Featured Books
  • Muhabbat Ek Sabaq - 16

    "अम्मी आप फ्री हैं" ?? आज रूटीन के मुताबिक़ शहरयार वॉक करने...

  • Raaz - Part 9

    सुबह के पाँच बजे थे।चंदनगढ़ की सुबह बाकी जगहों जैसी नहीं थी।...

  • आख़िरी चिट्ठी का रहस्य

    आख़िरी चिट्ठी का रहस्यबारिश की हल्की बूंदें गाँव की कच्ची गल...

  • क्या दीक्षा आवश्यक है ?

    जयगुरु क्या दीक्षा आवश्यक है? — शास्त्र, संत और मानवता की दृ...

  • मंदिर में तुम - 9

    ठंडी हवा चल रही थी…कोरिया की सड़कों पर हल्की रोशनी थी…और सुन...

श्रेणी
शेयर करे

खण्ड - 02 महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भाग 9

महाराणा राज सिंह : श्रीनाथ जी का मेवाड पधारना, औरंगजेब की पराजय
(1652-1680 ईसवी)

महाराणा राज सिंह के साथ मेवाड़ के महाराणाओं की उस वीरगाथा का अंत होता है, जिन्होंने इस्लामी आक्रांताओं का एक सहस्र वर्षों तक निरंतर, वीरतापूर्वक विरोध किया और भारतवर्ष में इस्लामी आक्रांताओं के निर्मम अत्याचारों का सतत प्रत्युत्तर दिया।

समकालीन हिंदू समाज की वैचारिक रिक्तता व मतांध हत्यारों के सम्मुख समर्पण को देखें तो महाराणा राज सिंह की यह कथा और इसके पात्र अवास्तविक से लगते हैं।

कविवर श्यामलदास और कर्नल जेम्स टॉड व राजेंद्र शंकर भट्ट द्वारा मेवाड़ के इतिवृत्त तथा गाथाओं के ध्यानपूर्वक, संरक्षित संकलन के अध्ययन से ही हम उन वीरों की अमर कथाओं को जान और समझ पाए हैं। इन महामनाओं के प्रयासों के बिना मेवाड़ का इतिहास या तो धूमिल हो जाता या केवल दंतकथाएँ बनकर रह जाता।

आठवीं शताब्दी में बाप्पा रावल से लेकर 17वीं शताब्दी में राज सिंह तक, मेवाड़ के इस अद्वितीय वंश ने ऐसे योद्धा और नायक उत्पन्न किए, जिन्होंने हिंदू धर्म पर अपनी निष्ठा रखते हुए जो महान कृत्य किए, वे मानव मन की कल्पनाओं से भी परे हैं।

मेवाड़ ने हिंदू धर्म के रक्षार्थ अपने स्वधर्मी राजाओं और सरदारों के साथ मित्रता करके धर्मयुद्ध किए। कभी-कभी, सब मेवाड से अलग हो जाते और मेवाड़ को अपने इस धर्मयुद्ध में, मध्य-पूर्व से आने वाले इन बर्बर आक्रांताओं का अकेले ही सामना करना पड़ा था।

मेवाड़ का केंद्र चित्तौड़गढ़, हजार वर्षों के इस संघर्ष में कई बार महाराणाओं के हाथ से निकला और पुनः जीत लिया गया। चित्तौड़ की एक-एक ईंट और दीवार, इन महान योद्धाओं के साहस की मूकदर्शक रही है, जिन्होंने धर्मध्वज तथा स्वातंत्र्य की पताका को सदैव ऊँचा रखा। इन महापुरुषों ने दोनों को ही अपने रक्त-अस्थि-मेद-मज्जा में समाहित कर, अपने सत्य-प्रण को प्राणांत होने तक धारण किए रखा।

कदाचित् हजार वर्षों की वीरगाथा के अंतिम भाग को लिखने के योग्य राज सिंह के अतिरिक्त कोई और राजा हो भी नहीं सकता था।

22 अक्तूबर, 1652 ईसवी में राज सिंह को जगत् सिंह द्वारा उत्तराधिकार के रूप में मेवाड़ का राज्य काफी सुदृढ़ और संपन्न अवस्था में प्राप्त हुआ। 28 वर्ष पश्चात्, अपनी मृत्यु तक राज सिंह ने उपमहाद्वीप के इतिहास को बदलकर रख दिया, इसीलिए उनका जीवनवृत्त न केवल राजस्थान, वरन् भारतवर्ष की लोकगाथाओं में सदा के लिए समाहित हो गया। राज सिंह के जीवनवृत्त को हम तीन मुख्य भागों में देख सकते हैं–

1. मेवाड़ में अकाल और राजसमंद झील का उत्खनन एवं निर्माण,

2. मेवाड़ का विस्तार और औरंगजेब से युद्ध,

3. भारतवर्ष के हिंदू राजाओं का एकीकृत होना।

1. मेवाड़ में अकाल
राज सिंह के राज्यारोहण को केवल सात वर्ष ही हुए थे कि मेवाड़ में निरंतर तीन वर्षों तक वर्षा न होने के कारण भीषण अकाल पड़ा।

राणा ने अपनी प्रजा के दुःख निवारण हेतु विभिन्न देवस्थानों, जैसे चारभुजा नाथ मंदिर और जगदीश मंदिर इत्यादि में वर्षा हेतु प्रार्थनाएँ कीं, किंतु आकाश द्रवित न हुआ। एक कवि ने अपनी कृति 'राज विलास' में इस परिस्थिति का अत्यंत दारुण विवरण लिखा है, जिसे कर्नल जेम्स टॉड ने अनुवादित कर लिखा है। यह मेवाड़ के इस अकाल और दुःख के समय का करुणाजनक चित्रण है। टॉड लिखते हैं–

“जब जगत् में जल की कमी के कारण आँखें द्रवित हो गईं और लोग भूख से व्याकुल हो उन्मादी हो गए।
तब लोग खाद्य-अखाद्य में भेद न करके सब कुछ खाने को विवश हो गए थे।
पति अपनी पत्नी को त्याग रहे थे और पत्नी पति को,
अभिभावकों ने अपने बच्चों तक को बेचना शुरू कर दिया था,
पल-पल बीतते समय में मनुष्य राक्षस होता जा रहा था,
अकाल का घेरा बढ़ता जा रहा था,
कीट-पतंग और कृमि तक का नाश होने लगा था, 
क्योंकि उनके पास भी खाने को कुछ नहीं था।
पश्चिम से बहता पवन भी घातक और असहज ऊष्मा से भरा था, 
रात्रि-आकाश में तारामंडल बहुत स्पष्ट दिखते थे, 
दिन में भी आकाश में मेघों का कोई अवशेष नहीं था, आँधी-तूफान तथा वज्रपात को लोग भूल ही चुके थे, 
इन परिस्थितियों में मानव-मन विचलित हो चला था, नदियाँ-झीलें और फव्वारे सभी सूख चुके थे, 
धनी लोगों ने अपने लिए भोजन संग्रह कर लिया था, 
कर्मकांडी और पुजारी वर्ग अपने दायित्व भूल चुके थे, 
कहीं कोई जातिभेद नहीं रह गया था, 
शक्ति, बुद्धि, जाति तथा जनजाति सभी गौण हो चले थे, 
अब केवल भोजन ही सर्वाधिक मूल्यवान् हो चला था, 
वर्ण-व्यवस्था के भेद के सभी चिह्नों को त्याग दिया गया था, 
सभी को क्षुधा अपनी छाया में लील चुकी थी,
फल-फूल, समस्त शाख-पत्रादि,
यहाँ तक कि वृक्षों की छाल भी लोगों के लिए खाद्य हो गई थी,
अन्यथा मनुष्य मनुष्य का भक्षण भी कर ही लेता,
जनसंख्या कम होने लगी थी,
परिवार के बीज का भी उच्चाटन और नाश होने लगा था, 
मत्स्यादि जल के जीव भी समाप्त होने लगे थे,
और इन सबके साथ आशा का सरोवर भी सूखने लगा था।

अकाल के उस विपरीत समय का यह भयावह किंतु सहज वर्णन है। ऐसे विकट समय में उदयपुर से पचास किलोमीटर की दूरी पर महाराणा राज सिंह ने अपनी दूरदर्शिता से एक कृत्रिम झील का निर्माण करवाया।

1661 ईसवी में महाराणा राज सिंह जब रूपनारायण मंदिर जा रहे थे तो भाव-विवश वे सूखी हुई गोमती नदी के किनारे रुके। उन्हें जिज्ञासा हुई कि क्या इस नदी के पानी को एकत्र करने के लिए किसी झील अथवा सरोवर का निर्माण करवाया जा सकता है?

इस पर सामंतों और परोहितों ने उन्हें बताया कि उनके परदादा अमर सिंह ने एक बार इस विषय में कार्य करने का प्रयास किया था, किंतु गोमती नदी के शक्तिशाली वेग के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया था। यदि यहाँ एक झील का निर्माण हो पाए तो यह एक महती कार्य होगा। राज सिंह अपनी प्रजा की दयनीय परिस्थिति पर मनन करने लगे।

उन्होंने एक ऐसा विशाल निर्माण करने के विषय में सोचा, जिससे प्रजा के दुःख दूर हो सकें, वर्षाजल का संग्रहण हो सके और उनके अपने वंश के नाम का गुणगान भी हो। इस झील का नाम 'राजसमुद्र' रखा गया। 'राजसमुद्र' के उत्खनन का कार्य 12 जनवरी, 1662 ईसवी को आरंभ हुआ। इसकी पाल अथवा बाँध की नींव 8 मई, 1665 ईसवी को रखी गई। 'राजसमुद्र' नाम की इस विस्तृत झील के निर्माण में कुल 16 वर्ष लगे और आज इसे 'राजसमंद' के नाम से जाना जाता है। इस झील के निर्माण से मेवाड़ के सहस्रों लोगों को जीवनयापन के अवसर मिले तथा राज सिंह ने इस निर्माण के निमित्त अपने राजकोष के द्वार खोल दिए। 'राजसमंद' को भरनेवाली मुख्यतः तीन नदियाँ हैं, जिनके नाम हैं– गोमती, ताली और केलवा। उत्तर-पश्चिम तथा उत्तर-पूर्वी छोर को छोड़कर झील का काफी हिस्सा इसकी पाल से घिरा हुआ है, जो कि कुल तीन किमी. की है। इस बाँध के माध्यम से 12 मील लंबी-चौड़ी झील की परिधि बाँधी गई थी। बाँध का निर्माण मुख्यतः सफेद मार्बल से हुआ है तथा इसकी पंक्तियाँ भी इसी पत्थर से निर्मित हैं। झील के भीतरी तल से लेकर ऊपरी सतह तक जानेवाले इस बाँध में केवल सफेद मार्बल, अर्थात् संगमरमर का ही प्रयोग हुआ है। राजसमंद, स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसके पास ही दक्षिण में एक नगर और दुर्ग का निर्माण हुआ था तथा बाँध के किनारे काँकरोली का भगवान् कृष्ण मंदिर भी है।

टॉड के अनुसार, राणा ने स्वयं इसके लिए दस लाख तथा उनके सरदारों व अन्य लोगों ने कुल डेढ़ लाख यूरोपियन शिलिंग्स दानार्थ प्रदान किए। श्यामलदास के अनुसार, इस निर्माण पर कुल एक करोड़ पाँच लाख सैंतालीस हजार पाँच सौ चौरासी रुपए का व्यय हुआ। यह इस अकाल में परमार्थ हेतु किए गए इस कार्य का सहज किंतु विस्तृत लेखा-जोखा है। इस दुर्भिक्ष से मेवाड़ अभी पूरी तरह से उबर भी नहीं पाया था कि क्रूर औरंगजेब ने अपना जेहाद छेड़ दिया और इस न्यायप्रिय तथा सर्वोदयी क्षेत्र पर अपनी दमनकारी नीतियों का भार डाल दिया।

मेवाड़ के महान राजपूतों व हिंदुओं को हानि पहुँचाने की दृष्टि से चलाए गए इस दमनचक्र के परिणामस्वरूप न केवल औरंगजेब, वरन् उसके पूरे वंश की छवि बुरी तरह धूमिल हुई। औरंगजेब के अपने पाप कर्मों के चलते, उसके मरते ही उसके परिवार के हाथ से सत्ता जाती रही और उसका वंश तक नष्ट हो गया।

महाराणा राज सिंह ने अपनी प्रजा तथा राज्य को अकाल से राहत देकर औरंगजेब के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया, जिसके पश्चात् भारतवर्ष से मुस्लिम साम्राज्यवाद का समूल नाश तथा उच्चाटन होना निश्चित हो गया था।

2. मेवाड़ का विस्तार और औरंगजेब के साथ युद्ध
जैसा कि हमने अमर सिंह, करण सिंह और जगत सिंह के अध्याय में देखा, 1615 ईसवी में मेवाड़-मुगल संधि के पश्चात् मेवाड़ ने आधी शताब्दी तक शांति और संपन्नता का एक संक्षिप्त समय देखा। इसी के कारण मेवाड़ को मुगलों के साथ वह अंतिम संघर्ष करने हेतु संसाधन, सहयोग एवं सेना एकत्र करने का समय मिल पाया। राज सिंह के राज्यारोहण के समय तक शाहजहाँ वृद्ध हो चला था और उसके चार पुत्रों शुजा, दारा शिकोह, मुराद तथा औरंगजेब के बीच सत्ता और उत्तराधिकार को लेकर खूनी संघर्ष प्रारंभ हो चुका था।

मुगलों में ज्येष्ठता के आधार पर उत्तराधिकारी के चुनाव की कोई परंपरा नहीं थी, जिससे बादशाह की मृत्यु होने पर सुगमता से शासनाधिकार ज्येष्ठ उत्तराधिकारी को प्राप्त हो। इसके विपरीत, उनमें अपने ही पिता को अपदस्थ करके सत्ता के लिए आपस में रक्त रंजित संघर्ष की परंपरा अवश्य थी। उत्तराधिकार के इस संघर्ष का प्रतिफल इस पर निर्भर करता था कि मेवाड़ किस पक्ष में खड़ा होगा ? अतः शाहजहाँ के चारों पुत्रों ने राज सिंह को इस संघर्ष में साथ देने के लिए पत्र लिखे।

