सुबह की पहली धुंध जब खिड़की के शीशों पर जमी, तो राघवन ने उसे एक धुंधले धुएं की तरह देखा, जो उसकी अपनी जिंदगी की हकीकत थी। पिछले रात के उस फोन कॉल और उस अजीब सी खामोशी के बाद, जो शालिनी और उसके बीच में एक दीवार बनकर खड़ी थी, राघवन ने अपने वजूद का एक बड़ा हिस्सा खो दिया था। वह अब उस 'मैनेजमेंट वाली शादी' का हिस्सा था, जहाँ प्यार की जगह सिर्फ एक ठंडी, पेशेवर समझदारी ने ले ली थी। आधुनिक महानगर की यही त्रासदी है—हम यहाँ बड़ी-बड़ी कंपनियों के प्रोजेक्ट्स तो मैनेज कर लेते हैं, लेकिन अपनी खुद की भावनाओं के प्रबंधन में पूरी तरह नाकाम साबित होते हैं।
शालिनी किचन में थी। कॉफी की खुशबू कमरे में फैल रही थी, लेकिन उस खुशबू में वह मिठास नहीं थी जो कभी उनके शुरुआती दिनों में हुआ करती थी। वह एक ऐसी रस्म थी जिसे निभाना मजबूरी थी। राघवन ने अपने कपड़े पहने—वही फॉर्मल शर्ट, वही प्रेस की हुई पैंट—और एक बार फिर अपनी जिंदगी का 'मुखौटा' पहन लिया। आईने में उसने खुद को देखा। आईने में दिखने वाला शख्स एक सफल कॉर्पोरेट एम्प्लॉई था, एक अच्छा पति था, एक जिम्मेदार नागरिक था। लेकिन आईने के पीछे, जो शख्स छिपा था, वह पूरी तरह से टूट चुका था, जो अब बस एक मरे हुए ख्वाब की राख ढो रहा था।
"आज ऑफिस जल्दी है?" शालिनी ने बिना मुड़े पूछा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था।
"हाँ, एक बड़ा प्रेजेंटेशन है," राघवन ने झूठ कहा। ऑफिस में कोई प्रेजेंटेशन नहीं था, बस उसे इस घर की दमघोंटू हवा से दूर भागना था। उसे डर था कि अगर वह एक पल भी यहाँ और रुका, तो शायद शालिनी के साथ उस ‘कॉन्ट्रैक्ट’ को तोड़ देगा और फिर से मीरा की ओर भाग पड़ेगा। लेकिन उसे पता था कि वह अब मीरा की तरफ नहीं जा सकता। मीरा ने सही कहा था—झूठ मिटाया नहीं जा सकता, उसके साथ ही जीना पड़ता है।
वह घर से निकला। दिल्ली की सड़कों पर ट्रैफिक का शोर शुरू हो चुका था। हर गाड़ी के भीतर बैठा इंसान किसी न किसी तरह के मुखौटे पहने हुए था। कोई अपने बॉस से डरा हुआ था, कोई अपने पार्टनर के शक से, तो कोई अपने कर्ज की किस्तों से। हम सब अपनी-अपनी एक्स्ट्रा-मेरिटल जिंदगियां जी रहे हैं—अपनी असलियत से दूर, एक ऐसी दुनिया में जो हमने खुद रची है ताकि हम अपनी तन्हाई से भाग सकें।
ऑफिस की लिफ्ट में चढ़ते ही, राघवन ने अपने फोन की स्क्रीन देखी। मीरा का कोई मैसेज नहीं था। उसने कोई मैसेज भेजा भी नहीं था। यह खामोशी ही अब उनके रिश्ते का आखिरी सच था। लिफ्ट का दरवाजा खुला और वह अपने केबिन की तरफ बढ़ गया। लेकिन उसका ध्यान काम में नहीं था। उसका दिमाग बार-बार उस बंद कमरे की तरफ जा रहा था, जहाँ मीरा और शालिनी आमने-सामने थीं।
अफेयर की मनोवैज्ञानिक पड़ताल करें, तो यह सिर्फ एक 'एडवेंचर' नहीं होता। यह उस खालीपन का परिणाम है जिसे हम 'सक्सेस' की चकाचौंध में भी नहीं भर पाते। राघवन ने मीरा के साथ जो अंतरंगता साझा की थी, वह उसके शरीर के लिए नहीं, बल्कि उसकी आत्मा के उस हिस्से के लिए थी जिसे उसने शादी के बाद कहीं दफन कर दिया था। मीरा उसके लिए एक 'टाइम मशीन' थी, जो उसे उस राघवन के पास ले जाती थी जो कभी उम्मीदों से भरा हुआ था।
