**📖 हीरो...!**
**भाग 2 : पहली मुस्कान, पहली मदद**
घंटी बजने के बाद कॉलेज की इमारत अचानक जीवंत हो उठी। गलियारों में छात्रों की भीड़ उमड़ पड़ी। कोई क्लास ढूँढ रहा था, कोई दोस्तों के साथ हँस रहा था, कोई मोबाइल पर वीडियो बना रहा था। हवा में नएपन की खुशबू घुली हुई थी—नए बैग, नई किताबें, नए चेहरे।
आर्या अपनी क्लास में घुसी। उसने खिड़की के पास वाली सीट चुन ली। बाहर गार्डन दिख रहा था। वही गार्डन जहाँ थोड़ी देर पहले एक छोटी-सी लड़की तितली के पीछे भाग रही थी। आर्या ने बैग नीचे रखा और नोटबुक निकाली। उसके आसपास कुछ लड़के और लड़कियाँ बैठे थे। कोई फुसफुसा रहा था—
“वही है ना… जो बाइक लेकर आई थी?”
“हाँ… हीरो लगती है बिल्कुल।”
आर्या ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह आदी थी ऐसी बातों की। उसका ध्यान बाहर की तरफ था। पेड़ों पर धूप छन-छनकर गिर रही थी। एक पीली तितली उड़ती दिखी। आर्या की आँखों के कोनों में हल्की मुस्कान तैर गई।
उधर मिशा अपनी क्लास में पहुँची तो हाँफ रही थी। उसने जल्दी-जल्दी सीट संभाली। उसके बगल में एक लड़की बैठी थी—नाम था सिया। सिया ने मुस्कुराकर कहा—
“अरे… तू इतनी हँफी हुई क्यों है? दौड़ी क्या?”
मिशा ने आँखें गोल करके कहा—
“तितली… एकदम पीली… बहुत सुंदर थी… मैं पकड़ने गई… फिर…”
वह रुक गई। उसके दिमाग में काली शर्ट, छोटे बाल और वह शांत मुस्कान घूम रही थी।
“फिर क्या?”
“फिर… एक लड़की ने मुझे गिरने से बचा लिया।”
सिया ने आँखें सिकुड़ीं।
“कौन लड़की?”
मिशा ने कंधे उचकाए।
“पता नहीं… लेकिन वो… बहुत कूल लग रही थी। जैसे फिल्म की हीरो।”
सिया हँस पड़ी।
“तू तो अभी-अभी आई है और हीरो ढूँढ ली?”
मिशा ने होंठ फुलाए।
“मैंने ढूँढा नहीं… वो खुद आ गई।”
पहली लेक्चर शुरू हुई। प्रोफेसर ने अपना परिचय दिया, सिलेबस बताया। मिशा ध्यान से सुनने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसका मन बार-बार उसी चेहरे पर चला जा रहा था। काली शर्ट… चेन… गहरी आँखें… और वह हल्की मुस्कान जब उसने कहा था—“उन्हें आज़ाद रहने दो।”
घंटी बजी। लंच ब्रेक।
कैंटीन की तरफ भीड़ बढ़ने लगी। मिशा सिया के साथ चल रही थी। अचानक उसकी नज़र काउंटर पर पड़ी। एक बड़ा सा चॉकलेट केक का स्लाइस रखा था। ऊपर से चॉकलेट सॉस टपक रहा था। मिशा की आँखें चमक उठीं।
“सिया… देख… केक…”
“हाँ… लेकिन बहुत महंगा लग रहा है।”
मिशा ने जेबें टटोली। उसके पास सिर्फ तीस रुपये थे। माँ ने कहा था कि पहले दिन ज़्यादा पैसे मत ले जाना। मिशा ने उदास होकर कहा—
“काश मेरे पास भी होता…”
उसने बस इतना ही कहा था। कोई शिकायत नहीं, कोई रोना नहीं। बस एक छोटी-सी चाहत।
वे दोनों एक टेबल पर बैठ गईं। मिशा पानी पी रही थी और केक की तरफ बार-बार देख रही थी। तभी सिया ने कहा—
“अरे देख… वही लड़की…”
मिशा ने सिर घुमाया।
कैंटीन के दरवाज़े से आर्या अंदर आई। बैग एक कंधे पर, चाल में वही आत्मविश्वास। उसने पानी की बोतल ली और एक कोने की टेबल पर बैठ गई। आसपास के कुछ छात्र फिर से फुसफुसाने लगे।
मिशा उसे देखे जा रही थी। आर्या ने एक बार उसकी तरफ देखा। नज़रें मिलीं। आर्या ने हल्के से सिर हिलाया—जैसे नमस्ते। मिशा ने शर्माते हुए मुस्कुरा दिया।
पाँच मिनट बाद…
मिशा अभी भी केक की तरफ देख रही थी कि अचानक उसकी मेज पर एक प्लेट रख दी गई। उसी चॉकलेट केक का स्लाइस। ऊपर से सॉस अभी भी टपक रहा था।
मिशा ने सिर उठाया। आर्या उसके सामने खड़ी थी।
“लो।”
मिशा की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“ये… ये मेरे लिए?”
“हाँ।”
“तुम्हें कैसे पता?”