इन सभी में से राज सिंह का झुकाव दारा शिकोह की ओर था, जो एक सहिष्णु शहजादा था। दारा शिक्षित व प्रबुद्ध व्यक्ति था और अच्छा लेखक भी। उसने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद भी किया था। किंतु अंततः औरंगजेब ने उस प्रत्येक व्यक्ति को अपनी महत्त्वाकांक्षा की बलि चढ़ा दिया, जो उसका विरोध कर रहा था। अपने पिता, अपने भाई और उसके अपने पुत्र, जो भी उसके विरोध में सामने आया, वह मार डाला गया। औरंगजेब की यह सत्तालोलुपता और उन्माद न केवल उसके अपने लिए, वरन् पूरे मुगल साम्राज्य के लिए पतन का कारण बने।

दारा शिकोह, औरंगजेब द्वारा फतेहाबाद के युद्ध में पराजित हुआ और 1659 ईसवी में मारा गया। मुराद को ग्वालियर में बंदी बना लिया गया था तथा औरंगजेब के कहने पर गुजरात में 1661 ईसवी में उसे मृत्युदंड दे दिया गया। शुजा को बंगाल का गवर्नर बना दिया गया था, किंतु जब उसकी महत्त्वाकांक्षाओं ने सिर उठाया तो औरंगजेब की सेना ने उसकी सेना को पराजित कर दिया। शुजा अपनी जान बचाकर बर्मा भाग गया, जहाँ स्थानीय लोगों ने उसे मार डाला।

जहाँगीर और शाहजहाँ द्वारा शक्तिशाली हिंदू राज्य मेवाड़ से मैत्री की संधि और सहयोग की राजनीति को औरंगजेब ने तिलांजलि दे दी। यही बात उसकी अपमानजनक पराजय व उसकी मृत्यु के बाद मुगल आतंक के पतन का कारण बनी। ध्यान देने योग्य बात यह है कि शाहजहाँ और जहाँगीर दोनों ही राजपूत माताओं के पुत्र थे, अतः दोनों ही किसी सीमा तक सहिष्णु भी थे। भारत जैसे देश पर राज करने के लिए यह सहिष्णुता अनिवार्य थी, क्योंकि भारत की 95 प्रतिशत जनसंख्या हिंदू थी।

औरंगजेब विशुद्ध तातार रक्त था और हिंदुओं से घृणा करता था। अतः राजपूतों के साथ उसकी मेल-मैत्री असंभव ही थी। उसकी अपेक्षा के प्रतिकूल, राजस्थान के समस्त राजा-रजवाड़ों, विशेषकर मेवाड़ व मारवाड़ ने उत्तराधिकार के संघर्ष में शाहजहाँ और दारा शिकोह का साथ दिया था। यह बात भी औरंगजेब के हृदय का काँटा बनी थी। औरंगजेब ने अपनी धर्मांधता के चलते हिंदुओं, विशेषतः राजपूतों का निर्ममता से संहार करना आरंभ कर दिया।

इधर मेवाड़ और मुगलों की 1615 ईसवी में हुई संधि की उपेक्षा करते हुए राज सिंह ने मुगलों का विरोध जारी रखा। राज सिंह अत्यंत धार्मिक थे और ऐसे आक्रामक हिंदू राजा थे, जो न केवल मेवाड़ की इंच-इंच भूमि मुगलों से वापस लेना चाहते थे, वरन् उत्तर एवं पश्चिम भारत में भी मेवाड़ का विस्तार कर, अंततः मुगलों को दिल्ली में पराजित करना चाहते थे। राज सिंह ने अपना कार्य, औरंगजेब के दिल्ली पर अधिकार करने से काफी पहले ही शुरू कर दिया था।

राज सिंह ने 'टीका दौड़' की नीति अपनाई, जिसमें मेवाड़ के राजा छोटी सी सेना लेकर शिकार अभियान की आड़ में आसपास के क्षेत्र पर शनैः शनैः अधिग्रहण कर लेते थे। राज सिंह ने इसी प्रकार से जयपुर के मालपुरा पर अधिकार कर लिया और अजमेर तक अपना राज्यविस्तार करके मुगलों को सीधी चुनौती दे दी। तब शाहजहाँ मुगल बादशाह था और उसने राज सिंह द्वारा किए गए इन अभियानों को नजरअंदाज कर दिया और इसे 'अपने भतीजे की कारस्तानी' कहकर मुँह फेर लिया।

शाहजहाँ, महाराणा करण सिंह को अपना मुँहबोला भाई मानता था। करण सिंह, राज सिंह के पितामह थे।

राज सिंह ने चित्तौड़ दुर्ग की मरम्मत करवाकर मेवाड़ तथा आसपास के क्षेत्र में मस्जिदों को तोड़कर, गौहत्या करने वाले मुसलमानों के सार्वजनिक रूप से सिर काटकर शाहजहाँ को कुपित करने का अपना उद्योग जारी रखा। 1654 ईसवी में शाहजहाँ 30,000 घुड़सवारों को लेकर राज सिंह से युद्ध करने हेतु अजमेर आया। शाहजहाँ ने एक ब्राह्मण चंद्रभान को राज सिंह को समझाने हेतु भेजा कि उन्हें अपनी महत्त्वाकांक्षा को नियंत्रित करना होगा। चंद्रभान मेवाड़ पहुँचता, उससे पहले ही राज सिंह ने स्वयं ही मधुसूदन भट्ट तथा राज सिंह झाला नाम के दो दूतों को मुगल सेनापति सदुल्ला खाँ के पास भेजा। सदुल्ला उस समय चितौड़ को अपने अधिकार में कर चुका था तथा निर्दयतापूर्वक तोड़-फोड़ कर रहा था। सदुल्ला खाँ और राज सिंह के दूतों के मध्य हुआ वार्तालाप कुछ इस प्रकार है–

सदुल्ला–उदयपुर के राजपूत कब से खुदमुख्तार हो गए? क्या तुम भूल गए हो कि शाहजहाँ हमारे बादशाह हैं?

दूत–उदयपुर के राजपूतों ने दिल्ली और मेवाड़ दोनों ही जगह एक साथ होने का अधिकार अपनी वीरता के बल पर प्राप्त किया है और यह परंपरा तब से चली आ रही है, जब से रावत मेघ सिंह और शक्ति सिंह, जहाँगीर और अकबर के साथ खड़े थे।

सदुल्ला–तो इसका मतलब यह कि तुम राजपूत दिल्ली को दोयम दर्जे की ताकत समझते हो ?

दूत–नहीं, किंतु मेवाड़ भी कम शक्तिशाली नहीं है। मेवाड़ के राजपूत दिल्ली में रहें या उदयपुर में, यह उनके मन पर निर्भर करता है।

सदुल्ला–अच्छा ? अगर उदयपुर को दिल्ली से जंग करनी है तो ठीक है, हम इस्तकबाल करेंगे तुम्हारा, वैसे राज सिंह के पास घोड़े कितने हैं?

दूत–छब्बीस हजार !

सदुल्ला–शाहजहाँ के पास एक लाख हैं, तुम हमसे लड़ोगे कैसे ?

दूत–तुम्हें पराजित करने के लिए 26,000 पर्याप्त हैं। 

इस प्रयास के विफल होने के पश्चात् राज सिंह ने दारा शिकोह से संपर्क किया और अपने पुत्र सुल्तान सिंह को अपने कुछ विश्वस्त सेवकों के साथ शाहजहाँ के दरबार में भेजा। शाहजहाँ ने कुँवर सुल्तान सिंह को मेवाड़ और मुगलों के झगड़े के उपरांत भी उचित आतिथ्य व सम्मान दिया।

राज सिंह समझ चुके थे कि उनके मस्तिष्क में जो योजना चल रही थी, वह संगठित हिंदू नेतृत्व तथा एक नियोजित योजना के बिना सिद्ध नहीं हो सकती थी। अतः उन्होंने राजस्थान के अन्य राजघरानों से संपर्क साधा। जोधपुर, बीकानेर और जयपुर, मुख्य राजपूत हिंदू राजघराने थे, जिनका सहयोग लिया जा सकता था। राज सिंह ने उभरते मराठा नायकों से मिलने हेतु दूत भी भेजे।

1661 ईसवी तक औरंगजेब अपने तीनों भाइयों को अपने मार्ग से हटा चुका था।

उदार चरित दारा, प्रबल साहसी मुराद और अतिसक्रिय शुजा, सभी का एक जैसा ही दुःखद अंत हुआ। औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहाँ को बंदी बना लिया और फिर आरंभ हुआ मेवाड़ की हिंदू आस्था तथा औरंगजेब की इस्लामी दरिंदगी के बीच का अंतिम व निर्णायक संघर्ष। इस संघर्ष में दोनों ही ओर से सैन्य रूप से सर्वोत्कृष्ट तथा अपने-अपने धर्म के प्रति प्रतिबद्ध नायक थे। भेद था तो केवल छल-कपट करने की क्षमता में।

राज सिंह अदम्य साहसी, किंतु राजपूत सुलभ, सरलता वाले नायक थे। उधर औरंगजेब भी महत्त्वाकांक्षी, किंतु कपटी व मिथ्याचारी राजा था।

भारतीय उपमहाद्वीप के हिंदुओं के लिए यह लज्जा का विषय है कि मुगलों पर हिंदुओं की इस महान विजय का अध्याय ही भारतीय इतिहास से पूर्णतया मिटा दिया गया है। औरंगजेब के हिंदूद्रोही शासनकाल के प्रथम बीस वर्षों में ही औरंगजेब को राज सिंह ने चुनौती दी और पराजित भी किया। यह एक बड़ी महत्त्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि इसने औरंगजेब की राजस्थान पर विजय प्राप्त करने की उसकी आकांक्षाओं पर पानी फेर दिया था।

राजस्थान से निष्कासित होने पर औरंगजेब ने अपना ध्यान पूर्णतया दक्षिण तथा सुदूर पूर्व की ओर कर लिया। यह एक ऐसी मूल्यवान घटना थी, जिसमें राजपूत राजघरानों ने आपस के भेद मिटाकर एक ऐसे शत्रु के विरुद्ध संगठन खड़ा किया, जो हर प्रकार से हिंदू धर्म की हानि करने को कटिबद्ध था। एक ऐसी गाथा, जिसके पश्चात् मेवाड़ तथा इस्लामी साम्राज्यवाद के मध्य संघर्ष की पूर्णतया इतिश्री हो गई। औरंगजेब के पश्चात् मुगल राज्य का पतन इसीलिए हो पाया कि राज सिंह के नेतृत्व में राजपूत मुगल संबंध पूरी तरह नष्ट होकर शत्रुता की ओर जा चुके थे। इस दृष्टि से राज सिंह, राजपूत एकता के लिए, सांगा व प्रताप के बाद, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण धुरी बनकर उभरे। हिंदू धर्म और बर्बर हत्यारे संप्रदाय के मध्य एक सहस्र वर्ष तक चले सभ्यताओं के संघर्ष के पटाक्षेप हेतु राज सिंह से अधिक योग्य नायक और कौन हो सकता था ! राज सिंह के नेतृत्व में मेवाड़-मुगल संघर्ष को समझने हेतु हमें समान रूप से महत्त्वपूर्ण तीन मुख्य घटनाओं को समझना होगा–

चारुमति प्रकरण
राज सिंह के समय किशनगढ़, मेवाड़ के अंतर्गत आनेवाला एक छोटा सा राज्य था, जिसके राजा थे रूप सिंह। इन रूप सिंह की एक अत्यंत सुंदर और सुगढ़ कन्या थी चारुमति। जब चारुमति के सौंदर्य की गाथा औरंगजेब तक पहुँची तो उसने चारुमति के भाई मान सिंह को संदेश भिजवाया कि वह चारुमति से विवाह का इच्छुक है।

किशनगढ़ राज्य के पुरुषों ने युद्ध की आशंका से इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति जता दी। किंतु जब चारुमति को इसका पता चला तो उसने अपने भाई तथा पिता द्वारा लाए गए एक मुसलमान से विवाह के प्रस्ताव पर अपनी असहमति स्पष्ट रूप से बता दी। चारुमति अत्यंत धार्मिक हिंदू कन्या थी और भगवान् श्रीकृष्ण में उसकी असीम आस्था थी।

अतः उसने अपने परिवार को स्पष्ट रूप से बता दिया कि एक म्लेच्छ से विवाह करने की अपेक्षा, वह मृत्यु का वरण करना अधिक गौरवशाली समझती है। अपने परिवार से यथोचित सांत्वना न प्राप्त होने के कारण चारुमति ने मेवाड़ के महाराणा राज सिंह को इस विषय में पत्र अपने एक विश्वासपात्र पुरोहित के माध्यम से भिजवा दिया। यह पत्र आज भी मेवाड़ के आख्यानों में सुरक्षित है।

उन्होंने राज सिंह को न्योता दिया कि वे आकर उससे विवाह कर लें। उस पत्र के एक अंश में यह लिखा है–

“क्या कभी कोई हंसिनी, काग से संबंध बना सकती है; तो एक शुद्धरक्ता राजपूतनी कैसे एक वानरमुखी बर्बर की पत्नी बन सकती है?”

