अहंकार
हवा के तेज झोंके उसकी साडी के आंचल और बालों को बिखेर
रहे थे, बार बार वह साड़ी का आंचल सम्हालती, गाड़ी के डब्बे में
आने जाने वाले यात्रियों व उनकी गतिविधियों से बेखबर- वह ट्रेन
में बैठी खिड़की से बाहर के आते जाते दृश्यों को देखती जा रही थी,
परन्तु मन कहीं और पिछली बातों में खोया हुआ था। अनिश्चित
भविष्य, अनिश्चित गंतव्य उसके मन को बार बार भावुक बना देते थे।
भविष्य की चिंता व भय उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रहे थे .
ट्रेन
की गति से भी तीव्र गति से उसका मन दौड़ रहा था। अनेक
आशकांयें उसे परेशान कर रही थी, चिंताएं उसके चेहरे पर झलक
भी रही थी-- सामने की सीट पर बैटे बुज़र्ग सहयात्री - मनोहर लाल
उसकी एक एक गतिविधि का अध्ययन कर रहे थे। उन्हें समझते देर
ना लगी यह कोई कुलीन परिवार की दुखियारी महिला है।
उन्होनें बड़ी आत्मीयता से उससे पूछा- आपका नाम क्या है?
उसने कहा ,- राजश्री, घर में सब राजो कहते हैं।
उन्होने फिर पूछा कहाँ जा रही हो बेटी ?
राजश्री बोली-- मथुरा वृन्दावन जा रही हूँ।
मनोहर लाल ने फिर पूछा- मथुरा वृन्दावन कैसे जा रही हो?
वहाँ कोई रिश्तेदार है या..वाक्य अधूरा छोड़कर वे राजश्री
की और देखते रहे।
वहाँ मेरा कोई नही है, ऐसे ही घूमने जा रही हूँ - राजश्री ने संक्षिप्त
उत्तर दिया।
मनोहर लाल समझ गये मामला कुछ और है। घूमने जाने जैसी कोई
खुशी तो राजश्री के चेहरे पर थी ही नही ,इसलिये उन्होने
फिर पूछा-अकेले ही घूमने जा रही हो, साथ में कोई और नही?
साथ में कोई और नही, शब्द उस को अन्दर तक हिला गये-
सोचने लगी ,क्या उत्तर दूं? साथ में तो कोई है ही नही और किसे
अपना समझे? घर, परिवार, बच्चे, पति सब कुछ छोड़कर आज वह
अकेली अनजान स्थान पर जा रही है। वर्षो पूर्व माता-पिता के साथ
मथुरा वृन्दावन धार्मिक यात्रा पर गई थी। वहां उसने महिला
सन्यासियों को देखा था, आज स्वयं भी सन्यासी बनने की इच्छा
रखकर वह चल पड़ी है- उसे कोई उत्तर देते ना बना। उसकी आंखे
भर आई, पर उसने ऑसू को रोके रखा।
मनोहर ने फिर पूछा-बेटी कुछ तो बताओ वहाँ क्यों जा रही हो?
राजश्री धीरे से बोली- अब वहीं रहूंगी भगवान के
चरणों में जीवन व्यतीत करने की सोची हूँ। माथे पर बिंदिया, मांग
में सिंदूर ,हाथों में चूड़ियॉँ, पैरो में बिछुआ व पायल, कानों में सोने के
टॉप्स उसके कुलीन मध्यमवर्गीय पारिवारिक पृष्ठभूमि का परिचय देने
के साथ साथ उसके सुहागिन होने का साक्ष्य प्रस्तुत कर रहे थे।
राजो स्वयं को सन्यासिन बनने की बात- कह रही हैं यह उनकी
समझ में नही आई, इसलिये बुजूर्ग व अनुभवी मनोहर लाल ने फिर
पूँछा - बेटी आपके कितने बच्चे हैं?
राजश्री ने कहा- तीन बच्चे हैं।
मनोहर ने पूछा- "बच्चे कितने बड़े हैं और क्या करते है"?
