पवित्र बहु - 6 archana द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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पवित्र बहु - 6

तभी जेठानी अंदर आई।
हाथ में चाय।
चेहरे पर माँ जैसी चिंता की एक्टिंग।
“अरे… थक गई होगी… इतने काम कर लिए…”
वह बोली।
चित्रा ने विनम्रता से सिर झुका दिया।
“नहीं दीदी, मैं ठीक हूँ…”
“बहुत सर्विस कर रही हो इस घर की…”
जेठानी ने बात को मीठाई में लपेटा।
“लेकिन ध्यान रखना… हर जगह इतनी इज़्ज़त नहीं मिलती… घर में बड़ी-बूढ़ियाँ जैसी भी आएँ… उनका मिज़ाज झेलना पड़ता है।”
चित्रा समझ नहीं पाई।
पर उसके दिल में हल्की-सी बेचैनी उतर गई।
रात को ही जेठानी ने अपने पति से बात की।
“दादी को शहर बुला लेते हैं।”
उसने कहा।
“उन्हें यहाँ रहना चाहिए… आखिर पोते की जिम्मेदारी है।”
असल बात कुछ और थी—
वह चाहती थी
दादी आए,
सख्ती करे,
और इस घर में चित्रा का साँस लेना भी मुश्किल हो जाए।
अगले ही दो दिनों में
घर में हलचल शुरू हो गई।
“दादी आ रही हैं।”
खबर फैली।
ससुर जी थोड़े शांत हो गए।
दिव्यम गंभीर।
और चित्रा—
बस चुप।
पर जिस बात ने सबसे ज़्यादा डराया—
वह यह था कि दादी सास़ के बारे में सुना गया था—
वह बच्चों से ज्यादा बहुओं से नफरत करती थी।
उसे बहुएँ कभी पसंद नहीं आती थीं।
और शहर की, पढ़ी-लिखी, सीधी, नरम बहू…
उसके लिए हमेशा आसान निशाना होती थी।
जेठानी अंदर ही अंदर खुशी से उबल रही थी।
उसे अब यकीन था—
“अब खेल शुरू होगा।”
जिस दिन दादी सास़ आई,
घर के बाहर गाड़ी रुकी।
दरवाजा खुला।
एक साठ-पैंसठ साल की कड़क चेहरे वाली बूढ़ी महिला उतरी।
कलाइयाँ पतली पर मजबूत।
आँखों में राख जैसी सख्ती।
चेहरा ऐसा कि कोई सीधे देख भी न पाए।
उसने अंदर आते ही निगाहें चारों तरफ घुमाईं।
जैसे किसी महकमे की जाँच करने आई हो।
चित्रा सामने खड़ी थी।
सिर पर आँचल, हाथ जोड़े।
“यही है नई बहू?”
उसने तीखी आवाज़ में पूछा।
जेठानी ने बनावटी मुस्कान के साथ कहा,
“हाँ दादी… यही है…”
दादी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
ठंडी नज़र।
किसी कसौटी पर परख रही हो जैसे।
“ज्यादा सीधी बन रही है।”
उसने भीतर ही भीतर सोचा।
“देखते हैं असली रंग कब दिखाती है।”
उसी समय दिव्यम का बेटा रो पड़ा।
चित्रा झट से उसे उठाने गई।
दादी की आँखों में तेज़ चिंगारी चमकी।
“रुको!”
उसने कठोर आवाज़ में कहा।
घर में सन्नाटा फैल गया।
चित्रा वहीं रुक गई।
हाथ हवा में स्थिर।
“पहले पूछो…”
दादी बोली,
“किस हक़ से गोद उठाती हो?
अभी कौन हो तुम इस घर में?
बीवी… या बस मेहरबानी से बैठी हुई औरत?”
जेठानी के होंठों पर जीतभरी मुस्कान आई।
यही तो चाहती थी वह।
ससुर जी भी चुप।
दिव्यम भी स्तब्ध।
चित्रा के सीने में जैसे कुछ टूट गया—
पर चेहरा न झुका,
न आवाज़ टूटी।
उसने धीरे से बच्चा फिर भी उठा लिया—
और प्यार से सीने से लगाया।
बच्चा शांत हो गया।
दादी ने ये देखा—
और अंदर एक अजीब-सी चिढ़ उठी।
“ये औरत…
इतनी आसानी से टूटेगी नहीं।”
उधर जेठानी ने अपनी साजिश का दूसरा पन्ना खोल दिया।
अब उसके मन में एक और खतरनाक सोच जन्म ले चुकी थी—
“अगर बच्चा ही नहीं रहेगा…
तो न वारिस रहेगा,
न यह चित्रा किसी काम की।”
उसके चेहरे पर धीमी, खतरनाक मुस्कान फैल गई।
खेल शुरू हो चुका था।
नाटक नहीं—
एक साज़िश।
और यह साज़िश…
सिर्फ़ चित्रा की जिंदगी नहीं—
दिव्यम के बच्चे की साँसों पर भी छाया बनकर उतरने वाली थी।
अब देखना था—
क्या चित्रा फिर टूटेगी…
या इस बार…
अपने ही दर्द से ताकत बनकर सामने खड़ी होगी।

घर अब पहले जैसा शांत नहीं रहा था।
अब हर दीवार पर ताने गूँजते थे।
हर सांस पर टोका-टोकी थी।
और हर कदम पर सवाल।
दादी सास घर की दहलीज़ पर बैठी रहतीं और बस नज़र रखतीं—
जैसे चित्रा कोई बहू नहीं, बल्कि कै़दी हो।
“अरे बहू!”
कड़क आवाज गूँजती।
“बच्चे को ऐसे अकेला छोड़ते हैं कहीं? समझ नहीं है तुम्हें?”
चित्रा पलटकर बोल सकती थी…
पर उसने सिर झुका दिया।
आँचल थोड़ा कसकर पकड़ा।
और चुपचाप फिर वही काम करने लगी।
थोड़ी देर बाद फिर आवाज़—
“रसोई ऐसे संभालते हैं?”
“माचिस यहाँ क्यों रखी?”
“चाकू ऐसे छोड़ दिया?”
“अरे तमीज़ नाम की चीज़ है कि नहीं तुममें!?”
हर रोज़…
हर वक्त…
हर साँस…
चित्रा सब सुनती…
सब सहती…
पर कुछ कहती नहीं।
उसे बस इस बात की परवाह थी—
कि वह दिव्यम से किया वादा निभा रही है।
उसने खुद से कहा था—
“मेरे हिस्से का दुख… मैं खुद झेलूँगी।
पर इस घर के लिए… माँ बनूँगी।”