एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 1 Jyoti Prajapati द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 1

रात के ढाई बज रहे थे। कमरे में एकमात्र उजाला राघवन के लैपटॉप की स्क्रीन से आ रहा था, जिसकी ठंडी नीली रोशनी उसके चेहरे पर एक अजीब सा पीलापन और थकान उकेर रही थी। स्क्रीन पर कर्सर एकटक झपकी ले रहा था, मानो उसे भी कोई सुध न हो कि क्या टाइप करना है। बगल में रखी कॉफी का कप अब पूरी तरह ठंडा हो चुका था, जिसकी सतह पर जमी मलाई की परत आधुनिक महानगर की उस स्थिर ठहराव की गवाही दे रही थी, जिसमें गति तो बहुत थी, पर जीवन का वेग गायब था।
राघवन ने अपनी उंगलियों को कीबोर्ड से हटाया और पीछे की ओर झुक गया। फ्लैट के बड़े-बड़े शीशों के पार, बाहर दिल्ली की चमकती हुई रिंग रोड का धुंधला सा कोलाहल दिख रहा था—गाड़ियों की दौड़ती हेडलाइट्स, दूर किसी बहुमंजिला इमारत पर टिमटिमाते लाल निशान, और इन सबके बीच एक गहरा, मूक सन्नाटा जो सीधे रीढ़ में उतर जाता था।
यह महानगर हज़ारों लोगों की भीड़ से भरा था, लेकिन इसके भीतर रहने वाले हर शख्स के पास अपनी एक अदृश्य दीवार थी, जिसके पार झांकने की इजाजत किसी को नहीं थी।
उसका फोन ज़ोर से वाइब्रेट हुआ। स्क्रीन पर एक नया नोटिफिकेशन चमक उठा—“आपकी एक पुरानी याद...”
राघवन ने स्क्रीन पर उंगली फेरकर उसे तुरंत हटा दिया। पुरानी यादें आज के समय में किसी ज़ख्म से कम नहीं होतीं। जब वर्तमान खालीपन से भरा हो, तो बीता हुआ कल और भी ज़्यादा भारी लगने लगता है।
तभी उसकी नज़र स्टडी टेबल पर रखे उस छोटे से नोटपैड पर पड़ी, जिसे उसने पिछले हफ्ते गुस्से में या शायद किसी अकुलाहट में लिखा था—‘एक ऐसी सूची, जिसे हम कभी जी नहीं पाए।’
यहीं से तो शुरू होती थीं वे सारी उलझनें। आधुनिक जीवन ने इंसान को सब कुछ दिया—सुविधाएं, तकनीक, आज़ादी और विकल्प; पर उससे उसकी वह ‘साझा खामोशी’ छीन ली, जिसमें दो इंसान बिना कुछ कहे एक-दूसरे को समझ सकते थे। आज के रिश्ते इंस्टाग्राम की रील्स जैसे हो गए थे—सुंदर, चमकदार, पल भर में लुभावने, पर अंदर से पूरी तरह खोखले।
राघवन ने एक लंबी सांस ली। उसने अपनी डायरी खींची, पेन उठाया और कागज पर पहला शब्द लिखा—"ख्वाब..."
अक्षर अभी आधे-अधूर ही उतरे थे कि दरवाजे की घंटी ब बजी। इतनी रात गए घंटी? इस महानगर में आधी रात को या तो कोई आपात स्थिति होती है, या फिर कोई भटका हुआ मुसाफिर। उसने उठकर दरवाजा खोला, तो सामने खड़ी परछਾਈ ने उसकी सांसों की रफ्तार को एक पल के लिए थाम दिया...