उसने कहा - "बड़ा बच्चा 5वीं कक्षा में पढ़ रहा है, दूसरा बच्चा
दूसरी कक्षा में पढ़ रहा है, छोटा अभी छोटा... कहकर वह भावूक हो
गई शब्द अधूरे रह गये।
बात को आगे बढ़ाते हये उन्होने पूछा - पति क्या करते हैं?
राजो ने कहा-उनकी "कपड़े की दुकान है।
मनोहर लाल ने फिर पूछा "दुकान कैसी चलती है?
राजश्री ने कहा-"अच्छी चलती है। थोक कपड़े की नगर में एक
ही दुकान है इसलिये अच्छी चलती है।" मनोहर की उत्सुकता बढ़ती
गई और मनोहर को समझते देर ना लगी कि यह महिला किसी
पारिवारिक परेशानी से ग्रसित दुखी महिला है। मथुरा, वृन्दावन में
कहीं भी गलत लोंगो के बीच फंस सकती है, इसलिये उन्होंने
आत्मीयता से बात करते हुये स्थिति को समझने का प्रयास किया।
धीरे-धीरे राजश्री भी मनोहर लाल की बातचीत से समझ गयी कि
मनोहर लाल कोई भले सज्जन व्यक्ति हैं इसलिये उसने अपनी
आपबीती सुनायी कि-
"पति अपने माता-पिता के एकलौते बेटे हैं और बहुत ही
मातृभक्त है। सासू मॉ बहुत ही क्रूर स्वभाव की कड़क महिला है।
ससुर व पति को मेरे विरूद्ध रोज भड़काती है और गलतफहमियां
पैदा करती हैं, जिससे घर में लड़ाई झगड़ा होता है। लगभग रोज
ही पति उसको बेरहमी से मारते व गालियाँ देते है ।"
मनोहर लाल ने कहा "तुमको अपनी बात अपने रिश्तेदारों को
बतानी चाहिये थी"।
राजश्री ने कहा "हमारे घर में पर्दा प्रथा है, फिर भी मैने
किसी-किसी को अपनी बात बतायी तो कुछ लोग तो सास की बातों
मे हाँ में हॉ मिला देते है। ससूर या अन्य किसी रिश्तेदार ने न्याय
की बात कहीं भी तो सासु माँ ससुर तक को लांछन लगाकर मुझे व
उन्हें बदनाम करती हैं। दुसरे के लिये कौन लांछन सहेगा ? सब चुप
रह जाते हैं। मैं भी सास के स्वभाव से दुखी रहती हूँ। कई बार
दो-दो तीन-तीन दिन खाना नही खाती तो कोई पूछने वाला नही
होता कि मुझ पर क्या बीत रही है?"
मनोहर लाल ने कहा "'तुमने अपने पिता को यह सब हाल नही
बताया क्या?"
