हीरो...! - 3 InkImagination द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हीरो...! - 3

📖 हीरो...!
भाग 3 : छोटी-छोटी इच्छाएँ

अगली सुबह आर्या की आँखें平时 से थोड़ी जल्दी खुल गईं। खिड़की से हल्की धूप आ रही थी। बारिश रात भर चली थी, लेकिन अब आसमान साफ था। उसने बिस्तर पर बैठकर एक पल आँखें बंद कीं। दिमाग में बार-बार वही गोल-गोल आँखें और चॉकलेट केक वाली मुस्कान घूम रही थी।
“आज भी केक माँग लेगी क्या?” उसने खुद से पूछा और हँस पड़ी। फिर उठकर तैयार हो गई—काली शर्ट, डार्क जीन्स, स्नीकर्स। बैग कंधे पर डाला और नीचे उतर आई।
माँ ने नाश्ता देते हुए कहा—
“आज चेहरा थोड़ा अलग लग रहा है।”
आर्या ने पराठा तोड़ते हुए पूछा—
“कैसे?”
“जैसे कोई अच्छा सपना देखा हो।”
आर्या ने सिर्फ मुस्कुराकर जवाब दिया और टिफ़िन उठाकर निकल गई।
उधर मिशा का घर भी पहले जैसा शोरगुल से भरा था।
“मम्मी… आज गुलाबी रिबन चाहिए… कल वाला गीला हो गया था बारिश में।”
माँ ने सिर हिलाते हुए रिबन दिया। मिशा ने दोनों चोटियाँ बाँधी, आईने में खुद को देखा और मुस्कुरा दी। बैग में आज अतिरिक्त चॉकलेट डालीं। फिर दरवाज़े पर खड़ी होकर बोली—
“आज हीरो मिलेगी…”
माँ ने हैरानी से देखा—
“कौन हीरो?”
मिशा ने शर्माते हुए कहा—
“कुछ नहीं मम्मी…” और भाग निकली।
कॉलेज पहुँचते ही मिशा की नज़र गेट पर पड़ी। काली बाइक पहले से खड़ी थी। आर्या हेलमेट उतार रही थी। मिशा ने दूर से ही हाथ हिलाया। आर्या ने देखा और हल्के से सिर हिला दिया। दोनों की नज़रें मिलीं। कोई बात नहीं हुई, लेकिन हवा में कुछ बदल सा गया था।
पहली दो लेक्चर सामान्य रहे। मिशा ध्यान से नोट्स बना रही थी, लेकिन बीच-बीच में खिड़की की तरफ देख लेती। आर्या की क्लास दूसरी बिल्डिंग में थी, फिर भी मन भाग रहा था।
ब्रेक में मिशा सिया के साथ कैंटीन की तरफ जा रही थी। रास्ते में उसने अचानक कहा—
“काश आज ठंडी कोल्ड कॉफी मिल जाए… बहुत मन कर रहा है।”
सिया ने कंधे उचकाए—
“यहाँ की कोल्ड कॉफी महंगी है और स्वाद भी वैसा नहीं।”
मिशा ने बस सिर हिलाया। कोई शिकायत नहीं की। बस इच्छा ज़ाहिर की और आगे बढ़ गई।
दस मिनट बाद…
मिशा अपनी टेबल पर बैठी थी कि अचानक उसके सामने एक लंबा गिलास रख दिया गया। बर्फ के टुकड़े तैर रहे थे, ऊपर से क्रशड आइस और हल्की सी चॉकलेट सिरप। कोल्ड कॉफी।
मिशा ने सिर उठाया। आर्या खड़ी थी।
“लो।”
मिशा की आँखें फटी रह गईं।
“ये… कैसे?”
“तुमने बोला था।”
“पर मैंने तो बस ऐसे ही… सिया से…”
आर्या ने कंधे उचकाए।
“तुमने बोला। मेरे लिए वही काफी था।”
मिशा ने गिलास दोनों हाथों से पकड़ा। ठंडक उँगलियों तक पहुँच गई। उसने एक घूँट भरा और आँखें बंद कर लीं।
“बहुत… बहुत स्वादिष्ट है।”
आर्या ने हल्के से मुस्कुराया।
“अच्छी लगी तो ठीक है।”
वह जाने लगी तो मिशा ने पीछे से पूछा—
“तुम मैजिशियन हो क्या?”