दरवाजे के चौखट पर खड़ी परछाईं, मद्धम पड़ती हुई सीलिंग लाइट की रोशनी में धीरे-धीरे एक स्पष्ट आकृति में ढल रही थी। वह मीरा थी।
वही मीरा, जो ठीक सात साल पहले ज़िंदगी के किसी चौराहे पर बिना किसी विदाई के, बिना किसी अंतिम वाक्य के, धुएं की तरह गायब हो गई थी। उसके कंधे पर वही पुराना सा लेदर का बैग टंगा था, बालों में हल्की सी सफेदी और आंखों में वही पुरानी, जानी-पहचानी सी अनकही थकान थी जो महानगरों की हवा हर संवेदनशील इंसान के हिस्से में चुपचाप डाल देती है।
राघवन हक्कान्बक्का खड़ा रह गया। उसके मुँह से कोई शब्द नहीं फूटा। दिमाग के किसी कोने में वर्षों से बंद पड़ी कोई भारी खिड़की अचानक ज़ोर से खुल गई हो और तेज़ हवा का झोंका भीतर आ गया हो—कुछ वैसा ही अहसास हुआ।
"क्या दरवाज़े पर ही खड़े रहने दोगे, राघवन? या अंदर आने के लिए कोई विधिवत निमंत्रण पत्र भेजूं?" मीरा की आवाज़ में वही पुरानी हल्की सी खनक थी, पर उसके पीछे छिपी कंपकंपी को महसूस करना मुश्क़िल नहीं था।
राघवन ने हड़बड़ाकर खुद को संभाला और एक कदम पीछे हटते हुए रास्ता दिया। "तुम... इतनी रात गए... यहाँ?" उसके मुँह से बस यही अटपटा सा वाक्य निकला।
मीरा अंदर आई। उसने कमरे की सरसरी निगाहों से थाह ली—ठंडी पड़ी कॉफी का कप, नीले उजाले वाला लैपटॉप, और टेबल पर खुला वह नोटपैड जिस पर अभी-अभी उसने "ख्वाब..." लिखा था। मीरा की नज़र उस पर टिक गई। उसके होंठों पर एक बहुत ही क्षीण, उलझन भरी मुस्कान तैर गई।
"मैंने तुम्हारी डायरी का पहला शब्द पढ़ लिया," मीरा ने अपना बैग सोफे पर रखते हुए कहा, और बिना राघवन की अनुमति के खुद ही एक कुर्सी खींचकर बैठ गई। "और यकीन मानो, पिछले सात सालों से मैं भी ठीक इसी शब्द की तलाश में भटक रही थी। बस... मेरा आसमान थोड़ा अलग था और ज़मीन भी।"
राघवन अभी भी दरवाजे के पास खड़ा था। हवा का वह झोंका जो कुछ पल पहले खिड़की से बाहर दिख रहा था, अब कमरे के भीतर आ चुका था। वक्त जैसे सात साल पीछे लौट आया हो, या शायद सात साल आगे निकलकर वर्तमान के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया हो।
"तुम्हें किसने बताया कि मैं यहाँ रहता हूँ?" राघवन की आवाज़ में अविश्वास के साथ-साथ एक अजीब सा खिंचाव भी था।
मीरा ने अपनी आँखें उठाकर राघवन की तरफ देखा—ऐसी नज़रों से, जिसमें बरसों की दूरी के सारे सवाल एक ही पल में सिमट आए थे। "किसी ने बताया नहीं, राघवन... महानगर भले ही लाखों की भीड़ से बने हों, लेकिन जब दो लोग अंदर से पूरी तरह टूटकर एकांत में जीते हैं, तो उनकी तन्हाइयों के रास्ते अपने आप एक-दूसरे से जा मिलते हैं।"
कमरे की खामोशी अब और गहरी हो गई थी। ठंडी होती कॉफी, लैपटॉप की टिमटिमाती स्क्रीन और सात साल बाद सामने बैठी वह औरत—इन तीनों के बीच राघवन को महसूस हुआ कि आधुनिक ज़िंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहाँ सब कुछ पास होते हुए भी हम अपनों के लिए महज़ एक अजनबी होते हैं, और जब अपने लौटते हैं, तो वक्त इतना आगे निकल चुका होता है कि संवाद के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं।

राघवन धीरे से आकर सोफे के दूसरे छोर पर बैठ गया। उसके और मीरा के बीच की यह दो गज की दूरी ऐसी थी, जिसे पार करने में भले ही कुछ सेकंड लगते, लेकिन इस दूरी को तय करने में सात साल का लंबा और थका देने वाला वक्त गुजर चुका था।
"सात साल, मीरा..." राघवन की आवाज में एक भारीपन था, जैसे वह खुद से ही बात कर रहा हो। "इतनी लंबी खामोशियाँ भी क्या किसी रिश्ते की सजा होती हैं?"
