**📖 हीरो...!**
**भाग 4 : हीरो और सनशाइन**
सुबह की पहली किरणों के साथ आर्या की आँखें खुल गईं। खिड़की से हल्की हवा आ रही थी। रात की बारिश की नमी अभी भी हवा में बाकी थी। उसने बिस्तर पर बैठकर एक पल आँखें बंद कीं। दिमाग में बार-बार वही आवाज़ घूम रही थी—“काश…” और फिर वह छोटी-सी मुस्कान जब इच्छा पूरी हो जाती थी।
आर्या ने सिर हिलाया और उठ खड़ी हुई। आज की शर्ट गहरे नीले रंग की थी। जीन्स और सफेद स्नीकर्स। बैग कंधे पर डाला और नीचे उतर आई। माँ रसोई में थीं।
“आज भी जल्दी?” माँ ने मुस्कुराते हुए पूछा।
आर्या ने दूध का गिलास उठाया।
“हाँ… आज थोड़ा काम है।”
माँ ने उसकी तरफ देखा। आँखों में समझ थी।
“काम या कोई खास चेहरा?”
आर्या ने जवाब नहीं दिया। बस मुस्कुराकर टिफ़िन उठाया और निकल गई। बाइक का इंजन गली में गूँजा। हवा चेहरे से टकरा रही थी। मन हल्का था।
उधर मिशा का घर पहले जैसा शोर से भरा था।
“मम्मी… आज वाला रिबन थोड़ा टेढ़ा लग रहा है…”
माँ ने माथा पकड़ लिया।
“मिशा, कॉलेज जाने का समय हो रहा है।”
मिशा ने आईने में खुद को देखा। दोनों चोटियाँ बाँधीं, गुलाबी रिबन लगाया और मुस्कुरा दी। बैग में आज अतिरिक्त दो चॉकलेट डालीं—एक अपने लिए, एक… शायद किसी और के लिए। दरवाज़े पर खड़ी होकर उसने कहा—
“आज हीरो को कुछ देना है।”
माँ ने हैरानी से देखा लेकिन मिशा भाग चुकी थी।
कॉलेज गेट पर पहुँचते ही मिशा की नज़र काली बाइक पर पड़ी। आर्या हेलमेट उतार रही थी। मिशा दौड़ती हुई पास गई।
“गुड मॉर्निंग हीरो!”
आर्या ने मुड़कर देखा। उसकी आँखों में हल्की मुस्कान थी।
“गुड मॉर्निंग। आज बहुत एनर्जी है?”
मिशा ने बैग से एक चॉकलेट निकाली और आगे बढ़ाई।
“ये… कल के पकोड़ों का शुक्रिया।”
आर्या ने चॉकलेट ली। रैपर साधारण था, लेकिन मिशा के हाथ से मिला हुआ लग रहा था।
“शुक्रिया की ज़रूरत नहीं थी।”
“फिर भी…”
दोनों साथ अंदर घुसे। गलियारे में कुछ छात्रों ने उन्हें देखा। फुसफुसाहट शुरू हो गई।
“देख… हीरो और वो छोटी वाली…”
“कल बारिश में साथ जा रहे थे।”
“सच में?”
मिशा ने सुना लेकिन परवाह नहीं की। आर्या भी चुपचाप चलती रही। दोनों की चाल अलग थी—एक शांत और स्थिर, दूसरी उछल-उछल कर। फिर भी लग रहा था जैसे वे एक ही लय में चल रहे हों।
पहली क्लास के बाद ब्रेक में मिशा सिया और कुछ अन्य लड़कियों के साथ बैठी थी। अचानक एक लड़की बोली—
“अरे मिशा, तुझे तो हीरो ने अपना बना लिया लग रहा है।”
मिशा की आँखें गोल हो गईं।
“क्या मतलब?”
“कल बारिश में छोड़ने गई, कोल्ड कॉफी, केक… सब सुन रखा है लोगों ने।”
सिया हँस पड़ी।
“और लाइब्रेरी वाली सीट भी।”
मिशा के गाल हल्के गुलाबी हो गए। उसने शर्माते हुए कहा—
“वो बस… मदद करती है।”
एक और लड़की बोली—
“मदद? या फिर तुम उसकी कमजोरी हो?”
मिशा कुछ जवाब नहीं दे पाई। तभी गलियारे से आर्या गुजरी। उसकी नज़र मिशा पर पड़ी। उसने दूर से ही सिर हिलाया। मिशा ने मुस्कुराकर जवाब दिया। लड़कियाँ एक-दूसरे को देखने लगीं।
“देखा? नज़रें मिलते ही मुस्कान।”
दोपहर की क्लास के दौरान मिशा का ध्यान बार-बार खिड़की पर जा रहा था। लेक्चर खत्म होते ही वह बाहर निकली। गार्डन की तरफ जा रही थी कि अचानक उसकी चोटी का रिबन खुल गया और हवा में उड़ने लगा। मिशा भागते हुए रिबन पकड़ने गई। रिबन पेड़ की निचली डाल पर अटक गया।
“अरे… मेरा रिबन…”
वह पैर की उंगलियों पर खड़ी होकर हाथ बढ़ा रही थी लेकिन पहुँच नहीं पा रही थी। तभी पीछे से एक आवाज़ आई—
“रुको।”
आर्या पास आई। उसने आसानी से रिबन निकाल लिया और मिशा की तरफ बढ़ाया।
“लो।”
मिशा ने रिबन लिया और दोनों हाथों से पकड़े रखा।
“तुम हमेशा कैसे…”
“कैसे क्या?”
