---------------उलझन 42-----------
अखाडो के उच्च अधिकारी जो अखाडो को चलाते थे आज वो महान संत मुनि श्रेष्ठ के पास बैठे थे। " बात वही पोलिस की चल रही थी। " उन मे किर्पा जी भी थे... उनके चार शिशे थे। ऐसे ही पंद्रहा अखड़ाओ को चलाने वाले उच्च कोटि के पोलिस की गुहार लगाने आये थे। संत मुनि श्रेष्ठ कुछ बोले " धर्म नहीं रोकता कानून को, ऐडन्टी होना एक सफल प्रयास है।" सिवल ड्रेस मे चार उच्च कोटि के पोलिस की क्राइम ब्राँच के आदमी बैठे थे। उनमे बहुतो ने कहा " योगी या साधु की अड़ेंटी तो जरुरी है, कया पता कोई गलत कर्म करके ही जहाँ आया हो। " कुछ को इस बात का इतराज था। ---- सरताज हसते हुए बोला " इतराज उसको होगा जिसने कोई गलत कर्म किया हो " ये क्राइम ब्राँच का उच्च अधिकारी था। तभी संत मुनि श्रेष्ठ ने कहा " मै सब को जो बनारस के घाट पे है, वो सब आपनी इडनटी देंगे। " कल से पका हो गया, कहा पुलिस स्टेशन नजदीक के।
12:30 रात का समय... बनारस घाट मे शिव शिव की मीठी धुन चल रही थी। सब आपने अखाड़ों मे आ गए थे। किर्पा भी आ गया था... साथ उनके कर्म करने वाले भी। एक महीने के अंदर 15 व्यक्ति ऐसे थे जो भाग चुके थे। क्योंकि उनका पोलिस चिठा बहुत ही घटिया था। कोई तो मर चूका था.... जैसे किर्पा और कालू मर चुके थे। इन्होने आपनी पत्नियां भी ऐसे ही काट दी, जैसे ये एक छोटे से प्रान्त मे काम करते थे। बकरो और जीवो का मास... कमबख्त ऐसे कि इन्होने आपनी पत्नियों का ही मास वेच दिया। शातर दिमाग़, एक नंबर के बोझिल इंसान, परमात्मा ऐसे मिल जाता है.... किर्पा ने और कालू ने तो पता नहीं कितने मार मुकाये होंगे.. किस लिए विद्रोह, पैसा। पोलिस को उनकी बहुत जयादा भाल थी... वो फिर जहाँ से निकल गए थे। दियाल पोलिस हिरासत मे था। वो उसकी गवाही दे बैठा था... " साबह चिंता न करे, आप का मिशन सक्सेस फूल होगा। "
टूट गया था मन ही मन.... दियाल... उसको छोड़ कर कहा था," ---इस नंबर पे फोन जरूर करना। कोई भी भिंक लगे। "
टूट सा गया ---- दियाल ---- वही बैठ गया ---- एक पथर पे। सोचने लगा। किर्पा कया था... कौन था... कया किया था उसने, सोच कर ही सब तबाह सा हो गया जैसे दियाल के खाब... पता कयो वो ये सोचने पे मजबूर हो गया, "कि पूछो मत, कितना भरा हुआ था, किस पर यकीन करे, कोई करने योगे है, बिलकुल नहीं, जैसे आत्मा टूट गयी, मन रूठ गया, आँख भर आयी... कयो दियाल जज्बाती था... "भगवे वस्त्र डाल के कोई साधु या योगी नहीं हो जाता, जितनी देर मुकदर की नियति मे न लिखा हो " दियाल ने बैग मे समान डाला... और वो सुबह की इंतज़ार किये बिना ही निकल पड़ा, रात के एक वजे का समय होगा... एक खौफ था रात को... रेलवे स्टेशन पहुंचने मै दियाल को दो घंटे तो लग ही गए थे, मुश्किल थका हुआ वो पंहुचा होगा... हालत गंभीर होंगी... विचारे की। वो वेटिंग रूम मे जा चूका था, टिकट लेनी थी , आपने ही शहर की... बस और कया करता, यही सोच थी उसकी, और कया करता भी कया.... गाड़ी साढ़े गयारा वजे दुपहर को आनी थी.. तब तक वो टिकट लेकर सिमट के बैच पर लेट चूका था। पड़ते सार ही नीद आ गयी... बैग को तकिया बना लिया था.... और करता भी कया। 👎।
(नीरज शर्मा, "1447702" )