अध्याय 8: कोमा के भीतर
धड़… धड़… धड़…
ट्रेन के पहियों की आवाज़ अंधेरे अस्पताल में गूँज रही थी।
अंगद बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
उसके सामने मीरा थी।
लेकिन अब वह अस्पताल के बिस्तर पर भी थी…
और उसके सामने भी।
दो अलग-अलग जगहों पर एक ही इंसान।
एक सवाल उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था—
अगर मीरा का शरीर दस साल से कोमा में है, तो उससे मिलने वाला कौन था?
अचानक लाइट वापस आ गई।
अंगद ने सामने देखा।
मीरा गायब थी।
सिर्फ बिस्तर पर पड़ी उसकी देह थी।
मॉनिटर पर वही नियमित धड़कन—
बीप… बीप… बीप…
अंगद धीरे-धीरे उसके पास गया।
“मीरा…”
कोई प्रतिक्रिया नहीं।
उसने उसका हाथ छूने की कोशिश की।
इस बार उसका हाथ उसके हाथ से टकराया।
गर्म।
जिंदा।
अंगद की आँखें भर आईं।
“तो तुम सच में हो…”
तभी डॉक्टर की आवाज़ पीछे से आई—
“तुम किससे बात कर रहे हो?”
अंगद ने पलटकर देखा।
डॉक्टर दरवाज़े पर खड़े थे।
“मीरा से।”
डॉक्टर का चेहरा बदल गया।
“तुम उसे जानते हो?”
“हाँ।”
“कैसे?”
अंगद कुछ बोल नहीं पाया।
डॉक्टर धीरे-धीरे उसके पास आए।
उन्होंने मीरा की फाइल उठाई।
“इस लड़की को तुमने पहले कभी देखा है?”
“हर रात।”
डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
“वो मेरे साथ ट्रेन में आती है।”
डॉक्टर चुप रहे।
फिर फाइल बंद कर दी।
“अंगद, तुम्हें शायद कुछ समझना होगा।”
“क्या?”
डॉक्टर ने बहुत धीरे कहा—
“तुम दोनों एक ही रात अस्पताल लाए गए थे।”
अंगद के चेहरे पर तनाव आ गया।
“16 अगस्त 2016?”
“हाँ।”
“और उसके बाद?”
“तुम दोनों कोमा में चले गए।”
अंगद ने मीरा की तरफ देखा।
“लेकिन… मुझे तो याद है कि मैं उससे बाद में मिला था।”
डॉक्टर ने सिर हिलाया।
“तुम्हारे लिए वो बाद में हुआ होगा।”
“और असल में?”
डॉक्टर ने जवाब देने से पहले कुछ पल सोचा।
“असल में… हो सकता है वो सब तुम्हारे दिमाग के भीतर हुआ हो।”
अंगद पीछे हट गया।
“नहीं।”
“अंगद—”
“नहीं!”
उसकी आवाज़ कमरे में गूँज गई।
“वो सब इतना असली था…”
उसकी आँखों में आँसू थे।
“मैंने उसकी आवाज़ सुनी है। उसे छुआ है। उसके साथ बात की है। हमने…”
वह रुक गया।
उसे अचानक कुछ याद आया।
एक बारिश।
एक छोटी-सी चाय की दुकान।
मीरा हँस रही थी।
वह उसे देखकर कह रही थी—
“तुम्हें हर चीज़ जीतनी क्यों होती है?”
अंगद ने आँखें बंद कर लीं।
“ये सिर्फ सपना नहीं था…”
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दस साल पहले
दृश्य फिर बदला।
बारिश हो रही थी।
वही रात।
लेकिन इस बार कहानी वहाँ से शुरू हुई जहाँ अंगद ने कभी ध्यान नहीं दिया था।
अंगद स्टेशन पर खड़ा था।
फोन पर किसी से बहस कर रहा था।
मीरा कुछ दूरी पर खड़ी उसे देख रही थी।
उसने पहली बार उसे देखा था।
लेकिन—
मीरा उसे पहले से जानती थी।
वह धीरे-धीरे उसके पास आई।
“अंगद?”
अंगद ने फोन से नजर हटाई।
“जी?”
मीरा मुस्कुराई।
“तुम मुझे पहचानते नहीं?”
अंगद ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
मीरा की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई।
“ठीक है।”
वह पीछे हटने लगी।
अंगद ने पूछा—
“हम मिले हैं?”
मीरा ने कुछ पल उसे देखा।
“हाँ।”
“कहाँ?”