उसने अपने पत्र के अंत में मुगल से विवाह न रुक पाने की स्थिति में आत्मघात तक करने की बात लिख डाली थी।

राज सिंह ने एक राजपूत कन्या के सतीत्व की रक्षा के लिए किशनगढ़ कूच का निश्चय किया। उन्होंने अपने विश्वासपात्र सामंतों की एक सेना तैयार करके मेवाड़ के अंतर्गत आनेवाले सलूंबर ठिकाने के रतन सिंह चूँडावत को एक पत्र लिखा। रतन सिंह अत्यंत साहसी योद्धा थे और उनके पास कुछ हजार सैनिक भी थे।

राज सिंह ने उन्हें तुरंत प्रभाव से अजमेर की ओर कूच करने का आदेश दिया, ताकि वे स्वयं, त्वरित गति से किशनगढ़ पहुँचकर चारुमति का औरंगजेब से बलात् विवाह करवाने के उद्देश्य से पहुँच रही औरंगजेब की सेना को रोक सकें।

औरंगजेब को मेवाड़ के विरुद्ध अभियान में अपने राजपूत सेनापतियों पर विश्वास नहीं था, अतः उसने अपने विश्वासपात्र मुसलमान सेनापति के नेतृत्व में मुगल सेना किशनगढ़ की ओर रवाना की। जब राज सिंह का पत्र रतन सिंह चुंडावत के पास पहुँचा, तब उनके विवाह को अभी कुछ ही दिवस हुए थे, किंतु फिर भी उन्होंने तुरंत ही राणा के इस पत्र में लिखे आदेश को मानते हुए अपने कुछ हजार सैनिकों को लेकर औरंगजेब की सेना को रोकने हेतु किशनगढ़ की ओर कूच कर दिया। किंतु रतन सिंह नवविवाहित अपनी सुंदर रानी के मोहपाश में बंधे थे, जो कि बूंदी के हाड़ा वंश की राजकुमारी थी। ऐसे अवसर पर हाडी रानी ने रतन सिंह की मनःस्थिति भाँपते हुए उन्हें समझाया कि वह सेना की पराजय के पश्चात् उनके पुनः आने की प्रतीक्षा करेगी।

मुगल कथा कुछ इस प्रकार है– रतन सिंह अपनी पत्नी के प्रेमपाश में इतने आबद्ध थे कि किशनगढ़ की ओर जाते हुए भी बीच-बीच में अपने दूत, संदेश लेकर रानी के पास भेजते जाते थे। पहले आए दो दूतों को तो रानी ने अपनी एक अँगूठी तथा एक सुवासित रुमाल अपने पति के लिए स्मृतिचिह्न के रूप में दे दिए। जब तीसरा दूत रानी के पास पहुँचा तो रानी समझ गई कि उनके पति प्रेम में अपने कर्तव्य से विचलित हो रहे हैं और रतन सिंह को मेवाड़ के प्रति उनके दायित्व समझाने हेतु कुछ कठोर करना ही होगा। इस समय पति की अधिक आवश्यकता रणभूमि में थी और इस कठिन समय में रतन सिंह की विजय पर ही राज सिंह का सम्मान टिका था।

इस विचार से प्रेरित हो हाड़ी रानी ने एक अकल्पनीय कृत्य कर डाला। उन्होंने एक पूजन थाल में लाल वस्त्र रखकर दूत को दिया और उसी समय खड्ग से अपना शीश काटकर उस थाल में रख दिया, ताकि उस स्मृतिचिह्न को रतन सिंह तक पहुँचाया जा सके और रतन सिंह निर्द्वंद्व होकर युद्ध कर सकें। इस्लामी आक्रांताओं से संघर्ष के समय में हमारे अद्भुत पूर्वजों ने ऐसे महान बलिदान दिए हैं। हम सोच भी नहीं सकते कि इस कृत्य से मेवाड़ भर में क्या संदेश गया होगा! क्या हम सोच सकते हैं उस दृश्य तथा उसके प्रभाव के विषय में, जब वह दूत हाड़ी रानी के कटे हुए मस्तक को थाल में लिये युद्ध स्थल में रतन सिंह के पास गया होगा! क्या हम रतन सिंह की मनःस्थिति कभी समझ पाएँगे, जब उन्होंने अपनी नवोढ़ा पत्नी का कटा हुआ मस्तक थाली में रखा देखा होगा ? हम तो सतत अपने जीवन को कुछ और वर्ष बढ़ाने की आशा एवं प्रयास में ही मरे जाते हैं। उन महानायक रतन सिंह पर क्या बीती होगी, जब उन्होंने थाल पर से लाल कपड़ा हटाया होगा। उनका विश्व तो एक क्षण में नष्ट हो गया था।

हजारों वर्षों में हमारी वीरांगनाओं द्वारा किए गए बुद्धिमत्ता और बलिदान से परिपूर्ण ऐसे ही अगणित कृत्यों के कारण हम हिंदू, एक ऐसे हत्यारे संप्रदाय पर अंकुश लगाने में सफल हो पाए, जो विश्व भर को अपनी कलुषित विचारधारा के तले कुचलने का प्रण लेकर चले थे।

रतन सिंह सभी प्रकार के सांसारिक मोह से विमुख हो वे पूरे साहस और बल के साथ युद्ध में प्रवृत्त हो गए। उन्होंने अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए चौगुनी बड़ी मुगल सेना को पराजित किया। आमेर के आस-पास कहीं यह युद्ध लड़ा गया। रतन सिंह तथा उनके अधिकांश सेनानी इस युद्ध में बलिदान देकर अमर हो गए, किंतु इस बीच राज सिंह को चारुमति से विवाह कर मेवाड़ वापस लौट जाने का समय मिल गया।

राज सिंह, जो अपने कुछ विश्वस्त सामंतों के साथ किशनगढ़ गए थे, सुरक्षित चारुमति के साथ उदयपुर पहुँच गए। राज सिंह से चारुमती के विवाह के इस विस्मयपूर्ण प्रकरण से राजस्थान के राजपूतों में हर्ष और आत्मविश्वास का ज्वार उठा और नव चेतना का संचार हुआ।

राणा ने निकृष्ट मुगलों को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए इस भावना का लाभ उठाकर राजपूतों की सेना में भरती आरंभ कर दी। यहीं से उन्होंने उस संघर्ष को प्रारंभ किया, जो उनके मन में पहले से ही सुनियोजित था और जिसके आधार पर वे देश और धर्म को इन आक्रांताओं से मुक्त कराना चाहते थे।

निर्भीक होकर एक राजपूत राजा का चारुमति से विवाह करना व एक मुसलमान शासक द्वारा बलात् एक राजपूत राजकुमारी से विवाह करने की कुत्सित योजना को असफल करना, राजपूतों के लिए शुभ शकुन सा था। रतन सिंह चूँडावत और हाड़ी रानी के अमर बलिदान ने राजस्थान भर में राजपूतों के आत्मसम्मान को सुदृढ़ करने का महती कार्य किया।

राज सिंह ने राजस्थान और भारत के हिंदुओं को यह दिखा दिया था कि मुगलों की शक्ति एवं सत्ता बुलबुले के समान असत्य व अस्थायी है।

मुगल सत्ता दो ही कारणों से खड़ी थी–पहला, राजपूतों का आपसी भेद और दूसरा, भाड़े के मुसलमान सैनिकों को हिंदुओं के धन व महिलाओं का लालच देकर अपने पक्ष में लड़ाना। यदि राजपूत अपने बीच के भेदों को मिटाकर एक-दूसरे का साथ देते हैं तो मुगल साम्राज्य को मिटाना अत्यंत सरल हो जाएगा। जब हिंदू अपना धन व अपनी महिलाओं की सुरक्षा कर लेंगे तो मुसलमानों का यह कुचक्र बिखर सकता है। इस प्रकार से राज सिंह ने औरंगजेब की सत्ता को चुनौती दी, किंतु औरंगजेब ने अभी मेवाड़ को छेड़ना उचित नहीं समझा।

अंत में अपने अपमान का घूँट पीकर औरंगजेब ने चारुमति की छोटी बहन का विवाह अपने पुत्र मुअज्जम से करवा कर अपने अहंकार को तृप्त किया।

नाथद्वारा प्रकरण तथा जजिया कर का विरोध
भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की स्थितियाँ बदलने में औरंगजेब ने अपनी धर्मांधता के चलते ऐसे दो कार्य किए, जिसके कारण उसे राज सिंह से आमने-सामने के युद्ध में खड़ा होना पड़ा। औरंगजेब ने मथुरा के गोसाईं पुरोहितों को संदेश भिजवाया कि यदि आपके देवी-देवता सत्य हैं तो मुझे कोई चमत्कार दिखाकर इसका प्रमाण चाहिए, अन्यथा मैं मथुरा और वृंदावन के कृष्ण मंदिरों को ध्वस्त कर दूँगा। 

10 अक्तूबर, 1669 ईसवी को श्रीनाथजी मंदिर, मथुरा के पुजारी दामोदरजी, बालकृष्ण, वल्लभजी और गंगा बाई, भगवान् कृष्ण की अद्भुत दैवीय मूर्ति को लेकर अत्याचारी औरंगजेब से बचाने हेतु राजस्थान की ओर प्रस्थान कर गए। कोई भी राजपूत राजा औरंगजेब के साथ शत्रुता करने का साहस नहीं जुटा सका। एक-एक करके सभी राजाओं ने गोसाईं पुरोहितों को अन्यत्र कहीं शरण लेने को कहा। बूँदी, जोधपुर, कोटा, जयपुर इत्यादि राजघरानों द्वारा शरण देने में असमर्थता देखकर, अंततः पुजारियों ने मेवाड़ के महाराणा राज सिंह से संपर्क किया, ताकि औरंगजेब के क्रूर मंतव्य से श्रीनाथजी की पावन मूर्ति को बचाया जा सके और मेवाड़ में श्रीनाथजी का मंदिर बनवाया जा सके।

राज सिंह ने पुजारियों को जो उत्तर दिया, वह सदा के लिए स्वर्णाक्षरों में हिंदू इतिहास में अंकित है। राज सिंह ने गुसाइयों से गरजकर कहा, “जब तक मेरे एक लाख राजपूतों के मस्तक कट नहीं जाते, तब तक औरंगजेब, श्रीनाथजी की मूर्ति को स्पर्श भी नहीं कर पाएगा।”

क्या भक्ति भावना रही होगी उन विलक्षण ब्राह्मणों की, जो श्री नाथजी की मूर्ति लिये भागते फिर रहे थे? क्या कहा जाए क्षात्र धर्म के पालक महाराणा राज सिंह के लिए, जो उस समय के सबसे नृशंस हत्यारे औरंगजेब से भिड़ गए ?

हमारे इन पुरखों से त्याग व समर्पण पर, हम अनुग्रह के भाव से केवल नतमस्तक हो सकते हैं।

राज सिंह ने मूर्ति तथा पुजारियों को अपने राज्य में संरक्षण दिया, साथ ही उन्हें अपनी इच्छानुसार मंदिर हेतु जगह पसंद करने का आग्रह किया। पुजारियों ने उदयपुर से 50 किमी. की दूरी पर बनास नदी के किनारे सिहाड़ गाँव में मंदिर हेतु जगह का चुनाव किया तथा शनिवार 20 फरवरी, 1672 ईसवी को श्रीनाथजी की मूर्ति को वहाँ स्थापित किया, आज वही गाँव, वैष्णव संप्रदाय के हिंदुओं के लिए एक प्रमुख मान्यतावाला तीर्थ है, जिसे 'नाथद्वारा' कहते हैं।

यह विडंबना ही है कि आज के नाथद्वारा में राज सिंह की कोई विशाल प्रतिमा तो दूर, श्रीनाथजी की रक्षा में किए उनके योगदान पर कोई पोस्टर भी नहीं लगा है। यह बहुत ही लज्जा का विषय है कि हिंदू समाज अपने रक्षकों को कैसे विस्मृत कर बैठा है!

वृंदावन के पुजारियों को आश्रय देना, औरंगजेब और मेवाड़ के संबंधों को चीर के रख देनेवाले एक काँटे के समान था।

राज सिंह ने धर्मनिष्ठा व आत्मसम्मान के लिए औरंगजेब के विरोध में खड़े रहने को, औरंगजेब से भय और धन इत्यादि के लोभ से अधिक माना। वैसे भी ये दोनों दुर्गुण राजपूतों की सिसोदिया शाखा को कभी लेशमात्र भी छू नहीं पाए थे।

औरंगजेब ने राज सिंह को पत्र लिखकर पुजारियों और श्रीनाथजी की मूर्ति को मेवाड़ में शरण देने हेतु मना किया था। राज सिंह ने औरंगजेब की बात पर कान ही नहीं दिया, बल्कि औरंगजेब द्वारा नवनिर्मित मंदिर पर आक्रमण की आशंका से उन्होंने मंदिर की रक्षार्थ एक बड़ी सेना सिहाड़ में तैनात कर दी। देवगढ़, सलूबर और आसपास के क्षेत्रों के सभी सामंत अपने हिंदू देवता की रक्षा में युद्ध हेतु पूरी तरह से तैयार हो चुके थे।

राज सिंह ने जोधपुर के राठौड़ वंश को भी औरंगजेब के विरुद्ध इस युद्ध में साथ देने हेतु अपना एक दूत भेजा। किंवदंति के अनुसार, नाथद्वारा के निकट एक भीषण युद्ध हुआ था, किंतु लेखक के बहुत प्रयासों के उपरांत भी, कोई स्पष्ट प्रमाण न मिलने के कारण कुछ कहना कठिन है।

दुर्गादास राठौड़ के साथ राज सिंह की मैत्री और जोधपुर के अजीत सिंह को आश्रय देना
ऐसा प्रतीत हो रहा था कि औरंगजेब के काल में प्रारब्ध स्वतः ही हिंदुओं की ओर झुकता चला जा रहा था। राजस्थान के तीनों बड़े और महत्त्वपूर्ण राजघराने अत्यंत साहसी, कुशल, शूरवीर तथा निष्ठावान, तीन राजाओं द्वारा सँभाले जा रहे थे। मेवाड़ में राज सिंह, जोधपुर में जसवंत सिंह और आमेर (जयपुर) में मिर्जा राजा जयसिंह, ये तीनों वे राजपूत राजा थे, जो उपमहाद्वीप के पूरी तरह से इस्लामीकरण करने की औरंगजेब की योजना के विरुद्ध दीवार की भाँति खड़े थे।

