राहें
गर्मी का मौसम, तेज धूप और गर्म तेज चलती हवायें वातावरण
को शुष्क बनायें हुयी थी। पलंग पर बैठा किशोर अपने कटे पैरों को
देखकर दर्द से कराह रहा था, तभी ठंडे झोंकें की तरह श्वेत वस्त्र
धारिणी, चेहरे पर पवित्रता की दिव्य आभा लिये कुमुद (बड़ी माँ)
कमरें में आईं और बडे प्यार से बोली - क्या हाल है, किशोर बेटे,
कैसी तबियत है तुम्हारी ? - कहते हुये उसने किशोर के सिर पर
हाथ फेरा, बालों को सहलाया उसके पैरों को देखा - फिर बोली- कई दिन से मैं तुमसे
मिलने की सोच रही थी, आज आ पायी, तुम्हारी तरफ से चिंता बनी
रहती है - फिर पूछा - यह सब कैसे हुआ?
बड़ी माँ का आना किशोर को मन ही मन अच्छा लगता है,
सुखद एहसास होता है, परन्तु जानता है वे फिर समझाने लगेंगी
किशोर बोला - मैं ट्रेन के डब्बे में दरवाजे पर खड़ा था, सहयात्री ने
धक्का दे दिया और मैं चलती ट्रेन से गिर गया और ट्रेन से मेरी दोनों
टॉगें कट गई, डाक्टर ने आपरेशन किया है।
बड़ी माँ बोली - तुमको ठीक होने में कितने दिन लग जायेंगें?
किशोर बोला लगभग 3 माह तो लग ही जायेंगें, फिर भी
बिना बैसाखी के नहीं चल पाऊंगा ,बड़ी माँ।
बड़ी माँ बोली -मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि तुम जल्दी
ठीक हो जाओ। बड़ी मॉँ को समझ आ गया कि कहीं कुछ गड़बड़
करके किशोर भागा होगा और चलती ट्रेन में चढ़ा होगा और
जल्दबाजी में असावधानी के कारण गिरा होगा इसी कारण ट्रेन से
इसकी टांगे कटी है, किसी के धक्का मारकर गिराने वाली बात
उनकी समझ में नही आई, परन्तु वे बोली कुछ नहीं। उसके स्वस्थ
होने की कामना ईश्वर से करती रही।
कुमुद प्रजापिता ब्रह्मा कुमारीज संस्था में वर्षों से समर्पित बहन
हैं ,वे सेन्टर पर रहती हैं - किशोर के आपरेशन होने व दोनों टॉगें
कट जाने से द्रवित थी, इसलिये उससे मिलने आई थी। किशोर का
हालचाल लेने के बाद अपनी बहन मनीषा (किशोर की माँ) से मिलने
अन्दर गई। मनीषा रसोई में खाना बना रही थी - कुमुद को देखकर
बोली - कब आई दीदी -
कुमुद बोली - अभी 15, 20 मिनट हुये किशोर के पास बैठी थी,
उससे बातें कर रही थी - बहुत परेशानी है उसको। यह सब कैसे
हो गया ?
मनीषा बोली - ट्रेन से इसकी टॉंग कट गई किसी ने दया
करके अस्पताल पहूँचा दिया था - हमें तो अस्पताल से खबर आई,
हमें तो कुछ भी मालूम नहीं था, खबर आने पर अस्पताल पहुँचे,
इसकी हालात देखकर बहुत दुख हुआ। वह तो समय पर अस्पताल
पहुँच गया तो बच गया, नहीं तो पता नहीं क्या होता ? कहते कहते
मनीषा की ऑखें भर आई - भगवान का लाख लाख शुक्रिया...
