एक दिन दिव्यम चित्रा को स्कूटी चलाना सिखा रहा था। चित्रा अभी भी पूरी तरह आत्मविश्वास से स्कूटी नहीं चला पाती थी, इसलिए दिव्यम उसके साथ-साथ चल रहा था और बार-बार उसे समझा रहा था—
“धीरे चलाओ चित्रा... घबराने की जरूरत नहीं है। ब्रेक तुम्हारे हाथ में है।”
चित्रा मुस्कुराते हुए बोली,
“आपको तो बहुत आसान लगता है... चलाना मुझे पड़ रहा है।”
दिव्यम हँस पड़ा।
“कुछ दिनों में तुम खुद मुझे पीछे छोड़कर निकल जाओगी।”
दोनों की यह हल्की-सी बातचीत सड़क से गुजर रहे एक आदमी ने देख ली।
वह चित्रा का पहला पति था।
उसके साथ उसका दोस्त भी था।
दोस्त की नजर अचानक चित्रा पर पड़ी।
“अरे... देख तो! ये तो तेरी पहली पत्नी चित्रा है!”
पहले पति ने तुरंत उधर देखा।
चित्रा को दिव्यम के साथ देखकर उसके चेहरे का रंग बदल गया।
उसकी आँखें कुछ पल के लिए वहीं टिक गईं।
दोस्त ने फिर कहा,
“और ये कौन है? इसके साथ इतनी आराम से घूम रही है?”
पहले पति ने तुरंत अपनी आवाज़ संभाली।
“तो क्या हुआ? घूम रही है तो घूमने दे।”
दोस्त ने हँसकर कहा,
“भाई, तेरी पत्नी थी... तुझे बुरा नहीं लग रहा?”
वह तुरंत बोला,
“मेरी पत्नी थी... अब नहीं है। ऐसी होती तो मुझे छोड़कर क्यों जाती? जरूर उसमें ही कोई कमी रही होगी। मैंने तो पहले ही समझ लिया था कि उसका चरित्र ठीक नहीं था।”
वह अपने दोस्त के सामने खुद को बेफिक्र दिखा रहा था।
लेकिन उसकी नजर बार-बार चित्रा पर ही जा रही थी।
चित्रा के चेहरे पर वह डर नहीं था जो कभी उसके साथ रहते हुए दिखाई देता था।
वह मुस्कुरा रही थी।
वह खुश दिखाई दे रही थी।
और यही बात उसके अंदर कहीं चुभ रही थी।
उसने मन ही मन सोचा—
“ये इतनी जल्दी खुश कैसे हो गई?”
लेकिन चित्रा के मन में दिव्यम को लेकर ऐसा कुछ नहीं था।
दिव्यम उसका पति जरूर था, लेकिन दोनों के बीच पहले ही एक बात साफ हो चुकी थी।
वे एक-दूसरे को पति-पत्नी का अधिकार नहीं देंगे।
दिव्यम ने उससे कहा था,
“चित्रा, मैं तुम्हारे अतीत को मिटाने की कोशिश नहीं करूँगा। तुम मुझे सिर्फ अपना दोस्त समझ सकती हो।”
चित्रा ने भी साफ कहा था,
“और मैं भी आपको वही सम्मान दूँगी... लेकिन पति वाला अधिकार नहीं।”
उनका रिश्ता इसी समझौते पर टिका था।
दोनों के बीच सम्मान था।
विश्वास था।
एक गहरी दोस्ती थी।
लेकिन प्रेम?
अभी नहीं।
कुछ दिनों बाद...
शहर के बाजार में काफी भीड़ थी।
दिव्यम और चित्रा खरीदारी करने आए थे।
चित्रा एक दुकान पर साड़ी देख रही थी।
“ये कैसी है?” उसने दिव्यम से पूछा।
दिव्यम ने साड़ी को देखकर कहा,
“तुम्हारे ऊपर बहुत अच्छी लगेगी।”
चित्रा ने मुस्कुराकर कहा,
“आपको हर चीज अच्छी ही लगती है।”
“क्योंकि तुम पहली बार अपनी पसंद से चीजें चुन रही हो।”
चित्रा के चेहरे पर हल्की खुशी आ गई।
वह दुकानदार से दूसरी साड़ी देखने लगी।
उसी समय सड़क के दूसरी तरफ एक कार खड़ी थी।
कार में चित्रा का पहला पति और उसकी पत्नी रोशनी बैठे थे।
पहले पति की नजर अचानक दुकान के बाहर पड़ी।
उसकी नजर चित्रा पर टिक गई।
वह उसे देखता रह गया।
चित्रा दिव्यम के साथ खड़ी थी।
उसके हाथ में खरीदारी का सामान था।
चेहरे पर वही मुस्कान थी...
जिसे वह कभी अपने साथ रहते हुए नहीं देख पाया था।
दिव्यम ने उसके लिए एक चीज उठाकर दिखाई और चित्रा हँस पड़ी।
उस पल उसके पहले पति के भीतर कुछ टूट-सा गया।
रोशनी ने उसकी नजर का पीछा करते हुए पूछा,
“क्या देख रहे हो?”
उसने तुरंत नजरें फेर लीं।
“कुछ नहीं।”
लेकिन उसकी आवाज़ में पहले जैसी बेफिक्री नहीं थी।
रोशनी ने फिर पूछा,
“चित्रा है न?”
वह चुप रहा।
रोशनी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
“लगता है तुम्हें अभी भी फर्क पड़ता है।”
वह झुंझलाकर बोला,
“बकवास मत करो।”
लेकिन उसकी आँखें फिर भी चित्रा को ही ढूँढ रही थीं।
उधर चित्रा ने दिव्यम से कहा,
“चलें?”
दिव्यम ने सिर हिलाया।
दोनों दुकान से बाहर निकले और साथ-साथ आगे बढ़ गए।
कार के अंदर बैठा उसका पहला पति उन्हें जाते हुए देखता रहा।
उसके मन में पहली बार एक सवाल उठा—
“क्या मैंने सच में चित्रा को खो दिया?”
और इस बार...
उसके पास उस सवाल का कोई जवाब नहीं था।
क्रमशः...