जयसिंह और जसवंत सिंह, निष्ठावान हिंदू राजा थे, किंतु अपने पूर्वजों की मुगलों से हुई संधि से विवश होकर वे मुगलों के ध्वज तले लड़ने को बाध्य थे। किंतु दोनों ही राजा, औरंगजेब के शासन से मन-ही-मन दुःखी थे और इसका आभास वे समय-समय पर औरंगजेब को करवाते भी रहते थे। औरंगजेब ने भी इन दोनों पर कभी विश्वास नहीं किया तथा सदैव इन्हें दिल्ली से दूर सैन्य अभियानों में उलझाए रखा।

भारत के हिंदू राजाओं तथा अफगानिस्तान के अफगानों के साथ औरंगजेब के सतत संघर्ष के कारण मुगल शासित क्षेत्रों से अधिकाधिक हिंदू विस्थापित होकर अन्य हिंदू शासित राज्यों में बसने लगे थे। इन हिंदू शासित राज्यों में नए-नए गाँव उभरने लगे।

मुख्य शहरों के खाली होते रहने के कारण आर्थिक मंदी का समय आ रहा था तथा औरंगजेब के राजसी खजाने को भारी क्षति पहुँच रही थी। औरंगजेब ने उपमहाद्वीप के सभी हिंदुओं पर 'जजिया' कर लगाने की योजना बनाई। जजिया कर, गैर-मुस्लिमों पर लगाया जाता था, जो इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म के अनुयायी थे। जजिया, इस्लामी न्याय व्यवस्था के लिए एक खलीफा उमर की सोच का परिणाम था, जिसमें गैर-मुसलमानों के लिए भिन्न आर्थिक व सामाजिक नियम होते थे।

इन नियमों को 'उमर की संधि' कहा जाता है, जो उमर ने तात्कालिक गैर-मुसलमानों को अपमानित व आर्थिक रूप से शोषित करने के इरादे से गढ़ा था। गैर-मुसलमानों को 'जिम्मी' कहना, उनके धर्म का अपमान व उनसे जजिया कर वसूलना इस संधि की मूल बातें हैं। औरंगजेब जानता था कि जयपुर, जोधपुर तथा मेवाड़ के राजपूत राज्यों के रहते जजिया का प्रबल विरोध होगा और उसके कारण विद्रोह की स्थिति भी बन सकती है। अतः सर्वप्रथम उसने जयपुर के मिर्जा राजा जयसिंह तथा जोधपुर के जसवंत सिंह की हत्या की योजना बनाई। उसने जयसिंह को दक्षिण भारत में चल रहे विद्रोहों का दमन करने हेतु भेजा तथा जसवंत सिंह को अफगानिस्तान में विरोध समाप्त करने के लिए। 28 अगस्त, 1667 के दिन औरंगजेब के आदेशानुसार राजा जय सिंह को विष देकर उनकी हत्या कर दी गई। जजिया के अतिरिक्त औरंगजेब ने राजा जयसिंह पर मराठा छत्रपति शिवाजी की सहायता करने का आरोप भी लगाया। जय सिंह की औरंगजेब द्वारा हत्या के विषय में लेखक को शोध करते समय दो पुस्तकों से प्रमाण मिले।

पहली कथा अत्यंत मार्मिक है। श्री शंकर सिंह आशिया द्वारा लिखित, 'चारण दिग्दर्शन' में स्पष्ट वर्णन मिलता है कि शिवाजी की सहायता के प्रकरण से क्षुब्ध औरंगजेब ने अपने वजीर, निजाम-उल-मुल्क को राजा जय सिंह की हत्या करवाने का दायित्व सौंपा। निजाम ने जयपुर के जगन्नाथ रत्नू को इस के लिए तैयार किया। जगन्नाथ एक बलिष्ट व वीर यक्का थे। उस काल में सौ लोगों को युद्ध में मारने वालों को 'यक्का' की उपाधि दी जाती थी।

जगन्नाथ रतनू, जय सिंह को शिकार के बहाने जंगल में ले गए। वहाँ उन्होंने जय सिंह पर तलवार तानकर उन्हें ललकारा। जय सिंह यक्के से नहीं लड़ सकते थे, तथापि उन्होंने भी खड्ग खेंच ली। तब जगन्नाथ रतनू ने जय सिंह जी के चरणों में अपनी तलवार रखते हुए उन्हें वह फरमान दिखाया, जिसमें निजाम ने उनकी हत्या का आदेश जगन्नाथ को दिया गया था।

जगन्नाथ बोले, “चारण कुल में जन्मे किसी भी वीर की तलवार किसी राजपूत पर कभी नहीं चल सकती। किसी चारण पर स्वामिद्रोह का लांछन कभी नहीं लग सकता।”

आगे जगन्नाथ ने कहा, “यद्यपि रोटी के लिए धर्म बेचा नहीं जा सकता, फिर भी औरंगजेब का अन्न मेरे पेट में है, सो उसके अन्न को उऋण करने के लिए मुझे यह सब करना पड़ा। आप पर तलवार उठाकर मैं उस बोझ से मुक्त हो गया हूँ। परंतु इससे आगे मैं धर्म सूत्र से बँधा हूँ। मैं आप पर वार नहीं कर सकता। यह नग्न खड़ग अब आपके वध के लिए नहीं, आपकी रक्षा के लिए है। अब आप यहीं से आमेर चले जाइए। मैं वजीर से आपके बच निकलने की कोई कहानी कह दूँगा।”

राजा जय सिंह ने जगन्नाथ को गले लगाया और बोले, “आप मेरे लिए पिता तुल्य हो। आप दिल्ली गए तो वजीर द्वारा मारे जाएँगे। कोई विश्वास नहीं करेगा कि जय सिंह एक यक्के से बचकर निकल गया। आप भी मेरे साथ आमेर चलो।”

जगन्नाथ के मना करने के उपरांत भी जय सिंह उन्हें आमेर ले गए तथा, चाकसू तहसील में भोजपुरा, झोहुँदा, सुनारा व नांगल इत्यादि बारह गाँव उन्हें जागीर में दिए। जगन्नाथ नांगल में ही बस गए, जहाँ जय सिंह उनसे मिलने जाया करते थे। जगन्नाथ रतनू के वंशज आज भी इन गाँवों में बसते हैं तथा इनमें से कुछ लेखक के दूर के संबंधी भी हैं। बहुत प्रयास के बाद भी औरंगजेब का वह फरमान लेखक के हाथ नहीं लगा। कदाचित् वह जगन्नाथ जी द्वारा उसी समय नष्ट कर दिया गया।

यह कथा हमारे पुरखों की विलक्षण समझ व उनकी दुविधा का प्रबल उदाहरण है। कितनी विषम परिस्थितियों में, कितने दुष्ट शत्रु से हमारे पुरखे स्वयं व धर्म को बचा कर लाए हैं।

दूसरा उल्लेख जयपुर के अभिलेखों में मिलता है कि औरंगजेब ने एक दासी के हाथों जय सिंह को विष दिलवा दिया। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना बुरहानपुर में 19 जुलाई, 1667 ईसवी को घटी। श्यामलदास जी व टॉड दोनों का मत है कि शिवाजी महाराज की सहायता करने के फलस्वरूप जय सिंह की हत्या औरंगजेब ने करवाई।

इस विषय में बीकानेर के श्री महेंद्र खड्गावत का नूतन शोध भी बहुत प्रामाणिक है, जिसे वे शीघ्र ही सार्वजनिक करेंगे। उन्होंने औरंगजेब द्वारा लिखित वह पत्र उद्धृत किया है जिसमें वह राजा जय सिंह को छत्रपति शिवाजी महाराज की मुक्ति का दोषी मानता है।

‍इसी वर्ष में औरंगजेब ने जसवंत सिंह के प्रतिभाशाली पुत्र पृथ्वीराज सिंह को 'खिलअत' नाम की एक अरबी वेशभूषा उपहार में दी, जिसमें विष लगा हुआ था। इसके फलस्वरूप पृथ्वीराज सिंह की मृत्यु हो गई। पृथ्वीराज बहुत मेधावी तथा कट्टर हिंदू राजकुमार थे। उनकी हत्या कर औरंगजेब ने जोधपुर को हड़पने की पूरी बिसात बिछा दी थी।

जसवंत सिंह अपने पुत्र की इस निर्मम हत्या से विचलित हो उठे, क्योंकि उनका और कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं था। कुछ अप्रकट कारणों से जसवंत सिंह औरंगजेब के लिए फिर भी लड़ते रहे और फिर 28 दिसंबर, 1678 को जसवंत सिंह की भी विष देकर हत्या कर दी गई। इस समय जसवंत सिंह की रानी गर्भवती थीं, किंतु औरंगजेब ने उन्हें दिल्ली में अपनी रानियों के साथ रहने को बाध्य कर दिया।

औरंगजेब ने जोधपुर के राज्य को मुगल अधिकार में कर लिया, क्योंकि जसवंत सिंह की मृत्यु के समय उनका कोई वैध उत्तराधिकारी नहीं था। कुछ समय पश्चात् जसवंत सिंह की रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया अजीत सिंह। औरंगजेब, इस राजपूत राजकुमार का पालन-पोषण मुस्लिम रीति से करना चाहता था, इसलिए उसने शिशु अजीत सिंह के दिल्ली के एक चिह्नित स्थान से बाहर जाने पर रोक लगा दी। तब मारवाड़ के मरुस्थल से एक वीर योद्धा उठा, जिसने औरंगजेब से विद्रोह करके भारतवर्ष में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के इतिहास को पलटकर रख दिया। उसका शौर्य ही कुछ ऐसा था कि इतिहास को उसके नाम के आगे 'वीर' का विशेषण लगाना ही पड़ा। यह योद्धा था, वीर दुर्गादास राठौड़ !

दुर्गादास, जसवंत सिंह की सेना में एक साधारण सैनिक ही थे, किंतु उन्होंने अपने रणकौशल तथा साहस के बल पर मारवाड़ के सामंतों और सेनानायकों के मध्य एक सम्मानित स्थान प्राप्त कर लिया। यहाँ तक कि शत्रु उनके नाम से भी भय खाते थे। जसवंत सिंह की हत्या से पूर्व दुर्गादास ने जसवंत सिंह के अजन्मे बालक की रक्षा करने तथा एक दिन उसे जोधपुर का महाराजा बनाने की शपथ ली थी।

दुर्गादास ने अपने इस प्रण को कैसे पूरा किया और कैसे अजीत सिंह को जोधपुर का महाराजा बनाया, यह पूरी गाथा स्वामिभक्ति, बुद्धिमत्ता, साहस व निस्स्वार्थ सेवा का अद्वितीय उदाहरण है। 

यदि हम इस गाथा को लिखने लगें तो हमें कदाचित् एक पूरी पुस्तक ही लिखनी होगी। अतः यहाँ संक्षेप में ही यह कथा वर्णित है।

हम इस बात का यहाँ उल्लेख इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि बालक अजीत को औरंगजेब के हाथों से छुड़वा कर दुर्गादास की स्वामिभक्ति और साहस की ख्याति पूरे राजस्थान में फैल चुकी थी। उन्हें मारवाड़ के सच्चे रक्षक और एक नायक के रूप में जाना जाने लगा था। बालक अजीत के बड़े होने और महाराजा बनने तथा मारवाड़ तथा जोधपुर से इस्लामी शासन समाप्त होने में वीर दुर्गादास राठौड़ का अतुलनीय योगदान रहा। मारवाड़ के इतिहास में इस घटना का विस्तार से उल्लेख है।

औरंगजेब के सिपाहसालार, फौलाद खान ने 20,000 सैनिक लेकर जोधपुर की हवेली को घेर लिया तथा रानी व अजीत सिंह को उन्हें सौंप देने की माँग की।

जब इन साहसी योद्धाओं ने अपने स्वामी के पुत्र और मारवाड़ के एकमात्र जीवित राजकुमार को औरंगजेब के हाथों में जाते देखा तो राठौड़ों में विद्रोह हो गया। उन्होंने अपने राजकुमार की जीवन रक्षा को ही अपना ध्येय बनाया। अपने इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु जो हृदयविदारक मार्ग उन्होंने चुना, वह कल्पनातीत था।

इस भयानक संघर्ष के आरंभ में राठौड़ कुल की जो स्त्रियाँ व बच्चे, रानी और राजकुमार के साथ रहती थीं, उन्हें बारूद के ढेर के साथ कमरों में बंद कर दिया गया। फिर अपने हाथों से उस बारूद को अग्नि देकर इन महापुरुषों ने अपने परिवारों के चिथड़े उड़ा दिए। बारूद के विस्फोट में सब कुछ क्षण भर में ही वाष्पीकृत हो गया। यह जौहर का ही एक वीभत्स रूप था, जिसमें सम्मान की रक्षा हेतु परिवारों का बलिदान दिया गया। कितने कठोर हृदय से राठौडों, चारणों व अन्य हिंदू लड़ाकों ने अपने परिवारों को विस्फोट से उड़ाया होगा, लेखक के लिए उस भावदशा का वर्णन करना असंभव है।

प्रेम और पारिवारिक बंधनों से मुक्त होने के पश्चात् मारवाड़ के राजपूतों के पास अन्य कोई साध्य नहीं बचा था।

राजपूत योद्धा, मृत्यु से पलायन की अपेक्षा, सम्मान के साथ मृत्यु का आलिंगन करने को श्रेयस्कर मानते थे। अजीत सिंह को मिठाइयों के एक टोकरे में छुपाकर पहले ही मुगल किले से बाहर निकाल दिया गया। अब मारवाड़ के मुट्ठी भर वीर, मुगल सेना से शिशु अजीत सिंह को बचाने को उद्यत हुए थे।

वीर दुर्गादास राठौड़ के नेतृत्व में मारवाड़ के पाँच सौ योद्धाओं ने अपने इष्ट को याद किया, अफीम का सेवन किया और एक असंभव कार्य करने को कटिबद्ध, अपने अश्वों पर आरुढ़ हुए।

सबसे पहले रघुनाथ भाटी ने अपने सौ सैनिकों के साथ आक्रमण किया। दुर्गादास और अन्य चार सौ सैनिक दूसरे द्वार से मारवाड़ की ओर भाग निकले।

रघुनाथ ने हजारों मुगलों को ढेर कर अपने सत्तर सैनिकों के साथ वीरगति प्राप्त की। तब तक दुर्गादास वहाँ से नौ मील दूर निकल गए थे। मारवाड़ की सेना का पीछा करने के लिए दस हजार मुगलों की एक सेना भेजी गई।

मुगलों को अगली चुनौती रणछोड़ दास जोधा और उनके साठ राजपूत सैनिकों ने दी। इस युद्ध में भी हजारों मुगलों को परलोक पहुँचाने के पश्चात् रणछोड़ दास अपने सैनिकों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए।

अंततः दुर्गादास और उनके बचे-खुचे राजपूत सैनिकों ने मुगलों से संघर्ष करने की ठानी।

पाँचला के चंद्रभान जोधा भी इस प्रकरण में अपनी दो पत्नियों के साथ निकले थे। उन्होंने अपने हाथों अपनी दोनों पत्नियों के शीश काट, उनके शरीर यमुना में प्रवाहित कर दिए तथा अन्य राजपूतों का साथ देने दुर्गादास से जा मिले।

क्या संस्कार रहे होंगे उन क्षत्राणियों के, जो अपने शीश कटाने को पति के सम्मुख बैठ गई!

यदि उन दो स्त्रियों ने चंद्रभान का विरोध किया होता, तो क्या चंद्रभान इस कृत्य को कर सकते थे ?

क्या किसी को आत्मबलिदान के लिए बाध्य किया जा सकता है ?

नहीं। उन देवी तुल्य महिलाओं ने सहज ही स्वयं को पति के हाथों में सौंप दिया।

केवल अपने राजकुमार की रक्षा के लिए!

कोई तर्क-कुतर्क नहीं, कोई भय नहीं, कोई शंका नहीं, कोई सस्ती भावुकता नहीं, बस कर्तव्य कर्म मात्र।

पति का कर्म कहीं क्षीण न पड़ जाए, इसलिए स्वयं की ही बलि चढ़ा दी।

ऐसी अविश्वसनीय वीरांगनाओं के होते हुए क्या आश्चर्य कि मुसलमान इस देश को कभी नहीं जीत पाए !

मुगलों पर हिंदू सैनिक, बिजली की भाँति टूट पड़े। प्रत्येक हिंदू सैनिक ने बलिदान देने से पूर्व बीस से तीस मुगलों को परलोक पहुँचाया और संध्या होने तक युद्ध करते रहे।

इस भीषण युद्ध के पश्चात् मारवाड़ की सेना में अत्यंत घायल अवस्था में दुर्गादास समेत सात हिंदू सैनिक शेष बचे, जबकि मुगलों की पूरी सेना का सफाया हो गया। उन शेष छः योद्धाओं के नाम इस प्रकार हैं–
1. रूप सिंह राठौड़ प्रयाग दासोत
2. मोखम सिंह राठौड़ जगत सिंहोत
3. भोजराज राठौड़
4. दूदी राठौड़
5. महा सिंह राठौड़ एवं
6. पंचायण दास पंचोली तिलक चंदोत

जोधपुर की महारानी एवं राजकुमार अब म्लेच्छों कि पकड़ से बहुत दूर निकल चुके थे।
मारवाड़ के सपूतों ने असंभव को संभव कर दिखाया था।

मारवाड़ की ख्यातों में इस युद्ध का कवितामय बखान है।

राठौडों व उनके मित्रों के अतुलनीय बलिदान का वर्णन लेखक के बस का नहीं। उस गौरवशाली दिन को पाठकों के लिए सजीव करने के लिए ख्यातों का वर्णन यहाँ साझा किया जा रहा है।

मृत्यु का भय निकलते ही एक एक हिंदू वीर साक्षात काल बनकर असुरों पर टूट पड़ा। आत्मबलिदान हेतु उनकी आकांक्षा इतनी प्रबल थी कि कभी-कभी तो उनकी भावना के आगे उनके बदला लेने का उद्देश्य भी गौण हो जाता था।

वीर दुर्गादास ने रणछोड़, गोविंद, जोधा के पुत्र, चंद्रभान दुरावत, रघुनाथ के पुत्र निडर भारमल, ऊदा, सूजावत इत्यादि सभी से कहा, “चलो ! युद्ध के ज्वार को हम तैरकर पार करें।”

 इस पर सभी ने उन्हें आश्चर्य से देखा तो दुर्गदास ने दहाड़ लगाई, “युद्ध के ज्वार में से आओ हम मिलकर इन असुरों को हमारी इस धरती से उखाड़ फेंकें, ताकि स्वयं अप्सराएँ हमें सूर्यदेव के भवन में ले जाएँ।”

फिर एक-एक करके सबने अपने वचन कहे, सूजा चारण ने ऐसे ही दिन के लिए अपने शब्द बचाकर रखे थे। उसने कहा, “अपनी संपत्ति ईश्वर के कार्यों हेतु दे दो, अपने शरीर को बलिदान हेतु और इस प्रकार सशरीर स्वर्ग जाने का पथ चुनो।”

“मैंने अपने जीवन में मित्रता पाई, उपहार प्राप्त किए और आज मैं जोधपुर के नमक का ऋण चुकाऊँगा। मैं अपने पिता की ख्याति को आगे ले जाऊँगा और आज के इस युद्ध में मैं मृत्यु को ऐसे पराजित करूँगा कि आने वाली पीढ़ियों तक चारण मेरा यशगीत गाएँ।”

असोह के पुत्र दुर्गादास ने कहा, “यवनों के दाँत तेज हैं, किंतु हमारी तलवारों की तेजी का, हमारे शौर्य का दिल्ली को पता लग जाएगा और हमारा क्रोध, शाह की सेना को ही लील जाएगा।”

जैसे ही औरंगजेब की सेना पहुँची, हाथों में शस्त्र लिये यम की भाँति दिखनेवाले मारवाड़ के राठौड़ एवं अन्य योद्धाओं ने अपने शत्रु पर धावा बोल दिया। रणक्षेत्र में रक्त का ज्वार बारंबार उठने और गिरने लगा।

आज शाहजहानाबाद, दिल्ली की सड़कों पर शिव का साक्षात् तांडव हो रहा था। रतन सिंह ने नौ हजार शत्रुओं को सँभाला। दिलोह व दुरावत दोनों ही वीरगति प्राप्त कर देवलोक को चले गए। चंद्रभान को अप्सराएँ अपने संग चंद्रपुर ले प्रयाण कर गईं। सुल्तान के पुत्र के पीछे ही भाटी का शरीर भी क्षत-विक्षत पड़ा था। निष्ठावान उदावत कमल के समान दिख रहे थे। सांद चारण अपने दोनों हाथों में तलवार लिये रणक्षेत्र में अपना युद्ध कौशल दिखाते हुए परमतत्त्व को प्राप्त हो गया। 

प्रत्येक जाति एवं वंश के योद्धाओं ने इस पुनीत धर्म कार्य में अपने दायित्व का निर्वहन किया तथा तलवारों की छाया में दुर्गादास ने अपने सैनिकों और सामंतों समेत शत्रु को धराशायी कर अपने सम्मान की रक्षा की।

अगस्त 1679 ईसवी के एक दिन, मारवाड़ के केवल पाँच सौ योद्धाओं ने औरंगजेब की अनुमानतः दस हजार सेना को पराजित किया तथा अपने राजकुमार और जसवंत सिंह की रानियों की रक्षा की। और यह अतिशयोक्ति नहीं, हर स्रोत से पुष्टि के बाद यह अविश्वसनीय घटना यहाँ लिखी गई है।

दुर्गादास समेत मात्र सात सैनिक, ग्राम बलूंदा के ठाकुर मोखम सिंह के यहाँ बालक अजीत को सुरक्षित लेकर पहुँचे। कुछ समय बाद अजीत सिंह को लेकर दुर्गादास मेवाड़ के महाराणा राज सिंह के पास गए, जिन्होंने सहर्ष अजीत सिंह को मेवाड़ में आश्रय दिया।

राज सिंह ने केलवा के आस-पास बारह गाँव की बालक अजीत सिंह को जागीर दी। फिर वे दुर्गादास से बोले, “औरंगजेब में मेवाड़ और मारवाड़ की संयुक्त सेना पर हमला करने का साहस नहीं है। आप निश्चिंत होकर मेवाड़ में रहिए।”

अतः मेवाड़ के सिसोदिया वंश और मारवाड़ के राठौड़ वंश के बीच एक नया संबंध प्रारंभ हुआ और आगे चलकर इन्हीं सुदृढ़ संबंधों के कारण राजस्थान से इस्लामी शासन की पूर्णतया समाप्ति हुई। दुर्गादास ने सिरोही और आबू के पर्वतों में आश्रय लिया तथा औरंगजेब की सेना पर छापामार आक्रमण करते हुए उसे बहुत हानि पहुँचाई। एक लोकोक्ति का उल्लेख यहाँ करना आवश्यक है।

औरंगजेब ने अपने दो महत्त्वपूर्ण शत्रुओं के चित्र बनवाने का आदेश दिया, जब चित्र बन गए तो उनमें शिवाजी महाराज को सिंहासन पर तथा दुर्गादास को अश्व पर विराजमान दर्शाया गया था। जब औरंगजेब ने इस चित्र को देखा तो उसके मुँह से निकल पड़ा, “संभवतः मैं इसे तो (शिवाजी को) पकड़ भी लूँ, किंतु यह शैतान तो मेरा काल बनने के लिए ही जन्मा है।”

औरंगजेब ने दुर्गादास को चालीस हजार दीनार की रिश्वत देने का भी प्रयास किया, यदि वह अजीत सिंह को उसके हवाले करने को तैयार हो, किंतु दुर्गादास ने इस बात को भी उपहास में उड़ा दिया। अंततः दुर्गादास ने औरंगजेब का विरोध जीवनपर्यंत जारी रखा और वे औरंगजेब से भी अधिक आयु को प्राप्त हो, मारवाड़ को मुगलों से स्वतंत्र कराने में सफल हुए।

1707 ईसवी में औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही दुर्गादास ने मारवाड़ से मुगलों की सेना को बाहर निकाल दिया तथा किशोर अजीत सिंह को मारवाड़ का महाराजा बना दिया।

अतः सिंह के समान साहसी दर्गादास ने अपने राजा जसवंत सिंह से किए वचन को निभाया। बाद में अजित सिंह के साथ कुछ मनमुटाव होने के कारण दर्गा दास सदा के लिए मारवाड़ छोड़ कर चले गए। कुछ समय पश्चात् 22 नवंबर, 1718 ईसवी को क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित धार्मिक नगरी उज्जैन में उनका देहांत हुआ। उस समय उनके कुछ निष्ठावान लोग ही उनके साथ थे।

दुर्गादास राठौड़ की वीरता, शौर्य, वीतरागता व धर्मनिष्ठा पर कोई लेखक क्या लिख सकता है, बस कुछ क्षणों के लिए, यदि हम उस अमर चेतना को अनुभव भी कर सकें तो हमारा साधारण जीवन रूपांतरित हो सकता है। माँ भवानी ने यदि अवसर दिया तो मारवाड़ के इस यशस्वी पुत्र पर भी एक विस्तृत पुस्तक लिखी जाएगी। अब हम पुनः राज सिंह की ओर लौटते हैं।

औरंगजेब के हाथों से छुड़ाकर अजीत सिंह को दुर्गादास ने कुछ माह तक राज सिंह की शरण में रखा तो यह भी मेवाड़ तथा मुगलों के बीच तनातनी का कारण बन गया।

औरंगजेब तथा राज सिंह के बीच शांति स्थापित होने की बची-खुची उम्मीद भी उस दिन समाप्त हो गई, जब भारतीय उपमहाद्वीप के हिंदुओं पर 'जजिया कर' लगाया गया। भारतवर्ष के हिंदुओं के लिए जजिया एक तरह से लाभकारी रहा, क्योंकि इस बात से औरंगजेब का सत्य अब पूरा प्रकट हो गया और वह हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करने के लिए खुलकर हिंसा और क्रूरता पर उतर आया था। औरंगजेब की हठधर्मी के चलते उसके अधीन राजाओं की सेना में ही नहीं, वरन् आम हिंदुओं में भी भयंकर रोष व्याप्त हो गया। जजिया के विरोध में राजस्थान के तीनों बड़े राजघराने मेवाड़, मारवाड़ और जयपुर अपने मतभेदों को भुलाकर एक हो चुके थे।

राज सिंह ही वह केंद्र बिंदु बन चुके थे, जिनके इर्द-गिर्द राजपूतों की शक्ति का एकीकरण हो रहा था। राज सिंह ने छत्रपति शिवाजी एवं दसवें सिख गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज को भी पत्र लिखे और दिल्ली के इस्लामी शासन के विरुद्ध पुरे भारतवर्ष में विरोध का सर्वाधिक प्रबल स्वर बनकर उभरे।

कुटिल औरंगजेब को पता था कि जब तक जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह और जयपुर के मिर्जा राजा जयसिंह जीवित हैं, तब तक जजिया कर लगाना हानिकारक होगा, क्योंकि ये दोनों ही निष्ठावान राजा जजिया का विरोध अवश्य करेंगे, संभवतः इसके विरोध में राज सिंह के साथ जा मिलेंगे।

जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, औरंगजेब ने 1679 ईसवी में जजिया लागू करने से पूर्व इन दोनों महान हिंदू राजाओं की कुटिलतापूर्वक विष देकर हत्या करवा दी। अब औरंगजेब के लिए जजिया के मार्ग में अब एक ही काँटा था–मेवाड़ के महाराणा राज सिंह।

राज सिंह द्वारा औरंगजेब को लिखे गए पत्र के अंश निम्न प्रकार से हैं। इस पत्र में राज सिंह ने हिंदुओं पर कर लगाने के विरोध में औरंगजेब को लगभग मेवाड़ पर आक्रमण का न्योता ही दे दिया–

