ड्रॉइंग रूम का भारी दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। इंस्पेक्टर आदिल पुलिस की गाड़ियों के साथ जा चुका था। घर में अब सिर्फ मुस्कान और दानिश थे।
मुस्कान सोफे पर पत्थर की मूरत बनी बैठी थी। उसके कान दानिश के कदमों की आहट को नाप रहे थे।
'टुक... चप... टुक... चप...' दानिश का वही हल्का सा लंगड़ापन अब मुस्कान के कानों में हथौड़े की तरह बज रहा था। दानिश उसके करीब आकर बैठ गया। मुस्कान का पूरा बदन अकड़ गया।
दानिश ने मुस्कान का ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया और बहुत प्यार से बोला,
मुस्कान, तुम ठीक तो हो? तुम्हारे हाथ इतने ठंडे क्यों हैं? और तुमने इंस्पेक्टर आदिल को वो सब क्यों बताया? मैंने कहा था ना कि तुम्हारा वहम है।
दानिश के इतने करीब होने से मुस्कान उस 'चंदन की महक' को और साफ़ महसूस कर पा रही थी। उसने डर के मारे अपनी साँसें रोक लीं, लेकिन खुद को संभाला। उसे अब चालाकी से काम लेना था।
वह एक झूठी मुस्कान लाने की कोशिश करते हुए बोली,
द-दानिश... मुझे लगा पुलिस की मदद करनी चाहिए। वैसे... आपके पैर में ये अचानक लंगड़ापन कैसे आया? और आपके बदन से ये कैसी खुशबू आ रही है?
दानिश का हाथ मुस्कान के हाथ पर एक सेकंड के लिए ठहर गया। उसने धीरे से अपना हाथ पीछे खींच लिया।
वह एक हल्की सी घबराहट के साथ हँसते हुए बोला
"अरे, वो सुबह जब पुलिस आई, तो मैं हड़बड़ी में सीढ़ियों से उतर रहा था, पैर में मोच आ गई। और खुशबू? वो आदिल साहब मेरे पास ही तो खड़े थे, शायद उनका परफ्यूम मुझमें बस गया होगा। तुम बहुत सोच रही हो मुस्कान, आराम करो।
दानिश वहाँ से उठकर चला गया। मुस्कान का शक अब सौ फीसदी यकीन में बदल चुका था। दानिश साफ बहाने बना रहा था।
रात के ग्यारह बज चुके थे। पूरी हवेली में गहरा अंधेरा पसरा था। मुस्कान अपने बेडरूम में जाग रही थी, उसका दिमाग सो नहीं पा रहा था। तभी उसे नीचे वाले बेसमेंट से किसी के फुसफुसाने की आवाज़ आई।
वह दबे पाँव, बिना कोई आवाज़ किए सीढ़ियों से नीचे बेसमेंट की तरफ बढ़ी। बेसमेंट के दरवाज़े के पास पहुँचकर उसने अपना कान लकड़ी के किवाड़ से सटा दिया। अंदर दानिश किसी से फोन पर बात कर रहा था,
और उसकी आवाज़ में एक अजीब सा गुस्सा था।
"तुम पागल हो गए हो क्या?
दानिश फोन पर दबी हुई आवाज़ में चिल्लाया।
पुलिस यहाँ तक पहुँच चुकी है! उस लड़की का मर्डर करने की क्या ज़रूरत थी? अगर मुस्कान को ज़रा सा भी शक हुआ... तो मैं तुम दोनों को बर्बाद कर दूँगा! जो सबूत बचे हैं, उन्हें आज रात ही ठिकाने लगाओ!
यह सुनते ही मुस्कान के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। दानिश सचमुच इस खौफनाक खेल का हिस्सा था! वह डर के मारे दो कदम पीछे हटी, और तभी उसका हाथ दीवार पर लगे लाइट के स्विच से टकरा गया। एक हल्की सी 'खट' की आवाज़ गूँज उठी।
अंदर दानिश की आवाज़ तुरंत बंद हो गई।
"कौन है बाहर?!
