ही पसन्द नही था इसलिये वे अलग प्लैट में रहते थे। लता का
उत्तर बड़ा ही समझदारीपूर्ण था।
थोडी देर बैठने के बाद मां बेटी जाने लगी। मैने बेटी वर्षा से
कहा --"कभी इधर आना हो तो घर जरूर आना बेटी, तुम लोग बहुत
याद आओगे।" वर्षा ने कहा "आंटी इस आंगन में खेल कर हम बड़े
हुये हैं, पूरा शहर भूल सकते हैं, आपको और इस आंगन को नही भूल
सकते.. कहते कहते भावुक हो उठी वर्षा।
लगभग 40 वर्ष पूर्व श्रीमती लता मेरे घर में किरायेदार की तरह
रहने आयी थी, उस समय मुकेश, वर्षा और रीना छोटे तीन बच्चे थे,
मेरे बच्चे भी छोटे थे। बच्चे बच्चों से हिल मिल गये, आपसी माधुर्य
ऐसा बना कि हम दोनो बहनें बन गई।
मिसेज लता अनुपम सौन्दर्य व शालीनता की मूरत थी। सलीके
से पहनी साधारण साड़ी और माथे की गहरी लाल बिंदिया, काले बाल
और गोरा चेहरे बाली लता, अन्य सम्पन्नता का प्रदर्शन कराती, आभूषणों से
लदी,वस्त्रों से सजी महिलाओं में अलग पहचानी जाती थी। उनके
शालीन व्यवहार व अनुपम सौन्दर्य से मैं सदैव प्रभावित रही। नगर में
सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाना होता सैकड़ों महिलाओं से मिलना
होता है, तो जो प्रभाव लता जी का रहा, उस स्थान को अन्य कोई
महिला नहीं ले पाई। मुझे पिछली बातें याद हो आई, तिवारी जी का
व्यक्तिव भी प्रभावशाली था।
पूरे 6 फीट 3 इंच का लम्बा व आकर्षक
व्यक्तित्व, बुलैट पर घूमते
घूमते वे अपना काम देखते थे। धीरे - धीरे उन्होनें
पड़ोस मे ही एक मकान खरीद लिया और वे लोग उस घर में रहने
चले गये । बच्चों का व हमारा आना जाना बना रहा। समय बीतता
रहा, दिन, सप्ताह, महीने और वर्ष बीतते गये। उनके व मेरे बच्चे बड़े
हुये ,बच्चों की पढ़ाई व शादियों का क्रम भी चलता रहा।
इस बीच मिसेज लता अपने बच्चों के अतिरिक्त तिवारी जी के
परिवार की जिम्मेदारियों को बड़ी शालीनता से निर्वहन करती रही।
तिवारी जी के पिताजी का वर्षों पूर्व देहवासन हो गया था। ननद नीलम की
शादी लता ने ही की, देवर को पढाने के बाद, उनकी भी शादी की।
सासू माँ की सेवा भी लता ही करती थी, बुढ़ापे में माता जी चलने
फिरने में असहाय हो गयीं थीं। बीमारी के समय वे उठ बैठ नहीं पाती
थीं। माताजी की सारी सेवा लता ही करती थी, बाथरूम जाने में
असमर्थ सासु मां को नहलवाना, नित्यकर्म करवाना, उसके बाद स्वयं
नहाकर खाना बनाना और फिर भी मुस्कुराते रहना। आने -जाने
वालों को सम्मान देना, लता की योग्यता व धैर्यता की प्रतिपल
प्रतिदिन परीक्षा हो जाती थी। लता हर बार इस परीक्षा में पास होती गई.