आर्या ने कंधे उचकाए।
“तुमने बोला था।”
“पर मैंने तो बस ऐसे ही… सिया से…”
“तुमने बोला। मेरे लिए वही काफी था।”
मिशा कुछ पल तक बस उसे देखती रही। फिर उसके चेहरे पर इतनी बड़ी मुस्कान आई कि केक से भी मीठी लग रही थी। उसने प्लेट दोनों हाथों से पकड़ी जैसे कोई खजाना हो।
“थैंक यू… बहुत-बहुत थैंक यू…”
आर्या ने हल्के से मुस्कुराया।
“खा लो… ठंडा हो जाएगा।”
वह मुड़कर अपनी टेबल की तरफ जाने लगी। मिशा ने पीछे से आवाज़ दी—
“वैसे… तुम्हारा नाम?”
आर्या ने मुड़कर देखा।
“आर्या।”
मिशा ने आँखें गोल कीं।
“लेकिन सब तुम्हें हीरो बोलते हैं ना?”
आर्या की हँसी फूट पड़ी। पहली बार किसी ने इतनी सीधी बात कही थी।
“हाँ… बोलते हैं।”
“तो मैं भी हीरो ही बोलूँगी।”
आर्या ने सिर हिलाया और चली गई। मिशा प्लेट लेकर बैठी रही। सिया हैरान होकर देख रही थी।
“ये क्या था अभी?”
मिशा ने केक का एक बड़ा सा टुकड़ा मुँह में डाला और मुस्कुराते हुए कहा—
“मैजिक…”
दोपहर की दूसरी क्लास के बाद छात्रों को लाइब्रेरी और गार्डन घूमने की छूट मिली। मिशा सिया के साथ गार्डन की तरफ जा रही थी कि अचानक उसकी नज़र सीढ़ियों पर पड़ी। ऊपर से कुछ छात्र उतर रहे थे। मिशा जल्दी में थी। वह दौड़ते हुए सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।
एक पैर फिसला।
“आह…!”
वह गिरने ही वाली थी कि फिर से वही मज़बूत हाथ उसकी कलाई पर आ गया।
“ध्यान से।”
मिशा ने आँखें खोलीं। आर्या फिर से सामने खड़ी थी। इस बार उसके चेहरे पर हल्की सी नाराज़गी भी थी।
“तुम हमेशा ऐसे ही दौड़ती हो क्या?”
मिशा ने शर्माते हुए कहा—
“नहीं… आज… जल्दी थी…”
आर्या ने उसका हाथ छोड़ा।
“अगली बार रेस लगानी हो तो ग्राउंड में लगाना।”
यह कहकर वह आगे बढ़ गई। मिशा पीछे खड़ी उसे देखती रही। आर्या की चाल में वही सहज आत्मविश्वास था। जैसे वह कभी जल्दबाजी में न हो, कभी घबराए नहीं।
मिशा मन ही मन बोली—
“किसी कूल है…”
शाम को कॉलेज खत्म होने पर मिशा गेट के बाहर खड़ी थी। उसकी माँ आने वाली थी। तभी आर्या अपनी बाइक लेकर निकली। हेलमेट हाथ में था। मिशा ने हिम्मत करके हाथ हिलाया।
आर्या ने देखा और बाइक रोक दी।
“घर जा रही हो?”
“हाँ… मम्मी आने वाली हैं।”
आर्या ने आसमान की तरफ देखा। बादल छाने लगे थे।
“बारिश आ सकती है। अंदर खड़ी रहना।”
मिशा ने सिर हिलाया। फिर अचानक बोली—
“हीरो…”
आर्या ने एक पल के लिए आँखें उठाईं।
“हाँ?”
“आज… तुमने दो बार बचाया मुझे।”
आर्या ने हल्के से मुस्कुराया।
“अगली बार खुद संभालना।”
“लेकिन अगर न संभलूँ?”
आर्या ने बाइक का इंजन स्टार्ट किया।
“तो फिर मैं संभाल लूँगी।”
मिशा की आँखों में चमक आ गई। आर्या हेलमेट पहनकर निकल गई। बाइक की आवाज़ दूर तक गूँजती रही।
मिशा वहीं खड़ी रही। हवा में हल्की नमी थी। उसने अपनी दोनों चोटियाँ सहलाते हुए मुस्कुरा दिया।
आज पहला दिन था।
लेकिन लग रहा था जैसे कुछ बहुत पुराना शुरू हो गया हो।
रात को घर पहुँचकर मिशा ने डायरी निकाली। उसने पन्ना खोला और लिखा—
“आज एक हीरो मिली।
उसने मुझे केक दिया।
मुझे गिरने से बचाया।
और कहा—‘अगर न संभलूँ तो मैं संभाल लूँगी।’
मुझे लगता है… मेरी खुशियाँ अब और बढ़ने वाली हैं।”
उधर आर्या अपने कमरे में बैठी थी। उसने मोबाइल में एक नोट बनाया—
“आज एक छोटी सी लड़की मिली।
तितली के पीछे भागती हुई।
केक देखकर आँखें चमक उठीं।
और बोली—‘दोस्त ज़्यादा होंगे तो खुशियाँ भी ज़्यादा होंगी।’
शायद कुछ लोग खुशियाँ बाँटने के लिए ही पैदा होते हैं।”
आर्या ने नोट बंद किया। खिड़की से बाहर देखा। शहर की लाइटें जल रही थीं। हवा में बारिश की हल्की बूंदें तैर रही थीं।
उसने मुस्कुराते हुए सोचा—
कल फिर कॉलेज जाना है।
और शायद… फिर से किसी को गिरने से बचाना है।
या किसी को केक देना है।
या बस… किसी की छोटी-छोटी बातें याद रखना है।
बाहर बारिश शुरू हो गई। हल्की-हल्की। जैसे आकाश भी मुस्कुरा रहा हो।
…जारी रहेगा (भाग 3)