अध्याय 7: दस साल की नींद
ट्रेन चल रही थी।
लेकिन अंगद के लिए समय रुक चुका था।
वह अपनी सीट पर बैठा था और सामने की खाली सीट को घूर रहा था।
कुछ मिनट पहले वहाँ मीरा बैठी थी।
अब वहाँ सिर्फ उसकी परछाईं जैसी एक हल्की-सी नमी थी।
अंगद ने अपनी हथेली खोली।
वही चाँदी की अंगूठी।
एम।
उसने अंगूठी को मुट्ठी में कस लिया।
उसके दिमाग में एक ही बात घूम रही थी—
“मैं अभी भी वहीं हूँ, अंगद।”
उसने आँखें बंद कीं।
फिर वही आवाज़—
बीप…
बीप…
बीप…
उसने अचानक आँखें खोल दीं।
सामने ट्रेन थी।
लेकिन मशीन की आवाज़ अब भी सुनाई दे रही थी।
बहुत धीमी।
जैसे कहीं बहुत दूर से आ रही हो।
अंगद ने कान लगाए।
बीप…
बीप…
उसने सिर घुमाया।
आवाज़ दरवाज़े की तरफ से आ रही थी।
वह उठकर वहाँ पहुँचा।
दरवाज़े के शीशे में अपना चेहरा दिखाई दिया।
लेकिन अगले ही पल—
शीशे में उसका चेहरा नहीं था।
एक अस्पताल का कमरा दिखाई दे रहा था।
सफेद दीवारें।
नीली चादर।
मॉनिटर।
और एक बिस्तर।
उस बिस्तर पर कोई आदमी लेटा था।
अंगद कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
फिर उसके चेहरे पर डर उतर आया।
वो आदमी…
वही था।
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“नहीं…”
अंगद पीछे हट गया।
शीशा फिर सामान्य हो चुका था।
उसने अपने चेहरे को छुआ।
सब ठीक था।
उसने आँखें बंद कीं।
फिर खोलीं।
कुछ नहीं।
सिर्फ उसका प्रतिबिंब।
“मैं पागल नहीं हूँ…”
उसने खुद से कहा।
“मैं पागल नहीं हूँ।”
लेकिन आवाज़ में विश्वास नहीं था।
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ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकी।
दरवाज़े खुले।
अंगद उतर गया।
वह प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा रहा।
ट्रेन कुछ सेकंड बाद आगे बढ़ गई।
वह उसे जाते हुए देखता रहा।
फिर जेब से फोन निकाला।
उसने अस्पतालों की सूची खोजनी शुरू की।
मुंबई — 16 अगस्त 2016 — ट्रेन दुर्घटना — गंभीर घायल।
कई अस्पतालों के नाम सामने आए।
लेकिन एक नाम पर उसकी उँगली रुक गई।
सेंट मार्था मेमोरियल अस्पताल।
उसे नहीं पता क्यों।
बस एक अजीब-सी पहचान महसूस हुई।
जैसे वह इस नाम को पहले से जानता हो।
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अगली सुबह वह अस्पताल पहुँच गया।
पुरानी इमारत।
सफेद दीवारें।
फर्श पर फिनाइल की गंध।
रिसेप्शन के पीछे बैठी नर्स ने सिर उठाकर पूछा—
“जी?”
“मुझे दस साल पुराना रिकॉर्ड देखना है।”
“किसका?”
अंगद कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला—
“अंगद…”
नर्स ने पूरा नाम पूछा।
उसने बताया।
नर्स कंप्यूटर पर कुछ खोजने लगी।
फिर रुक गई।
उसके चेहरे का भाव बदल गया।
“आप रिश्तेदार हैं?”
अंगद ने कहा—
“हाँ।”
नर्स ने स्क्रीन से नजर हटाकर उसे देखा।
“आपको किसका रिकॉर्ड चाहिए?”
“मेरा।”
नर्स कुछ सेकंड उसे देखती रही।
फिर धीमे से बोली—
“आप मज़ाक कर रहे हैं?”
अंगद के चेहरे पर तनाव आ गया।
“नहीं।”
नर्स ने फिर स्क्रीन देखी।
उसने कुछ टाइप किया।
फिर उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
“एक मिनट…”
वह अंदर चली गई।
अंगद वहीं खड़ा रहा।
उसकी धड़कन बढ़ती जा रही थी।
कुछ देर बाद एक बुज़ुर्ग डॉक्टर बाहर आए।
सफेद बाल।
पतला चश्मा।
उन्होंने अंगद को देखा।
फिर स्क्रीन देखी।
फिर दोबारा अंगद को।
उनके चेहरे पर ऐसी हैरानी थी…
जैसे उन्होंने किसी मृत व्यक्ति को अपने सामने खड़ा देखा हो।
“तुम्हारा नाम अंगद है?”
“जी।”
डॉक्टर ने कुर्सी की तरफ इशारा किया।
“बैठो।”
अंगद बैठ गया।
डॉक्टर सामने बैठ गए।
कुछ सेकंड तक कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी।
फिर डॉक्टर ने पूछा—
“तुम्हें पिछले दस साल की कोई याद है?”
अंगद का दिल जैसे रुक गया।
“क्या मतलब?”
डॉक्टर ने स्क्रीन उसकी तरफ घुमाई।
एक पुराना रिकॉर्ड खुला था।
Patient: Angad Malhotra
Date of Admission: 16 August 2016
Condition: Severe traumatic brain injury
अंगद की नजर नीचे गई।
फिर आखिरी लाइन पर टिक गई—
Patient remains in persistent coma.