कुमुद बोली - बहन मैं तुझे बहुत पहले से समझाती आ रहीं हूँ
कि किशोर को समझा कर रखा कर- वह उग्र स्वभाव का है -
स्कूल में जब पढ़ता था गुरूजी कुछ कहते थे या पढ़ाई के लिये
डॉटते थे तो उल्टा किशोर गुरूजी से बहस करता और गुरु जी को थप्पड़ भी मार
देता था, तब भी तुम लोग किशोर को प्रोत्साहित करते रहे। धीरे
धीरे उसकी गलत आदतें पक्की होती गई, तुमने किशोर को कभी
डॉटा ही नहीं। माँ की जिम्मेदारी है कि वह अपने बच्चे को अच्छी
बातें ,ऊँच-नीच सिखाये, ताकि बच्चे का भविष्य सुखी हो। तुमने बेटे
का कुछ भी नहीं सिखाया। उसकी हॉ में हाँ मिलाती रही उसी का
परिणाम हैं।
मनीषा बोली - नहीं दीदी, आपको ऐसा लगता है, मै अकेले में
उसको बहुत डॉटती हूँ - उसको कई बार कह चुकी हूँ, अपनी आदतें
सुधार ले, परन्तु वह अपनी आदतों से मजबूर है दीदी।
कुमुद बोली - यदि तुम उसको शुरू ही समझाती तो यह
इतना नहीं बिगडता बात बात में गुस्सा करता है - सबसे लड़ता
है - आज किशोर के दोनों पैर कट गए ,हमें और तुम्हें कितना दुख
हो रहा है, सोचों जब इसने एक बच्चे की माँ नलिनी को जान से मारा
होगा तो उसके परिवार वालों व उसकी छोटी सी बच्ची पर क्या बीती
होगी ?
मनीषा बोली - तो दीदी आप ही सोचो , कुँवारा लड़का एक बच्चे
की मॉँ से कैसे शादी कर लेता ? वो शादी के लिये इसके पीछे पड़ी
थी।
कुमुद बोली - तो इसको भी एक बच्चे की मॉ से प्यार मौहब्बत
क्यों करना था? शादी ना करने के लिये किसी को जान से मार देना
ठीक है क्या ? मैं तुम्हें व किशोर को कई बार समझा चुकी हूँ, कोई
भी काम करने से पहले थोड़ा सोचो, आत्म चिंतन कर हर पहलू पर
सोचकर काम करो परन्तु ना तुम और ना किशोर कुछ सोचते, वह
उत्तेजना गलत काम करता है और तुम उसका समर्थन करती हो,
माना बेटा बहुत प्यारा होता है परन्तु अपना और दूसरों के भविष्य का
भी सोचना पड़ता है।
आप तो ब्रहमाकुमारी हो गई हो तो तुम्हें अच्छी अच्छी बातें
करनी आती हैं, हम सब परिवार के बीच दस झंझटों में फसे रहते हैं ।
तो जिन्दगी में क्या क्या झेलना पड़ता है, हम जानते हैं -मनीषा बोली ।
कुमुद बोली उस एक हत्या के कारण किशोर ने क्या क्या
झेला, तुम भी सब जानती हो। वर्षों सूरत, पूना और चैन्नई में छिपता
रहा, इस शहर से उस शहर घूमता रहा। एक अपराध को छुपाने के
लिये। ठीक है कोर्ट से बच गया परन्तु क्या भगवान के दरबार से बच
पाया ? अब दोनों टॉगें कट गई, जीवन भर के लिये चलने को असमर्थ
हो गया। इन्हीं पैरों के दम पर वह शहरों शहरों घूमता व छिपता
रहा परन्तु अब पैरों के बिना कैसे चलेगा ?
मनीषा बोली - दीदी आप भी पुरानी बातें लेकर बैठे हो। बचपन
में बच्चों से गलतियाँ हो जाती हैं, अब उन बातों को बार बार मत
कहो। अब तो पहले से बहुत सुधर गया है।
कुमूद बोली - अभी भी अपराध करके भी वह कहता है -
*पुलिस क्या कर लेगी सब बिके हुये है। * मैं तो कहती हूँ, सबको
जीवन भर सच के मार्ग पर चलना चाहिये, तो ऐसी समस्यायें आये
ही ना। माँ की जिम्मेदारी है, बच्चों को बचपन से ही सही रास्ता
बतायें, एक के साथ पूरा परिवार परेशान होता है। क्या तब और क्या
अब तुम दुखी नहीं हो ? मैं तुमसे पूछती हूँ ? मैं भी किशोर के हित
की बात कर रही हूँ।
मनीषा बोली,- सब दुखी है? तुम्हारी बात सही है। कह कर
मनीषा चुप हो गई ।
ऐसे वातावरण में कुमुद असहज महसूस कर रही थी इसलिये
किशोर को समझाकर, उसके लिये दुआयें करती करती वापस सेंटर
आ गई । रास्ते भर सोचती रही --- इन दोनों को बहुत समझाती हूँ, परन्तु
समझते ही नहीं, पता नहीं कब सुधरेंगें ? सबकी अपनी अपनी राहें
है, सोच कर अपने मन को सान्त्वना देती रही।
छत्तीसगढ़ रत्न डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा
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