मरना तो है
साकेत कई दिनों से परेशान हो रहा था। बेटी की शादी की
तैयारी पूरी हो चुकी थी, कल बारात आने वाली है और सुनार ने बेटी
के आभूषण अभी तक बनाकर नहीं दिये थे। घर में पिताजी भी
चिल्लाते और उसे लापरवाह समझकर डॉटते रहते थे, परन्तु सुनार की भी
अपनी मजबूरी थी, उसके पिता भी इसी बीच संसार से चल बसे
इसलिये मिले हुये आर्डर को वह समय पर पूरा नहीं कर पा रहा था।
आज साकेत सुनार की दुकान पर जाकर स्वम बैठ गया और 20 तौले सोने
के जेवर लेकर वह दुकान से जैसे ही निकला तो एक अपरिचित
गाड़ी उसके सामने आकर रूकी और वह लोग घबराये हुये थे दुखी
स्वर में बोले कि भैया आपके बड़े भाई निकेत का एक्सीडेंट हो गया
है ,गंभीर हालात में वे अस्पताल में भर्ती हैं आप जल्दी चलो।
हड़बड़ाया साकेत- उनकी गाड़ी में बैठ गया, जेवर का बैग
उसके हाथ में ही था, उसे वह छोडता भी कहां - गाडी के थोडा आगे
बढ़ते ही वह बोला - भाई आप लोग कहाँ जा रहे हो अस्पताल तो
उस दिशा में है, तुम किधर चल रहे हो? कार में बैठे व्यक्ति ने रूमाल
से उसका मुँह बंद कर तमंचा दिखाते हुये कहा- चुपचाप बैठे रहो।
साकेत समझ गया कि वह किसी साजिश का शिकार हो गया
है। चुप रहने के अतिरिक्त उसके पास कोई चारा ही नहीं था। गाड़ी
तेज गति से आगे बढ़ती रही और एकान्त सुने से गॉँव में जाकर
रूकी। उसके पास के सारे आभूषण, नगद रूपये, उसके हाथ में
बंधी घड़ी व अंगुली की अंगूठी सब लुटेरों ने लूट ली और उसे बंदी
बना लिया। एक अंधेरे से कमरे में उसे रख दिया| कमरे में बैठा-बैठा
लाचार साकेत सोचता रहा कि--- बेटी की शादी के कितने सपने उसने देखे थे, सब
टूट गये,--- पता नहीं अब घर में क्या हो रहा होगा? जब से बेटी पैदा
हुई है, ---तब से ही प्रतिमाह उसके लिये कुछ रूपये वह पोस्ट ऑफिस में
जमा करता आ रहा था। उन्ही पैसों से उसने बेटी के लिये जेवर
बनाये थे, हार और झूमके बड़े शौक से बेटी ने पसन्द किये थे, ---
सब लूटेरों ने लूट लिये। पता नही बेटी व उसकी माँ का क्या हाल होगा?---
वह उदास होकर दीवारों को देखता रहा।---
लुटेरे उस पर दबाव डालते कि वह अपने घर से फिरौती के
लिये 25 लाख रूपये की मांग करें। उसके बार-बार कहने पर कि
वह लोग इतना पैसा नहीं दे पायेंगें, लुटेरे उसे जान से मारने की
धमकी देते थे| आखिरकार एक दिन उसने अपने घर पिता को पत्र
लिखा कि निश्चित स्थान पर वह 25 लाख रूपये पहुँचा देंगें तो उसे
छोड़ दिया जायेगा, अन्यथा उसकी हत्या कर दी जायेगी।
साकेत के घर ना लौटने पर घर के सभी लोग बहुत परेशान
थे। उस दिन तो घर वाले सोचते रहे कि वह कहीं काम से चला गया
होगा, रात को ना लौटने पर उसकी खोज चालू हुयी, परन्तु वह कहीं
ना मिला। बारात तो आई और किसी तरह शादी की रस्म अदायगी
भी पूरी की गई परन्तु सब साकेत की लापरवाही को कोसते रहे।
पत्नी और बेटी का बुरा हाल था। कोई समझ नहीं पा रहा था कि
साकेत कहॉँ चला गया? तरह-तरह के विचार सभी के मन में आते
थे। साकेत की चिट्ठी मिलने पर सब स्थिति स्पष्ट हो गई कि साकेत
का अपहरण हो गया हैं। वैसे भी साकेत के घर ना आने के कारण
सभी परिजन शंका कुशंकाओं से ग्रसित थे। इतनी बड़ी रकम
इकटठी कर पाना परिजनों के लिये कठिन था। साकेत की अनुपस्थिति
में परिजनों ने किसी तरह बेटी की शादी तो कर दी परन्तु अब शादी
के बाद इतनी बड़ी रकम कहाँ से लायेंगें ? वैसे भी शादी में कर्जा हो
गया था। वे देनदारियाँ तो थी ही ,अब ऐसे में और पैसे की व्यवस्था
बड़ी बात थी। कोई कुछ भी समझा नहीं पा रहा था। मध्यम वर्गीय
परिवार वैसे भी दो पाटों के बीच सदैव पिसता रहता है फिर बेटी की
शादी और अपहरण दोहरी चिंता में परिवार फंसा हुआ था। पैसा देने
के बाद भी साकेत के लौटने की कोई गारन्टी नहीं थी।
महीना भर तक परिजन पैसे की व्यवस्था नहीं कर पाये सभी
परेशान थे । उधर लुटेरे साकेत को रोज प्रताड़ित करते कि - यदि
पैसे नहीं आये तो हम तुमको जिंदा नहीं छोड़गें । उससे दुबारा