उसके हाथ सुन्न पड़ गए।
“ये…”
उसकी आवाज़ नहीं निकली।
डॉक्टर ने धीरे से कहा—
“तुम दस साल से यहाँ हो।”
अंगद ने सिर उठाया।
“नहीं।”
“हाँ।”
“मैं कल ही यहाँ से निकला हूँ।”
डॉक्टर की आँखों में चिंता थी।
“तुम कहीं से नहीं निकले।”
अंगद पीछे हट गया।
“मैं काम करता हूँ।”
“कौन सा काम?”
अंगद ने अपना ऑफिस बताया।
डॉक्टर ने सिर हिलाया।
“तुम्हारा ऑफिस दस साल पहले बंद हो चुका है।”
अंगद चुप।
“तुम्हारा घर?”
उसने पता बताया।
डॉक्टर ने कंप्यूटर पर कुछ देखा।
“वहाँ अब दूसरी फैमिली रहती है।”
अंगद की साँस तेज़ हो गई।
“नहीं…”
उसने सिर पकड़ लिया।
“ये झूठ है।”
डॉक्टर ने कुछ नहीं कहा।
अंगद अचानक खड़ा हो गया।
“मुझे अपनी आँखों से देखना है।”
“क्या?”
“वो कमरा।”
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डॉक्टर उसे एक लंबे गलियारे से लेकर गए।
दरवाज़े पर नंबर था—
ICU-17
अंगद रुक गया।
उसे अचानक चक्कर आया।
अंदर से वही आवाज़ आ रही थी।
बीप…
बीप…
बीप…
डॉक्टर ने दरवाज़ा खोला।
अंगद अंदर गया।
कमरे में मशीनें लगी थीं।
ऑक्सीजन।
मॉनिटर।
एक बिस्तर।
डॉक्टर ने पर्दा हटाया।
अंगद वहीं जम गया।
बिस्तर पर एक आदमी लेटा था।
चेहरा दुबला।
बाल बढ़े हुए।
आँखें बंद।
शरीर मशीनों से जुड़ा हुआ।
लेकिन चेहरा…
वही।
अंगद।
उसने एक कदम पीछे लिया।
“ये…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
“ये मैं हूँ?”
डॉक्टर ने धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ।”
अंगद की आँखों से आँसू निकल आए।
“तो मैं कौन हूँ?”
डॉक्टर ने कोई जवाब नहीं दिया।
अंगद बिस्तर के पास गया।
उसने अपने ही हाथ को देखा।
पतला।
स्थिर।
दस साल से बिना हिले पड़ा हुआ।
उसने धीरे से अपनी हथेली आगे बढ़ाई।
मशीन से जुड़ी उँगलियों को छूने की कोशिश की।
लेकिन उसका हाथ…
उस हाथ के आर-पार चला गया।
अंगद पीछे हट गया।
तभी—
बीप।
मॉनिटर की लाइन अचानक बदल गई।
डॉक्टर ने चौंककर स्क्रीन देखी।
“ये…”
अंगद ने देखा।
मॉनिटर पर दिल की धड़कन अचानक तेज़ हो गई थी।
बीप-बीप-बीप-बीप।
डॉक्टर ने तुरंत नर्स को बुलाया।
लेकिन अंगद की नजर बिस्तर पर थी।
उसके अपने शरीर की बंद आँखों के कोने से…
एक आँसू नीचे आया।
अंगद की साँस रुक गई।
“ये कैसे…”
और तभी—
उसके पीछे किसी ने बहुत धीरे से कहा—
“क्योंकि तुम अकेले नहीं सो रहे थे।”
अंगद ने पलटकर देखा।
मीरा दरवाज़े पर खड़ी थी।
इस बार वह ट्रेन में नहीं थी।
वह अस्पताल में थी।
अंगद उसकी तरफ बढ़ा।
“तुम कौन हो?”
मीरा की आँखें भर आईं।
उसने ICU के दूसरे हिस्से की तरफ इशारा किया।
“मुझे देखना है?”
अंगद ने कुछ नहीं कहा।
मीरा ने पर्दा हटाया।
सामने दूसरा बिस्तर था।
एक लड़की उस पर लेटी थी।
चेहरा शांत।
बाल बिखरे हुए।
मशीनें शरीर से जुड़ी थीं।
अंगद कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
फिर उसकी आँखें फैल गईं।
वह चेहरा…
वही था।
मीरा।
वही लड़की जिसे वह दस साल से अपनी यादों, ट्रेनों और सपनों में देख रहा था।
अंगद के होंठ काँपे।
“तुम…”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
इस बार उसकी आवाज़ बिल्कुल धीमी थी—
“हाँ, अंगद। मैं भी दस साल से कोमा में हूँ।”
कमरे में सिर्फ मशीनों की आवाज़ थी।
बीप…
बीप…
और फिर—
मीरा ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—
“लेकिन सवाल ये नहीं है कि हम दोनों यहाँ क्यों हैं।”
अंगद ने उसकी आँखों में देखा।
“तो सवाल क्या है?”
मीरा की आँखों में डर उतर आया।
उसने धीरे से कहा—
“सवाल ये है कि अगर हम दोनों कोमा में हैं… तो पिछले दस सालों से हम एक-दूसरे से मिल कहाँ रहे थे?”
अंगद के चेहरे से सारी रंगत गायब हो गई।
मॉनिटर पर उसकी धड़कन अचानक तेज़ होने लगी।
और उसी क्षण—
पूरे अस्पताल की लाइटें बंद हो गईं।
अंधेरा।
फिर कहीं दूर से…
ट्रेन के पहियों की आवाज़ आई।
धड़… धड़… धड़…