दोपहर का समय था। वह अपने डेस्क पर बैठा कुछ फाइल्स देख रहा था, तभी उसकी एक जूनियर, रिया, उसके पास आई। रिया, जो इस कॉर्पोरेट कल्चर का एक नया और आधुनिक हिस्सा थी—स्वतंत्र, मुखर और बेपरवाह।
"सर, क्या आप लंच के लिए फ्री हैं? मुझे आपसे उस नए प्रोजेक्ट के बारे में कुछ चर्चा करनी थी," रिया ने एक ऐसी मुस्कान के साथ कहा, जिसमें एक अजीब सा आकर्षण था।
राघवन ने उसकी ओर देखा। रिया की आँखों में वही चमक थी जो सात साल पहले मीरा की आँखों में हुआ करती थी। राघवन को तुरंत उस खतरे का अहसास हुआ। वह फिर से उसी मोड़ पर खड़ा था—जहाँ एक और आकर्षण उसे अपने जाल में फंसाने के लिए तैयार था। क्या वह फिर से वही गलती दोहराएगा? क्या एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर एक 'लत' (addiction) की तरह होता है?
"आज नहीं, रिया। शायद कल," राघवन ने बहुत ही संभलकर जवाब दिया। उसने अपने मन की उस बेचैनी को दबाने की कोशिश की। उसने जान लिया था कि रिया उसके लिए खतरा नहीं थी, बल्कि उसके मन के भीतर की वह 'प्यास' खतरा थी, जो कभी भी किसी को भी अपना शिकार बना सकती थी।
ऑफिस से निकलने के बाद, वह सीधे अपनी गाड़ी लेकर शहर के बाहरी इलाके की तरफ चला गया। उसे अकेलेपन की ज़रूरत थी, लेकिन ऐसा अकेलापन जहाँ कोई भी उसे देख न सके। वह एक पुराने पार्क में जाकर बैठ गया। शाम का वक्त था, अंधेरा धीरे-धीरे पसर रहा था।
पार्क में कई जोड़े बैठे थे। कुछ नए थे, जो अभी एक-दूसरे को जानने की कोशिश कर रहे थे, और कुछ पुराने, जो अब चुप्पी साझा कर रहे थे। उसने देखा कि आधुनिक दौर के रिश्ते कितने जल्दी बदल रहे हैं। पहले लोग एक-दूसरे को पाने के लिए साल बिताते थे, अब लोग स्वाइप करके एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। लेकिन गहराई? गहराई कहीं खो गई है। हम सब 'फास्ट फूड' की तरह रिश्ते जी रहे हैं—जल्दी मिलते हैं, जल्दी उब जाते हैं, और जल्दी खत्म कर देते हैं।
राघवन ने अपनी जेब से वह डायरी निकाली जिसे उसने जलाया तो था, पर उसका एक हिस्सा अभी भी बचा हुआ था। उसमें मीरा के साथ बिताए कुछ पलों के बारे में उसने लिखा था। वह अब उस डायरी को फाड़कर फेंकना चाहता था। उसे लगा कि वह अपनी इस याद को अपनी जिंदगी से पूरी तरह मिटा देना चाहता है।
लेकिन क्या यादें कभी मिटती हैं? यादें तो उस खुशबू की तरह होती हैं जो कमरे में रहने के बाद भी रह जाती है।
तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आया। यह मीरा का था।
“शायद हम फिर कभी नहीं मिलेंगे, राघवन। लेकिन जो हमने जीया, वह इस महानगर की उस भीड़ में अकेला होने से तो कहीं बेहतर था। अपना ख्याल रखना।”
राघवन की आँखों में आंसू आ गए। उसने फोन बंद कर दिया और अपनी आँखें बंद कर लीं। एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर का यह रिश्ता अब आधिकारिक तौर पर खत्म हो चुका था। लेकिन उसके भीतर की वह कचोट अब भी बाकी थी।
वह घर लौटा। शालिनी अभी भी उसी तरह सोफे पर बैठी थी, जैसे वह उसके आने का इंतजार कर रही हो। घर का माहौल अब और भी ज्यादा ठंडा हो चुका था। राघवन ने अपनी जैकेट उतारी और सीधे शालिनी के पास जाकर बैठ गया। उसने अपना हाथ शालिनी के हाथ पर रखा।
