एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 3 Jyoti Prajapati द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 3

शहर की रफ्तार अपनी नियमित गति से आगे बढ़ रही थी, लेकिन राघवन और मीरा के जीवन में समय जैसे एक अनचाहे ठहराव पर आकर थम गया था। पिछले अध्याय की उस रात के बाद, दोनों के बीच की दूरियां अब केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी एक नए मुहाने पर आ खड़ी हुई थीं। आधुनिक महानगर की यह विडंबना ही है कि यहाँ इंसान के पास सब कुछ होने के बावजूद अपनों के लिए एक अदृश्य दीवार होती है, जिसे लांघने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।
दोपहर की ढलती धूप राघवन के उस छोटे से लिविंग रूम की कांच की खिड़कियों से छनकर फर्श पर लंबे-लंबे साए बना रही थी। कॉफ़ी के दो खाली कप अभी भी टेबल पर वैसे ही रखे थे, मानो किसी अनकहे संवाद के गवाह हों। मीरा बालकनी की ग्रिल के पास खड़ी थी। उसके हाथ में एक सिगरेट थी, जिसका धुआं धीरे-धीरे हवा में मिलकर गायब हो रहा था। राघवन सोफे पर बैठा एकटक उसे देख रहा था।
यह स्थिति किसी साधारण मुलाकात जैसी नहीं थी। यह एक ऐसा एक्स्ट्रा-मेरिटल रिश्ता था, जिसकी अपनी कोई ज़मीन नहीं थी, कोई सामाजिक मान्यता नहीं थी, और न ही भविष्य का कोई सुरक्षित नक्शा था। यह सिर्फ वर्तमान की उस बेचैनी पर टिकी एक इमारत थी, जिसे दोनों ने मिलकर अपनी तन्हाई के मलबे पर खड़ा किया था।
"क्या सोच रहे हो, राघवन?" मीरा ने मुड़े बिना, धुएं के बीच से अपनी आवाज़ निकाली। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी ठंडक थी, जो सीधे दिल पर जाकर लगती थी।
"यही कि हम दोनों इस वक्त कहाँ खड़े हैं," राघवन ने अपनी जगह से उठते हुए कहा। वह धीरे-धीरे चलकर मीरा के ठीक पीछे जाकर रुक गया। उनके बीच महز कुछ इंच की दूरी थी। उस दूरी में भी एक अजीब सा खिंचाव था—एक ऐसा चुंबकत्व जो नैतिकता के हर पहरे को धता बताने के लिए काफी था। "एक तरफ मेरा वह घर है जहाँ मेरी एक स्थापित ज़िंदगी है, एक पत्नी है, और सामाजिक मर्यादाओं का पूरा ढांचा है। और दूसरी तरफ... तुम हो, जिनके साथ बिताया हर पल मुझे यह अहसास कराता है कि मैं अब तक एक झूठी ज़िंदगी जी रहा था।"
मीरा ने सिगरेट को ऐशट्रे में बुझाया और धीरे से मुड़ी। उसकी आँखें राघवन की आँखों में सीधे गड़ी हुई थीं। उनमें कोई झिझक नहीं थी, बल्कि एक ऐसा प्रगाढ़ स्वीकार था जो किसी भी रिश्ते को सबसे खतरनाक मोड़ पर ले जाने के लिए काफी होता है।
"झूठी ज़िंदगी किसे कहते हैं, राघवन?" मीरा ने उसके बिल्कुल करीब आते हुए कहा। उसकी सांसों की गर्माहट राघवन की त्वचा पर महसूस हो रही थी। "क्या वह ज़िंदगी झूठी नहीं है जहाँ दो लोग सिर्फ समाज के डर से एक छत के नीचे अजनबियों की तरह रहते हैं? जहाँ रातें बिना किसी संवाद के गुजर जाती हैं, और सुबह होते ही मुखौटे पहनकर बाहर निकलना पड़ता है? अगर वह सच है, तो फिर हम जो यह पाप कर रहे हैं, वह मुझे उस सच से कहीं ज़्यादा पवित्र लगता है।"
