पवित्र बहु - 8 archana द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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पवित्र बहु - 8

चित्र मायके में थी…
माँ के आँगन में बैठी हुई… पर मन कहीं और अटका था – दिव्यांश में… दिव्यम में… उस घर में जहाँ उसे रोज़ अपमान मिलता था, फिर भी उसने उसे अपना मान लिया था।
लेकिन यह मायका भी अब सुकून नहीं दे रहा था।
शाम के समय वह बालकनी में खड़ी थी। नीचे गली में कुछ पड़ोस की औरतें बैठी थीं। जानबूझकर तेज़ आवाज़ में बातें कर रही थीं।
“अरे वही है ना… जिसे उसके पति ने छोड़ दिया था…”
“हाँ हाँ… चरित्र ढीला होगा तभी तो छोड़ा होगा।”
“भली औरत होती तो पति क्यों छोड़ता?”
“अब देखो, बार-बार मायके भाग आती है… ऐसी औरतें घर कहाँ बसा पाती हैं।”
“पहले एक को फँसाया… अब दूसरे को…”
हँसी गूँज रही थी।
शब्द तीर बनकर चित्र के सीने में धँस रहे थे।
उसके हाथ काँपने लगे।
आँखें भर आईं।
वह बिना कुछ कहे, धीरे से अंदर चली गई।
कमरे में आकर पलंग पर बैठ गई।
घुटनों में सिर छुपा लिया।
मन में तूफ़ान चल रहा था।
“एक औरत… बस एक औरत…
इतना सहती है…
पति छोड़ दे तो औरत गंदी…
समाज छोड़ दे तो औरत बदचलन…
ससुराल निकाले तो औरत बदनसीब…
और अगर चुप रहे तो कमजोर…”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“क्या मेरी कोई इज्जत नहीं…?
क्या मेरा दर्द किसी को दिखता नहीं…?”
उसी समय माँ अंदर आई।
“क्या हुआ बेटा? उदास क्यों है?”
चित्र ने जल्दी से आँसू पोंछे।
“कुछ नहीं माँ… बस ऐसे ही…”
लेकिन माँ माँ होती है।
वह समझ गई।
तभी उसकी सहेली रिचा भी आ गई।
“अरे… क्या हुआ? तू रोई है?”
चित्र ने धीरे से कहा –
“रिचा…
एक छोड़ी हुई औरत होना…
इतना भारी क्यों होता है?”
रिचा चुप हो गई।
चित्र आगे बोली –
“लोग नहीं देखते कि पति कैसा था…
लोग नहीं देखते कि औरत ने क्या सहा…
बस ये देखते हैं – पति ने छोड़ा…
मतलब औरत खराब होगी…”
रिचा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तू गलत नहीं है चित्र… समाज अंधा है।”
चित्र ने गहरी साँस ली।
“मैं आज ही वापस जाऊँगी…
मुझे यहाँ और नहीं रहना।”
“अरे, इतनी जल्दी?”
“हाँ…
दिव्यांश रोता होगा…
दिव्यम अकेले होंगे…
और वहाँ… चाहे मुझे रोज़ अपमान मिले…
पर बच्चा तो मेरा सहारा है।”
रिचा ने कहा –
“दिव्यम बहुत अच्छे इंसान हैं… मैंने भी सुना है।”
चित्र ने धीमे से कहा –
“अच्छे हैं… बहुत अच्छे हैं…
पर मेरा दिल…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
“मेरा दिल अभी भी मेरे पहले पति के नाम है…
मैं किसी और की हो ही नहीं पाई…”
रिचा की आँखें भर आईं।
“तू बहुत पवित्र है चित्र… इसीलिए तेरी कहानी इतनी दर्द भरी है।”
चित्र ने फैसला कर लिया –
“मैं आज शाम ही निकलूँगी।”
उधर दिव्यम का घर…
चित्र के मायके में उसे बदनाम किया जा रहा था…
और इधर ससुराल में उसे अपराधी बनाया जा रहा था।
उसकी दादी सास जानबूझकर किचन में घुसी।
डिब्बे उलट दिए।
अनाज फैला दिया।
चम्मच इधर-उधर कर दिए।
तेल गिरा दिया।
पूरा किचन गंदा कर दिया।
फिर जोर से चिल्लाई –
“अरे दिव्यम! ज़रा आ तो देख!”
दिव्यम दौड़कर आया।
“क्या हुआ दादी?”
“देख अपनी बहू का काम!
कोई तमीज नहीं है इसे!
किचन को कबाड़खाना बना रखा है!”
तभी नीतू जेठानी भी आ गई।
“हाँ दादी जी, सही कह रही हो आप।
इसे कुछ आता ही नहीं।
हम लोग तो ऐसे नहीं रखते घर।”
दिव्यम ने चारों ओर देखा।
उसे अजीब लगा।
“पर… चित्र तो यहाँ है ही नहीं…”
दादी सास झुँझला गई –
“तो क्या हुआ?
कल भी यही हाल था!
रोज़ का है इसका!”
नीतू ने आग में घी डाल दिया –
“दादी जी, मैंने तो पहले ही कहा था…
ऐसी औरतों से घर नहीं चलता…”
दिव्यम चुप हो गया।
मन में पहली बार एक सवाल उठा –
“अगर चित्र यहाँ नहीं है…
तो ये सब गंदगी किसने की?”
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा