परमार्थ
डा. सिंह साहब के घर कोहराम मचा हुआ था। उनका मंझला
बेटा गगन सुबह-सुबह चल बसा था। सिंह साहब की पत्नी पछाड़
खा खाकर रो रही थी। गगन की पत्नी श्रेया भी रोये जा रही थी,
दो छोटे-छोटे बच्चो को छोड़कर गगन दुनियाँ छोड़कर चला गया
था। सबका दुखी होना स्वभाविक भी था। होली त्यौहार के एक दिन
पहले गगन का यों जाना पास पड़ोस में सभी के लिये दूखदायी था।
सुबह सुबह पलंग पर ही सोये हुये ही उनके प्राण पखेरू उड़ गये
थे।
परिजनों का दुःखी होना स्वाभाविक था। कुछ वर्ष पूर्व
सिंह साहब के बड़े बेटे मदन की भी हदयघात से मृत्यू हो गयी थी।
वह भी दो बच्चों- एक बेटा और एक बेटी व पत्नी को अपने पीछे
छोड गया था।
युवा पुत्र मदन की मृत्यु के बाद से डा. सिंह साहब उदास रहने
लगे थे। कहीं आना जाना उन्होनें छोड़ दिया था। सरकारी नौकरी
से रिटायरमेंट के बाद वह घर में ही रहने लगे थे , नौकरी के समय
भी उनका परिचय लोगों से अच्छा था। पेशे से डाक्टर सिंह साहब
बातचीत में निपुण थे। लोगो को उनसे मिलना जुलना अच्छा लगता
था। डाक्टर साहब घर में आने वाले मरीजों को घर में ही देख कर
दवा दे देते थे, इसलिये रिटायरमेंट के बाद भी उन्हें खालीपन या
सूनेपन का अनुभव नहीं होता था परन्तु बड़े बेटे के निधन के बाद वे
टूट गये थे। विधवा बहू श्रद्धा और छोटे पोते-पोती को देखकर वे बेचैन हो
जाते थे।
वर्षो पूर्व डा. साहब के सर्विस काल में ही उनके छोटे पुत्र पंकज
की 15 वर्ष की आयु में अपने मित्र के साथ मोटर साइकिल चलाते
हुये ट्रक से टकरा जाने के कारण मृत्यु हो गयी थी। पकंज को वे
भूल भी नही पाये थे, फिर बड़े पुत्र मदन की मृत्यु भी डाक्टर के लिये
अत्यन्त कष्टदायी था। रिटायरमेंट के कुछ दिनों बाद ही मदन भी
हृदयघात से चल बसे। एक तो सरकारी नौकरी से रिटायर होना
फिर बेटे की मृत्यु से डाक्टर दिन प्रतिदिन टूटते गये ।
पत्नी वासन्ती जब जब उनसे खाने के लिये कहती तो डाक्टर
साहब कहते,-- क्या रखा है दुनियाँ में? अब खाने में भी क्या रखा
है?... तुम बार बार कहती हो तो खाने बैठ जाता हूँ- परन्तु खाया
ही नही जाता, और वे विषाद से भर जाते।
वासन्ती समझाती - भगवान के आगे किसी का वश नहीं
चलता,--- हमने तो कभी किसी का बूरा नहीं किया ,मन में संतोष
रखो ,खाना नही खाओगे तो शरीर नहीं चलेगा। परिवार व बच्चों
को भी देख़ना है।
परन्तु यह बातें मन नही समझता, पिता की ममता और वात्सल्य
के आगे यह सारे तर्क बेकार हो जाते हैं। डाक्टर साहब रात-रात
भर नही सोते थे ---अकेले में रोते रहते थे। कभी कभी जीवन उन्हें
निराश सा लगता, ---हर त्यौहार उन्हें रूला देता, वृद्धावस्था में वे बहुत
ही भावुक हो गये थे।
पत्नी वासन्ती भी पति के सामने ना रोकर अकेले में रोती थी।
बहू व बच्चों के सामने रोने से परिवार के सदस्य दुखी होंगें व घबरा
जायेंगे। परिवार के सभी सदस्यों का यही हाल था। बहू भी सास
ससुर वृद्ध हैं, यह सोचकर घर काम में लगी रहती थी परन्तु सभी
दुखी थे, सभी अशान्त ,एक दूसरे से अपना दुख कह नही पाते थे, और
चुप रहते थे । ऐसा जीवन कितने दिन चलता - डाक्टर साहब मदन
की मृत्यु के सदमें को झेल नहीं पाये और कुछ दिनों बाद वे भी
हृदयघात से संसार से विदा हो गये।
ऐसे कठिन समय में वासन्ती ने बड़े धीरज से काम लिया, पति
की मृत्यु के बाद परिवार को सम्हालना बहुत मुश्किल था, वह भी तब
जब डाक्टर की विजातीय उप पत्नी मीना भी थी। डाक्टर की मृत्यु