यह शब्द सीधे राघवन के भीतर उतर गए। एक विवाहित पुरुष होने के नाते उसने हमेशा खुद को समाज के नियमों के दायरे में सुरक्षित महसूस किया था, लेकिन अंदर ही अंदर वह भी जानता था कि उसकी वैवाहिक जिंदगी केवल एक समझौते के सिवा कुछ नहीं थी। पत्नी के साथ उसका रिश्ता आत्मीयता से ज्यादा औपचारिक कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का एक लंबा सिलसिला बन चुका था। आधुनिक जीवन की यह सबसे बड़ी सच्चाई थी—जहाँ लोग साथ रहते हुए भी मानसिक रूप से हज़ारों मील दूर होते हैं।
मीरा के इस स्पर्श ने राघवन के भीतर बरसों से दबी उस आग को हवा दे दी, जिसे उसने बहुत करीने से छिपाकर रखा था। उसने अपना हाथ मीरा की कमर पर रखा। यह स्पर्श अब किसी हिचकिचाहट का मोहताज नहीं था। इसमें एक अजीब सी आक्रामकता थी, उस घुटन के खिलाफ बगावत थी जिसे दोनों ने पिछले इतने सालों से झेला था।
"हम दोनों आग से खेल रहे हैं, मीरा," राघवन की आवाज़ हल्की सी कांपी, लेकिन उसके हाथ का दबाव मीरा की कमर पर और गहरा हो गया। "अगर किसी को भी इस बात की भनक लगी..."
"तो क्या होगा?" मीरा ने उसकी बात बीच में ही काट दी। उसके होंठों पर एक बहुत ही मादक, निर्भीक मुस्कान तैर गई। उसने अपना एक हाथ राघवन के कंधे पर रखा और उंगलियों से उसके कोट के कॉलर को सहलाने लगी। "क्या समाज हमें जीने की कोई और सजा दे देगा जो हम पहले से नहीं भुगत रहे? रोज़ सुबह उठकर उस खोखलेपन को ढोना, बिना किसी अपनापन के दिन काटना—इससे बड़ी सजा और क्या होगी, राघवन?"
कमरे की हवा धीरे-धीरे भारी होने लगी थी। बाहर की दुनिया का शोर अब उनके कानों तक नहीं पहुँच रहा था। उनके बीच की वह अदृश्य दीवारें एक-एक करके ढह रही थीं। आधुनिक जीवन के वे तमाम दबाव, वे कॉर्पोरेट मीटिंग्स, वे ईमेल्स, वे सामाजिक औपचारिकताएं—सब कुछ इस छोटे से कमरे की चारदीवारी के बाहर छूट गया था।
मीरा ने धीरे-धीरे कदम पीछे बढ़ाए और बिस्तर की तरफ इशारा किया। वह कदम किसी आमंत्रण से ज्यादा एक अनिवार्यता थी, जिसे टाला नहीं जा सकता था।
जब दो इंसान अपनी वैध सीमाओं को तोड़कर एक-दूसरे की बाहों में उतरते हैं, तो उस पल उनके भीतर का सारा अपराधबोध धीरे-धीरे एक अजीब से उन्माद में बदल जाता है। राघवन ने आगे बढ़कर मीरा को अपनी बाहों में समेट लिया। यह आलिंगन सिर्फ शारीरिक नहीं था; यह दो ऐसे टूटे हुए वजूदों की पुकार थी जो अपनी तन्हाई को मिटाने के लिए हर हद पार करने को तैयार थे।
उनके बीच के अंतरंग पल किसी योजना का हिस्सा नहीं थे, बल्कि उस दमन और घुटन का स्वाभाविक विस्फोट थे जो आधुनिक महानगरों की हवा हर संवेदनशील इंसान के हिस्से में डालती है। राघवन ने मीरा के बालों में अपना चेहरा छिपा दिया। मीरा की साँसें तेज हो रही थीं। उसके हाथों की पकड़ राघवन की पीठ पर और मजबूत हो गई।