माताजी की अभिलाषा थी कि पोतियों की शादी देख लूं,इस
कारण बेटियों की शादी कर दी, अपने पौत्र की शादी माताजी नहीं
देख पायीं और माताजी संसार से विदा हो गई।
मुकेश की शादी का निमंत्रण हमें भी मिला था। स्वर्ण आभूषणों
व कीमती वस्त्रों से सजी नवविवाहिता पिंकी को देखने का हमें भी
अवसर मिला परन्तु लता के सौन्दर्य के आगे नवविवाहिता पिंकी
ठहर ही नहीं पा रही थी। कुछ कहे बिना बधाई देकर मै घर आ गई
परन्तु एक बार लता की शालीनता व सौन्दर्य की प्रशंसा किये बिना
मेरा मन फिर नही माना।
मुकेश के बड़े होने व पुत्र वधू के आ जाने के बाद लता ने पोल्ट्री
फार्म के काम के साथ-साथ डेयरी का व्यवसाय भी बड़ा लिया था
परन्तु बहू पिंकी नागपुर शहर से आयी थी, तो यह नगर उसको
पसन्द नहीं आ रहा था। बड़े शहर से आना छोटे शहर में बसना उसे
रास नहीं आया। कई बार वह कह चुकी थी, यह शहर कोई रहने
के लायक है? लता अभी भी खाना बनाती, ऊपर कमरे में बहु को
खाना पहुँचाती या बाई से पहुँचवाती। पुत्रवधू के लिये खाना पहुँचाते
समय लता को अपने दिन याद हो आते। शादी होकर जब वह इस
घर में आई थी तो सासू माँ से कितना डरती थीं। सासू मॉ की एक
आवाज पर सब काम छोड़कर दौड़ती थी। तब सासू मॉ को कमरे में
खाना देकर आती थी ,आज वर्षों बाद भी वह वही कर रही है। अब
पूत्रवधू को खाना उनके कमरें में भिजवाती है। कभी- कभी मुकेश भी
ऊपर बहू को खाना पहुँचाता, बहू का कमरा ऊपर था।
धीरे-धीरे पिंकी ने मुकेश को रायपुर में सर्विस करने के लिये
प्रेरित किया। रायपुर में मुकेश की सर्विस लगते ही पिंकी अपने पुत्र
रवि को लेकर रायपुर रहने लगी। किराये के मकान में रायपुर में
उन्होंने कई वर्ष आन्नदपूर्वक बिताये। इस बीच पिंकी एक बिटिया
लवी की माँ भी बन गई। कुछ दिनों के बाद लवी बिटिया की तबियत
खराब रहने लगी। पिंकी ने रायपुर में कई जगह दिखाया परन्तु उसे
आराम नहीं हुआ। पिंकी ने नागपुर में भी बच्ची को दिखाया कुछ
दिनों वहाँ का उपचार चला परन्तु लवी का स्वास्थ्य सुधर नही रहा
था। डॉक्टरों की सलाह पर कैसर पीड़ित लवी को बॉम्बे ले जाना
पड़ा। कैसर के इलाज हेतु पिंकी को बॉम्बे रहना पड़ता था और बाम्बे
में अकेले रहना पिंकी को कठिन होता जा रहा था। मुकेश बार-बार
छुट्टियां लेकर बाम्बे भागते और बच्ची के अच्छा होने के लिये
निरन्तर डॉक्टरों के चक्कर तो लगाते ही साथ ही मंदिरों में ईश्वर से
उसके शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना भी करते थे।
ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था, निरन्तर भाग दौड़ के कारण
मुकेश की छुट्टियां बढ़ती जा रही थी। प्रायवेट कम्पनी वाले भी कब
तक देखते ? मुकेश की नौकरी छूट गयी। अब भी रायपुर वाले घर
का किराया, बिजली बिल हर माह आता था, बॉम्बे का खर्चा अलग
था, इस तरह उनपर आर्थिक बोझ बढ़ने लगा।
अतः लता ने उस समय भी बड़ी समझदारी का परिचय देते हुये
पौत्र रवि को रायपुर से यहाँ लाकर स्कूल में भरती करवा दिया।
रायपुर का घर भी खाली कर दिया। सामान सब यहाँ ले आई। बच्ची
का इलाज अभी भी बाम्बे में चल रहा था, वहाँ खर्चा बढ़ता जा रहा
था, मुकेश के पास पैसे का अभाव निरन्तर बढ़ता जा रहा था। मुझे
मालूम है लता ने अपनी वृध्दावस्था के लिये कुछ पैसे एफ.डी.आर. के
रूप में सुरक्षित रखे थे । इस परेशानी में पौत्री के इलाज व बाम्बे के
खर्च हेतु उन्होने अपनी सुरक्षित एफ.डी.आर तोड़कर पैसे की व्यवस्था
की थी। एफ.डी.आर. तोड़ते समय वह कितनी विचलित हुई थी।
पुत्रवधू के रूखे स्वभाव, उसके आगे मुकेश की विवशता, अपना बुढ़ापा
और बुढ़ापे में अपने शरीर की असमर्थता और वर्तमान स्थितियाँ, उसे
बार विचलित कर देती परन्तु कोई और विकल्प ना देख उसे एफ.