“मुझे ज्ञात हुआ है कि मेरे विरुद्ध षड्यंत्रों के लिए बहुत अधिक मात्रा में धन का व्यय हो रहा है और उसकी वजह से आपके राजकोष में हो रही हानि की भरपाई हेतु आपने आम जनता पर अवांछित कर लगाने शुरू कर दिए हैं... आपका शुभचिंतक।”

“आपके महान पूर्वजों ने अपने महान आदर्शों की स्थापना और उनके पालन से जहाँ-जहाँ भी अपने चरण रखे, वहाँ देश-विदेश में केवल विजय प्राप्त की और इसमें उन आदर्शों का भी योगदान था। किंतु हे महामना! आपके शासनकाल में आपके कई साथी राजाओं ने अपने पाँव पीछे खींच लिये हैं तथा आगे भी आपको अपनी सीमाओं की हानि ही उठानी होगी, क्योंकि विनाश और लूटमार अब सभी जगह फैल चुके हैं तथा इन पर आपका नियंत्रण भी नहीं रहा है। आपकी प्रजा का निरंतर दमन हो रहा है तथा आपके साम्राज्य का प्रत्येक सूबा दरिद्र होता जा रहा है। जब राजा और प्रजा दोनों ही दरिद्रता का मुख देख रहे हैं तो सामंतों की क्या स्थिति होगी? जहाँ तक सेना का प्रश्न है, उनमें भी खुसुर-पुसुर शुरू हो चुकी है, व्यापारी भी मुसलमानों से दुःखी हैं, हिंदुओं की अधिकांश जनसंख्या दिन-रात क्रोध और क्षोभ में भरी अपना सिर पीट रही है। इस बुरे काल में, ऐसा सुनने में आया है कि आप स्वयं भी हिंदू भक्तों से ईर्ष्या कर रहे हैं तथा ब्राह्मणों, समोरा, जोगी, बैरागी और संन्यासियों से भी कर के रूप में धन वसूली कर रहे हैं। यदि बादशाह अपने धर्मग्रंथों में आस्था रखते हैं और दैवीय प्रताप को मानते हैं तो उन्हें ज्ञात होगा कि ईश्वर सभी प्राणियों का ईश्वर है, केवल मुसलमानों का ही नहीं है।

कर के रूप में जो धन आप हिंदुओं से वसूल रहे हैं, वह असंगत है। न ही यह एक उचित नीति है, बल्कि इससे देश भी दरिद्रता के पथ पर चल पड़ेगा। यह नीति और कुछ नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के कानून की अवमानना है। किंतु यदि आपके धर्म ने आपको यह पथ चुनने को बाध्य किया है तो सर्वप्रथम जयपुर के महाराजा रामसिंह को इस पुण्य कार्य में अपना भाग देना चाहिए, यही न्यायपूर्ण होगा क्योंकि वही हिंदुओं के एक बड़े आदर्श हैं। फिर मैं, आपका हितैषी तो उपस्थित हैं ही, जिसका सामना करने में आपको अधिक कष्ट नहीं उठाना होगा। आपके जैसे ओजस्वी तथा उदार व्यक्ति को, तुच्छ कीड़े-मकोड़ों सी जनता को त्रास देना शोभा नहीं देता। यह अद्भुत है कि आपके मंत्रिपरिषद् के सदस्यों में से एक ने भी आपको सत्य और सम्मान के मार्ग पर चलते हुए शासन करने के विषय में नहीं समझाया।”

इस उपहास भरे पत्र के बाद औरंगजेब क्रोध में जल उठा। इसी समय के आसपास छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी औरंगजेब को एक पत्र लिखा। शिवाजी महाराज ने औरंगजेब को चुनौती दी कि यदि उसमें सामर्थ्य है तो मेवाड़ के महाराणा राज सिंह से जजिया कर वसूल करके दिखाए!

इस प्रकार मेवाड़ और मुगलों के मध्य उस युद्ध की आधारशिला रखी गई, जो कि भारतवर्ष में इस्लाम के विरुद्ध मेवाड़ का अंतिम संघर्ष सिद्ध होना था। यह एक ऐसा अध्याय है, जो औरंगजेब को पराजित कर उसे दक्षिण तथा पूर्वी भारत की ओर धकेलकर मेवाड़ की महानता को स्थापित करता है। जजिया लगने के लिए यह आवश्यक हो गया था कि औरंगजेब, मेवाड़ पर चढ़ाई कर, राज सिंह को पराजित करे।

राज सिंह मेवाड़ के ऐसे अंतिम महान राजा थे, जिन्होंने मेवाड़ की सैन्यशक्ति के बल पर मुगलों को न केवल मुँहतोड़ जवाब दिया, वरन् उन्हें सदा के लिए पराजित कर दिया। राज सिंह ने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष में अपनी महती भूमिका का निर्वहन किया। मराठा शक्ति के उदय के साथ हिंदू धर्मध्वज शिवाजी महाराज और उनके पेशवाओं के हाथों में चला गया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राजस्थान से मुगलों को बाहर निकालने में राज सिंह का योगदान न केवल अति महत्त्वपूर्ण था, वरन् पूरे भारतवर्ष में हिंदुओं द्वारा मुगलों के विरुद्ध संघर्ष का सूत्रपात भी था।

राज सिंह तथा औरंगजेब के मध्य 1679 से 1680 ईसवी, अर्थात् दो वर्ष तक चले निरंतर युद्ध के परिणामस्वरूप औरंगजेब की सेना, पराजित व अपमानित करके राजस्थान की सीमाओं से बाहर धकेल दी गई।

अंतिम मुगल-मेवाड़ युद्ध
औरंगजेब ने मेवाड़ के विरुद्ध जो युद्ध की तैयारी की थी, वह किसी विशाल साम्राज्य से लड़ने के लिए काफी थी, न कि एक छोटे जमींदार के लिए, जबकि मेवाड़ मुगलों के तथाकथित साम्राज्य के सामने एक छोटा सा राज्य था और स्वयं मुगलों के अनुसार, यह केवल एक छोटी जमींदारी से अधिक नहीं था।

औरंगजेब की तैयारी ही प्रमाण है कि मुगल, मेवाड़ से कितना आशंकित रहते थे, तथा मुसलमान इतिहासकार किस प्रकार हिंदुओं के सामर्थ्य को कम लिखते थे।

औरंगजेब ने मेवाड़ में सेना समेत पदार्पण करने से पूर्व अपने पुत्र अकबर को बंगाल से, अजीम को काबुल से तथा मुअज्जम को दक्षिण से अपनी सहायता हेतु बुलवा लिया।

राज सिंह ने भी औरंगजेब के आक्रमण के प्रत्युत्तर में पूरे कुल व सामंतों को लामबंद कर लिया। उन्होंने राजस्थान के समस्त छोटे-बड़े राजाओं तथा सामंतों को हिंदू धर्म के रक्षार्थ साथ आने का निमंत्रण देते हुए दूतों को वहाँ भेजा तथा उनकी सहायता से एक विशाल सेना खड़ी कर ली। राज सिंह के जीवन तथा उनके कार्यों ने राजस्थान के युवाओं को इतना प्रेरित कर दिया था कि उन सभी में हिंदू धर्म को आहत करनेवाले विधर्मियों का प्रतिकार करने की प्रबल इच्छाशक्ति जाग्रत् हो गई।

भील, पलिंदा और पालिपट लोगों ने हिंदूपत अर्थात् हिंदुओं के सर्वे-सर्वा के साथ अपने हजारों हृदय और धनुष-बाण थामे सैनिक समर्पित कर दिए। सिसोदिया तथा राठौड़ रक्त के वंशज, राज सिंह ने विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली तथा बर्बर शासकों के विरुद्ध मेवाड़ का केसरिया ध्वज पूरे साहस, शक्ति और सम्मान के साथ ऊँचा उठा दिया था।

मेवाड़ के सेनापति के रूप में राज सिंह की प्रथम राजाज्ञा थी–उनके महान पूर्वजों की समतल भूमि को छोड़ साधारण जनता द्वारा पर्वतों की ओर पलायन।

किसान, व्यापारी, ग्वाले, लोहार इत्यादि समस्त छत्तीस जातियों ने अपने पूरे-के-पूरे गाँव खाली कर दिए और मैदानों को छोड़कर पर्वतीय क्षेत्रों में बस गए, जहाँ एक बार फिर भीलों ने उनका साथ दिया, उनके भोजन-पानी और रक्षा की व्यवस्था की और एक बार पुनः इस कृत्य से मुगल सेना को कष्टों का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके लिए भोजन-पानी इत्यादि की भयंकर समस्या उत्पन्न हो गई, जो उन्हें अजमेर से मँगवाना पड़ता था और मेवाड़ के वीर गुरिल्ला युद्ध में उस सामग्री को लूट लेते थे।

राज सिंह ने अपनी सेना को तीन भागों में विभक्त कर रखा था। उनके ज्येष्ठ पुत्र जयसिंह को अरावली की चोटियों पर तैनात किया गया, ताकि पर्वत-श्रृंखला के किसी भी ओर से आनेवाले शत्रु पर आक्रमण किया जा सके। कनिष्ठ पुत्र भीम सिंह को मेवाड़ के पश्चिमी भाग में भेजा गया था, जिससे वे आबू में तैनात रहकर मारवाड़ तथा गुजरात के हिंदू शासकों से संपर्क में रहें तथा समय आने पर उनकी मदद ले पाएँ। महाराणा राज सिंह ने मेवाड़ की सेना की प्रमुख वाहिनी को अपने साथ अरावली पर्वत-श्रृंखला के बाएँ भाग में रखा, ताकि मुगलों द्वारा न किसी से संपर्क किया जा सके और न ही पीछे की ओर भागा जा सके।

औरंगजेब, उदयपुर के बाहरी हिस्से देबारी की ओर से आते हुए रुक गया, जहाँ जयसिंह उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उस घाटी से आने के बजाय उसने अपने सेनापति टाइबर खान और अपने पुत्र अकबर को 50,000 सैनिकों के साथ उदयपुर भेजा। संभव है, औरंगजेब को इस विषय में पूर्व सूचना मिल गई हो और तभी उसने अपनी पूरी सेना को भेजने के बजाय केवल पचास हजार सैनिकों को ही भेजा और इसी कारण उसकी पूरी सेना नष्ट होने से बच गई।

शहजादा अकबर, उदयपुर में बिना किसी विरोध के घुस गया। महल, उपवन और झीलों के मध्य बने महल उसने सब कुछ देखा, किंतु वहाँ उसे एक भी जीवित प्राणी नजर नहीं आया। अकबर ने उदयपुर में अपना पड़ाव डाला, साथ ही ताज खाँ तथा रोहिल्ला खाँ को सभी मंदिरों एवं मूर्तियों को तोड़ने का आदेश दिया। उस समय उदयपुर में अनुमानतः 200 मंदिरों को धराशायी कर दिया गया। इन मंदिरों पर आक्रमण के समय कई छोटे-बड़े संघर्ष हुए, जिनमें प्रत्येक मंदिर में औसतन 20 से 50 मेवाड़ी हिंदू अपने से तीन-चार गुना मुसलमानों को मारकर वीरगति को प्राप्त हुए।

प्रसिद्ध जगदीश मंदिर के पास हुआ यह युद्ध बहुत भीषण था और इसका उल्लेख होना आवश्यक है।

उदयपुर राजमहल के रक्षक नरु बारहठ नामक सेनानी थे, जब राज सिंह ने महल छोड़कर पर्वतों की ओर प्रस्थान किया तो किसी ने नरु के साथ उपहास करते हुए कहा कि जीवन भर तुमने यहीं से उपहार इत्यादि लिये तो क्या अब इन महलों और मंदिरों के रक्षार्थ तुम यहाँ नहीं रुकोगे ?

स्वाभिमानी नरु ने अपने परिवार को राणा के साथ पर्वतों में भेज दिया और स्वयं जगदीश मंदिर के दरवाजे पर कुछ चुने हुए सैनिकों के साथ वीरतापूर्वक डट गए। जब ताज खाँ और रोहिल्ला खाँ जगदीश मंदिर पहुँचे तो नरु और उनके 20 योद्धाओं ने 500 से अधिक मुगल सैनिकों को समाप्त करने के पश्चात् ही अपने प्राण त्यागे।

इस प्रकार मेवाड़ के लोग मुगलों को अपने शौर्य और साहस से उनके भविष्य का पूर्वाभास करवाते रहते थे। औरंगजेब देबारी से उदयसागर गया, जहाँ उसने स्वयं शिव और विष्णु के तीन सुंदर मंदिरों को ध्वस्त करवाया। राज सिंह अपने सैनिकों के साथ आगे बढ़े और उन्होंने औरंगजेब की सेना को कुछ इस प्रकार घेर लिया कि न तो औरंगजेब आगे बढ़ पाया और न ही शहजादा अकबर उदयपुर से वापस लौटकर मदद करने को आ सके।

राज सिंह रणनीति के कुशल जानकार थे। उन्हें मेवाड़ के भूगोल की पूरी जानकारी थी। राज सिंह चाहते थे कि उदयपुर की सीमाओं में फँसा अकबर कोई मूर्खता करे और हुआ भी वही। कुछ सप्ताह प्रतीक्षा करने के पश्चात् अकबर ने एक आत्मघाती निर्णय लिया। अकबर ने बाहर निकलने के लिए गोगूँदा के पर्वतों और घाटियों को चुना, जहाँ घाटियों और पर्वतों के मध्य छुपे भील और राजकुमार जयसिंह की संयुक्त सेना अकबर की प्रतीक्षा कर रही थी।

भीलों की साहसी सेना के साथ उन पर्वतीय क्षेत्रों के भूमिपतियों ने अकबर के बचकर निकलने के सभी रास्ते बंद कर दिए थे। उन्होंने विस्तृत घाटियों में भीतर आने तथा बाहर निकलने के सभी रास्तों, जिन्हें 'नाल' कहा जाता था, उनको पेड़ों व पत्थरों से अवरुद्ध कर दिया।

