कहते हैं कि अंधी आँखें दुनिया का कोई रंग नहीं देख सकतीं। न उजाला, न कफ़न का सफेद रंग और न ही हाथों पर लगा खून का लाल धब्बा। लेकिन क्या वाकई रोशनी के चले जाने से सच भी अंधा हो जाता है? या फिर कभी-कभी आँखें न होना एक वरदान बन जाता है, क्योंकि तब आप इंसानों के चेहरों को नहीं, बल्कि उनके झूठ की गंध और उनके कदमों के फरेब को सुनने लगते हैं।
यह कहानी है मुस्कान की। एक ऐसी लड़की जिसकी दुनिया सिर्फ सन्नाटों, आहटों और खुशबुओं के सहारे चलती थी। उसे नाज़ था अपनी इस महफूज़ दुनिया पर, और नाज़ था अपने शौहर दानिश की उस बेइंतहा मोहब्बत पर, जो उसकी आँखों का नूर बन चुका था।
लेकिन उस तूफानी रात ने सब कुछ बदल दिया। जब हवेली के पिछले दरवाज़े पर एक लंगड़ाता हुआ साया आकर रुका और हवा के झोंके के साथ चारों तरफ 'चंदन के इत्र' की एक भारी, दम घोंटने वाली महक फैल गई। उस महक के पीछे एक कत्ल का राज़ छुपा था, एक ऐसा राज़ जो धीरे-धीरे मुस्कान को एक ऐसे चक्रव्यूह में ले गया जहाँ हर रास्ता अपने ही हमसफर के गुनाह की तरफ मुड़ता था।
क्या कोई इंसान किसी से इतनी मोहब्बत कर सकता है कि उसके गुनाहों का कफ़न खुद ओढ़ ले? या फिर सच का वो चेहरा, जो आँखों के सामने धुंध बनकर छाया हुआ था, जब बेनकाब होगा तो ज़हन को हमेशा के लिए अपाहिज कर देगा?
भाग 1: आधी रात की आहट
रात के दो बजे थे। चारों तरफ एक खौफनाक सन्नाटा पसरा हुआ था। हवेली के बड़े से बेडरूम में लगी घड़ी की 'टिक-टिक' उस खामोशी को और गहरा कर रही थी। बाहर मौसम सर्द था और रुक-रुक कर कड़कती बिजली आसमान को चीर रही थी।
बिस्तर पर लेटी मुस्कान के चेहरे पर अचानक बेचैनी बढ़ गई। एक ज़ोरदार कड़कड़ाहट के साथ उसकी आँखें खुल गईं। उसकी आँखें बेहद खूबसूरत और शांत थीं, लेकिन अफ़सोस, उन आँखों में दुनिया को देखने की रोशनी नहीं थी। वह अंधी थी।
उसने घबराकर अपने बगल में हाथ मारा,
"दानिश...?
बिस्तर का वह हिस्सा बिल्कुल खाली और ठंडा पड़ा था। दानिश वहाँ नहीं था। मुस्कान के मन में घबराहट की एक लहर उठी,
'इतनी रात को दानिश कहाँ चले गए? क्या वह नीचे हॉल में हैं?
वह धीरे से बिस्तर से उतरी। आँखों से महरूम होने के बावजूद वह इस बड़ी हवेली के कोने-कोने से वाकिफ थी। दीवार का सहारा लेकर वह बेडरूम के दरवाज़े की तरफ बढ़ी। तभी अचानक उसके कान खड़े हो गए। कुदरत ने भले ही उसकी आँखों की रोशनी छीन ली थी, लेकिन उसकी सुनने की ताकत आम लोगों से दस गुना तेज़ थी।
हवेली के बाहर, बारिश से गीली हुई मिट्टी पर किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी—'चप... चप... चप...'। कोई बहुत भारी कदमों से हवेली के पिछले दरवाज़े की तरफ बढ़ रहा था। गौर करने वाली बात यह थी कि उस चाल में एक अजीब सा लंगड़ापन था, मानो एक पैर भारी पड़ रहा हो और दूसरा हल्का।
मुस्कान की आवाज़ डर से काँपने लगी,
क... कौन है बाहर? दानिश, आप हैं क्या?
बाहर से कोई जवाब नहीं आया। लेकिन तभी, हवा के एक तेज़ झोंके के साथ खिड़की के रास्ते एक बेहद नशीली और तेज़ महक कमरे के अंदर दाखिल हुई। वह 'चंदन के इत्र' की खुशबू थी। वह खुशबू इतनी भारी थी कि मुस्कान का दम घुटने लगा। डर के मारे वह दो कदम पीछे हटी, और तभी उसका पैर कोने में रखे एक चीनी मिट्टी के फूलदान से टकरा गया।
एक तीखी आवाज़ के साथ फूलदान फर्श पर बिखर गया। इस आवाज़ के होते ही बाहर की वो लंगड़ाती आहट अचानक रुक गई। ऐसा लगा कि बाहर खड़े उस साये ने मुस्कान की मौजूदगी को भांप लिया था। कुछ सेकंड का रोंगटे खड़े कर देने वाला सन्नाटा छाया रहा, और फिर वे भारी कदम तेज़ी से पीछे की तरफ भाग गए।
मुस्कान का पूरा बदन थर-थर काँप रहा था। तभी अचानक बेडरूम का मुख्य दरवाज़ा खुला और मुस्कान के हलक से एक चीख निकल गई।
"मुस्कान! मुस्कान, शांत हो जाओ! मैं हूँ... तुम्हारा दानिश।
दानिश ने दौड़कर उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसकी आवाज़ में मुस्कान के लिए बेइंतहा फिक्र और मोहब्बत थी।
मुस्कान ने दानिश की कमीज़ को कसकर पकड़ लिया और रोते हुए बोली,
"दानिश! कोई था बाहर... पिछले दरवाज़े के पास। कोई लंगड़ाकर चल रहा था। और... और पूरे आंगन में चंदन के इत्र की तेज़ महक आ रही थी। मुझे बहुत डर लग रहा है!