राजश्री ने कहा-- "उनको सब मालुम है वे कई बार आये भी
थे। उन्होनें भी इन लोंगों को बहुत समझाया ,कई बार वे मुझे मायके
ले भी गये, परन्तु वे समझा बुझाकर फिर ससुराल भेज देते है। वह
भी प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। बदनामी के डर से कुछ भी कर नही पाते हैं,
परन्तु मेरा जीवन नारकीय हो गया है। दिनभर घर व बच्वों का काम,
ऊपर से सास और पति की गालियाँ, मारपीट, धमकी, घुड़की झेलते
हये अब त्रस्त होकर मैने वह घर छोड़ दिया और अब मैं सन्यासिन
माताओं के साथ जीवन बिताऊंगी यही सोचकर घर से चली हूँ।"
मनोहर लाल दुखियारी राजश्री की स्थिति समझ रहे थे उन्हें
मालूम है, सन्यासिनों का जीवन कैसा होता है? उन्होनें राजश्री को
ऊँच-नीच बहुत समझाया और राजो को अपने घर चलने के लिये
विवश किया। मथुरा में वे राजश्री को अपने घर ले आये। राजश्री से पता
पूछकर उन्होंने देहली में राजश्री के मामा को व गांव रामपुर
उसके पिता को खबर कर दी कि राज श्री उनके यहाँ है।
राजश्री के ससुराल से चले जाने की खबर हवा की तरह
फैल गई थी। राजश्री के पिता व मामा को भी पता था कि दुखी होकर
राजश्री ससुराल छोड़कर कहीं चली गई है। खबर मिलते ही मामा व
पिता दोनो मथुरा में मनोहरलाल के घर पहुँचे। राजश्री (राजो) को
बहुत समझाया परन्तु अब वह ससुराल जाने को तैयार नही थी, अतः
राजश्री मामा के साथ दहेली चली गई । दहेली में मामा के घर
में रहते हुये राजो ने सिलाई कढ़ाई का काम सीखा वैसे भी राजो
सिलाई कढ़ाई करती थी, परन्तु देहली में रहकर उसने अच्छे से
सिलाई कढ़ाई सीखकर दोनों के डिप्लोमा ले लिये।
पति गृह से आने के बाद वहाँ कोई प्रतिक्रिया नही थी , वहाँ तो
अहंकार का साम्राज्य था। उन्होनें ना तो राजश्री को खोजने का
प्रयास किया, ना ही अपनी करनी पर कोई पश्चाताप, उन्होनें सोचा
वह मायके गई होगी ,वापस आ ही जायेगी- कौन पिता अपनी बेटी
को रख पाया है ,जो उसका पिता उसे रखेगा। लौट फिर कर, ठोकरें
खाकर हमारे ही घर आयेगी। जब भी किसी ने उन्हें समझाने हेतु बहू
को घर लाने के लिये कहा, तो भी माँ बेटे का सीधा जवाब होता था-
"ना हमने भेजा है ,ना हम लेने जायेंगे। अपने मन से गई है तो अपने
मन से आये'। अपने किये दुर्व्यवहार पर उन्हें कतई पश्चाताप नहीं
था। उनके व्यवहार से लगता था कि बहु घर की सदस्य ना
होकर घर का कचरा थी , जो बाहर निकल गई, उसके प्रति कहीं भी
संवेदना नही थी।
राजश्री के घर में ना रहने से सास को घर सम्हालने में परेशानी
होती थी परन्तु अहंकार वश सासू यशोदा अपनी थकान व परेशानी
को प्रकट होने नहीं देती थी। पति राजेश का भी यहीं हाल था।
यशोदा की सुविधा के लिये उन्होने नौकरानी रख ली थी परन्तु पत्नी
को बुलाना उनके अहंकार को स्वीकार्य नही था। पत्नी जैसा निरीह
प्राणी कहाँ मिलता है? अपने पुरूषत्व व अहंकार का प्रदर्शन उसी के
समक्ष प्रकट करने पर पुरूष का अहम संतुष्ट होता है। यही धारणा
राजेश की थी।
लगभग साल भर बाद राजश्री को पिता गांव ले आये और
उसकी पढ़ाई की व्यवस्था की। शादी से पूर्व राजश्री कक्षा आठवीं
तक गॉव के स्कूल में पढ़ी थी। उन दिनो लड़कियों को पढ़ाने का
रिवाज नही था, इसलिये आठवीं पास कर घर के काम सीखने लगी
थी। 16 वर्ष की आयु में ही उसकी शादी भी कर दी गई थी, परन्तु
अब दुखद स्थितियों में पिता ने उसे पढ़ाकर आत्मनिर्भर बनाने की
सोची और उसकी पढ़ाई की व्यवस्था की। धीरे-धीरे राजो ने बी.ए.