घने पेड़ों में पहाड़ की चोटियों पर बनी चौकियों पर बैठे सैनिक अपने बाणों से शत्रु का संहार कर रहे थे और दूसरी ओर राजकुमार ने घाटी में आने-जाने के रास्तों में अपने योद्धा बैठा रखे थे, जो मुगलों का आवागमन रोके हुए थे। मृत्यु अब मुगलों के सिर पर नाच रही थी।

मुगल सेना एक पाश में बंध चुकी थी तथा भूख-प्यास से व्याकुल, निरंतर अपने अंत के समीप पहुँचती जा रही थी, तब राजकुमार जयसिंह ने उन पर दया दिखाई और अकबर के संधि प्रस्ताव को मानते हुए उन्हें जीलवाड़ा होते हुए चित्तौड़ की ओर जाने का सुरक्षित मार्ग दे दिया।

उससे पहले जयसिंह ने अकबर को शपथ दिलवाई कि वह कभी मेवाड़ की ओर मुँह करके भी नहीं सोएगा। इधर अकबर अरावली के दरों में फँसा था, उधर एक और मुगल सेनापति दिलेर खाँ, मारवाड़ की ओर से, देसुरी की नाल होते हुए मेवाड़ के भीतर अकबर की सहायता के लिए निकला।

मेवाड़ी सेना ने दिलेर खाँ को बिना किसी संघर्ष के भीतर आने दिया, जब वह एक संकीर्ण घाटी में पहुँच गया तो विक्रम सोलंकी और गोपीनाथ राठौड़ नाम के दो साहसी मेवाड़ी सरदारों ने मुगलों की उस टुकड़ी का संहार कर दिया। मेवाड़ के हाथों में बड़ी मात्रा में मुगलों के शस्त्रास्त्र तथा धन भी आ गया। अरावली के दर्रो में मुगलों को फँसाने की योजना अत्यंत कुशलता के साथ क्रियान्वित की गई तथा मुगलों को इस अभियान में भारी क्षति पहुँची।

भिन्न-भिन्न स्थानों पर मुगल या तो फँसे हए थे या मारे जा रहे थे। यही उपयुक्त समय है, सोचकर राज सिंह ने औरंगजेब पर उदयपुर और चित्तौड के पर्वतों के मध्य किसी स्थान पर स्वयं आक्रमण किया।

ब्रिटिश इतिहासकर रॉबर्ट ऑरमे ने उस समय के ऐतिहासिक पक्ष पर काफी अध्ययन किया है, उनके कथन को उद्धत करते हुए टॉड कहते हैं–

“मुगल सेना बड़ी मुश्किलों से संकीर्ण घाटियों से होती हुई आगे बढ़ी, किंतु उन्होंने बुद्धि का लेशमात्र भी प्रयोग नहीं किया, परिणामतः जिस सेना का नेतृत्व स्वयं औरंगजेब कर रहा था, उसे भरपूर कठिनाई का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर राजपूतों ने औरंगजेब के घाटी से वापस लौटने के रास्तों को बड़े-बड़े पेड़ों और पाषाणखंडों से अवरुद्ध कर दिया और ऊपर से तीरों व बाणों की बौछारों से मुगलों का संहार करने लगे। अब मुगल न आगे जाने के रहे, न ही पीछे लौटने के। भीतर और बाहर सभी ओर से मुगलों ने स्वयं को फँसा हुआ पाया।”

औरंगजेब की एक सुंदर यवन पत्नी थी उदैपुरी, जो इस भीषण युद्ध में उसके साथ आई थी। वह अपने सेवकों के साथ पर्वत के दूसरी ओर फँस गई। उसके रक्षक पर्वत के इस ओर अटके हुए थे, अतः रानी के जीवन को खतरा देखते हुए सेवकों ने अपनी रानी समेत समर्पण कर दिया। इस बेगम को राणाजी के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिन्होंने न केवल सम्मान के साथ उसका स्वागत किया, बल्कि यथोचित ध्यान भी रखा। इस बीच औरंगजेब ने भी भूख व प्यास का स्वाद अच्छे से चख लिया था, अतः राणा ने करुणा दिखाते हुए मात्र एक-दो दिन और उसे रोके रखा और तत्पश्चात् अपने सामंतों को अपनी-अपनी चौकियों से पीछे हटने का आदेश दिया, ताकि बादशाह स्वयं अपनी सेना के साथ सुरक्षित वहाँ से निकल जाए। जैसे ही औरंगजेब खतरे से बाहर हुआ तो राणा ने कुछ विश्वस्तों की सहायता से उसकी पत्नी को ससम्मान उसके पास पहुँचा दिया। 

इसके बदले में राणा ने औरंगजेब से केवल एक ही शर्त रखी थी कि औरंगजेब कभी भी हिंदू धर्म में पवित्र माने जाने वाले पशुओं को आहत नहीं करेगा; किंतु औरंगजेब, जो अपने स्वार्थ के अतिरिक्त किसी भी चीज में विश्वास नहीं करता था, उसने राणा की उदारता तथा सहनशीलता का प्रत्युत्तर बदला लेने की अपनी कत्सित नीतियों से किया और युद्ध को अनवरत जारी रखा।

कुछ ही समय बाद वह पुनः पर्वतों पर अपनी सेना लेकर चढ़ आया।

औरंगजेब, सिसोदिया और राठौड़ योद्धाओं के साहस और शौर्य के सामने टिक नहीं पाया, यद्यपि उसके पास फ्रांसीसियों द्वारा संचालित तोपखाना था, किंतु मुगल सेना धर्मनिष्ठ और वीर राजपूतों के सामने विवश होकर मरती रही। औरंगजेब काफी अपमानित हुआ और उसकी पूर्ण पराजय हुई। सेना, धन और सैन्य उपकरणों की भारी क्षति के पश्चात् उसे अपनी सेना के साथ बहुत लज्जास्पद परिस्थितियों में पीछे हटना पड़ा।

राज सिंह ने मुगलों के हाथी-घोड़े-शस्त्रास्त्र-रथादि सभी सैन्य वस्तुओं को अपने हस्तगत कर लिया। राज सिंह, उनके पुत्रों एवं सामंतों द्वारा औरंगजेब और उसके पुत्रों का अपमान यहीं समाप्त नहीं हुआ, यह आगे भी दो वर्षों तक चला। आगे भी कई छोटे-बड़े युद्ध लड़े गए, जिनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण युद्धों का उल्लेख यहाँ संक्षेप में किया जा रहा है।

औरंगजेब जैसे-तैसे बच करके चित्तौड़गढ़ की सुरक्षित दीवारों में पहुँचा, वह अपने पुत्रों अकबर तथा मुअज्जम से मिला। इतनी बुरी तरह अपमानित और पराजित होने के पश्चात् भी वो अपने बर्बर आचरण से नहीं चूका और फिर एक बार उसने हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करने का घृणित कार्य किया।

बढ़ते हुए राजपूतों को कैसे रोके, इस विचार के साथ अपने घावों को मरहम-पट्टी करते हुए, थका-हारा, बचकर भागते हुए भी उसने अपनी नीचता नहीं त्यागी। चित्तौड़ और उसके आसपास कुल 76 हिंदू एवं जैन मंदिरों को उसने ध्वस्त करवाया। इसी बीच साँवलदास राठौड़ नाम के एक मेवाड़ी सामंत, जो जयमल राठौड़ के वंशज थे, उन्होंने मुगलों की सहायता हेतु अजमेर से चित्तौड़ पहुँचनेवाली खाद्य एवं सैन्य सामाग्री को लूट-लूटकर मुगलों को तंग करके रख दिया।

इन घटनाओं से औरंगजेब को अपनी स्वयं की सुरक्षा की चिंता हुई। मेवाड़ के इस भयावह युद्ध अभियान को अपने पुत्रों के भरोसे छोड़ कर, उसने पीछे हटते हुए अजमेर जाकर शरण ली। प्रतिशोध की आग में जलते हुए, अपमानित, दो बार महाराणा से अभयदान प्राप्त कर, अपनी खोई हुई पत्नी को ससम्मान वापस पाकर, अपनी सेना, धन, शस्त्रादि व धर्मांधता तथा अहंकार के मानमर्दन के पश्चात्, तातारी हत्यारे औरंगजेब को महान बाप्पा रावल के पवित्र और शूरवीर वंशजों ने मेवाड़ की पावन धरा से सदा के लिए बाहर निकाल दिया, लेकिन हमारे इस अभागे देश के इतिहास में इन महान योद्धा और कुशल प्रशासक, महाराणा राज सिंह के विषय में पढ़ाना तो दूर, इनका नाम तक मिटा दिया गया।

एक ऐसे महाराणा, जिन्होंने अपने पूर्वजों से विरासत में प्राप्त सुख और शांति में विलासी जीवन व्यतीत न करके धर्म के रक्षार्थ, औरंगजेब की धर्मांधता से प्रेरित महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण रूप से पराजित किया। अजमेर पहुँचकर औरंगजेब ने रोहिल्ला खाँ को बारह हजार सेना के साथ साँवलदास को पकडने और उनकी हत्या करने हेतु भेजा। साँवलदास की सहायता हेतु मारवाड़ की सेना आगे आई और इनकी संयुक्त सेनाओं ने मुगलों को मांडल के युद्ध में पराजित कर उन्हें फिर से अजमेर तक धकेल दिया।

जब राणा और उनके ज्येष्ठ पुत्र जयसिंह ने औरंगजेब को पूर्व में पराजित कर दिया, तब उनके कनिष्ठ पुत्र भीम सिंह ने पश्चिमी क्षेत्र में अपने शौर्य का परिचय देते हुए गुजरात पर आक्रमण किया और उसे हस्तगत कर लिया। भीम ने ईडर पर भी आक्रमण किया और वहाँ के मुगल किलेदार वसाल हसन और उसकी सेना को समाप्त कर दिया। भीम ने वडनगर और पाटन पर आक्रमण करके उन्हें भी हस्तगत कर लिया। सिद्धपुर, मोढ़ासा इत्यादि पश्चिमी गुजरात के नगरों का भी यही हाल रहा। भीम सूरत की ओर अग्रसर हो ही रहे थे, जब राज सिंह ने उन्हें वापस बुलवा लिया, क्योंकि गुजरात के सुल्तान और स्थानीय नवाब ने राणा के आगे सहायता की गुहार लगाई थी। भीम निष्ठावान और सशक्त हिंदू राजकुमार थे, जिन्होंने हिंदू मंदिरों के ध्वंस के प्रत्युत्तर में दक्षिणी राजस्थान एवं उत्तरी गुजरात में मस्जिदों के साथ वही किया, जो मुगलों ने हमारे धर्मस्थलों के साथ किया था।

श्यामलदास 'वीर विनोद' में उल्लेख करते हैं–“महाराणा ने अपने पुत्र भीम सिंह को 4,000 अश्वारोहियों के साथ वडनगर, गुजरात भेजा, जहाँ उन्होंने 300 मस्जिदों को तोड़ा और वहाँ से 40,000 रुपए हरजाने में वसूल कर विजयी होकर लौटे।”

महाराणा के नेतृत्व में हिंदुओं के प्रतिकार का एक और प्रकरण है, जिसका उल्लेख होना आवश्यक है, इसके पश्चात् हम महाराणा और उनके तीन पुत्रों द्वारा लड़े गए तीन मुख्य युद्धों के विषय में बात करेंगे, जिनके कारण मेवाड़ की पूर्ण विजय हुई और औरंगजेब को राज सिंह से संधि करनी पड़ी। एक संधि, जिसके कारण मेवाड़ की सुरक्षा तथा संपन्नता सुनिश्चित हुई और राज सिंह ने मुगलों को झुकाकर यह संधि की।

दो वर्ष तक मेवाड़-मुगल संघर्ष में राज सिंह, उनके दोनों पुत्रों तथा मेवाड़ के सभी पुराने सामंतों-मंत्रियों ने एक छत्र के नीचे हिंदू गौरव के निमित्त, निर्दयी औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध किया, जिसके कट्टरपंथी व जिहादी मंतव्य अब सबके सामने आ चुके थे। ऐसे ही एक मंत्री थे, दयाल शाह नामक एक जैन योद्धा, जिन्होंने राणा के प्रति निष्ठा रखते हुए ऐसा रण-कौशल दिखाया कि वे राणा के विश्वासपात्र बन गए थे। 

दयाल शाह एक उड़न दस्ते का नेतृत्व करते थे, जिसका कार्य था, शत्रुओं को अपने बाणों से विदीर्ण कर वहाँ से शीघ्रता से निकल लेना। इस युक्ति से उन्होंने मुगलों को बहुत त्रस्त कर दिया था। राज सिंह ने दयाल शाह के साथ एक बड़ी टुकड़ी पूर्व में मालवा की ओर भेजी और दयाल शाह ने नर्मदा तथा बेतवा नदियों तक के विस्तार में अपने शौर्य और मेवाड़ के नाम का डंका बजा दिया।

जेम्स टॉड, कुँवर भीम सिंह तथा दयाल शाह द्वारा मेवाड़ के प्रतिकार को इस्लामी दमन का बदला बताते हुए लिखते हैं–

“पराजित को अभयदान देने के राजपूतों के चरित्र के विपरीत, मेवाड़ के योद्धाओं और सेनानायकों ने औरंगजेब के कपटपूर्ण व्यवहार एवं उसकी दमनकारी नीतियों से बाध्य होकर प्रतिकारात्मक कार्यवाही की। दयाल शाह ने सारंगपुर, देवास, सरोंग, मांडू, उज्जैन और चंदेरी इत्यादि पर आक्रमण किए और मुगलों के विरोध का प्रत्युत्तर अपनी तलवार से दिया। 

इतिहास के उल्लेखानुसार–
“पुरुष अपने परिवारों को छोड़ भाग खड़े हुए, जिन वस्तुओं को साथ ले जाना संभव नहीं था, उन्होंने उसे आग लगा दी। काजियों को बंदी बना लिया गया था और उनकी दाढ़ियाँ मुँडवा दी गईं, कुरान की प्रतियाँ कुओं में डाल दी गईं।”