मीरा ने अपनी हथेलियों को आपस में मरोड़ा। उसकी उंगलियों की हल्की सी कंपकंपी बता रही थी कि उसका यह यहां आना जितना अचानक था, उतना ही मानसिक उथल-पुथल से भरा भी था। उसने खिड़की की तरफ देखा जहाँ बाहर की कृत्रिम रोशनी और रात का काला सन्नाटा आपस में उलझे हुए थे।
"सजा किसकी थी, राघवन? तुम्हारी या मेरी, या फिर इस अंधी दौड़ की जिसमें हम दोनों अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं को कंधे पर लादे किसी रेस के घोड़े की तरह भाग रहे थे?" मीरा ने फौरन पलटकर सवाल किया। उसकी आंखों में एक चमक थी, जो उन आंसुओं को छिपाने की कोशिश कर रही थी जो बरसों से भीतर ही भीतर सूख चुके थे। "हम दोनों ने मिलकर एक ऐसा भविष्य गढ़ा था जहाँ सफलता तो थी, लेकिन साँस लेने की जगह नहीं थी। जब घुटन हद से बढ़ गई, तो मैंने भाग जाना बेहतर समझा... बिना यह सोचे कि भागने से दूरियां कम नहीं होतीं, और गहरी हो जाती हैं।"
राघवन ने महसूस किया कि मीरा की बात में वह कड़वाहट नहीं थी, जो कभी अलगाव के वक्त हुआ करती थी; बल्कि अब उसकी जगह एक अजीब सा खालीपन और परिपक्वता आ चुकी थी। आधुनिक जीवन की चक्की ने दोनों को अलग-अलग रास्तों पर पीसकर एक ही सांचे में ढाल दिया था—दोनों ही सफल थे, दोनों के पास आधुनिक सुख-सुविधाएं थीं, लेकिन दोनों के भीतर एक अंतहीन रेगिस्तान फैला हुआ था।
राघवन उठा और किचन की तरफ बढ़ा। "तुम्हें कॉफ़ी पसंद है या चाय? हालांकि इस वक्त घर में कॉफ़ी ही मिलेगी... वो भी शायद ठंडी।" उसकी जुबान पर एक फीकी सी हंसी आ गई।
"जो भी गरम हो, राघवन," मीरा ने राहत की सांस लेते हुए कहा, और अपने कंधे से लेदर का बैग उतारकर नीचे रख दिया। "बस इतना गरम कि इस महानगर की ठंडक और मेरे भीतर जमी बर्फ पिघल सके।"
जब राघवन किचन में पानी उबालने लगा, तो उसकी नजर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर पड़ी। घड़ी की सुइयां टिक-टिक कर रही थीं। उसे अचानक अहसास हुआ कि यह रात सिर्फ एक सामान्य रात नहीं है। यह उन सारे अनकहे सवालों, दबी हुई भावनाओं और उस अधूरी 'बकेट लिस्ट' का प्रस्थान बिंदु है, जिसे उसने कुछ देर पहले अपनी डायरी में लिखना शुरू किया था।
चाय के कपों में उठती भाप के साथ, कमरे की हवा में अब सात साल की धूल धीरे-धीरे छटने लगी थी। बातचीत के वे तार जो अचानक टूट गए थे, बहुत संभलकर दोबारा जुड़ने की कोशिश कर रहे थे।



क्रमशः