“तुम्हें याद नहीं।”
अंगद ने हँसकर कहा—
“शायद आपकी याददाश्त मेरी से बेहतर है।”
मीरा भी हल्का-सा मुस्कुराई।
“शायद।”
ट्रेन आ गई।
दोनों एक ही डिब्बे में चढ़े।
और वहीं से वह रात शुरू हुई…
जिसे अंगद पिछले दस सालों से बार-बार जी रहा था।
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वर्तमान
अंगद ने अचानक आँखें खोल दीं।
वह ICU में था।
डॉक्टर सामने खड़े थे।
“मुझे वो रात पूरी याद आ रही है।”
डॉक्टर चुप रहे।
“मीरा मुझे पहले से जानती थी।”
“क्यों?”
अंगद ने सिर हिलाया।
“मुझे नहीं पता।”
तभी मॉनिटर पर मीरा की धड़कन अचानक तेज़ हो गई।
बीप… बीप… बीप-बीप-बीप।
डॉक्टर तुरंत उसकी तरफ दौड़े।
“नर्स!”
अंगद ने मीरा की तरफ देखा।
उसकी उँगली…
हल्की-सी हिली।
अंगद की आँखें फैल गईं।
“डॉक्टर!”
मीरा की उँगली फिर हिली।
इस बार साफ।
डॉक्टर ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“मीरा? अगर तुम सुन सकती हो तो प्रतिक्रिया दो।”
कुछ नहीं।
फिर—
उसकी उँगली ने धीरे से बिस्तर पर तीन बार हल्की चोट की।
टक।
टक।
टक।
डॉक्टर ने अंगद की तरफ देखा।
“इसका क्या मतलब है?”
अंगद के चेहरे पर अचानक डर उतर आया।
क्योंकि उसने ये आवाज़ पहले भी सुनी थी।
ट्रेन में।
हर बार जब मीरा कुछ कहना चाहती थी।
तीन बार।
उसने धीरे से कहा—
“वो कुछ बताना चाहती है।”
“क्या?”
अंगद मीरा के पास झुका।
“मीरा…”
उसने फुसफुसाकर पूछा—
“तुम मुझे सुन सकती हो?”
कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।
फिर—
टक।
टक।
टक।
अंगद की आँखें नम हो गईं।
“क्या तुम मुझे ट्रेन में बुलाती थी?”
एक बार—
टक।
“क्या वो सब मेरे दिमाग में था?”
दो बार—
टक।
टक।
अंगद ने साँस रोक ली।
“तो फिर…”
वह रुक गया।
“हम वहाँ मिलते कैसे थे?”
इस बार कोई आवाज़ नहीं आई।
पूरा कमरा शांत हो गया।
फिर अचानक मीरा की उँगली तेजी से हिलने लगी।
टक-टक-टक-टक-टक।
मॉनिटर पर उसकी धड़कन बढ़ गई।
डॉक्टर घबरा गए।
“पीछे हटो!”
लेकिन अंगद वहीं खड़ा रहा।
क्योंकि मीरा के होंठ हिल रहे थे।
बहुत हल्के।
इतने हल्के कि आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी।
अंगद उसके बिल्कुल पास झुक गया।
“क्या कह रही हो?”
मीरा के होंठ फिर हिले।
इस बार अंगद ने शब्द पढ़ लिए।
“अकेले मत जाना।”
अंगद पीछे हट गया।
“कहाँ?”
मीरा ने आँखें बंद रखीं।
फिर उसके होंठों से एक आखिरी शब्द निकला—
“ट्रेन…”
और उसी क्षण—
ICU की सारी मशीनें एक साथ बंद हो गईं।
बीप—
एक लंबी सीधी आवाज़।
डॉक्टर चिल्लाए—
“कोड ब्लू!”
नर्सें दौड़कर अंदर आईं।
अंगद को पीछे खींच लिया गया।
लेकिन उसकी नजर मीरा पर थी।
मॉनिटर पर लाइन सीधी थी।
फिर—
बीप।
एक धड़कन।
फिर दूसरी।
बीप।
तीसरी।
बीप।
मीरा की धड़कन वापस आ रही थी।
अंगद ने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी उसकी नजर खिड़की पर गई।
बाहर अस्पताल की पार्किंग नहीं थी।
बाहर…
एक प्लेटफ़ॉर्म था।
बारिश हो रही थी।
एक ट्रेन खड़ी थी।
और उसके दरवाज़े पर—
मीरा खड़ी थी।
अंगद ने आँखें झपकाईं।
दृश्य गायब।
वहाँ फिर अस्पताल की पार्किंग थी।
लेकिन अब अंगद समझ चुका था—
ये सिर्फ यादें नहीं थीं।
उनके बीच कुछ ऐसा था जो दस साल से दोनों को जोड़कर रखे हुए था।
और शायद…
उसका जवाब उसी रात की ट्रेन में छिपा था।
जिस ट्रेन में वे दोनों पहली बार मिले थे।
और शायद…
आखिरी बार भी।