चिट्ठी लिखवाने के लिये दबाव बनाते- परन्तु वह बार-बार यही
कहता कि वो लोग पैसा नहीं दे पायेंगें।
लुटेरों का तर्क था कि - गरीब आदमी अपनी बेटी को 20 तोला
सोने के जेवर नही दे सकता हमें सब मालूम है। तुम्हारे पिता के पास
बहुत पैसा है हम तो सिर्फ 25 लाख ही कह रहैं, यदि नहीं दोगे तो हम तुमको जिंदा नहीं छोड़ेंगे, फिर
मरो।
इसी बीच लुटेरों के गिरोह के किसी अन्य अपहरित व्यक्ति के
परिजनों से सौदा का पैसा लेना था। साकेत की चौकीदारी के लिये
दो व्यक्ति- एक महिला व एक पुरूष छोड़कर गिरोह के सदस्य कहीं
अन्यंत्र चले गये। वैसे भी साकेत हथियारों से लैस लूटेरों के बीच
बहुत सहमा सा रहता था। उसकी जान को हर दिन ख़तरा रहता था,आज फिर घर की याद व अपनी मजबूरी
से वह बहुत निराश था। सोचा मरना तो है ही ,---एकान्त में बैठा साकेत
विचारों के भंवर में उलझा था। ---अस्त होते सुरज को देख रहा था
मानो उसके जीवन में कुछ बचा ही नही हो। ---उसे भी अपने जीवन
का अंत दिखाई दे रहा था। निराशा उसके मन में छा गई थी। वह
सोचता ---अब उसका बचना संभव नही है। --- यह लोग उसे मार डालेंगें।
उस दिन साकेत की चौकीदारी में तैनात दोनों चौकीदारों के
पास भी हथियार थे- पुरूष चौकीदार शौच के लिये बाहर चला गया
और महिला चौकीदार को साकेत पर निगरानी रखने के लिये छोड़
गया था। इसी बीच एक ट्रक उस झोपड़ी के सामने से निकली। ट्रक
की स्पीड कम थी महिला चौकीदार उनींदी सी थी, उसे झपकी आ
गई। साकेत ने सोचा मरना तो है ही, कैसे भी मरू। पीछे से महिला
चौकीदार के गोली चलाने की पूरी सम्भावना थी फिर भी वह तेजी से
ट्रक पर चढ़ गया। ट्रक पर बैठे मजदूरों ने उसे चोर समझ कर
मारना चालू कर दिया साकेत थोड़ी देर पिटता रहा फिर-निवेदन की
मुद्रा में बोला -मुझे मत मारो, मैं चोर नहीं हूँ उसने अपने साथ घटी
घटना उन लोंगों को बतलायी।
ड्राइवर ने उससे सभी बातें पूछी, तुम कहाँ के रहने वाले हो?
उसने अपना पता बता दिया, कि वह जगदलपुर का रहने वाला है।
साकेत ने पूछा- ट्रक कहाँ जा रही है?
ड्राइवर ने बताया - ट्रक तो रायपुर जा रही है।
साकेत बोला - मुझे रायपुर में ही कहीं उतार देना वहाँ मेरी
बहन रहती है। मैं उसके घर चला जाऊंग।
ड्राइवर बोला - हम तो बायपास रोड से निकल जाते हैं, तुम्हारी
बहन कहाँ रहती है?
साकेत ने कहा-शंकर नगर में रहती है।
ड्राइवर ने पूछा- कैसे जाओगे वहाँ तक?
साकेत बोला - आपने इतना किया है तो कोई और भी दया
करके मुझे मेरी बहन के घर तक पहुँचा देगा।
ट्रक ड्राइवर को उसके ऊपर दया आ गई और वह साकेत को
रायपुर में उसकी बहन के घर तक पहुँचाने ट्रक लेकर चल दिया।
बहन के घर पहुँचते ही भाई-बहन गले मिलकर बहुत रोये। दो माह
से बिछड़े भाई से मिलने पर बहन भी बहुत भावुक हो गई, फिर बहन
ने ट्रक ड्राइवर व ट्रक के मजदूरों की बड़ी आवभगत की और इस
एहसान को जिन्दगी भर याद रखने की बात कही।
ट्रक ड्राइवर व मजदूरों से साकेत ने उस स्थान का पूरा पता
मालूम कर लिया ,जहाँ से वह ट्रक में चढ़ा था। उसे कुछ पता नहीं
था कि वह कहाँ पर बंदी बना कर रखा गया था।
थोड़े दिन बहन सुचि के पास रहकर साकेत जगदलपुर अपने
घर आ गया। जगदलपुर आकर उसने लुटेरों के विरूद्ध थाने में
रिपोर्ट की । सब आप बीती बतायी व उस स्थान का पता बताकर-
जहाँ लुटेरे- लोगों को बंद कर के रखते थे-कार्यवाही करने के लिये
प्रेरित किया।
पुलिस ने कार्यवाही करते हुये छापा डाला और लुटेरों को
गिरफ्तार कर बहुत सा संदिग्ध सामान भी वहाँ से जप्त किया। पुलिस
की सख्त कार्यवाही से लूटेरों के अन्य साथी भी अलग अलग जगहों
से गिरफ्तार हुये और उन पर कार्यवाही हुयी।
कुछ दिनो बाद थाने में नागरिक सम्मान का कार्यक्रम रखा गया
जिसमें साकेत को उसके हिम्मत और पुलिस कार्यवाही में मदद करने
के लिये एस.पी. द्वारा सम्मानित किया गया।
छतीसगढ़ रत्न
डॉ.शिरोमणि माथुर
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