अध्याय 9: आख़िरी सफ़र
अस्पताल की खिड़की के बाहर बारिश हो रही थी।
अंगद ICU के बाहर खड़ा था।
काँच के उस पार मीरा अब भी बेहोश थी।
मशीनें चल रही थीं।
बीप… बीप… बीप…
लेकिन अंगद के दिमाग में सिर्फ एक आवाज़ थी—
“अकेले मत जाना।”
वह धीरे से दीवार से टिक गया।
दस साल।
दस साल से उसका शरीर इसी अस्पताल में पड़ा था।
और इन दस सालों में उसका दिमाग…
एक ऐसी दुनिया बना चुका था, जहाँ मीरा उसके साथ थी।
लेकिन अगर वो दुनिया सिर्फ सपना थी—
तो उसे हर रात वही ट्रेन क्यों दिखाई देती थी?
वही स्टेशन।
वही समय।
वही डिब्बा।
और सबसे अजीब—
मीरा को भी वही सब क्यों याद था?
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डॉक्टर बाहर आए।
अंगद तुरंत उनकी तरफ बढ़ा।
“अब कैसी है?”
“अभी स्थिर है।”
“वो होश में आएगी?”
डॉक्टर ने जवाब देने से पहले मीरा की तरफ देखा।
“कह नहीं सकता।”
अंगद चुप रहा।
फिर बोला—
“मुझे उसके रिकॉर्ड देखने हैं।”
डॉक्टर ने सिर उठाया।
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे लगता है… हमारे साथ जो हुआ, वो सिर्फ दुर्घटना नहीं थी।”
डॉक्टर कुछ सेकंड उसे देखते रहे।
फिर बोले—
“दस साल पहले की फाइलें नीचे रिकॉर्ड रूम में हैं।”
“मुझे वहाँ जाना है।”
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रिकॉर्ड रूम अस्पताल के पुराने हिस्से में था।
दरवाज़ा खोलते ही सीलन और पुराने कागज़ों की गंध बाहर आई।
चारों तरफ लोहे की अलमारियाँ थीं।
हर अलमारी पर साल लिखा था।
2015
2016
2017
अंगद की नजर सीधे 2016 पर गई।
उसने एक मोटी फाइल निकाली।
कवर पर लिखा था—
रेल दुर्घटना — 16/08/2016
उसने फाइल खोली।
पहले कुछ पन्ने सामान्य थे।
घायलों की सूची।
इलाज की जानकारी।
पुलिस रिपोर्ट।
फिर एक फोटो।
अंगद का हाथ रुक गया।
फोटो में दुर्घटनाग्रस्त ट्रेन थी।
डिब्बा बुरी तरह क्षतिग्रस्त था।
लेकिन फोटो के पीछे किसी ने हाथ से कुछ लिखा था।
अंगद ने कागज़ पलटा।
सिर्फ एक लाइन—
“दूसरा यात्री अभी जीवित है।”
अंगद की भौंहें सिकुड़ गईं।
“दूसरा यात्री?”
उसने फाइल पलटी।
मीरा का नाम ढूँढने लगा।
लेकिन वहाँ उसका नाम नहीं था।
सिर्फ—
Female — unidentified.
उम्र लगभग 24।
गंभीर चोट।
कोमा।
अंगद ने अगला पन्ना पलटा।
और वहीं उसे कुछ ऐसा मिला जिसने उसके पैरों के नीचे से जमीन खींच ली।
एक फोटो।
दोनों घायल यात्रियों की।
एक तरफ वह था।
दूसरी तरफ मीरा।
लेकिन फोटो देखकर उसकी साँस अटक गई।
दोनों को अस्पताल ले जाने के समय…
उनके हाथ एक-दूसरे में बंधे हुए थे।
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“ये कैसे…”
अंगद फोटो के बिल्कुल पास चला गया।
उस रात उसे याद था कि उसने मीरा को पकड़ने की कोशिश की थी।
लेकिन दुर्घटना के बाद क्या हुआ था?
उसे कुछ याद नहीं था।
उसने रिपोर्ट पढ़ी।
“दोनों यात्रियों को मलबे से लगभग एक साथ निकाला गया।”
फिर नीचे एक और लाइन थी—
“महिला मरीज लगातार एक ही नाम दोहरा रही थी।”
अंगद का दिल तेज़ धड़कने लगा।
उसने अगला पन्ना पलटा।
नर्स की लिखावट में था—
“Patient repeatedly saying: Angad.”
उसके हाथ काँपने लगे।
“मीरा मुझे जानती थी…”
लेकिन आगे की लाइन पढ़ते ही उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
“जब पूछा गया कि अंगद कौन है, patient unable to respond.”
फिर—
“Patient lost consciousness at 12:21 AM.”
अंगद ने फाइल बंद कर दी।
कुछ सेकंड तक वह स्थिर खड़ा रहा।
फिर उसे कुछ याद आया।
मीरा ने अस्पताल में उससे कहा था—
“तुम मुझे दस साल से जानते हो।”
लेकिन दुर्घटना के समय…
वो उसे पहले से जानती थी।
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तभी पीछे से आवाज़ आई।
“तुम्हें ये नहीं पढ़ना चाहिए।”
अंगद ने पलटकर देखा।
एक बूढ़ी नर्स दरवाज़े पर खड़ी थी।
“आप?”