डी.आर. तोड़कर पैसे की व्यवस्था तो करनी ही पड़ी। थोड़े दिनों बाद
वह बच्ची भी दुनियाँ से विदा ले गयी और मुकेश व पिंकी वापस घर
आ गये।
मुकेश व पिंकी को पॉल्ट्री फार्म व डेयरी का काम पसन्द नहीं
था। अतः लता ने डेयरी की गाये व भैसे बेच दी। उन पैसे में और
पैसे डालकर मुकेश को दुकान खुलवा दी और पिंकी को स्कूल में
पढ़ाने का काम मिल गया। धीरे-धीरे जीवन सामान्य
होने लगा, परन्तु पिंकी को ऐसी सासू माँ भी सहन नहीं थी। इसलिये
मुकेश व पिंकी किराये का फ्लैट लेकर अलग रहने लगे थे बहाना था,
घर का पुराना होना। लड़की के मायके वाले कुछ मदद करते हैं तो वे दस जगह बताती हैं और उनके गुण गाती हैं, और जब सास ससुर मदद करते हैं तो उनको अनुभव भी नहीं होता. यही बात दुख देती है. लता का त्याग पिंकी को कभी अनुभव ही नहीं हुआ.
पिंकी का व्यवहार व लहजा लता को परेशान करता
लेकिन वह कुछ नही कहती थी। कुछ कहे और उसने जवाब दे दिया
तो सारी जिन्दगी के लिये रिश्ते खराब हो जायेंगे। ये सोचकर लता
मन न ही मन घुटती रहती थीं।
लता और तिवारी जी भी वृद्ध हो गये है, इस बीच मोटर
साइकिल से एक्सीडेन्ट के कारण तिवारी जी गिर गये। उनकी पैर
की हड़डी टूट गई, महीनों वे बिस्तर पर भी रहे, ऑपरेशन के बाद
भी लगभग एक साल तक वे चलने फिरने में असमर्थ रहे। अब चलते
तो है परन्तु वृद्धावस्था व दुर्घटना ग्रस्त शरीर कितना साथ देता है,
यह भुक्त भोगी ही जानता है । वृद्धावस्था व एकाकीपन तिवारी दम्पति
को कष्ट दे रहे थे। अतः उन्होने नगर छोड़कर गोंदियां बसने का
निर्णय लिया, जहां वर्षा बेटी व अन्य परिजनों के साथ जीवन के शेष
दिन बीत जायेंगे , अभी भी लता ने अपने सौम्य शालीन व्यवहार से
मुकेश, पिंकी के व्यवहार के रूखेपन को आभासित नही होने दिया।
लगातार संघर्ष और अन्तद्वन्द चलता रहा, चाहे इसकी वजह गलतफहमी
पीड़ा, दुख, अपनों की उपेक्षा, रिश्तों में कड़वाहट या कुछ भी हो।
विचारों की उथल पुथल लगातार चलती रहती है, ना कहते बनता ना
चुप रहते बनता। ना जाने कितने ख्याल आते है यदि कह दिया तो
सामने वाला बुरा मानेगा पता नही अंजाम क्या होगा? रिश्तो में दरार
ना आ जाये यह सोचकर वह जीवन भर सब कुछ सहती रही।
गोंदिया में वृद्धावस्था काटना वैसा ही है जैसे बड़े वृक्ष को जड़ों
से उखाड़कर बिरानी वीराने में रोप देना। नये सिरे से जीवन शुरू करना ही
है। कभी-कभी फोन पर लता से बातें होती है पता हुआ ,अभी लता
छोटी बेटी रीना के पास 3 माह रहकर आई है, वहीं उन्होनें अपने
घुटने का ऑपरेशन कराया था ,चलने फिरने लायक हुयी तो वापस
गोंदिया आ गई। लगता है अभी भी परीक्षायें शेष है। जीवन ना जाने
कितनी परीक्षाये लेता है?
छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा
Email - shiromanimathur@gmail.com
Contact- 9893742299