पर वह भी अपने बच्चों के सहित यहाँ आ गई। एक साथ दो नारियाँ
विधवा हो गई। घर रूदन-घर बन गया, जिसकी पीड़ा पड़ोस व
वातावरण में व्याप्त हो गई थी। अड़ोस पड़ोस सभी दुखी थे। सभी
की सहानुभूति डाक्टर परिवार के प्रति थी- परन्तु विधि का विधान
मिटाये नही मिटता, सब भोगना ही पड़ता है।
डाक्टर साहब की मृत्यु के बाद वासन्ती अपने मंझले पुत्र गगन
के साथ साथ मीना के बच्चों का भी ध्यान रखती थी। धीरे से वासन्ती
ने गगन की शादी की और मीना की बेटी नेहा की शादी अपने घर
से ही की, जबकि मीना गॉव में रहती थी। विजातीय उप पत्नी मीना
का यदि वासन्ती साथ ना देती तो समाज में मीना के बच्चों को
सम्मान मिलना कठिन हो जाता इसलिये वासन्ती ने मीना की बेटी
नेहा का विवाह सुयोग्य स्वजातीय वर से कर दिया था, और मीना के
बेटे मनीष के लिये भी अपनी रिश्तेदारी से बेटी मांगकर, शादी कर
दी। इस तरह सभी बच्चो की शादी हो गई थी। सब बच्चे अपने अपने
काम धन्धे में व्यस्त थे। किसी तरह वासन्ती भी अपने दुखों को भूलती
जा रही थी। गहन कर्तव्य बोध उसे निरन्तर काम में व्यस्त रख रहा
था।
अचानक बिना किसी बीमारी के गगन की घर में सोये- सोये
मृत्यु हो जाना, वासन्ती के लिये हृदय विदारक घटना थी, वह भी
होली से एक दिन पहले । फिर एक बहू विधवा हो गयी फिर दो बच्चे
अनाथ हो गये । अब वासन्ती भी वृद्धा हो गई है। उससे भी काम नहीं
होता था परन्तु उसकी दूरगामी सोच उसके व्यक्तित्व को सदैव
निखारती रही। अभी भी उसने बहु व बच्चों को अपने सीने से लगा
के रखा, हर समय बहू श्रेया व गगन के बच्चों का ख्याल रख रही थी।
बड़ी बहु श्रद्धा भी वासन्ती का सहारा बनती थी।
मदन के बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था भी वासन्ती बनाती रहती
थी। मदन के पुत्र तेजस से उसने पूछा - तेजस तुम क्या पढ़ना
चाहते हो?
बोला - दादी मैने तो "मैथ्स, साइन्स ली है, मैं बी.ई.
करना चाहता हूँ।"
वासन्ती ने रायपुर में अपने रिश्तेदार के सहयोग से तेजस का
बी.ई. में एडमिशन दिलवा दिया। इसी तरह तेजस की बहन नीति को
एम.काम, के बाद बी.एड. में एडमीशन दिलवाकर बच्चों के पढ़ने की
भी व्यवस्था बनायी।
यह सब करते हुये भी वासन्ती गगन को भूल नहीं पाती।
बूढ़ापे का सहारा गगन का वियोग उससे सहन नही हो पा रहा था।
वह भी बीमार रहने लगी। तीनों बेटों व पति की मृत्यु उसे घुन की
तरह खोखला करते जा रहे थे। सीमित साधनों में सब कुछ
व्यवस्थित रखना उसकी विशेषता व सबसे बड़ी उपलब्धि थी। बुढ़ापा
और दुख उसे खोखला करते जा रहे थे परन्तु आत्मबल और पवित्रता
उसके चेहरे पर सदैव छायी रहती।
एक दिन वासन्ती अपनी पुत्र -वधू श्रद्धा से बोली -"लगता है।
अब मैं ज्यादा दिन नहीं चलूंगी'।
"ऐसा क्यों कह रही हो- मॉजी- श्रद्धा ने कहा।"
जो यथार्थ है वही कह रही हूँ। मैंने सुना है, पितरों के मोक्ष के
लिये भागवत कथा कराना चाहिये, मेरे घर से डाक्टर साहब सहित
तीनो बेटे खत्म हो गए हैं। मैं भी भागवत कथा करवाऊँ क्या? उसने
प्रश्नवाचक दृष्टि से श्रद्धा को देखा।
श्रद्वा बोली- 'जैसी आपकी इच्छा, परन्तु भागवत-कथा में
खर्चा बहुत आता है"।
"जैसे यह सब काम हो रहे हैं वैसे ही खर्चा कम करके कथा
भी हो सकती है। सुना है पंडित मोहन प्रसाद चतुर्वेदी अच्छी भागवत
-कथा कहतें हैं और दक्षिणा भी ज्यादा नहीं मॉगते। यदि तुम्हारी
राय हो तो एक दिन जाकर उनसे बात कर आऊ"।
श्रद्धा ने कहा - "चलो मैं भी आपके साथ चलती हूँ -अब आप
अकेले कहां जाओगी' ?