इस रिश्ते में कोई भविष्य नहीं था—वे दोनों यह बात अच्छी तरह जानते थे। यह एक ऐसा चक्रव्यूह था जिसमें उतरने के बाद सिर्फ दर्द और बिखराव का ही रास्ता बचता है। लेकिन उस वक्त, उस कमरे के भीतर, उस अंतरंगता के समंदर में डूबते हुए, उन्हें इस भविष्य की परवाह बिल्कुल नहीं थी। उनके लिए सिर्फ वह वर्तमान था, वह स्पर्श था, और वह वर्जित सुख था जिसके लिए वे अपनी पूरी दुनिया दांव पर लगाने को तैयार थे।
कमरे की खामोशी अब उनकी साँसों की सरसराहट और दबी हुई आहों से टूट रही थी। समय जैसे थम गया था। राघवन ने महसूस किया कि मीरा का शरीर उसके स्पर्श से सिहर उठा है। उसकी हर साँस में वही तड़प थी जो उसने अपनी डायरी के पन्नों में ‘ख्वाब’ के रूप में लिखी थी। यह कोई साधारण शारीरिक संबंध नहीं था, बल्कि दो इंसानों की वह चीख थी जो अपनी तन्हाई के खिलाफ आखिरी जंग लड़ रही थी।
वक्त की सुइयां आगे बढ़ रही थीं, लेकिन उनके इस आलिंगन में ऐसा खिंचाव था कि वे इस दुनिया से कटकर किसी और ही लोक में पहुँच चुके थे।
शाम की मद्धम रोशनी जब परों को चीरती हुई कमरे के भीतर फैली, तो माहौल शांत हो चुका था।
मीरा बिस्तर के एक कोने में चादर ओढ़े लेटी थी। उसकी आँखें छत की तरफ टिकी थीं। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, जो किसी बड़े तूफान के गुजर जाने के बाद आती है। राघवन बेड के किनारे बैठकर अपनी सिगरेट सुलगा रहा था। उसकी उंगलियां अभी भी हल्की सी कांप रही थीं।
"तुम्हें नहीं लगता कि हम बहुत दूर आ चुके हैं, राघवन?" मीरा ने बिना अपनी नज़रें हटाए बेहद धीमी आवाज़ में पूछा।
राघवन ने एक लंबा कश लिया और धुएं को हवा में छोड़ते हुए कहा, "दूर आना ही था, मीरा। जब रास्ते ही इतने संकरे हों, तो या तो इंसान पीछे लौट जाता है, या फिर कुचल दिया जाता है... हमने आगे बढ़ना चुना है।"
उसकी इस बात में एक ऐसा संकल्प था जो खतरनाक भी था और सम्मोहक भी। एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर के इस दलदल में उतरने के बाद अब पीछे मुड़ने का कोई विकल्प नहीं बचा था। वे दोनों जानते थे कि यह रिश्ता न तो समाज को स्वीकार्य होगा, और न ही उनके अपने घरों को। लेकिन इसके बावजूद, इस वर्जित प्रेम की मिठास उनके पूरे वजूद पर छा चुकी थी।
दरवाजे की घंटी अचानक बजी।
उस एक आवाज़ ने कमरे के पूरे तापमान को शून्य पर ला दिया। राघवन के हाथ से सिगरेट की राख नीचे गिर पड़ी। मीरा की आँखें चौंककर फैल गईं। इतनी शाम गए, इस वक्त, इस पते पर कौन हो सकता है? क्या राघवन की पत्नी लौट आई थी? या फिर यह किसी अनहोनी की पहली दस्तक थी?
कमरे का सन्नाटा एक बार फिर किसी भारी चट्टान की तरह उनके सिर पर आ गिरा।

क्रमशः