दानिश का चेहरा कुछ सेकंड के लिए बिल्कुल सफेद पड़ गया। उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं, लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाला और मुस्कान के बाल सहलाने लगा।
वह बेहद धीमी और भारी आवाज़ में बोला,
"शशश... कोई नहीं है बाहर। मैं नीचे किचन में तुम्हारे लिए दूध गर्म करने गया था। शायद तुम्हारा वहम होगा। और इस रात के सन्नाटे में चंदन का इत्र कहाँ से आएगा? चलो, चुपचाप लेट जाओ।
दानिश ने उसे बिस्तर पर लेटा तो दिया, लेकिन मुस्कान का दिल अंदर ही अंदर चीख रहा था कि दानिश झूठ बोल रहा था। कुछ तो था, जो छुपाया जा रहा था।
अगली सुबह पूरी हवेली पुलिस के सायरन से गूँज उठी। हवेली के ठीक पीछे वाले घने जंगल में गाँव वालों की भीड़ जुटी थी। वहाँ एक चौबीस साल की लड़की की लाश मिली थी, जिसका गला बड़ी बेरहमी से रेता गया था।
हवेली के बड़े से ड्राइंग रूम में इंस्पेक्टर आदिल बैठा था। कड़क वर्दी, तीखी आँखें और चेहरे पर एक सख्त मिजाज। दानिश उसके सामने खड़ा था, और मुस्कान सोफे पर गुमसुम बैठी थी।
"मिस्टर दानिश, आपकी हवेली इस जंगल के सबसे करीब है,
इंस्पेक्टर आदिल ने अपनी डायरी में कुछ लिखते हुए कड़क आवाज़ में कहा।
"कल रात दो से तीन के बीच इस लड़की का कत्ल हुआ है। क्या आपने या आपकी पत्नी ने रात को कोई अजीब आवाज़ सुनी?
दानिश ने तुरंत बात काटते हुए कहा,
"नहीं इंस्पेक्टर साहब। हम दोनों गहरी नींद में थे। हमें सुबह पुलिस की गाड़ियों से ही पता चला। मेरी पत्नी देख नहीं सकतीं, ये वैसे भी रात को कमरे से बाहर नहीं निकलतीं।
"नहीं इंस्पेक्टर साहब! दानिश झूठ बोल रहे हैं। मैंने आवाज़ सुनी थी!
मुस्कान अचानक सोफे से उठ खड़ी हुई।
आदिल के कान खड़े हो गए। उसने एक सर्द निगाह दानिश पर डाली और फिर मुस्कान की तरफ मुड़ा। उसकी आवाज़ थोड़ी नरम हुई,
"जी मुस्कान जी, बताइए। आपने क्या सुना था?
मुस्कान की आँखों में वो खौफ फिर से तैर गया,
"रात ठीक दो बजे... कोई हमारे पिछले दरवाज़े के पास चल रहा था। उसके चलने में एक लंगड़ापन था, जैसे उसका एक पैर खराब हो। और... उसके बदन से बहुत तेज़ चंदन के इत्र की खुशबू आ रही थी। वह कातिल ही था इंस्पेक्टर साहब!
यह सुनते ही इंस्पेक्टर आदिल चौंक कर खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब से एक छोटी सी प्लास्टिक की थैली निकाली, जिसके अंदर कातिल के पैरों के पास से मिली एक टूटी हुई शीशी थी।
उसने गंभीर आवाज़ में कहा,
"मुस्कान जी, आपकी सुनने की ताकत कमाल की है। क्योंकि हमें लाश के पास से जो सबूत मिला है... वह 'चंदन के इत्र' की ही एक टूटी हुई शीशी है। और कातिल के पैरों के निशान भी मिट्टी पर लंगड़ाते हुए मिले हैं!
"थैंक यू मुस्कान जी, आपने हमारी बहुत बड़ी मदद कर दी,
इंस्पेक्टर आदिल ने कहा और बाहर जाने के लिए मुड़ा।
दानिश उसे बाहर तक छोड़ने के लिए आगे बढ़ा। जैसे ही दानिश दो कदम चला, मुस्कान का पूरा वजूद बर्फ की तरह जम गया। दानिश का सीधा पैर हल्का सा लंगड़ा रहा था! वह सुबह की हड़बड़ी का बहाना बना सकता था, लेकिन तभी हवा का एक झोंका दानिश की तरफ से उड़कर मुस्कान के चेहरे से टकराया।
मुस्कान के नथुने फड़क उठे। दानिश के बदन से वही 'चंदन के इत्र' की हल्की सी खुशबू आ रही थी, जो उसने रात को महसूस की थी।
मुस्कान ने डर के मारे अपने दोनों हाथों से अपना मुंह बंद कर लिया ताकि उसकी चीख न निकले। उसकी अपनी आँखें भले ही अंधी थीं, लेकिन उसका जमीर चिल्ला रहा था—कि उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा हमसफर, उसका शौहर दानिश ही वो खूंखार कातिल था! (जारी है)