पास कर लिया और राजश्री कस्बे के सरकारी स्कूल में टीचर बन
गई।
यद्यपि राजश्री टीचर बन गई थी परन्तु इस बीच वह वड़ी
मानसिक यंत्रणा व संताप से गुजरी थी। तीन छोटे- छोटे बच्चों को
छोड़कर रहना , सरल काम नहीं था। बात बात में उसे बच्चे याद आते,
कितना भी हो, उसे अपना घर याद आता, परन्तु वहाँ की यंत्रणायें
उसे विचलित कर देती इसलिये वह अपने निश्चय पर अडिग रही कि
उसे ससुराल-उस घर-में नही जाना है। कालान्तर में सास वृद्ध
हुयी और स्वर्ग भी सिधार गई । सासू मॉ के देहॉत पर वह एक दिन
के लिये ससुराल गई थी तब सबका कहना हुआ कि उसे अब वहीं
रहना चाहिये परन्तु तब वह वहाँ नहीं रूकी क्योंकि कुछ लोग तो
कहेंगें कि "सास के मरने का इन्तजार कर रही थी, सास के मरते ही
वापस आा गई।"
राजश्री बड़े ऊहापोह में थी, पति भी अब बुज़र्ग से हो गये थे।
सिर पर खिचड़ी बाल, चेहरे पर झुरियाँ स्पष्ट दिख रही थी, परन्तु
वे शान्त थे। आत्मविश्वास से परिपूर्ण पढ़ी लिखी आत्मनिर्भर पत्नी के
सामने उन्हें अपनी गलतियों का एहसास व आत्मग्लानि हो रही थी,
वह कुछ बोल ही नहीं पाये। राज श्री बच्चों को बार-बार देखती, कभी
घर को देखती, कभी पति को , आखिर वह दिल को कड़ा
करके वहाँ से चली आई। मेहमानों के सामने कुछ बात भी नही हो
सकती थी।
वहां से आकर वह अपनी डयूटी पर जाने लगी परन्तु बच्चों से
मिलने के बाद अब उसे बच्चे व वह परिवार याद आने लगा। बच्चे
भी अब बड़े हो गये थे, छोटे बेटे को छोड़े वर्षो हो गये थे, जिसके
प्रति वह अपने दायित्व का निर्वाह भी ठीक से नही कर पायी थी-
वही छोटा बेटा उसे घर में रूकने के लिये बार-बार कह रहा था।
वह रोज सुबह स्कूल जाती शाम को घर आती, परन्तु उसे बच्चों
व पति की याद निरन्तर आती। उन सभी की पारिवारिक परेशानियाँ
उसे बार-बार द्रवित कर देती, परन्तु पति के बिना कहे वह वहां
रूकती भी तो कैसे? पता नहीं अभी भी उनके मन में कट्ता भरी
भरी हो,
भले ही वह आर्थिक रूप से आत्म निर्भर थी परन्तु मातृत्व उसे अभी
भी कर्तव्य पथ दिखा रहा था। यही सब सोचकर राजश्री
भावुक हो जाती और अकेले में अपने भाग्य पर बहुत रोती थी। रोयी
तो वह तब भी बहुत थी, जब वह उस घर व बच्चों को छोड़कर आई थी।
लगभग दो माह बाद एक दिन शाम को अचानक बिना किसी
पूर्व सूचना के राजेश उसके घर आ ही गये। बिना किसी पूर्व सूचना
के पति को आया देखकर राजो फिर असंमजस में पड़ गई। कई
विचार उसके मन में एकदम कौंध गये, बातचीत करने पर अनुभव
हुआ कि अब जिंदगी की ठोकरें खाकर उनका अहंकार चूर चूर हो
चुका था। अपनी पिछली गलतियों के लिये वे बहुत शर्मिन्दा थे और
माफी भी मॉग चुके थे। उन्होने नौकरी छोड़कर घर चलने के लिये
राजश्री को विवश किया। इस बीच पिता भी संसार से विदा हो चुके थे,
वृद्धा मां से आज्ञा ले कर राजश्री पति के साथ अपने घर चली आई।
छतीसगढ़ रत्न
डॉ.शिरोमणि माथुर
दिल्ली राजहरा
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