"मैं सब कुछ भूलने की कोशिश कर रहा हूँ, शालिनी," उसने कहा।
शालिनी ने अपना हाथ पीछे नहीं हटाया, लेकिन उसने अपना हाथ राघवन के हाथ से मिलाया भी नहीं। वह एक पत्थर की मूरत की तरह बैठी रही।
"भूलना कोई समाधान नहीं है, राघवन," उसने कहा। "हमें उस जख्म के साथ जीना सीखना होगा। हमें अब यह देखना है कि हम इस बंजर जमीन पर क्या उगा सकते हैं।"
यह एक नई शुरुआत थी। न प्यार की, न जुनून की, बल्कि उस 'समझौते' की, जो शालिनी ने 'मैनेजमेंट' कहा था।
रात हुई। राघवन बिस्तर पर लेटा था, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। वह खिड़की के बाहर के उस उजाले को देख रहा था जिसे शहर की लाइटों ने बनाया था। दिल्ली का वह आधुनिक चेहरा, जो सुंदर तो बहुत है, लेकिन उसके पीछे हज़ारों ऐसी कहानियां दफन हैं जो कभी नहीं लिखी जाएंगी।
उसने मीरा के बारे में सोचना छोड़ दिया। उसने रिया के बारे में सोचना छोड़ दिया। उसने सिर्फ अपने बारे में सोचा। वह कौन था? वह क्या चाहता था? क्या वह वाकई उस 'परफेक्ट' जिंदगी को चाहता था जो उसे समाज ने दी थी? या वह उस अराजकता (chaos) को चाहता था जो उसने मीरा के साथ अनुभव की थी?
जवाब था—वह कुछ नहीं चाहता था। वह बस थक चुका था। आधुनिक जीवन की यह थकावट शारीरिक नहीं है, यह मानसिक है। यह उस दबाव से आती है जहाँ हमें हर वक्त 'सही' दिखना पड़ता है।
अगली सुबह, जब राघवन उठा, तो उसने एक नया फैसला किया। वह दफ्तर से छुट्टी लेगा। वह कहीं दूर चला जाएगा, जहाँ कोई उसे नहीं जानता होगा। जहाँ कोई 'मैनेजमेंट' नहीं होगा, कोई 'कॉन्ट्रैक्ट' नहीं होगा, कोई 'अफेयर' नहीं होगा। बस वह होगा, और उसकी अपनी तन्हाई।
उसने शालिनी को बताया कि वह एक हफ्ते के लिए कहीं बाहर जा रहा है। शालिनी ने बस सिर हिला दिया। उसे कोई फर्क नहीं पड़ा। यह अहसास राघवन के लिए सबसे बड़ा सच था—कि उसके होने या न होने से अब किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
वह एक सूटकेस लेकर घर से निकला। उसे नहीं पता था कि वह कहाँ जा रहा है, लेकिन उसे पता था कि उसे इस महानगर के उस मुखौटों की परेड से बाहर निकलना है।
गाड़ी चलाते हुए उसने खिड़की नीचे कर दी। हवा के ठंडे झोंके उसके चेहरे पर लगे। उसे लगा कि वह पहली बार खुली हवा में सांस ले रहा है। एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर का उसका सफर यहीं खत्म हुआ था, और उसके असली सफर की शुरुआत अब हो रही थी।
क्या वह फिर कभी किसी से प्यार करेगा? क्या वह फिर कभी उस 'ख्वाबगाह' की तलाश करेगा? शायद नहीं। क्योंकि अब उसने समझ लिया था कि जिंदगी 'ख्वाब' नहीं है, जिंदगी तो वह है जो हर सुबह चाय के उस फीके कप के साथ शुरू होती है।
उसने अपनी गाड़ी को हाईवे की ओर मोड़ दिया। पीछे छूटता हुआ वह महानगर अब बस एक छोटा सा बिंदु बन गया था। उसके भीतर का वह शोर अब शांत हो रहा था।
इस तरह, एक मध्यमवर्गीय कॉर्पोरेट जीवन की यह दास्तान उस जगह पर आकर थमी, जहाँ इंसान अपने ही साए से दूर होकर खुद को खोजने की कोशिश कर रहा था।
क्रमशः