“जब भी मुझे किसी चीज़ की ज़रूरत होती है… तुम आ जाती हो।”
आर्या ने कंधे उचकाए।
“संयोग होगा।”
मिशा ने सिर हिलाया।
“नहीं… ये संयोग नहीं है।”
आर्या कुछ नहीं बोली। उसने मिशा की खुली चोटी की तरफ देखा।
“बाँधूँ?”
मिशा हैरान रह गई। फिर धीरे से सिर हिला दिया। आर्या ने उसके पीछे खड़े होकर सावधानी से चोटी बाँधी। उँगलियाँ बालों में फँस रही थीं। मिशा चुपचाप खड़ी रही। दिल की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी। आर्या ने रिबन लगाकर कहा—
“हो गया।”
मिशा ने मुड़कर देखा। आर्या का चेहरा पहले से थोड़ा करीब था। दोनों की नज़रें मिलीं। एक पल के लिए समय रुक सा गया। फिर आर्या ने कदम पीछे किए।
“चल… क्लास का समय हो रहा है।”
शाम को कॉलेज खत्म होने पर गेट के बाहर भीड़ थी। मिशा सिया के साथ खड़ी थी। अचानक एक लड़का जोर से हँसा—
“अरे देखो… हीरो और सनशाइन आ गए।”
मिशा ने सिर घुमाया। आर्या बाइक के पास खड़ी थी। लड़के की आवाज़ सुनकर आर्या ने भी देखा। मिशा के गाल लाल हो गए।
“सनशाइन?”
सिया हँस पड़ी।
“हाँ… क्योंकि तू जहाँ जाती है वहाँ रोशनी ले आती है। और हीरो… वो तो हीरो ही है।”
नाम हवा में फैल गया। अगले ही दिन कॉलेज के कोने-कोने में यही चर्चा थी—“हीरो और सनशाइन”। जहाँ आर्या होती, थोड़ी देर बाद मिशा जरूर दिख जाती। जहाँ मिशा होती, कुछ ही देर में आर्या पहुँच जाती। जैसे दोनों की दुनिया एक-दूसरे के बिना अधूरी हो।
एक बार दोपहर में मिशा गार्डन में बैठी थी। अचानक उसकी आँखों में आँसू आ गए। सिया ने पूछा—
“क्या हुआ?”
मिशा ने धीरे से कहा—
“मेरा टेडी कीचेन… बैग से गिर गया होगा। माँ ने दिया था…”
वह उदास हो गई। तभी गार्डन के रास्ते से आर्या आती दिखी। उसके हाथ में वही छोटा सा टेडी कीचेन था।
“ये तुम्हारा है?”
मिशा की आँखें चमक उठीं। वह उठकर आर्या के पास गई और बिना सोचे उसके हाथ से कीचेन ले लिया। फिर अचानक आर्या को हल्के से हग कर लिया।
आर्या एक पल के लिए पूरी तरह सन्न रह गई। उसके शरीर में अकड़न सी आ गई। फिर धीरे से उसने मिशा के सिर पर हाथ रखा।
“पागल।”
मिशा ने चेहरा उठाया। आँखों में आँसू थे लेकिन मुस्कान भी थी।
“हाँ… लेकिन तुम्हारी।”
आर्या की साँस एक पल के लिए रुक गई। उसने कुछ नहीं कहा। बस मिशा के बालों को सहलाया और धीरे से कहा—
“अगली बार ध्यान रखना।”
मिशा ने सिर हिलाया। दोनों अलग हुए। लेकिन वह पल दोनों के दिल में बैठ गया।
शाम को घर लौटते समय मिशा ने आर्या का हाथ हल्के से पकड़ लिया।
“हीरो…”
“हाँ?”
“अगर मैं रोज़ तंग करूँ…”
“करना।”
“अगर रोज़ केक माँगूँ?”
“मिलेगा।”
“अगर रोज़ हग माँगूँ?”
आर्या रुक गई। उसने मिशा की तरफ देखा। आँखों में हल्की मुस्कान थी।
“उसके लिए परमिशन नहीं लेनी पड़ती।”
मिशा खिलखिलाकर हँस दी और सीधा आर्या के कंधे पर सिर रख दिया। दोनों धीरे-धीरे गेट की तरफ बढ़े। आसपास के छात्र देख रहे थे। कोई हँस रहा था, कोई मुस्कुरा रहा था। लेकिन दोनों को किसी की परवाह नहीं थी।
रात को मिशा ने डायरी में लिखा—
“आज मुझे एक नया नाम मिला—सनशाइन।
और हीरो ने मेरी चोटी बाँधी।
मेरा टेडी वापस दिया।
और कहा—हग के लिए परमिशन की ज़रूरत नहीं।
मुझे लगता है…
मेरी दुनिया अब पहले से कहीं ज़्यादा रोशन है।”
उधर आर्या ने नोट में लिखा—
“आज पहली बार किसी ने मुझे इस तरह हग किया।
बिना सोचे।
बिना हिचकिचाहट के।
और मैं…
एक पल के लिए भूल गई कि मैं हीरो हूँ।
बस एक लड़की रह गई…
जिसके कंधे पर किसी ने सिर रख दिया था।”
आर्या ने खिड़की से बाहर देखा। शहर की लाइटें जल रही थीं। हवा में हल्की ठंडक थी। उसने मुस्कुराते हुए सोचा—
कल फिर मिलना है।
और शायद… फिर से कोई छोटी-सी खुशी बाँटनी है।
…जारी रहेगा (भाग 5)