इस तरह दोनो सास बहू एक दिन पंडित मोहन प्रसाद चर्तुवेदी
के घर पहुँच गई और उन्होने भागवत कथा सुनने व पितरों के मोक्ष
की बात कही तो पंडित जी बोले- "मैं आपसे ग्यारह रूपये और
नारियल दक्षिणा स्वरूप लेकर कथा सुना दूंगा, आप चिंता मत करो" ।
माघ माह धार्मिक आयोजन के लिये अच्छा माना जाता है, इसलिये
माघ माह में भागवत आयोजन कराने पर सहमति बनी।
वासन्ती में सेवा भाव कूट कूटकर भरा था। माघ महीने में
भागवत कथा का आयोजन होना था। वासन्ती की इच्छा थी कि
करोना काल में मौहल्ले से कई पड़ोसी युवा अकाल मृत्यु को प्राप्त
हुये थे। उसने सोचा वह अपने पितरों के लिये भागवत कथा का
आयोजन कर रही है तो क्यों न पड़ोसी- जो अकाल मृत्यु को प्राप्त
हुये है- उन पितरों को भी कथा का लाभ दिया जाये । इसलिये
वासन्ती पड़ोस में सभी को कथा का निमंत्रण देने गई और मौहल्ले
में करोनाकाल में खत्म हुये लोगों का फोटो लेकर आ गई ताकि अपने
पितरों के साथ साथ पड़ोसी पितरों को भी कथा का लाभ हो- ऐसी
मान्यता है कि भागवत कथा सुनने से मृत आत्मायें तृप्त होकर मुक्ति
पाती है और भटकती नहीं हैं। इसलिये उसने अपने पितरों के साथ
साथ पड़ोसी मृत लोगों के फोटो भी कथा स्थान पर रखकर उनकी
आत्मा की शान्ति हेतु विधि विधान से पूजा अर्चना किया। परोपकारी
व कल्याणकारी कार्यों की सुगन्ध फूल की तरह दूर दूर तक जाती
है व अन्यों को आकर्षित करती है ।
वासन्ती की इस धार्मिक व कल्याणकारी भावना को देखकर पूरे
मौहल्ले के लोग उसके घर आने जाने लगे, जिससे जो सहयोग बना
देने लगे। किसी ने खाने में, किसी ने शामियाने में, किसी ने भगवान
के भोग में, किसी ने यज्ञ हवन सामग्री में सहयोग देना प्रारम्भ किया।
एक के देखा देखी दसरों ने भी कथा आयोजन में सहयोग देना
प्रारम्भ कर दिया। धार्मिक कार्य में सहयोग देने से पुण्य मिलता है व
पाप कर्म नष्ट होते हैं यह भावना विस्तारित होती गई।
भक्तों ने पंडित जी को कपड़े, नारियल, सूखे मेवे, स्वर्ण, रजत
आभूषण, बर्तन व रूपये दक्षिणा स्वरूप दिये | भागवत-कथा का ऐसा
आयोजन हुआ जो सब में भक्ति भाव के साथ भ्रातृत्व भाव जाग्रत हो
गया। सात दिन कैसे बीते पता ही नहीं चला। कथा समाप्ति पर पूरे
मौहल्ले ने मिलकर भव्य भंडारा भी किया।
इस अवसर पर वासन्ती की आँखों में प्रेम, वात्सल्य व कृतज्ञता
के ऑसू थे। उसने सोचा नहीं था कि कथा इतनी भव्य होगी।
वासन्ती सभी के लिये सम्माननीय व आदर्श महिला हो गई। उसने पूरे मौहल्ले के पितरों की मुक्ति के लिए भागवत कथा का आयोजन कर सब को एकता के सूत्र में बांध लिया था।
छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा
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