जंगल - 43 Neeraj Sharma द्वारा कुछ भी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

जंगल - 43

                उलझने (43) 

ज़िन्दगी मतलब की कुंजी है, लोगो का यही मानना होता है मतलब निकले हम कही तुम कही। जलधर के साथ एक गांव मे उतरा आधी अब पंजाबी और हिंदी बोल देता था... गांव की वही सडके यहां धीरे धीरे चल था। जो वहा भगति का रस था शंकर के जैकारे थे वो अब भी जैसे कानो मे गुजन करते थे। कितना मनमोहक समय था। जो गुज़र रहा था... धीरे धीरे। गांव मे अनजाना सा लगता था नया कोई जैसे आया हो चार साल बाद... सड़क भी सुनसान सी थी.. हाँ कोई राहगीर आ रहे थे, जिसमे तीन पुरष दो महला थी। उन्हों ने आते एक ने पहचान कर कहा " मास्टर जी आप... इस चदन तिलक से लगता है लम्बी यात्रा कर आये हो, तभी कहु मास्टर जी का कोई कुड़ता बनने नहीं आया। " ---- दियाल जी ठहरे ----" ओह कृष्ण लाल जी " दोनों जैसे विषड़े बहुत सालो बाद मिले। " "काले पुत्र  मास्टर जी का ट्रंक उठा लो।"  और ऐसा ही उसने किया। "---मंदिर कैसा है काम चल रहा है या बंद हो गया। " पीपली की छाया के नीचे दयाल जी का छोटा सा घरोदा था। ताला लगा हुआ था। " मास्टर जी आप कौन सी यात्रा कर आये हो " कृष्ण लाल ने थोड़ा रुक कर कहा। बड़ी मुश्किल से ताला खोल ते हुए मास्टर जी ने अंदर देयोडी मे समान टिका लिया... और कृष्ण को अंदर आने को कहा... कमरा खोला... सैलाब से कोई अजीब बू आ रही थी। कृष्ण लाल ने कहा ---" मास्टर जी अमरीका मे आपका पुत्र सेटल तो हो ही गया होगा। " दियाल ने हसते हुए कहा " हो ना हो कृष्ण लाल जी, एक संतान वो भी सात समुद्र पार.... कभी कभी फोन कर के बस यही कहता है, काम नहीं है, काम नहीं है..... " मैंने एक दिन कह दिया -----" मेरे पास आ जा.... मेरे पास इतने तो है कि तुझे और तेरी पत्नी को खिला सकू... बेवकूफ का बेवकूफ ही रहेगा। " कृष्णा थोड़ा चुप हो कर बोला " यात्रा मे भी दियाल जी ख्याल तो उसका ही होगा.... " आँखे भर आयी ---" जिम्मेदारी से हम भाग नहीं सकते " ठरमा देकर कृष्ण लाल चला गया। दियाल ने मन मे कहा " कमबख्त ने सब ललजत खराब कर दी... कितना मे डूबा हुआ था शंकर भोले के नाम मे.... " 👎 सूरज ऊग रहा था... उसकी पहली किरणे गांव के मंदिर के गुब्द पे पड़ती थी। कृष्ण लाल कि दुकान दर्जी की... कपड़े सिले जा रहे थे चौक था कच्चा गांव का यहां सब बच्चे बूढ़े इकठे होते और बच्चों को कहानियाँ सुनाते थे। दियाल दुपहर को निकला था.... मास्टर था रिटायर इसी स्कूल से हुआ, गांव वाले इज़त करते थे। मास्टर साहब की। रोटी सब्जी पारो कभी दे जाती कभी रामू कुए वाला जटो के पास काम करता था। सारे गांव मे प्रसाद मंदिरो का गांव मे नैन के हाथ से वटवा दिया था। सब मास्टर को नसीबवाला कहते थे। अक्सर कहते " मास्टर जी की थापी पीठ पे जिसे मिल जाये, वो लक्की बंदा होता है। ये अफवाह कब सच बन गया ये तो परमात्मा ही जाने।

उलझने जिदे जी कहा खत्म होती है... जिमेवारिया बढ़ती है कम नहीं होती। 👎

नीरज शर्मा 

144702 -----🌹👎