“मैं उस रात ड्यूटी पर थी।”
अंगद तुरंत उसकी तरफ बढ़ा।
“आपको मीरा याद है?”
नर्स ने कुछ सेकंड उसे देखा।
फिर बोली—
“मीरा?”
“हाँ।”
“उसका नाम मीरा नहीं था।”
अंगद रुक गया।
“क्या?”
नर्स धीरे-धीरे अंदर आई।
“हमने उसका नाम बहुत बाद में जाना।”
“कैसे?”
नर्स ने एक पुरानी डायरी निकाली।
उसका कवर लगभग घिस चुका था।
उसने एक पन्ना खोला।
“दुर्घटना वाली रात वह बार-बार कुछ बोल रही थी।”
“क्या?”
नर्स ने अंगद की आँखों में देखा।
“वो कह रही थी—”
वह रुक गई।
फिर बहुत धीमे बोली—
“मैं उसे फिर से नहीं खो सकती।”
अंगद की साँस अटक गई।
“किसे?”
नर्स ने जवाब नहीं दिया।
उसने डायरी अंगद की तरफ बढ़ा दी।
अंगद ने पन्ना पढ़ा।
उस पर सिर्फ एक नाम लिखा था—
अंगद।
और उसके नीचे—
“अगर वो जाग गया, तो उसे कुछ भी मत बताना।”
अंगद ने सिर उठाया।
“किसने लिखा?”
नर्स चुप रही।
“किसने?”
नर्स की आँखों में डर था।
“तुम्हारे डॉक्टर ने।”
अंगद के चेहरे पर अविश्वास उतर आया।
“कौन से डॉक्टर?”
नर्स ने धीरे से कहा—
“डॉ. राघव।”
अंगद ने तुरंत पूछा—
“वो कहाँ हैं?”
नर्स ने उसकी तरफ देखा।
“मर चुके हैं।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
“कब?”
“दस साल पहले।”
“कैसे?”
नर्स ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस डायरी बंद कर दी।
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अंगद वापस ICU पहुँचा।
मीरा अब भी बेहोश थी।
वह उसके पास जाकर बैठ गया।
“तुम मुझे पहले से जानती थीं…”
कोई प्रतिक्रिया नहीं।
“डॉ. राघव कौन थे?”
कुछ नहीं।
“उन्होंने मेरे बारे में क्या छुपाया?”
कुछ नहीं।
अंगद ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा।
“और तुमने मुझे क्या नहीं बताया?”
मीरा की उँगली हल्की-सी हिली।
अंगद चौंक गया।
“मीरा?”
एक बार।
फिर दूसरी बार।
फिर तीसरी।
टक।
टक।
टक।
अंगद झुक गया।
“तुम मुझे सुन सकती हो?”
एक बार।
हाँ।
“क्या डॉ. राघव जानते थे कि हम दोनों एक-दूसरे से मिलते हैं?”
कोई प्रतिक्रिया नहीं।
“क्या उन्होंने ही हमें इस ट्रेन में भेजा था?”
मीरा की उँगली अचानक तेज़ी से हिली।
टक-टक-टक-टक।
अंगद का चेहरा बदल गया।
“तो दुर्घटना…”
वह रुक गया।
“दुर्घटना थी ही नहीं?”
मॉनिटर की धड़कन अचानक तेज़ हो गई।
बीप-बीप-बीप-बीप।
अंगद ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“मीरा… सच क्या है?”
मीरा की बंद पलकों के नीचे आँखें तेजी से हिलने लगीं।
और फिर—
उसके होंठ खुले।
बहुत धीमी आवाज़ निकली।
अंगद उसके बिल्कुल पास झुक गया।
“क्या?”
मीरा ने मुश्किल से कहा—
“ट्रेन… दुर्घटनाग्रस्त होने वाली नहीं थी…”
अंगद की आँखें फैल गईं।
“तो फिर?”
मीरा की आवाज़ टूट रही थी।
“उसे… रोकना था…”
“किसे?”
मीरा ने आँखें खोलीं।
पहली बार।
सीधे अंगद की तरफ देखा।
उसकी आँखों में डर था।
“तुम्हें…”
अंगद पीछे हट गया।
“मुझे?”
मीरा ने बहुत मुश्किल से कहा—
“तुम्हें उस ट्रेन में मरना था, अंगद।”
मॉनिटर की आवाज़ तेज़ हो गई।
बीप… बीप… बीप…
और तभी—
अस्पताल की सारी लाइटें फिर बुझ गईं।
अंधेरे में वही आवाज़ लौट आई—
धड़… धड़… धड़…
ट्रेन के पहिए।
अंगद ने मीरा का हाथ पकड़ लिया।
लेकिन इस बार…
उसका हाथ खाली हवा में था।
ICU गायब हो चुका था।
उसके सामने सिर्फ वही पुराना प्लेटफ़ॉर्म था।
बारिश हो रही थी।
घड़ी—
11:52 PM।
और सामने खड़ी ट्रेन का दरवाज़ा खुला था।
अंदर मीरा खड़ी थी।
लेकिन उसके पीछे…
एक और अंगद खड़ा था।
वही चेहरा।
वही कपड़े।
वही उम्र।
उसने अंगद की तरफ देखा और कहा—
“इस बार तुम मुझे बचाने नहीं आए हो।”
एक पल की चुप्पी।
फिर—
“इस बार तुम्हें खुद को बचाना है।”