अध्याय 5: दस साल पुरानी रात
कागज़ अब भी अंगद की उँगलियों के बीच था।
16 अगस्त 2016।
वही तारीख।
दस साल पुरानी।
उसने कागज़ को पलटा।
पीछे कुछ नहीं था।
सिर्फ हल्की-सी नमी।
जैसे कागज़ अभी-अभी किसी गीली जगह से निकाला गया हो।
अंगद ने उसे अपनी हथेली में दबा लिया।
उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।
“दस साल…”
शब्द उसके मुँह से अपने आप निकले।
तभी—
धड़ाम!
ट्रेन अचानक झटके से रुकी।
डिब्बे की लाइट एक बार झपकी।
फिर वापस जल गई।
अंगद ने सामने देखा।
लोग अपनी सीटों पर थे।
वही आदमी खिड़की के पास सो रहा था।
वही महिला फोन पर बात कर रही थी।
वही बच्चा अपनी माँ के कंधे पर सिर रखकर सो रहा था।
सब कुछ सामान्य।
सिर्फ अंगद सामान्य नहीं था।
उसने फिर घड़ी देखी।
11:57।
उसे याद आया—
कल भी इसी वक्त…
यही झटका लगा था।
उसने नोटबुक निकाली।
पन्ने पलटे।
कल के नीचे उसने लिखा था—
11:57 — दरवाज़े के पास आदमी लड़खड़ाया।
आज उसने नीचे लिखा—
11:57 — ट्रेन रुकी।
उसने पेन रोक दिया।
एक विचार उसके दिमाग में आया।
अगर घटनाएँ बदल सकती हैं…
तो शायद यह पूरा सिलसिला भी बदला जा सकता है।
लेकिन उसके लिए उसे पहले ये समझना होगा कि आखिर हो क्या रहा है।
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ट्रेन फिर चल पड़ी।
अंगद ने तय किया—
आज वह मीरा का इंतज़ार करेगा।
लेकिन मीरा नहीं आई।
एक स्टेशन।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
हर बार दरवाज़े खुलते।
लोग चढ़ते।
उतरते।
पर मीरा नहीं।
अंगद की बेचैनी बढ़ती गई।
आखिर उसने खुद से कहा—
“शायद आज नहीं आएगी।”
उसने फोन देखा।
12:06।
और तभी—
सामने वाली सीट पर कोई आकर बैठ गया।
अंगद ने सिर उठाया।
उसकी साँस अटक गई।
मीरा।
वह चुपचाप बैठी थी।
जैसे पिछले दस मिनट से वहीं हो।
अंगद ने तुरंत पूछा—
“तुम अभी आई?”
“हाँ।”
“कहाँ से?”
“यहीं से।”
“कहाँ से यहीं से?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम बहुत सारे सवाल पूछते हो।”
“और तुम बहुत कम जवाब देती हो।”
मीरा हल्का-सा मुस्कुराई।
“क्योंकि तुम्हें अभी जवाब सुनने की आदत नहीं है।”
अंगद ने उसकी तरफ झुककर कहा—
“16 अगस्त 2016 क्या है?”
मीरा की मुस्कान गायब हो गई।
पहली बार।
पूरी तरह।
उसने अंगद के हाथ में पकड़ा कागज़ देखा।
उसकी आँखें कुछ पल के लिए उस तारीख पर ठहर गईं।
फिर उसने बहुत धीमे पूछा—
“ये तुम्हें कहाँ मिला?”
“तुमने दिया।”
“मैंने?”
“हाँ।”
“कब?”
अंगद चुप हो गया।
उसे नहीं पता था।
मीरा ने कागज़ उससे ले लिया।
कुछ सेकंड उसे देखती रही।
फिर फुसफुसाई—
“तो आखिरकार तुम्हें तारीख मिल गई।”
अंगद के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“आखिरकार?”
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।
“मीरा।”
वह चुप।
“मेरी तरफ देखो।”
मीरा ने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा।
“तुम मुझे कितना जानती हो?”
“जितना तुम खुद को नहीं जानते।”
अंगद कुछ बोलता, उससे पहले मीरा ने पूछा—
“तुम्हें अपना आखिरी दिन याद है?”
“कौन सा आखिरी दिन?”
“वो दिन… जिसके बाद तुम्हें कुछ याद नहीं।”
अंगद के चेहरे पर उलझन थी।
“मुझे सब याद है।”
“क्या?”