अंदर से दानिश की दहाड़ सुनाई दी।
मुस्कान के पास भागने का वक्त नहीं था। अंधी होने के कारण अगर वह तेज़ भागती, तो किसी चीज़ से टकराकर गिर जाती। उसने तुरंत एक फैसला किया। वह वहीं दीवार से सटकर खड़ी हो गई और अपनी आँखों को बिल्कुल शून्य कर लिया, मानो वह नींद में चल रही हो।
दरवाज़ा खुला। दानिश हाथ में टॉर्च लिए बाहर आया। उसने मुस्कान को वहाँ खड़ा देखा तो उसकी आँखें सिकुड़ गईं। उसने टॉर्च की तेज़ रोशनी सीधे मुस्कान के चेहरे पर डाली। मुस्कान की आँखों की पुतलियाँ बिल्कुल स्थिर रहीं। उसने अपनी धड़कनों पर काबू रखा।
वह नींद का नाटक करते हुए धीरे से बड़बड़ाई,
"पानी... दानिश... कहाँ हो...
दानिश ने एक गहरी सांस ली और टॉर्च बंद कर दी,
"मुस्कान? तुम यहाँ नीचे क्या कर रही हो? तुम फिर से नींद में चलने लगी हो क्या?
दानिश ने उसका हाथ पकड़ा। इस बार उसका हाथ बहुत सख्त और ठंडा था। वह उसे वापस ऊपर कमरे में ले गया, उसे बिस्तर पर लिटाया और बाहर से कमरा लॉक कर दिया! मुस्कान कमरे में बंद हो चुकी थी। वह समझ गई कि अब वह इस घर में महफूज़ नहीं थी।
अगली सुबह, जैसे ही दानिश किसी काम से बाहर गया, उसने नौकर को मुस्कान पर नज़र रखने को कहा। लेकिन मुस्कान ने चालाकी से काम लिया और किसी तरह रसोई के लैंडलाइन फोन तक पहुँच गई। उसे इंस्पेक्टर आदिल का नंबर याद था, जो उसने कल आदिल के जाते वक्त डायरी के पन्ने पलटने की आवाज़ के साथ सुना था।
उसने काँपते हाथों से नंबर डायल किया।
"हेलो! इंस्पेक्टर आदिल? मैं मुस्कान बोल रही हूँ... दानिश की पत्नी,
उसने रोते हुए दबी आवाज़ में कहा।
"जी मुस्कान जी, बताइए। सब ठीक तो है?
दूसरी तरफ से आदिल की गंभीर आवाज़ आई।
"नहीं आदिल साहब! दानिश ही कातिल है। उसने कल रात बेसमेंट में किसी से बात की थी। वह सबूत मिटाने की बात कर रहा था। उसके पैर में कोई मोच नहीं है, वह रात को भी लंगड़ा रहा था... और उसके पास वही चंदन का इत्र है! प्लीज मुझे यहाँ से बचाइए, उसने मुझे कमरे में बंद कर दिया था!
आदिल कुछ सेकंड के लिए बिल्कुल खामोश रहा, फिर बोला,
मुस्कान जी, आप घबराइए मत। मैं अभी पुलिस फोर्स लेकर आपकी हवेली आ रहा हूँ। जब तक मैं न आऊँ, दानिश को शक मत होने दीजिएगा। मैं उसे रंगे हाथों पकड़ूँगा।
फोन कट गया। मुस्कान ने राहत की एक लंबी सांस ली कि आखिरकार मदद आ रही थी। वह फोन रखकर जैसे ही पीछे मुड़ी, उसके हलक में उसकी सांस अटक गई।
ठीक उसके पीछे दानिश खड़ा था!
दानिश के हाथ में वही 'चंदन के इत्र' की एक चमचमाती हुई नई शीशी थी। वह मुस्कान को बहुत ठंडी और डरावनी निगाहों से देख रहा था।
वह धीरे से मुस्कुराया और बेहद शांत आवाज़ में बोला,
"तो... तुमने आदिल को फोन कर ही दिया, मुस्कान? तुम्हें मुझ पर इतना शक था?
दानिश दो कदम आगे बढ़ा और उसने वह इत्र की शीशी ज़बरदस्ती मुस्कान की काँपती हथेलियों में थमा दी।
उसने मुस्कान के कान के पास झुककर कहा,
"लो, सूंघो इसे। क्या यही वो महक है जिससे तुम्हें नफरत है? अब जब आदिल आएगा... तो कहानी का अंत देखने लायक होगा।
मुस्कान का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि दानिश के इस अजीब से सुकून के पीछे क्या छिपा था? क्या उसे पुलिस का कोई डर नहीं था, या फिर खेल कुछ और था?(जारी है)