धुंध के पीछे - 4 Shaziya Khan द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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धुंध के पीछे - 4

भाग 4: चेहरे पर से हटता नकाब



कमरे की हवा अचानक इतनी भारी हो गई थी कि मुस्कान को लगा उसका दम घुट जाएगा। कंधे पर रखा इंस्पेक्टर आदिल का वो ठंडा हाथ किसी सांप की तरह महसूस हो रहा था। चंदन के इत्र की वो तेज़, तीखी महक और आदिल के कदमों का वो जानबूझकर लाया गया लंगड़ापन... सब कुछ चीख-चीखकर कह रहा था कि कत्ल वाली रात हवेली के पिछले दरवाज़े पर दानिश नहीं, बल्कि आदिल खड़ा था।


मुस्कान ने पूरी ताकत लगाकर अपने चेहरे के खौफ को छुपाया। वह जानती थी कि अगर इस वक्त उसने ज़रा सी भी समझदारी नहीं दिखाई, तो आदिल उसे यहीं खामोश कर देगा।


वह जानबूझकर अनजान बनते हुए दो कदम पीछे हटी और रोने का नाटक करते हुए बोली, "आदिल साहब... मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं आपका शुक्रिया कैसे अदा करूँ। अगर आज आप सही वक्त पर न आते, तो दानिश पता नहीं मेरे साथ क्या करता।


आदिल ने उसकी तरफ देखा। उसकी तीखी आँखें मुस्कान के चेहरे के एक-एक भाव को पढ़ रही थीं। उसने अपनी जेब से सिगरेट निकाली और उसे सुलगाते हुए बोला,

"शुक्रिया की कोई ज़रूरत नहीं है मुस्कान जी। यह तो पुलिस का फ़र्ज़ है। वैसे... एक बात बताइए, दानिश के पकड़े जाने पर आपको अफ़सोस नहीं हो रहा? आखिर वो आपका शौहर था।


"शौहर था आदिल साहब, पर एक कातिल से वफ़ादारी कैसी?

मुस्कान ने अपनी आवाज़ को मजबूत बनाते हुए कहा।


"जो इंसान किसी बेगुनाह लड़की का गला रेत सकता है, वह मेरा क्या सगा होगा?


आदिल ने सिगरेट का धुआँ हवा में उड़ाया। वह धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा। उसकी वो मुस्कुराहट बहुत डरावनी थी। वह बोला,

"बहुत खूब! बहुत प्रैक्टिकल सोच है आपकी। लेकिन सोचिए... अगर दानिश वाकई कातिल न हो तो? अगर कातिल ने ये सारे सबूत जानबूझकर दानिश के बेसमेंट में छुपाए हों ताकि पुलिस सीधे उसे ही पकड़े?



मुस्कान का दिल ज़ोर से धड़का, पर उसने खुद को बहकने नहीं दिया। उसने पूछा,


"आप ऐसा क्यों कह रहे हैं आदिल साहब? सबूत तो आपके सामने मिले हैं।


आदिल मुस्कान के और करीब आया। उसके जूतों की लंगड़ाती हुई आवाज़ फर्श पर गूँज रही थी। उसने कहा,


"क्योंकि पुलिस को जो चाकू और कपड़े मिले हैं, उन पर दानिश की उँगलियों के निशान नहीं हैं। और सबसे मज़ेदार बात जानते हैं क्या है? दानिश को पता था कि वो सबूत बेसमेंट में हैं... उसे यह भी पता था कि कत्ल मैंने किया है... फिर भी उसने खुद को गिरफ्तार होने दिया। वह चुपचाप हथकड़ी पहनकर चला गया। अजीब बात है न?


मुस्कान अंदर ही अंदर काँप उठी। वह मन ही मन सोचने लगी, 'दानिश को सब पता था? फिर भी वो चुप रहा? उसने मेरा गुनाह... नहीं, उसने आदिल का नाम क्यों नहीं लिया?'


"वह चुप क्यों रहा आदिल साहब?

मुस्कान ने पूछा, उसकी आवाज़ में इस बार असली उलझन थी।


आदिल ने सिगरेट का टुकड़ा फर्श पर फेंका और उसे अपने जूते से कुचलते हुए कहा,


"वही तो मिस्ट्री है मुस्कान जी! दानिश जैसा चालाक इंसान बिना किसी बड़ी वजह के खुद को सूली पर नहीं चढ़ाएगा। वह किसी को बचा रहा है... या फिर किसी बहुत बड़े सच को छुपा रहा है। खैर, मुझे अब थाने निकलना होगा। दानिश से उगलवाना पड़ेगा कि उसका असली राज़ क्या है।



आदिल मुड़ा और इस बार वह बिल्कुल सामान्य तरीके से, बिना लंगड़ाए सीधे कदमों से चलता हुआ हवेली के मुख्य दरवाज़े से बाहर निकल गया। उसके जाते ही पूरे घर में फिर से वही भयानक सन्नाटा पसर गया।


मुस्कान घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई। उसका दिमाग सुन्न हो चुका था। आदिल ने खुलकर यह नहीं माना था कि उसने कत्ल किया है, लेकिन उसने मुस्कान को यह साफ़ इशारा दे दिया था कि असली खिलाड़ी वही है। और दानिश? दानिश ने अपनी बेगुनाही साबित करने की एक कोशिश भी नहीं की।


तभी मुस्कान के हाथ में रखी इत्र की वो शीशी फर्श पर गिरकर टूट गई। उसकी तेज़ खुशबू से मुस्कान का सिर चकराने लगा। अचानक उसे याद आया कि दानिश ने जाने से पहले उसके कान में कुछ कहा था—"सच तुम्हारी अंधी आँखों से भी ज़्यादा धुंधला है।


मुस्कान ने अपना रोना बंद किया और खड़ी हुई। उसे समझ आ गया था कि अगर उसे सच जानना है, तो उसे खुद उस बेसमेंट में जाना होगा जहाँ पुलिस को सबूत मिले थे। आदिल के बिछाए इस जाल के पीछे कोई ऐसा सिरा था जो सिर्फ दानिश और आदिल जानते थे, और मुस्कान को उसे ढूंढना ही होगा। (जारी है)