“काम… घर… ट्रेन…”
“नहीं।”
मीरा की आवाज़ इस बार कठोर थी।
“मुझे वो रात बताओ।”
अंगद ने आँखें बंद कीं।
अंधेरा।
ट्रेन।
बारिश।
फोन।
किसी से बात करते हुए अपनी आवाज़—
“हाँ, मैं deal छोड़ नहीं सकता…”
फिर एक लड़की।
दरवाज़े के पास।
हवा।
उसका हाथ।
अंगद ने आँखें खोल दीं।
उसकी साँस तेज़ थी।
“वो…”
“क्या?”
“मैं वहाँ था।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“कहाँ?”
“यहीं।”
अंगद ने पूरे डिब्बे को देखा।
“इस ट्रेन में?”
“हाँ।”
“किसके साथ?”
मीरा ने जवाब देने से पहले बहुत देर तक उसे देखा।
फिर बोली—
“मेरे साथ।”
अंगद का दिल जोर से धड़का।
“लेकिन… मैं तुम्हें तो अभी जानता हूँ।”
मीरा ने हल्की-सी मुस्कान दी।
“नहीं अंगद।”
उसकी आवाज़ में अब कोई रहस्य नहीं था।
सिर्फ दर्द था।
“तुम मुझे दस साल से जानते हो।”
अंगद के हाथ से कागज़ गिर गया।
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अचानक ट्रेन की सारी लाइटें बंद हो गईं।
इस बार अंधेरा सिर्फ कुछ सेकंड का नहीं था।
पूरा डिब्बा काला था।
अंगद ने हाथ आगे किया।
“मीरा?”
कोई जवाब नहीं।
“मीरा!”
दूर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।
फिर किसी महिला की चीख।
फिर धातु के मुड़ने की भयानक आवाज़—
कrrrr्र्र्र…
ट्रेन जैसे किसी चीज़ से टकराई हो।
अंगद ने आँखें बंद कर लीं।
उसके कानों में अचानक कई आवाज़ें भर गईं।
लोगों की चीखें।
काँच टूटने की आवाज़।
किसी के रोने की आवाज़।
और फिर…
एक लड़की की आवाज़।
बहुत पास।
“अंगद…”
उसने आँखें खोल दीं।
अंधेरे में मीरा खड़ी थी।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ आँखें।
“मुझे पकड़ो।”
अंगद ने हाथ बढ़ाया।
लेकिन इससे पहले कि वह उसका हाथ पकड़ पाता—
एक तेज़ रोशनी।
और सब कुछ गायब।
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अंगद ने आँखें खोलीं।
ट्रेन फिर सामान्य थी।
लोग बैठे थे।
लाइट जल रही थी।
कोई चीख नहीं।
कोई टूटा हुआ काँच नहीं।
मीरा सामने नहीं थी।
अंगद ने नीचे देखा।
उसकी हथेली पर कुछ था।
खून नहीं।
बस…
एक छोटी-सी चाँदी की अंगूठी।
उसने उसे पलटा।
अंदर बेहद छोटे अक्षरों में खुदा था—
एम.
अंगद की आँखें नम हो गईं।
उसे नहीं पता था क्यों।
पर उस अंगूठी को देखते ही उसके सीने में ऐसा दर्द उठा…
जैसे उसने किसी को खोया हो।
बहुत पहले।
बहुत बुरी तरह।
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ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकी।
अंगद उतर गया।
प्लेटफ़ॉर्म लगभग खाली था।
वह कुछ कदम चला।
फिर रुक गया।
उसने पीछे मुड़कर ट्रेन को देखा।
एक खिड़की के अंदर…
मीरा खड़ी थी।
वह उसे देख रही थी।
ट्रेन चलने लगी।
अंगद दौड़ा नहीं।
बस वहीं खड़ा रहा।
मीरा की आँखें उससे जुड़ी रहीं।
ट्रेन दूर होती गई।
और आखिरी डिब्बा अंधेरे में गायब होने से ठीक पहले—
मीरा ने अपने होंठ हिलाए।
अंगद आवाज़ नहीं सुन सका।
लेकिन उसने शब्द पढ़ लिए।
“याद करो।”
ट्रेन अंधेरे में खो गई।
अंगद ने अपनी मुट्ठी में अंगूठी कस ली।
अब उसके सामने सिर्फ एक सवाल था—
दस साल पहले उस ट्रेन में आखिर हुआ क्या था?
और उससे भी बड़ा सवाल—
मीरा उसे बार-बार उसी रात में वापस क्यों ले जा रही थी?