इस बार मेवाड़ की सेना ने इस्लामी आक्रांताओं को उनकी अपनी भाषा में प्रत्युत्तर दिया था और उनके धर्म पर भी दया नहीं दिखाई। दयाल शाह ने सैकड़ों मस्जिदों को ध्वस्त किया।

दयाल शाह का यह तांडव रुक ही नहीं रहा था। उन्होंने पूरे मालवा को ही श्मशान भूमि-सा बना दिया था। मालवा को जी भर के लूटा गया तथा मेवाड़ के कोषागार को उस लूट से भर दिया गया। यह बिल्कुल उसी तरह था, जैसा कि प्रताप के समय में मालवा से लूटकर लाए गए धन को भामाशाह ने प्रताप को मेवाड़ की सेवा हेतु समर्पित कर दिया था, यद्यपि मात्रा में वह इतना बड़ा नहीं था।

मालवा से लूटे गए धन और साधन इत्यादि को लेकर दयाल शाह, राजकुमार जयसिंह से चित्तौड़ के पास मिले और वहीं चित्तौड़ के निकट औरंगजेब के पुत्र अजीम को युद्ध में भारी टक्कर दी। जब दयाल शाह जयसिंह तक पहुँचे, तब जयसिंह ने चित्तौड़ में 13,000 अश्वारोहियों तथा 26,000 सैनिकों के साथ अपना पड़ाव डाला हुआ था।

चित्तौड़ में हुए इस भीषण युद्ध से एक रात्रि पूर्व, मुखिम और गंगा सिंह शक्तावत, सलूंबर के रतन सिंह चूँडावत, सादड़ी के चंद्रसेन झाला और बेदला के सबल सिंह चौहान ने मेवाड़ की सेना को उत्साहित करने के लिए अपने भाषण दिए, जो मेवाड़ के इतिहास में संकलित हैं। जुलाई 1680 ईसवी के एक दिन, मेवाड़ी सेना चित्तौड़ दुर्ग के नीचे एकत्र हुई और वर्षा का लाभ उठाते हुए उन्होंने वहाँ उपस्थित मुगलों का जमकर नरसंहार किया।

मेवाड़ी सेना, मुगलों से लूटे हुए हाथी, अश्व, अंगाड़े, तंबू, शस्त्रास्त्र इत्यादि लेकर राजकुमार जयसिंह के पास लौटे तो राजकुमार ने इन सब वस्तुओं को अपने नायकों इत्यादि में वितरित कर दिया। चित्तौड़ का दुर्ग, एक बार पुनः 500 वर्षों के रक्तरंजित संघर्ष के पश्चात् राजपूतों ने कभी न खोने के लिए विजय कर लिया था।

अजीम अपनी जीवनरक्षा हेतु चित्तौड़ से भाग निकला और मेवाड़ी सेना ने रणथंभौर दुर्ग तक उसका पीछा किया, किंतु अजीम दुर्ग में घुसने में सफल हो गया और स्वयं को वहीं बंद कर लिया। इस समय महाराणा राज सिंह, मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा, अर्थात् पश्चिमी मेवाड़ पर स्थित थे। राज सिंह ने गोड़वाड़ के मुख्य नगर गणोड़ा में मुगलों को पराजित कर मारवाड़ के राठौड़ वंश के कुँवर अजीत सिंह की रक्षा की शपथ के निर्वहन हेतु किया वचन पूरा किया। दुर्गादास के नेतृत्व में मारवाड़ के वीरों ने मेवाड़ी सेना के साथ मिलकर मुगल सेना से लोहा लिया और उन्हें बुरी तरह धराशायी कर मेवाड़ और मारवाड़ की सीमाओं से बाहर फेंक दिया।

उत्तरी-मध्य मेवाड़ के किसी क्षेत्र में राजकुमार भीम अपने सिसोदिया योद्धाओं के साथ एकत्रित हुए और उनके साथ मारवाड़ के राठौड़ योद्धा भी आए, सभी ने एक साथ शहजादा अकबर तथा उसके सेनापति टाइबर खाँ पर आक्रमण करके बुरी तरह पराजित किया। इस विजय का श्रेय उन राजपूत सेनानियों को जाता है, जिन्होंने पहले तो मुगलों से पाँच सौ ऊँट लूट लिये और फिर रात्रि के समय उन ऊँटों पर मशालें बाँधकर उन्हें मुगलों के खेमे में छोड़ दिया, जिससे मुगलों में हाहाकार मच गया और इसी का लाभ उठाते हुए मेवाड़ी सैनिकों ने मुगलों पर औचक आक्रमण कर उन्हें पराजित कर दिया।

1680 ईसवी में भागा औरंगजेब, मेवाड़ से इतना भयभीत हो गया था कि उसने 1707 ईसवी में अपनी मृत्युपर्यंत पुनः कभी मेवाड़ की ओर आँख उठाकर नहीं देखा। राज सिंह और उनके सरदारों ने मारवाड़ के राठौड़ों के साथ मिलकर मुगलों की महान सत्ता के भ्रम का सदा के लिए अंत कर दिया। इन्होंने मुगलों की सैन्यशक्ति तथा साधनों इत्यादि को लूटकर इतनी हानि पहुँचाई कि उन्हें दक्षिण एवं पूर्व के अभियान से पूर्व स्वयं को सँभालने में काफी लंबा समय लग गया।

औरंगजेब की धर्मांधता ने ऐसे नए संघर्ष को जन्म दिया, जिससे 150 वर्षों से चल रहे मुगल-राजपूत संबंधों के समीकरण का अपूरणीय बिगाड़ हो गया। मारवाड़ और मेवाड़ राजघराने पहले से ही औरंगजेब से अलग हो चुके थे और जयपुर के राजा रामसिंह कच्छावा अन्यमनस्कता से बैठे थे। अब औरंगजेब के पास हिंदुओं को सँभालने हेतु कोई हिंदू राजा नहीं था। औरंगजेब द्वारा मंदिरों को क्षतिग्रस्त करने तथा जजिया कर लगाने के घृणित कृत्यों के चलते भारत भर में हिंदुओं ने विद्रोह कर दिया।

भारत के इस्लामीकरण की औरंगजेब की मतांधता ने हिंदू शक्तियों को तब एकीकृत कर दिया, जब राज सिंह ने श्री गुरु गोबिंद सिंह महाराज, पुणे के छत्रपति शिवाजी महाराज के अतिरिक्त राजस्थान के सामंतों और राजपूत राजाओं को भी पत्र लिखकर मुगलों को भारतभूमि से सदा के लिए बाहर कर देने हेतु पत्र लिखे। इससे हजार वर्षों से भारत में चले आ रहे हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की धारा को सदा के लिए हिंदुओं के पक्ष में मोड़ दिया होता, यदि महाराणा राज सिंह के निकट रहने वाले कुछ हिंदुओं ने अपनी आत्मा का विनिमय नहीं किया होता।

3 नवंबर, 1680 को मुगलों को पूर्णतया राजस्थान से बाहर कर दिया गया और राज सिंह, भारत से इस्लामी शासन का संपूर्ण अंत करने की भूमिका बाँध रहे थे। कुंभलगढ़ के निकट ओढ़ा नाम के गाँव में राज सिंह अपने मित्र एवं विश्वासपात्र आसकरण चारण के साथ भोजन करने बैठे। वे आसकरण को अपना भाई मानते थे। दोनों ने साथ बैठकर खिचड़ी खाई और भोजन में विष मिला होने के कारण कुछ ही क्षणों में दोनों की मृत्यु हो गई। मात्र 51 वर्ष की आयु में इन महान महाराणा का आकस्मिक प्राणांत अपने ही लोगों के विश्वासघात के चलते हुआ।

औरंगजेब द्वारा जोधपुर एवं जयपुर के राजपूत राजाओं को विष देकर उनकी हत्या करने एवं उसके परदादा अकबर द्वारा भी इसी प्रकार से अपने शत्रुओं को रास्ते से हटाने के तरीकों से स्पष्ट हो जाता है कि महाराणा राज सिंह की मृत्यु में भी औरंगजेब का ही हाथ था। इस प्रकार मानव इतिहास के एक महान राज्य में सूर्यास्त हो गया, जहाँ एक से बढ़कर एक महान और प्रतापी राजाओं ने मातृभूमि और धर्म के प्रति अपनी निष्ठा एवं बलिदान के कीर्तिमान स्थापित किए थे। राज सिंह ने अपने पूर्वजों की कीर्ति और ख्याति को सदैव शिरोधार्य रखा।

बाप्पा रावल के समान उन्होंने हिंदुओं से आपसी मैत्री कर भारत पर बर्बर इस्लामी आक्रांताओं को रोका।

कुंभा के समान उनकी रुचि भी विभिन्न विषयों में थी, इसीलिए उन्होंने मेवाड़ में कला और स्थापत्य के उत्थान पर विशेष ध्यान दिया। मेवाड़ में अकाल के समय राजसमंद झील का निर्माण इसका विशेष उदाहरण है।

सांगा के समान ही उन्होंने अपनी किसी भी सैन्य दुर्बलता या वैचारिक द्वंद्व को औरंगजेब की इस्लामी महत्त्वाकांक्षाओं के विरुद्ध खड़ा होने में स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। चारुमति की रक्षा हो या श्रीनाथजी एवं गोस्वामियों को मेवाड़ में शरण देनी हो या जोधपुर के राजकुमार अजीत सिंह को राजकीय आश्रय देना, ये सभी कृत्य उनकी निर्भीकता को प्रदर्शित करते हैं, जो कदाचित् उन्हें अपने महान पूर्वज, राणा सांगा से प्राप्त हुई थी। सांगा की ही भाँति राज सिंह समूचे भारत के हिंदुओं के सिरमौर बन गए।

प्रताप की भाँति, राज सिंह ने बर्बर इस्लामी शक्तियों के सामने कभी अपने दृढ़ निश्चय व संकल्प को कम नहीं होने दिया, यद्यपि राज सिंह ने प्रताप की भाँति कभी भी आर्थिक संघर्ष नहीं देखा था, किंतु राज सिंह के समक्ष जो संकट था, वो प्रताप से कहीं अधिक विराट व व्यापक भी था।

राज सिंह पूरे जीवन एक ऐसे अडिग पर्वत की भाँति खड़े रहे, जिनकी छत्र छाया में संतप्त हिंदू आजीवन शरण पाते रहे। एक राजा, जिन्होंने उदयपुर राजमहल के वैभव-विलास को त्यागकर, अरावली के जंगलों में अपना डेरा बनाया तथा उन विपरीत परिस्थितियों में भी औरंगजेब के विरुद्ध अपना अभियान जारी रखा।

एक समर्पित हिंदू, जिन्होंने देवताओं के सम्मान की रक्षा हेतु खड्ग उठाई, जबकि कोई अन्य हिंदू राजा कुछ भी करने में घबरा रहा था। एक करुणामय शासक, जिन्होंने मेवाड़ में अकाल की परिस्थिति में अपनी प्रजा की सेवा हेतु अपने राजकोष के द्वार खोल दिए।

एक सम्माननीय व्यक्तित्व, जो चारुमति के आग्रह पर उनके रक्षार्थ आगे आए।

एक पारिवारिक व्यक्ति, जिन्होंने उस समय की सबसे शक्तिशाली एवं दुर्दांत सेना से, बालक अजीत सिंह की रक्षा का बीड़ा उठाया। एक दूरदृष्टा राजा, जिन्होंने इस्लामी आक्रमणों के सत्य को समझा और कभी भी किसी लालच अथवा आलस्य के वश, मुगलों के मिथ्याचारी भ्रम में नहीं फँसे। इसके विपरीत, उन्होंने अन्याय के विरुद्ध सभी हिंदू राजाओं को एकीकृत किया। मेवाड़ के सिसोदिया राजाओं के मुसलमानों से विरोध की अमर गाथा का अंत करने के लिए महाराणा राज सिंह के अतिरिक्त और कौन हो सकता है, जिनके माहात्म्य से इस गाथा को पूर्ण किया जाए !

सतत विरोध, सबल संघर्ष व अप्रतिम विजय की एक ऐसी अद्भुत गाथा, जिसमें सामने खड़ा शत्रु अधिक शक्तिशाली एवं कपटी आक्रांता था, जिसमें मानवीय भावनाओं एवं सिद्धांतों का अभाव था और जो अपनी धर्मांधता में निर्मम हत्याएँ करने में ही अपने जीवन की सार्थकता समझता था।

मेवाड़ के सिसोदिया राजपूत, हमारी महान वैदिक धरती पर हुए इस्लामी आक्रमण का विरोध करने के लिए किसी दैवी शक्ति द्वारा भेजे गए महापुरुष थे।

बाप्पा रावल से महाराणा राज सिंह तक, इन्होंने सैनिक का सैनिक से, लोहे का लोहे से, अग्नि का अग्नि से, पशु का पशु से, छल का छल से, साहस का साहस से व रक्त का रक्त से प्रतिकार लिया और 1,000 वर्षों तक हिंदू धर्म पर हर आघात को अपनी छाती पर सहा।

मेवाड़ के महाराणाओं द्वारा इस्लामी आक्रांताओं के साहसपूर्ण विरोध की इस गाथा को मैं भरपूर तृप्ति, गौरव तथा कृतज्ञता की भावना के साथ संपूर्ण कर रहा हूँ। हिंदुओं की इस गौरवगाथा को समाप्त करने हेतु गौरवशाली, करुणामय एवं शक्तिशाली महाराणा राज सिंह की कथा से सुंदर और क्या अध्याय हो सकता था !

मेरा सामर्थ्य नहीं कि इन देवपुरुषों की यशोगाथा के साथ न्याय कर सकूँ, किंतु यह पुस्तक, यदि हिंदू समाज को इन महापुरुषों के त्याग व संघर्षों की छोटी सी झलक भी दिखा सकी, तो मैं इस प्रयास को सार्थक समझूगा।