आर्या मुड़ी। उसकी आँखों में हँसी थी।
“नहीं।”
“फिर?”
“बस… तुम्हारी बातें याद रह जाती हैं।”
मिशा कुछ बोल नहीं पाई। सिर्फ मुस्कुराती रही। आर्या चली गई। सिया हैरान होकर देख रही थी।
“ये लड़की तुझे कैसे सुन लेती है इतनी दूर से?”
मिशा ने कोल्ड कॉफी का एक और घूँट लिया और धीरे से कहा—
“पता नहीं… लेकिन अच्छा लगता है।”
दोपहर की क्लास के बाद लाइब्रेरी का समय था। मिशा किताबें लेकर अंदर घुसी। लाइब्रेरी शांत थी। खिड़कियों के पास वाली सीटें लगभग भरी हुई थीं। मिशा ने एक खाली सीट देखी जो खिड़की से थोड़ी दूर थी। उसने साँस छोड़ते हुए कहा—
“काश लाइब्रेरी वाली खिड़की के पास बैठ पाती… बाहर पेड़ दिखते…”
उसने बस इतना कहा और दूसरी सीट पर बैठने लगी। तभी लाइब्रेरियन की आवाज़ आई—
“वो वाली सीट खाली है। उस लड़की ने अभी छोड़ी है।”
मिशा ने सिर उठाया। खिड़की वाली सीट खाली पड़ी थी। कुर्सी पर एक छोटा सा नोट रखा था। मिशा ने पास जाकर नोट उठाया। उस पर साफ अक्षरों में लिखा था—
“ये सीट तुम्हारे लिए।
बाहर पेड़ अच्छे दिखते हैं।
—आर्या”
मिशा की धड़कन तेज़ हो गई। उसने चारों तरफ देखा। आर्या लाइब्रेरी के दूसरे कोने में एक किताब लेकर बैठी थी। उसकी नज़रें किताब पर थीं, लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान तैर रही थी।
मिशा ने सीट संभाली। खिड़की से बाहर हरे-भरे पेड़ दिख रहे थे। धूप पत्तियों से छनकर अंदर आ रही थी। उसने नोट को किताब के अंदर रख लिया और मुस्कुरा दी। मन ही मन बोली—
“हीरो… तुम सच में जादूगर हो।”
शाम को कॉलेज खत्म होने से पहले मौसम बदल गया। आसमान पर काले बादल छा गए। हवा तेज़ हो गई। छात्र भागने लगे। मिशा गेट के पास खड़ी थी। उसकी छाता घर रह गई थी। बारिश की पहली बूंदें गिरने लगीं।
मिशा ने आकाश की तरफ देखा और अचानक बोल उठी—
“काश इस बारिश में गरम-गरम पकोड़े और चाय मिल जाए…”
सिया ने कहा—
“अभी कहाँ से मिलेंगे? सब भाग रहे हैं।”
मिशा ने सिर्फ कंधे उचकाए। बारिश तेज़ होने लगी। वह छत की ओट में खड़ी हो गई। तभी गेट के बाहर से एक आवाज़ आई—
“मिशा।”
आर्या बाइक पर बैठी थी। एक हाथ में कागज़ का बैग था, दूसरे में दो कप चाय। बारिश में भीगते हुए भी उसका चेहरा शांत था।
“लो।”
मिशा हैरान रह गई।
“पकोड़े… और चाय?”
“तुमने बोला था।”
मिशा ने बैग और कप लिए। पकोड़ों की खुशबू हवा में फैल गई। उसने एक पकोड़ा तोड़ा। अभी भी गरम था।
“तुम… कैसे?”
आर्या ने हेलमेट ठीक करते हुए कहा—
“बाहर वाली दुकान पर मंगवा लिया था। बारिश शुरू होने से पहले।”
मिशा की आँखें भर आईं। न रोने के लिए, बल्कि किसी अजीब सी खुशी से। उसने एक पकोड़ा आर्या की तरफ बढ़ाया।
“तुम भी खाओ।”
आर्या ने लिया और एक कौर खाया। दोनों छत की ओट में खड़े बारिश देख रहे थे। बूंदें ज़मीन पर गिर रही थीं। छात्रों की भीड़ अब कम हो चुकी थी।
मिशा ने धीरे से कहा—
“हीरो…”
“हाँ?”
“तुम हमेशा ऐसे ही मेरी बातें याद रखते हो?”
आर्या ने बारिश की तरफ देखा।
“सिर्फ तुम्हारी नहीं… लेकिन तुम्हारी बातें… अलग लगती हैं।”
मिशा ने चाय का घूँट भरा। गरम चाय गले से उतरते ही पूरा बदन हल्का लगने लगा।
“मुझे लगता है… तुम जादू करते हो।”
आर्या हँसी।
“जादू नहीं। बस ध्यान रखती हूँ।”
बारिश थोड़ी हल्की हुई। आर्या ने कहा—
“चलो… छोड़ देती हूँ घर तक।”
मिशा की आँखें चमक उठीं।
“सच?”
“हाँ। बैठो।”
मिशा ने बैग संभाला और बाइक पर पीछे बैठ गई। पहली बार किसी बाइक पर बैठी थी। आर्या ने धीरे से बाइक स्टार्ट की। बारिश की बूंदें चेहरे पर लग रही थीं, लेकिन मिशा को ठंड नहीं लग रही थी। उसने हल्के से आर्या के कंधे को पकड़ रखा था।
रास्ते भर दोनों चुप रहे। लेकिन वह चुप्पी भारी नहीं थी। जैसे दोनों एक-दूसरे की साँसें सुन रहे हों।
घर पहुँचकर मिशा उतर गई। आर्या ने हेलमेट उठाया।
“अंदर चली जा। भीग गई होगी।”
मिशा ने सिर हिलाया। फिर अचानक बोली—
“हीरो…”
“हाँ?”
“कल… फिर मिलना।”
आर्या ने मुस्कुराया।
“कॉलेज में ही मिलना है।”
“फिर भी…”
आर्या ने बाइक का इंजन चालू किया।
“ठीक है। कल मिलते हैं।”
मिशा दरवाज़े पर खड़ी आर्या को जाते हुए देखती रही जब तक बाइक की आवाज़ गली के मोड़ पर गायब नहीं हो गई। फिर वह अंदर घुसी। माँ ने हैरानी से देखा—
“बारिश में भीग गई? और ये पकोड़े?”
मिशा ने मुस्कुराते हुए कहा—
“हीरो ने दिए।”
रात को डायरी खोलते हुए मिशा ने लिखा—
“आज कोल्ड कॉफी मिली।
खिड़की वाली सीट मिली।
बारिश में पकोड़े और चाय मिली।
और पहली बार बाइक पर बैठी।
हीरो कहती है जादू नहीं करती।
लेकिन मुझे लगता है…
वो मेरी छोटी-छोटी खुशियों का जादूगर है।”
उधर आर्या अपने कमरे में बैठी थी। बालों से तौलिया से पानी पोंछ रही थी। मोबाइल में नोट खोला और लिखा—
“आज भी वही आवाज़।
‘काश…’
और फिर सब कुछ अपने आप हो जाता है।
कोल्ड कॉफी।
खिड़की की सीट।
पकोड़े।
पता नहीं क्यों…
उसकी छोटी-छोटी बातें याद रह जाती हैं।
जैसे कोई गाना जो बार-बार दिमाग में घूमता रहे।”
आर्या ने नोट बंद किया। खिड़की खोली। बारिश अब रुक चुकी थी। हवा में मिट्टी की खुशबू थी। उसने दूर शहर की लाइटों को देखा और धीरे से मुस्कुरा दी।
कल फिर कॉलेज जाना था।
और शायद… फिर से कोई छोटी-सी इच्छा सुननी थी।

…जारी रहेगा (भाग 4)